महात्मा बुद्ध और सामाजिक समरसता

    दिनांक 07-मई-2020
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डॉ.प्रवेश कुमार
बुद्ध पूर्णिमा दुनिया को दिशा देने वाले महात्मा बुद्ध का जन्मदिवस है। आज ही के दिन लुम्बनी, नेपाल में सिद्धार्थ का जन्म हुआ जो अपने 35 वर्ष की आयु में आज ही के दिन सिद्धार्थ से बुद्ध बन गए , और आज ही वो भी दिन है जिस दिन 45 वर्ष की आयु में भगवान बुद्ध का महापरिनिर्वाण हुआ था, ये भी एक संयोग ही है

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भगवान बुद्ध का बचपन का नाम सिद्धार्थ था। उनका 16 वर्ष आयु में विवाह हुआ उसके बाद 29 वर्ष की आयु तक अपने ग्रहस्थ जीवन में रहे और फिर अपने पीछे पुत्र राहुल और पत्नी को छोड़ सत्य की तलाश में निकल गए। गृह त्याग को लेकर मुख्यता दो कहानियां प्रचलित है एक तो ये की उन्होंने अपने राज्य में लोगों को दुखी देखा तो उनका सांसारिक मोह भंग हो गया वही एक और कहानी प्रचलित है जिसमें कहा गया की पानी को लेकर उनके राज्य और पड़ोसी राज्य में विवाद हुआ जिसमें अधिकतर लोगों का मानना था की ये विवाद युद्ध से सुलझाया जाए वही गौतम बुद्ध का मानना था कि युद्ध से नहीं आपसी चर्चा और फिर आपसी समन्वय, समझौते से किया जाए। बहरहाल सिद्धार्थ ने घर त्याग दिया और लगभग तीन वर्षों तक देश भर के तमाम आश्रमों में गए और ध्यान के आठों चरणों को सीखा लेकिन फिर भी मन में एक ही प्रश्न उन्हें परेशान करता रहा की संसार में दुःख का कारण क्या है ? बुद्ध पूर्णिमा के ही दिन सिद्धार्थ को बौद्धिसत्व प्राप्त हुआ यानी की ज्ञान प्राप्त हुआ जिसमें उन्होंने कहा कि ये शरीर चार तत्व से मिलकर बना है, पृथ्वी,जल, वायु,अग्नि और इन चारों के भिन्न- भिन्न गुण हैं जैसे जल शीतलता , तरलता , वायु का प्रवाह एवं अग्नि की ज्वलनशीलता , पृथ्वी का ममत्व इन्हीं को बुद्ध ने अष्टकला कहा है। वहीं हिंदू दर्शन में हमने पांच तत्वों की बात की है ,बुद्ध ने कठोर तप से प्राप्त ज्ञान के बाद कहा कि संसार में सारे दुखों का कारण एक है और वो है मानव की तृष्णा । ये आजीवन उसके साथ रहती है बच्चे से लेकर मृत्युशया तक उसको लगता है ये भी मुझे मिले किसी को अपनी आयु की , धन की , सम्मान की अन्य-अन्य प्रकार की इच्छा रहती है,ये ही उनके जीवन के कष्ट का कारण भी है । बुद्ध ने धर्म के मार्ग को इस जन्म मृत्यु के चरण में एक मात्र साधन माना उन्होंने धर्म को भी परिभाषित इसको तीन भागो में विभाजित किया , शारीरिक पवित्रता,वाणी पवित्रता,मन की पवित्रता । शारीरिक पवित्रता में वे कहते हैं जीव हत्या न करना , किसी को कष्ट न देना , किसी की बुराई न करना, वहीं वाणी के पवित्रता पर उनका कहना था सत्य बोलना , झूठ का त्याग करना, सबको समान दृष्टि से देखना, कोई भेद नहीं करना, इसी प्रकार मानसिक पवित्रता में वे कहते हैं किसी से ईर्ष्या नहीं करना,नफ़रत नहीं करना , सबको समान दृष्टि से देखना और समान समझना , सभी भेदभाव को नकार देना। बुद्ध सामाजिक समरसता के तत्व की भी बात करते हैं, वे कहते हैं जब सभी के मन में किसी के प्रति कोई मैला न हो सभी का मन निर्मल हो, किसी भी ऊंच-नीच के भाव का अंत हो जाए तभी धर्म का राज्य है। धर्म तभी सद्दधर्म बनता है जब उसमें कोई जातिवाद नहीं है,कोई जन्म से उच्च और कोई निम्न नहीं है सभी को समान शिक्षा मिले , कोई व्यक्ति अपने कर्म से बड़ा , श्रेष्ठ न माना जाए बल्कि उसके मूल्यांकन के अंदर पर उसको जांचा जाए । बुद्ध की ये सारी बातें भारत के उस पुरातन वैदिक दर्शन जिनको लोकाचार में लाने का कार्य उपनिषदों ने किया में हमें दिख जाती हैं , भारत का दर्शन समता के मूल तत्व पर ही तो आधारित है तभी तो हम मेरा कल्याण हो की बात न करके विश्व का कल्याण हो की बात करते हैं। सर्वे भवंतु सुखिना का ये मंत्र ही तो हमारे दर्शन का आधार है, बुद्ध ने समाज को लोकतांत्रिक बनाने का कार्य किया व्यक्ति और समाज मिलकर सभी के कल्याण की कामना करे कोई ऊंचा नहीं कोई नीचा नहीं ये भाव कैसे आ जाए इसका अंत होना , इसी के लिए बुद्ध ने जीवन भर काम किया । अपने बौद्ध संघ के दरवाज़े बुद्ध ने सभी के लिए खोले।
आज हम दुनिया में जिन मूल तत्वों की बात करते है समानता,स्वतंत्रता , बंधुत्व ये तीन मूल विचार जो भारत के दर्शन के मूल विचार सदैव से रहे हैं उन्हीं को दुनिया से पुनः परिचय कराने का कार्य महात्मा बुद्ध ने किया । बौद्ध दर्शन बताता है बुद्ध का अर्थ क्या है ये बताते हुए वो कहता है जब आप जागृत मस्तिष्क जो सत्य को सत्य और आसत्य को आसत्य देखने में सक्षम हो उसी को बौद्ध कहते हैं। इसीलिए इस संसार में जो सत्य के मानदंड पर टिकता है उसी को मानना अन्य को नकार देना ये ही बुद्धि की जगृति है और बुद्ध होना है। सामाजिक समरसता का तत्व क्या इससे भिन्न है तो ऐसा नहीं, जन्म होना , एक ही प्रक्रिया से होना ये एक सत्य है तो कोई उच्च और निम्न कैसे हो गया यानि ये उच्च- नीच का भाव असत्य है और इसको नकार देना ही बुद्धि जागरण है। इसी सत्यता का बोध समाज और दुनिया को करने का कार्य महात्मा गौतम बुद्ध ने किया।
( लेखक जेएनयू में सहायक प्राध्यापक हैं )