पालघर हत्याकांड— वनवासी समाज को दिगभ्रमित करने वाले तत्वों पर सख्ती बरतने का समय

    दिनांक 06-मई-2020
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 पाञ्चजन्य प्रतिनिधि
गत दिनों महाराष्ट्र के पालघर जिले में दो साधुओं और उनके चालक की हत्या हुई। इस संबंध में अनेक तरह की बातें की जाती हैं। आखिर सच क्या है, यह जानने के लिए अहमदनगर की संस्था ‘ह्यूमैन राइट्स एंड ड्यूटीज अवरनेस फाउंडेशन’ ने इस पर गहरा अध्ययन किया है। उस अध्ययन के कुछ अंशों को लेकर यह रिपोर्ट तैयार की गई है

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गत दिनों महाराष्ट्र के पालघर जिले में दो साधुओं और उनके चालक की हत्या हुई। इस संबंध में अनेक तरह की बातें की जाती हैं। आखिर सच क्या है, यह जानने के लिए अहमदनगर की संस्था ‘ह्यूमैन राइट्स एंड ड्यूटीज अवरनेस फाउंडेशन’ ने इस पर गहरा अध्ययन किया है। उस अध्ययन के कुछ अंशों को लेकर यह आलेख तैयार किया गया है।
पालघर जिला वनवासी-बहुल है। यहां साधु-संतोें का बहुत ही सम्मान होता रहा है, लेकिन पिछले कुछ वर्ष में यहां ईसाइयों और कम्युनिस्टों के प्रभाव बढ़ने से यह जिला अशांत हो गया है। ‘आदिवासी एकता मित्र मंडल’ के अध्यक्ष संतोष जनाठे कहते हैं, ‘‘35-40 वर्ष से इस क्षेत्र में वामपंथी संगठन सक्रिय हैं। इनकी नींव ही हिंसा पर रखी गई है। 2001 में कुछ कार्यकर्ताओं के साथ यात्रा करते समय मुझ पर भी हमला हो चुका है। पूरे इलाके में वामपंथी हिंसा करते रहते हैं। इसलिए वनवासियों पर बल प्रयोग करने के बजाय पुलिस को इस घटना के षड्यंत्रकारियों को खोजना चाहिए।’’ डहाणू एवं तलासरी क्षेत्र में कई वर्षों से सामाजिक कार्य करने वाले अप्पा जोशी कहते हैं, ‘‘विश्व हिंदू परिषद् ने तलासरी में एक छात्रावास की स्थापना की थी। वहां मैं पूर्णकालिक कार्यकर्ता के नाते रह रहा था, साथ में मेरी पत्नी भी थीं। एक दिन छात्र जब विद्यालय में थे, तभी लगभग 350 लोगों ने छात्रावास पर हमला कर दिया। मुझे भी बुरी तरह मारा। मैं बेहोश हो गया। पुलिस आने पर वे लोग भाग गए और मेरी जान बच गई।’’
भारतीय कानून को चुनौती
इस क्षेत्र में भारतीय कानून को चुनौती देने का मामला कुछ दिन पहले सामने आया था। डहाणू तहसील के चिखले एवं वाकी नामक वनवासी-बहुल गांवों में भारत की सत्ता को चुनौती देने वाले बोर्ड लगाए गए थे। उनमें लिखा था, ‘‘सावधान! आप अनुसूचित क्षेत्र में हैं!’’ साथ ही भारतीय संविधान के अनुच्छेद 244 (1)(ख)(1), अनुच्छेद 19 (5) तथा 19(6) का संदर्भ देते लिखा गया था, ‘‘अनुसूचित क्षेत्र में (यानी ग्राम पंचायत की सीमा में) भारतीय संसद अथवा राज्य की विधानसभा में निर्मित कानून लागू नहीं हैं। बाहरी लोगों (वनवासियों को छोड़कर) के लिए मुक्त रूप से घूमने, नौकरी करने, बसने, व्यापार-व्यवसाय करने आदि की मनाही है।’’ यह झारखंड और छत्तीसगढ़ में वनवासियों की पुरानी परम्परा की आड़ में हो रही पत्थलगड़ी से मिलता-जुलता है।
इन सबको देखते हुए कहा जा सकता है कि भारत, भारतीय संसद और भारतीय कानून के विरुद्ध किए गए दुष्प्रचार के कारण ही इस क्षेत्र में हिंसक घटनाएं बढ़ी हैं। वामपंथी संगठन यहां के वनवासियों को यह कहकर भड़काते हैं,‘‘वे हिंदू नहीं, मूल निवासी हैं। अत: हिंदू देवी-देवताओं की पूजा न करें। एनपीआर के संदर्भ में शासकीय अधिकारियों को जानकारी न दें, उनका सहयोग न करें। इससे आपको मिलने वालीं सुविधाएं खत्म हो जाएंगीं।’’ इस प्रकार वे दिग्भ्रमित होकर अपने इलाके में आने वाले हर व्यक्ति को शंका की दृष्टि से देखते हैं। इस कारण अनेक घटनाएं हो चुकी हैं। जो लोग वनवासियों को भड़काते हैं, उन्हें खोजा जाना चाहिए, उनकी विस्तृत जांच होनी चाहिए। यह जानने का प्रयास होना चाहिए कि वे लोग ऐसा क्यों कर रहे हैं ? इस इलाके में एक संगठन चलाने वाले प्रदीप प्रभु नामक एक व्यक्ति का वीडियो वायरल हुआ है। इसमें वह कह रहा है,‘‘वनवासियों का अपना अलग संविधान है। इसे 100 वर्ष पूर्व लिखा गया है।’’ वनवासी समाज को दिगभ्रमित करने वाले ऐसे लोगों की जांच होनी चाहिए।
वास्तव में साधुओं की हत्या के पीछे वे संगठन जिम्मेदार हैं, जो वनवासियों को हिंदू संस्कृति, हिंदू परम्पराओं के विरुद्ध भड़काते हैं। ऐसे लोगों के विरुद्ध सख्ती दिखाने की जरूरत है, नहीं तो यह पूरा इलाका नासूर बन सकता है।