चीन के खिलाफ दुनिया का उबलता गुस्सा, कद्दावर नामचीन लोग ही नहीं, आम जनता भी है आगबबूला

    दिनांक 06-मई-2020
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प्रो. हर्ष वी. पंत
 
दुनिया में चायनीज वायरस की महामारी फैलाकर 'मदद का मसीहा' बनने की चीनी धूर्तता अब दुनिया के सामने उजागर हो चुकी है। शेष विश्व अब उससे अपने कारोबारी संबंधों पर नए सिरे से सोच रहा है और वहां से अपने प्रतिष्ठान हटाने की ओर बढ़ रहा है
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चीन के वुहान से उभरी कोरोना जैसी जानलेवा बीमारी से जहां पूरी दुनिया संघर्ष कर रही है, वहीं इसका जनक देश, चीन महाशक्ति बनने की दौड़ की रणनीतिक व्यूहरचना में व्यस्त है-समुद्र में सैन्य तैनाती, नौसैनिक अभ्यास और अन्य राष्ट्रों की मछुआरा नौकाओं को डुबाने जैसी हरकतें कर रहा है। चीन की लापरवाही से विश्व में उपजे ऐसे भयंकर संकट से जहां अन्य देशों की कमर टूट रही है, वहीं इस स्थिति का फायदा उठाने के लिए वह अपनी कमर कस रहा है। एक तरफ वह कोविड-19 महामारी में मदद का आडंबर रचकर बेहद जरूरतमंद देशों को मेडिकल किट और विशेषज्ञों की सुविधा मुहैया कराने की आड़ में खुद को वैश्विक नेता के रूप में पेश कर अप्रत्यक्ष तौर पर अमेरिका के ट्रम्प प्रशासन को ‘आत्मकेंद्रित’ ठहराते हुए उसकी छवि धूमिल कर रहा है, तो दूसरी तरफ यूरोप में सूचना संबंधी टकराव को उकसाकर यूरोपीय संघ में आंतरिक दरार की चिंगारी भड़का रहा है।
 
संदेह हुआ गहरा
 
इस महीने की शुरूआत में चीन के वुहान शहर, पिछले साल जहां से कोरोनो वायरस उभरा था, में कोविड-19 से मरने वालों की आधिकारिक संख्या में 50 फीसदी का इजाफा हुआ, जिससे शहर में मृत्यु दर 3,869 पर पहुंच गई है। वुहान के अधिकारियों ने आंकड़ों के संबंध में पारदर्शिता का दावा करते हुए बताया कि यह वृद्धि अस्पतालों से बीमारों और मरने वालों के संबंध में दी गई ताजा खबरों के आधार पर पेश की गई है। लेकिन इन नए आंकड़ों ने महामारी की शुरूआत के बाद से चीनी अधिकारियों के दावों और संबंधित खंडन के प्रति दुनिया के अन्य सभी देशों के मन में सुगबुगाते संदेहों को और मजबूत कर दिया, जो मानते हैं कि चीनी कम्युनिस्ट पार्टी ने सूचनाओं पर कड़ी लगाम कस रखी है। इससे चीन में हो रही मौतों की वास्तविक संख्या दुनिया के सामने नहीं आ रही है। दुनिया के अन्य देशों में व्यापक तौर पर यह धारणा है कि चीनी कम्युनिस्ट पार्टी ने शुरूआती चरणों में इस महामारी के संकट को गोपनीय बनाए रखा, जिसके कारण बेहिसाब संख्या में लोग काल के ग्रास बने।
 
नतीजतन, चीन और इसके कथित कुप्रबंधन पर तीखे सवाल उठने लगे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने पिछले हफ्ते विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) पर चीन के कम्युनिसट शासन के प्रति नरम रवैया रखने और उस पर अत्यधिक भरोसा करने का आरोप लगाते हुए उसे दी जाने वाली सहायता राशि को रोक दिया। हालांकि इस कदम के लिए उनकी कड़ी आलोचना हुई, लेकिन महामारी के संदर्भ में चीन—परस्त व्यवहार के कारण विश्व स्वास्थय संगठन की वैश्विक विश्वसनीयता भी सवालों से घिर गई है। ट्रम्प लगातार चीन और वहां से आने वाली सूचनाओं पर गंभीर सवाल उठा रहे हैं। हर गुजरते दिन के साथ वे अपने रुख को सख्त करते जा रहे हैं। ट्रम्प ने अप्रैल 2020 के मध्य में अपनी बात दोहराई, ‘क्या आप वास्तव में चीन नामक इस विशाल देश के उन आंकड़ों पर विश्वास करते हैं कि उनके यहां ‘इतने ही मामले’ आए और ‘इतनी ही मौतें’ हुईं; क्या कोई सच में इस पर विश्वास करेगा?’ अमेरिका इस बात की भी जांच कर रहा है कि कोरोनो वायरस कहां पैदा हुआ, साथ ही वह उन सुनी-सुनाई खबरों की जांच भी कर रहा है कि कोरोना वायरस वुहान शहर के किसी बाजार के बजाय वहां स्थित किसी प्रयोगशाला से उभरा होगा।
 
यूरोपीय संघ का सख्त रुख
 
माना जा सकता है कि अमेरिका-चीन के बीच के मतभेदों में कोविड-19 के पहले से चली आ रही प्रतिद्वंद्विता की भी भूमिका भी है जो महाशक्ति की दावेदारी के लिए दोनों के बीच जारी है। ऐसे में यूरोपीय संघ का चीन के प्रति सख्त रुख ज्यादा दिलचस्पी जगाता है। यूरोप के वरिष्ठ राजनीतिक नेता अब चीन के व्यवहार और नीतियों पर दृढ़ता से सवाल उठा रहे हैं। चायनीज कोरोना वायरस महामारी को परंपरागत उपचार के जरिए दुनिया के मुकाबले बेहतर तरीके से संभालने के दावे को चुनौती देते हुए फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रॉन ने इसे ‘भोला बनने का दिखावा’ बताते हुए कहा कि ‘वहां कुछ ऐसा हुआ है जिसके बारे में हमें कुछ नहीं पता।’ उन्होंने यह स्पष्ट किया कि लोकतांत्रिक देशों जैसी पारदर्शी व्यवस्थाओं और चीन जैसी सत्ता प्रणालियों, जहां सत्य दबा दिया जाता हो, के बीच कोई तुलना नहीं हो सकती। ब्रिटेन के विदेश मंत्री डॉमिनिक रॉब ने भी चीन की कड़ी आलोचना करते हुए कहा, ‘हमें कड़े सवाल पूछने होंगे कि यह कहां से आया और इसे पहले कैसे रोका जा सकता था।’ उन्होंने यह भी कहा कि ‘वर्तमान संकट समाप्त होने के बाद चीन के साथ सामान्य रूप से कारोबार करना मुमकिन नहीं होगा।’
चीन के खिलाफ किसी यूरोपीय देश से ऐसा कड़ा वक्तव्य, इटली और स्पेन जैसे देशों में उभरे मामलों को संभालने में बुरी तरह विफल होने के बाद, यूरोपीय एकजुटता में चीन की वजह से आई खटास के बाद आया है। इतालवी प्रधानमंत्री गुइसेप कोंटे के चिकित्सा उपकरण तत्काल उपलब्ध कराने के अनुरोध को यूरोपीय सरकारों ने कई दिन तक नजरअंदाज किया था। जर्मनी, फ्रांस और चेक गणराज्य जैसे कुछ देशों ने अपना भंडार सुनिश्चित करने के बाद ही जरूरतमंद पड़ोसियों के लिए आपातकालीन उपकरणों के निर्यात को मंजूरी दी। इस स्थिति ने यूरोपीय संघ को भावी दुष्परिणामों के प्रति आगाह किया, जिसके परिणामस्वरूप यूरोपीय संघ आयोग के अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने इटली से ‘दिल से माफी’ मांगी कि वे घातक कोरोना वायरस प्रकोप की शुरूआत में मदद नहीं कर सके।
 
चीन की चालाकी
चीन इस संकट के समय को न सिर्फ अपने भू-राजनीतिक प्रभाव बढ़ाने के लिए इस्तेमाल करने में जुटा है, बल्कि स्वास्थ्य देखभाल क्षेत्र के 'सिल्क रूट' पर काम शुरू करने के अपने इरादे की भी उसने घोषणा कर दी है। चीन चिकित्सकीय आपूर्ति और किट के साथ यूरोप से अफ्रीका तक के देशों तक पहुंच बना रहा है और ऐसे समय में अपने नेतृत्व को महिमामंडित करने का काम भी बखूबी कर रहा है। जबकि पचिमी देश बंटे हुए हैं या आत्मकेंद्रित हैं। पिछले दो दशकों में चीनी कंपनियों ने यूरोपीय प्रौद्योगिकी फर्मों में उल्लेखनीय अधिग्रहण और निवेश किया है। खतरे की बात यह है कि इस महामारी और परिणामस्वरूप उभरे आर्थिक संकट में चीन यूरोप में चुपके से अपनी पैठ बनाने के लिए नई संभावनाएं तलाश सकता है। लेकिन अब चीनी अधिग्रहण के खतरे को दूर करने के लिए यूरोप नई ऊर्जा के साथ संकल्प ले रहा है। काबिलेगौर है कि यूरोपीय संघ की प्रतिस्पर्धा आयोग की प्रमुख मार्गेट वेस्टेगर ने हाल ही में सुझाव दिया था कि यूरोपीय देशों को इस खतरे को दूर करने के लिए कंपनियों के शेयर खरीदने पर विचार करना चाहिए।
 
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अमेरिकी राष्ट्रपति लगातार विश्व स्वास्थ्य संगठन पर निशाना साधकर उसे घेर रहे हैं 
 
हालांकि, दुनिया के ज्यादातर देश चीन पर शुरुआती जानकारी छिपाने को लेकर नाराज हैं, फिर भी उनकी मजबूरी है कि कुछ समय के लिए उन्हें चीन से मदद लेनी ही होगी। इसी समीकरण ने चीन को इस महामारी के दौरान दुनिया की ‘मदद’ करने की आड़ में अपने प्रभाव का विस्तार करने का मौका थमा दिया है। अगर चीन ने सही समय पर उपयुक्त कदम उठाए होते तो यह संकट कतई इतना भयंकर रूप नहीं लेता। आज बन रहे हालात का नतीजा यह होगा कि दुनिया एक ऐसे दौर में प्रवेश करेगी जिसमें चीन और अमेरिका के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी, जिसका सबसे बड़ा खामियाजा वैश्विक अधिष्ठान को उठाना पड़ेगा, जो इस संकटकाल में एकजुट होता दिखा है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) ने द्वितीय विश्व युद्ध के बाद दुनिया के सामने आई सबसे बड़ी सुरक्षा चुनौती के रूप में करीब चार महीने पहले उभरी चायनीज कोरोना महामारी के संबंध में अप्रैल के दूसरे सप्तााह में अपना पहला सत्र आयोजित किया था। मार्च, 2020 में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अध्यक्षता मिलने पर संयुक्त राष्ट्र में चीनी राजदूत झांग जुन ने कहा था कि ‘अपने अध्यक्षीय कार्यकाल के दौरान चीन की परिषद में महामारी की स्थिति पर चर्चा करने की कोई योजना नहीं, क्योंकि कोरोना वायरस महामारी पर घबराने की कोई आवश्यकता ही नहीं है’। उन्होंने आगे कहा था कि दुनिया आसानी से ‘वसंत के आने के साथ’ कोविड-19 को पराजित कर देगी। इस वैश्विक महामारी पर चीन और अमेरिका किसी संयुक्त समाधान के लिए सहमत नहीं हैं। अमेरिका इस बात पर अड़ा है कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव में चीन के वुहान में कोरोना वायरस पैदा होने की बात का साफ जिक्र होना चाहिए और यह बात चीन की झुंझलाहट बढ़ा रही है।
 
विश्व स्वास्थ्य संगठन घेरे में

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जर्मनी ने कोरोना से हुए नुकसान के लिए बाकायदा चीन को 130 बिलियन पाउंड का बिल भेजा है
 
लेकिन इससे भी गंभीर मुद्दा यह है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने इस महासंकट पर कैसा व्यवहार किया। इस विश्वव्यापी महामारी के समय दुनिया के सभी देशों की प्रतिक्रियाओं के बीच समन्वय तैयार करने वाली नोडल एजेंसी बनकर अपने अन्य हितधारकों की नजरों में अपनी विश्वसनीयता बरकरार रखने के बजाय उसने खुद को चीन के हितों के प्रति समर्पित कर दिया।
 
विश्व स्वास्थ्य संगठन के महानिदेशक तेद्रोस अधानोम ने चीन के दबाव में पहले तो इसे महामारी बताया ही नहीं, पर जब स्थिति बिगड़ने लगी तो आखिर जनवरी 2020 के अंत में घोषणा की कि कोरोना एक वैश्विक महामारी बन चुकी है। तेद्रोस इस संकट को संभालने में चीन की कार्यशैली का बचाव भी करते दिखे। हैरानी की बात है कि जनवरी, 2020 के मध्य में विश्व स्वास्थ्य संगठन का ट्वीट आया कि ‘चीनी अधिकारियों की प्रारंभिक जांच में इस बीमारी के मनुष्य से मनुष्य के बीच संक्रमण फैलने के कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं मिले हैं।’ साथ ही जनवरी के अंत में तेद्रोस ने सलाह भी दी कि ‘विश्व स्वास्थ्य संगठन कारोबार और संबंधित गतिविधियों को सीमित करने की सिफारिश नहीं करता ह’। इस पर अमेरिका ने कड़ा विरोध जताया था जो विश्व स्वास्थ्य संगठन को सबसे बड़ा वित्तकपोषक है।
 
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने संयुक्त राष्ट्र की एजेंसी पर न सिर्फ ‘चीन पर ज्यादा ध्यान देने’ और महामारी के संबंध में ‘सही समय पर कदम न उठाने’ का आरोप लगाया, बल्कि उसे दी जाने वाली सहायता निधि पर यह कहते हुए रोक लगा दी कि ‘कोरोना वायरस के संबंध में विश्व स्वास्थ्य संगठन की गंभीर लापरवाही और महामारी छिपाने में उसकी भूमिका की समीक्षा की जा रही है।’ हालांकि, ट्रम्प की मदद रोकने की घोषणा के बाद अमेरिका के राजनीतिक गलियारों में भूचाल आ गया है। अमेरिकी कांग्रेस के वरिष्ठ सदस्यों ने भी पार्टी की ओर से आह्वान कर दिया कि विश्व स्वास्थ्य संगठन की चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के साथ मिलकर महामारी से निपटने में उठाए कदमों की जांच की जाए। आज दुनियाभर के राष्ट्र अपनी वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला का गंभीर मुआयना करते हुए चीनी अर्थव्यवस्था पर अपनी निर्भरता को कम करने के लिए चीन से अलग दिशा की ओर बढ़ रहे हैं। ऐसे में उनके लिए सबसे उपयुक्त यही होगा कि वे समान विचारधारा वाले देशों के साथ काम करें, ताकि एक नई वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला का निर्माण हो, जो चीन जैसी दुष्प्रवृत्ति वाले देश के विषैले आघातों से सुरक्षित हो।
 
चीन के खिलाफ विश्व का गुस्सा उबल रहा है। बड़े, कद्दावर नामचीन लोग ही नहीं, आम जनता भी चीन से आगबबूला है। कोविड-19 महामारी ने इंसानों पर ही नहीं, वैश्विक अर्थव्यवस्था पर ही ग्रहण लगा दिया है। विश्वव्यापी सामाजिक-आर्थिक संकट ने चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की कलई उतार दी है। उम्मीद है, अब चीन से खतरे की संभावनाओं पर होने वाली बहस हमेशा के लिए खत्म हो जाएगी।
(लेखक नई दिल्ली स्थित आब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में अध्ययन के निदेशक और सामरिक अध्ययन कार्यक्रम के प्रमुख हैं)