प. बंगाल में डॉक्टर और नर्सों को बलि का बकरा बनाया जा रहा है, सच कब तक छिपाएंगी दीदी ?

    दिनांक 06-मई-2020
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 पाञ्चजन्य प्रतिनिधि
चायनीज वायरस के संकट को लेकर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी सच छिपा रही हैं। इस कारण पश्चिम बंगाल की जनता का उनसे भरोसा उठता जा रहा है। कोरोना से हुई मौतों के आंकड़े कम दिखाकर ममता जताना चाहती हैं कि वह महामारी से बेहतर तरीके से निपट रही हैं लेकिन पश्चिम बंगाल का सच इसके उलट है

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पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर से राज्य के लोगों का भरोसा तेजी से उठता जा रहा है। लोगों का उनसे पहला सवाल यही है कि दिल्ली के निजामुद्दीन मरकज से आने वाले जमाती कहां गए ? क्या उनकी जांच की गई ? अगर जांच हुई तो इसका खुलासा क्यों नहीं किया गया ? इसके अलावा, खाद्य सामग्री वितरण में घपले के आरोप भी लग रहे हैं। अंत्योदय और बीपीएल कार्डधारकों को मुफ्त चावल, दाल और आटा नहीं मिला। अधिकांश जिलों में राशन दुकानों ने अनुमान से भी कम राशन बांटा। लाभार्थियों ने आवाज उठाने की कोशिश की तो पुलिस ने उन्हें चुप करा दिया। राज्यपाल और केंद्र सरकार से तकरार, कोरोना से मौतों की पुष्टि के लिए अलग से आडिट कमेटी गठित कर देना, इन्हीं कारणों से लोगों को की किसी बात पर विश्वास नहीं हो रहा है। रात के अंधेरे में विभिन्न स्थानों पर रोजाना पुलिस और तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ता शवों को दफन व अंत्येष्टि करते देखे जा रहे हैं। फिर भी राज्य में कोरोना संक्रमण से मरने वालों का आंकड़ा 20 से ज्यादा नहीं बढ़ रहा है! आलम यह है कि यूरोप और उत्तरी अमेरिका से लोग अपने राज्य को लेकर चिंता जाहिर कर रहे हैं। अमेरिका में कार्यरत पश्चिम बंगाल से गए कुछ बंगाली वैज्ञानिकों ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को एक पत्र लिखा है, लेकिन तृणमूल के सांसद पत्र लिखने वालों के खिलाफ ही अनाप-शनाप बोल रहे हैं।
 
 
ध्यान चुनाव पर
दरअसल, ममता बनर्जी का ध्यान महामारी की रोकथाम पर है ही नहीं। उनका पूरा ध्यान 2021 में होने वाले विधानसभा चुनाव पर है। लिहाजा वह मीडिया प्रबंधन और वोटबैंक बचाने में जुटी हुई हैं। इसलिए लॉकडाउन में प्रचार के नए-नए तरीके निकाल रही हैं। इन दिनों दो प्रमुख बांग्ला न्यूज चैनल पर राज्य सरकार का 3:30 मिनट का विज्ञापन धड़ल्ले से प्रसारित किया जा रहा है, जो वास्तव में ममता बनर्जी का भाषण है। बीते माह एक न्यूज चैनल पर प्रति 10 सेकंड करीब 2200 रुपये वाले इस विज्ञापन को 3,000 बार प्रसारित किया गया। यही नहीं, इन दोनों चैनलों ने भाजपा और दूसरे विपक्षी दलों की खबरों का बहिष्कार कर रखा है। यही कारण है कि इन दोनों को छोड़कर शेष सभी चैनलों ने 26 अप्रैल को रा.स्व.संघ के सरसंघचालक श्री मोहन राव भागवत के उद्बोधन का प्रसारण किया। इसी तरह, ममता बनर्जी ने कुछ दिन पहले कोलकाता नगर निगम क्षेत्रों में प्रचार के लिए पुलिस वाहन का इस्तेमाल किया। कोरोना संक्रमण की आड़ में वह भाजपा के सभी सांसदों को पहले ही ‘लॉकडाउन’ कर चुकी हैं। रायगंज प्रशासन ने केंद्रीय मंत्री देबश्री चौधरी के घर को भी सील कर दिया था, जबकि तृणमूल कांग्रेस के सांसद पूरे राज्य में घूम-घूम कर पार्टी का काम कर रहे हैं।
 
बड़ी संख्या में स्वास्थ्यकर्मी संक्रमित
राज्य में जब कोरोना संक्रमण बढ़ रहा था, तब राज्य सरकार कोई कदम उठाने के बजाए परीक्षण किटों की कमी को लेकर झूठ बोलती रही। सच्चाई यह है कि कोलकाता स्थित राष्ट्रीय कॉलरा एवं आंत्र रोग संस्थान और राज्य सरकार के बीच कोई तालमेल ही नहीं था। हुआ यह कि जब राज्य में कोविड-19 के मामले बढ़ने लगे तब राज्य सरकार ने कोलकाता स्थित आईसीएमआर प्रयोगशाला में जांच के लिए नमूने भेजने ही बंद कर दिए। आज भी पश्चिम बंगाल में सबसे कम संख्या में परीक्षण हुए हैं।
 
 
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प. बंगाल में जरूरतमंदों को बांटे जाने वाले राशन पैकेट पर ममता बनर्जी की फोटो
 
एक तो बंगाल में बुनियादी ढांचा नहीं है, ऊपर से सभी राजनीतिक फैसले विशेषज्ञ चिकित्सकों के साथ चर्चा किए बिना लिए गए। आलम यह है कि राज्य में कोरोना से सबसे ज्यादा डॉक्टर, नर्स और स्वास्थ्यकर्मी संक्रमित हैं। राज्य सरकार इन्हें व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण (पीपीई) तक मुहैया नहीं करा पाई। नतीजा, दो महत्वपूर्ण अस्पतालों, एनआरएस अस्पताल (कोलकाता) और उत्तर बंगाल मेडिकल कॉलेज अस्पताल में संक्रमण फैल गया और सरकार को इन अस्पतालों को बंद करना पड़ा। दोनों अस्पतालों के 100 से अधिक डॉक्टर और नर्स संक्रमित हैं। राज्य में स्वास्थ्य सेवा की बदहाली पर डॉ. इंद्रनील खान ने व्हीसल ब्लोअर की भूमिका निभाई तो उनके पीछे पुलिस को लगा दिया गया। उनके खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करा दी गई। मामला उच्च न्यायालय तक पहुंचा। लेकिन संविधान के अनुच्छेद-19 का उल्लंघन करने पर कलकत्ता उच्च न्यायालय ने उल्टे राज्य सरकार को ही फटकार लगाई।
दरअसल, राज्य में स्वास्थ्य सेवाओं का संचालन डॉक्टर नहीं, बल्कि सत्तारूढ़ दल के नेता कर रहे। डॉक्टरों और नर्सों को तो बलि का बकरा बनाया जा रहा है। राज्य में अब तक 500 से अधिक स्वास्थ्य कर्मचारियों को क्वारंटीन किया जा चुका है। अस्पतालों के कई विभाग बंद कर दिए गए हैं। आलम यह है कि अप्रैल को राज्य स्वास्थ्य सेवा के सहायक निदेशक डॉ. बिप्लब कांति दासगुप्ता की कोरोना संक्रमण से मौत हो गई। लेकिन आडिट कमेटी ने इसकी पुष्टि काफी देर से की। इसके बाद 27 अप्रैल को बेले व्यू अस्पताल के एक आॅर्थोपेडिक सर्जन डॉ. शिशिर कुमार मंडल की भी मौत संक्रमण से हुई।
अस्पतालों में राजनीतिक दखल
राजनीतिक हस्तक्षेप के कारण कलकत्ता मेडिकल कॉलेज पूरी तरह संक्रमित हो चुका है। यहां एक गर्भवती महिला कोरोना संक्रमित पाई गई, लेकिन उसकी सर्जरी करने वाले डॉक्टरों को क्वारंटीन में भेजने की बजाए उनका ड्यूटी पर रहना अनिवार्य कर दिया गया। यही हाल पीजी छात्रावास में रहने वाले डॉक्टरों का है। अव्वल तो छात्रावास में साफ-सफाई नहीं है, दूसरे यहां कुछ डॉक्टरों को 5 दिन अलग-थलग रहने को कहा गया है, जबकि उनके साथ कमरा साझा करने वाले डॉक्टरों को ड्यूटी पर बुलाया जा रहा है। उन्हें धमकाया जा रहा है कि यदि वे अस्पताल नहीं आएंगे तो उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। इसी तरह, 21 अप्रैल को सोमनाथ दास ने कोलकाता स्थित एमआर बांगुर अस्पताल की स्थिति पर एक वीडियो सोशल मीडिया पर डाला था। दास को इसी अस्पताल के आइसोलेशन पुरुष वार्ड में रखा गया था।

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विदेशों में रह रहे प. बंगाल के लोगों ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से
कोविड-19 के खतरे से उचित प्रकार निपटने की मांग करते हुए यह पत्र लिखा है।
 
 इस वीडिया में उन्होंने यह दिखाने की कोशिश की थी कि कोरोना संदिग्धों, संक्रमितों को किस तरह रखा जाता है। इसी वार्ड में दो शव पड़े हुए थे। वीडियो वायरल होने के बाद इसी दिन उनकी रिपोर्ट को सही बताते हुए सोमनाथ को अस्पताल छुट्टी दे दी गई। लेकिन तत्काल पुलिस ने उसे तुरंत हिरासत में ले लिया। उसका मोबाइल फोन भी जब्त कर लिया गया। यह सब दर्शाता है कि ममता बनर्जी राज्य में महामारी से किस तरह से निपट रही हैं। राज्यपाल और केंद्र सरकार के प्रति उनका रवैया तो जगजाहिर है ही।
दहशत में डॉक्टर
राजनीतिक कारणों से ममता सरकार ने राज्य में केंद्र की ‘आयुष्मान भारत’ योजना लागू नहीं की है। लिहाजा राज्य के डॉक्टरों और अन्य स्वास्थ्यकर्मियों को 50 लाख रुपये का बीमा कवरेज नहीं मिलेगा। राज्य सरकार ने इसकी जगह डॉक्टरों और इमरजेंसी में तैनात कर्मचारियों की मृत्यु पर 10 लाख रुपये देने की घोषणा की है। दिलचस्प बात यह है कि कुछ दिन पहले बांकुरा जिला अस्पताल में कोविड-19 से एक डॉक्टर की मौत हुई, लेकिन मृत्यु प्रमाण पत्र पूर्व मेदिनीपुर जिला अस्पताल के दूसरे डॉक्टर ने जारी किया। लेकिन डॉक्टर के परिवार को 10 लाख रुपये नहीं मिलेंगे, क्योंकि उनकी मृत्यु का कारण उच्च रक्तचाप बताया गया है। यानी सरकार द्वारा तय राशि उसी को दी जाएगी, जिसे राजनेता चाहेंगे। राज्य सरकार ने कोरोना मामलों की पुष्टि के लिए खासतौर से एक आॅडिट कमेटी गठित की है। लेकिन समिति में कोई डॉक्टर नहीं है। यही समिति मृत्यु प्रमाण पत्र जारी करती है, अस्पताल में तैनात डॉक्टर नहीं। यानी किसी मृत्यु कोविड-19 से हुई है और किसकी नहीं, इसका यही समिति करेगी। राज्य सरकार की नीति के कारण डॉक्टर हतोत्साहित हैं।
मुसलमानों के लिए कोई नियम नहीं!
ममता बनर्जी ने इस महामारी को बहुत हल्के में लिया है और इसे अपने राजनीतिक उद्देश्य की पूर्ति का साधन बनाया है। यही कारण रहा कि लॉकडाउन के बावजूद मुस्लिम बहुल इलाकों में उन्होंने मुसलमानों को खुली छूट दी। कोलकाता के खिदिरपुर, मटियाबुर्ज, राहबाजार आदि इलाकों में सामान्य दिनों की तरह चहल-पहल थी। ममता बनर्जी अपने वोट बैंक को नाराज नहीं करना चाहतीं, इसलिए उन्होंने मुस्लिम इलाकों में न तो कोई पाबंदी लगाई और न ही उनकी स्वास्थ्य जांच कराई। यही नहीं, दक्षिण 24 परगना, मुर्शिदाबाद, मालदा आदि जिलों में तो बीडीओ कार्यालय के कर्मचारियों और पुलिस पर हमले भी हुए।

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बरुईपुर के जिला व्यवस्थापक बप्पपाल पर तृणमूल के गुडों ने हमला किया

  
ये सब मुस्लिम बहुल क्षेत्र हैं, जहां लॉकडाउन का दूर-दूर तक कोई नामोनिशान नहीं था। मस्जिदें खुली थीं और मुसलमान आम दिनों की तरह नमाज पढ़ने आते रहे। हास्यास्पद स्थिति यह है कि ममता बनर्जी ने 2 अप्रैल को एक संवाददाता सम्मेलन में कहा कि राज्य से तब्लीगी जमात में केवल 71 मुसलमानों ने हिस्सा लिया था। दूसरी ओर, 3 अप्रैल को पुरुलिया के एस.पी. एस.सेलवा मुरुगन ने कहा कि केवल पुरुलिया से 54 जमाती दिल्ली गए थे। यानी राज्य के अन्य जिलों से केवल 17 लोग ही जमात में शामिल होने दिल्ली गए! राज्य सरकार द्वारा जमातियों के बारे में दी गयी यह अंतिम जानकारी थी, अविश्वसनीय है।
24 अप्रैल को जब केंद्रीय टीम पहुंची तो आडिट कमेटी के हवाले से राज्य के मुख्य सचिव ने बताया कि राज्य में हुई 57 मौतों में से कोविड-19 से केवल 18 लोगों की मौत हुई, जबकि 39 मौतें अन्य कारणों से हुर्इं। राज्य सरकार कोरोना के कम आंकड़े दिखाकर लोगों को यह विश्वास दिलाना चाहती है कि उसने महामारी पर नियंत्रण पा लिया है, जबकि स्थिति इसके विपरीत और बदतर है।
संघ कार्यकर्ताओं पर अत्याचार
एक ओर राज्य में सेवा भारती और रा.स्व.संघ के स्वयंसेवक जरूरतमंदों व वंचित वर्गों को खाद्य सामग्री मुहैया करा रहे हैं। दूसरी ओर, कट्टरपंथी मुसलमान मंदिरों में तोड़फोड़ कर रहे हैं और भूता गांव, औसग्राम ब्लॉक-1, बर्धवान (पूर्व) में हिंदू घरों में आग लगा रहे हैं। संघ स्वयंसेवकों ने इसके विरुद्ध शिकायत भी की है, पर पुलिस ने इस पर ध्यान नहीं दिया। उल्टा स्वयंसेवकों को ही पूर्व बर्धवान के औसग्राम पुलिस स्टेशन में बुलाया गया। जिला प्रचार प्रमुख देबाशीष चौधरी को पुलिस थाने में धमकाया गया। यही नहीं, पुलिस ने शुभ घोष, रवि भूषण तिवारी, संजीव सेन आदि स्वयंसेवकों से बेवजह पूछताछ भी की।
तृणमूल कार्यकर्ताओं की गुंडागर्दी जारी
लॉकडाउन के दौरान तृणमूल कार्यकर्ताओं गुंडागर्दी भी बढ़ी है। दरअसल,लॉकडाउन के दौरान दक्षिण 24 परगना में बरुईपुर के पुराना बाजार क्षेत्र स्थित तृणमूल कांग्रेस कार्यालय में सैकड़ों लोग एकत्र हुए थे। बरुईपुर के बैद्य पारा में रहने वाले भाई-बहन ने जब लॉकडाउन के उल्लंघन के विरुद्ध आवाज उठाई तो गलती मानने की बजाए तृणमूल के गुंडे उन्हें गाली देने लगे। भाई ने उन्हें रोकने की कोशिश की तो उसे बुरी तरह पीटा। ईंट-पत्थर भी फेंक कर मारा, जिसके कारण उसके सिर में भी गंभीर चोट आई। स्थानीय तृणमूल कार्यकर्तार्ओं के साथ मिलकर कुछ इलाकों में पुलिस भी आम हिन्दू नागरिकों के साथ दुर्व्यवहार कर रही है।