सभी धर्म समान और अच्छे होते हैं ऐसा समझना गलत है: बाबासाहेब

    दिनांक 06-मई-2020
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हम लगातार आपको बाबासाहेब के जीवन से जुड़े कुछ अनछुए प्रसंगों को बताने का प्रयास कर रहे हैं। आगे भी यह प्रयास जारी रहेगा। ये प्रसंग “डॉ. बाबासाहब आंबेडकर राइटिंग्स एंड स्पीचेज”, “पाकिस्तान ऑर पार्टीशन ऑफ इंडिया”, “द सेलेक्टेड वर्क्स ऑफ़ डॉ. बी. आर. आंबेडकर”, “द डिक्लाइन एंड फॉल ऑफ़ बुद्धिज़्म” आदि पुस्तकों से लिए गए हैं. बाबासाहेब को जानें भाग 30 :-

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आंबेडकर के अनुसार, धर्म की चार विशेषताएं हैं। पहली यह कि समाज को एकत्रित रखने के लिए कोई कानून या कोई नैतिकता जरूरी होती है अन्यथा समाज टुकड़ों में बिखर जाता है। दूसरी विशेषता यह कि धर्म का आधार तर्क विज्ञान है। धर्म का आधार नैतिकता हो, यह तीसरा वैशिष्ट्य है, यह जरूरी है, पर यही परिपूर्ण नहीं है। नैतिकता के साथ-साथ लोकतंत्र के मूलभूत त्रिसूत्रों- स्वातंत्र्य, समता और बंधुत्व का अनुसरण अनिवार्य होता है। चौथी खासियत है कि धर्म को कभी भी दारिद्रय का गुणगान तथा महिमामंडन नहीं करना चाहिए।
धर्म भाषा की तरह सामाजिक होता है। धर्म को आधार बनाकर समाज में भेदभाव करना आंबेडकर को मंजूर नहीं है। हम अपने ही धर्मबंधुओं के साथ जानवर की तरह व्यवहार करें और अन्याय-अत्याचार करें, यह बात उन्हें मान्य नहीं है। वे कहते हैं- धर्म और गुलामी साथ-साथ नहीं चल सकते। धर्म कभी वैयक्तिक नहीं होता।
सभी रिलीजन अलग-अलग होते हैं। सभी धर्मों के मार्ग और पद्धति अलग-अलग होते हैं। दो धर्म कभी पूर्णत: समान नहीं रहते। सभी धर्म समान और अच्छे होते हैं- ऐसा समझना गलत है और धोखा देने वाला है। धर्म एक संस्था और प्रभाव होता है। धर्म फलदायी या उपद्रवी हो- यह उस धर्म पर निर्भर करता है।
धर्म ग्लानि क्यों होती है? नागसेन और मिलिंद (मिलिंद प्रश्न) का उदाहरण देकर आंबेडकर कहते हैं कि धर्म के विनाश के तीन प्रमुख कारण हैं: पहला, धर्म की आधारशिला का ही अपरिपक्व होना। दूसरा, परिपूर्ण ज्ञानी धर्मप्रचारक न होना। तीसरा, धर्म तथा धर्म सिद्घांत सिर्फ चुनिंदा ज्ञानी लोगों के लिए हों और आम साधारण लोग जब मंदिर-विहार तक ही सीमित रहें, तो धर्म का विनाश निश्चित है।
बुद्ध और उनका धर्म : ‘बुद्घ और उनका धम्म’ ग्रंथ के अनुसार बुद्ध रेशनल, डेमोक्रेटिक, मॉरल और साइन्टिफिक हैं। धर्म क्या है? जीवन मंगल रखना धर्म है। जीवन में पूर्णता पाना धर्म है। सक्रियता और निर्वाण में जीना धर्म है। तृष्णा से मुक्त होकर जीना धर्म है। सभी यौगिक वस्तुएं क्षणिक हैं, ऐसा विश्वास करना धर्म है। कर्म ही नैतिक नियमों का साधन है, ऐसा विश्वास करना धर्म है।