कोरोना की मार कई अंग होते बेकार

    दिनांक 07-मई-2020
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योगेश कुमार गोयल 
 
कई अध्ययनों से साफ हो चुका है कि चीन से उपजा कोरोना वायरस कई तरह से जानलेवा है। यह सिर्फ फेफड़ों पर ही असर नहीं करता बल्कि शरीर के कई अंगों को जड़ कर सकता है। जांच बताती है कि जब तक अन्य अंगों में खराबी की वजह की खोज हो पाती है तब तक कई मामलों में बहुत देर हो चुकी होती है

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चीन के वुहान से निकलकर पूरी दुनिया को निशाना बना रहा अदृश्य कोरोना वायरस दुनियाभर में लाखों लोगों को निवाला बना चुका है। विश्व स्वास्थ्य संगठन सहित कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं लगातार चेतावनी दे रही हैं कि फिलहाल कोरोना का प्रकोप खत्म होने के कोई आसार नहीं हैं। यही कारण है कि दुनिया के कई देशों में लॉकडाउन लागू है और भारत में इसी लॉकडाउन के जरिये बहुत बड़ी आबादी को कोरोना के कहर से बचाने के प्रयास जारी हैं। चिंता की स्थिति यह है कि कोरोना का वैश्विक कहर देखने के बावजूद देश में एक वर्ग विशेष के लोग कोरोना के खतरे को बहुत हल्के में ले रहे हैं और अपने साथ दूसरों की जान का खतरा पैदा कर रहे हैं।
दरअसल कुछ लोगों को गलतफहमी है कि कोरोना से खतरा केवल उन्हीं लोगों को है, जिन्हें मधुमेह, हृदय रोग या कैंसर जैसी बीमारियां हैं, कोरोना केवल फेफड़ों तथा श्वसन तंत्र पर ही हमला करता है। लेकिन अब कई अध्ययनों से स्पष्ट हो चुका है कि कोरोना इनके अलावा शरीर के कई अन्य अंगों पर भी हमला करता है। कोरोना की चपेट में आने के बाद ऐसी स्थिति किसी भी उम्र के व्यक्ति के लिए खतरनाक हो सकती है। कई रिपोर्ट में ये तथ्य सामने आए हैं कि कोविड-19 शरीर में आॅक्सीजन की वाहक लाल रक्त कोशिकाओं को क्षतिग्रस्त कर देता है, जिससे शरीर में आॅक्सीजन की कमी होने लगती है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के स्वास्थ्य आपदा कार्यक्रम के कार्यकारी निदेशक डॉ. माइकल जे. रेयान का कहना है कि इसमें कोई संदेह नहीं कि कोविड-19 फेफड़ों को प्रभावित करता है। इस बात के प्रमाण मिल रहे हैं कि मरीजों के शरीर में अचानक आॅक्सीजन का स्तर गिर जाता है। डॉ. रेयान के अनुसार कोरोना मरीजों की ऐसी रिपोर्ट देखी गई हैं, जिनमें मरीजों के फेफड़ों के अलावा दूसरे अंग भी क्षतिग्रस्त हुए हैं। यह वायरस नाक, मुंह अथवा आंखों के रास्ते शरीर में प्रवेश करने के पश्चात पूरे शरीर में फैल जाता है। जहां तक ज्यादा आयु वाले लोगों में कोरोना के ज्यादा खतरा होने की बात है तो उसका प्रमुख कारण यही है कि उम्र बढ़ने के साथ-साथ किसी भी व्यक्ति में स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं भी बढ़ने लगती हैं और शरीर की किसी भी वायरस से लड़ने की क्षमता कमजोर हो जाती है।

ऐसे लोगों पर खतरा ज्यादा
अमेरिका में रोग नियंत्रण और रोकथाम केन्द्र्र (सीडीसी) के मुताबिक 40 से अधिक बॉडी मास इंडेक्स (बीएमआई) वाले व्यक्तियों को कोरोना संक्रमण का खतरा काफी ज्यादा है। इसी प्रकार अमेरिकन डायबिटीज एसोसिएशन के मुताबिक डायबिटिक केटोएसिडोसिस के मरीज तो कोरोना संक्रमण से कोमा में भी जा सकते हैं और उनकी मौत भी हो सकती है। हालांकि इसका अर्थ यह कदापि नहीं कि कम उम्र के व्यक्ति कोरोना के खतरे के प्रति लापरवाह हो जाएं और अपने साथ-साथ दूसरों की जान भी जोखिम में डालें। दरअसल अब तक कोरोना संक्रमण को सांस लेने में दिक्कत, बुखार, सर्दी, निमोनिया जैसे लक्षणों से ही जोड़कर देखा जा रहा था, लेकिन अब कुछ अध्ययनों से पता चला है कि कोरोना फेफड़ों के अलावा हृदय, किडनी, मस्तिष्क, आंखों, लीवर, आंत्र नाल इत्यादि शरीर के कई अन्य महत्वपूर्ण अंगों पर भी प्रहार करता है। कुछ अध्ययनों से यह साबित हो चुका है कि कोरोना संक्रमण के लक्षणों में गंध और स्वाद तंत्रिकाओं का क्षीण होना भी शामिल है। प्राय: कोरोना संक्रमण के गंभीर लक्षणों से पहले लोगों ने अपनी सूंघने तथा स्वाद लेने की क्षमता खो दी थी।
हृदय पर कोरोना का प्रहार
 
चीन तथा न्यूयॉर्क के डॉक्टरों के मुताबिक कई ऐसे मामले देखे जा चुके हैं, जिनमें कोविड-19 ने मरीजों के दिल को नुकसान पहुंचाया। ऐसे मरीजों के हृदय में इंफ्लेमेशन अर्थात् मायोकार्डिटिस तथा एरिथमिया (हृदय की मांसपेशियों में सूजन, हृदय धड़कने की लय में अनियमितता) जैसी दिक्कतें भी देखी गई, जिनके कारण मरीज को हृदयाघात होता है। जामा कार्डियोलॉजी जर्नल में प्रकाशित ‘कार्डियोवैस्कुलर सिस्टम पर वायरस के संभावित प्रभाव’ नामक अध्ययन के अनुसार कोरोना संक्रमण के बाद आरम्भिक दौर में मरीज निमोनिया का शिकार होता है और शरीर में आॅक्सीजन की कमी होने लगती है, जिससे सांस लेने में परेशानी आती है। इसी दौरान कोविड-19 वायरस हृदय की मांसपेशियों को नुकसान पहुंचाना शुरू कर देता है। यदि मरीज पहले से ही हृदय रोग से पीड़ि़त है तो उसकी हालत कुछ ही दिन में गंभीर हो जाती है। चिकित्सकों का कहना है कि करीब तीस फीसदी मरीजों में कोरोना वायरस मायोकार्डिटिस के लक्षण भी देता है, जिससे हृदय की मांसपेशियों और उसके 'इलैक्ट्रिकल सिस्टम' पर प्रभाव पड़ता है। इससे हृदय गति पर असर पड़ता है और हृदय की कार्यप्रणाली पर असर पड़ने से कई बार पम्पिंग एकाएक कम हो जाती है, जिसका पता ही नहीं चल पाता। ऐसे कई मामलों में मरीज की अचानक मौत हो जाती है। अमेरिकन कॉलेज आॅफ कार्डियोलॉजी के अनुसार कोरोना संक्रमण से 10.5 फीसदी रोगियों की मौत हृदयाघात से ही हुई है। एम्स, नई दिल्ली के निदेशक डा. रणदीप गुलेरिया भी बताते हैं कि कोरोना के पांच में से एक मामले में हृदय को नुकसान पहुंचाने के संकेत दिखाई दिए हैं। इसलिए कहा जा सकता है कि कोरोना वायरस फेफड़ों पर ही नहीं, हृदय पर भी घात करता है। डा. गुलेरिया के अनुसार कुछ मरीजों में कोरोना वायरस के हमले के बाद फेफड़ों में थक्के जम जाते हैं, जिससे फेफड़े काम नहीं करते।
किडनी पर असर
फेफड़ों तथा हृदय के अलावा कोरोना वायरस का असर कुछ मरीजों की किडनी पर भी देखा गया है। अध्ययनकतार्ओं के अनुसार वुहान तथा न्यूयॉर्क में 14 से 30 फीसदी कोविड-19 पॉजिटिव मरीजों को किडनी फेल हो जाने के कारण डायलिसिस अथवा रीनल रिप्लेसमेंट थैरेपी की जरूरत पड़ी। बताया जाता है कि अमेरिका के विभिन्न अस्पतालों में कोरोना के जितने भी मरीज भर्ती हुए, उनमें से करीब आधे मरीजों के मूत्र में रक्त या प्रोटीन पाया गया, जिसका सीधा सा अर्थ है कि उनकी किडनी को नुकसान पहुंच रहा था। हालांकि अभी यह स्पष्ट नहीं है कि उनकी किडनी को हो रही इस क्षति के पीछे कारण कोरोना संक्रमण ही था या वजह कुछ और भी थी। कई मरीजों में 'पलमनरी एम्बोलिज्म' भी देखा गया। यह नसों में खून का थक्का जम जाने की ऐसी बीमारी है, जिससे मरीज की कई रक्त वाहिकाएं फट सकती हैं। ऐसा होने पर रक्त फेफड़ों में चला जाता है, जिससे मरीज की मौत हो जाती है। एक अध्ययन के दौरान वुहान में कुल 80 कोरोना मरीजों पर शोध में पाया गया कि उनमें से 20 मरीज 'पलमनरी एम्बोलिज्म' के शिकार थे और उनमें से 8 की जान चली गई थी। इसी खतरे को देखते हुए अमेरिका के अस्पतालों में कोविड-19 के मरीजों को रक्त को पतला करने की दवाएं भी दी जा रही हैं।

मस्तिष्क पर प्रतिकूल प्रभाव
अमेरिका, इटली तथा कुछ अन्य देशों के डॉक्टरों का कहना है कि यह वायरस कुछ मरीजों के दिमाग पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रहा है। कोरोना पीड़ि़त कई मरीजों में पक्षाघात, सुन्नपन, रक्त के थक्के बनने के लक्षण मिले हैं। चिकित्सा विज्ञान में इन्हें ‘एक्रोपैरेस्थेशिया’ भी कहा जाता है। डॉक्टरों के मुताबिक कोरोना के कारण लोगों के दिमाग पर असर पड़ने को ‘इंसेफैलोपैथी’ के नाम से जाना जाता है, जिसमें लोगों की दिमागी क्षमता प्रभावित होने के साथ ही सूंघने और स्वाद लेने की क्षमता घट जाती है। कई कोरोना संक्रमित मरीजों के मस्तिष्क का परीक्षण करने पर दिमाग के कई हिस्सों में सूजन मिली और इन हिस्सों में कुछ कोशिकाएं मृत भी पाई गईं। मरीजों की इस दशा को काफी गंभीर बताते हुए डॉक्टरों ने इसे ‘एक्यूट नेक्रोटाइजिंग इंसेफैलोपैथी’ नाम दिया है। यह दशा इंफ्लुएंजा जैसे वायरल संक्रमण के बिगड़ने के कारण पैदा होती है। कुछ परिस्थितियों में कोरोना वायरस सीधे दिमाग पर हमला कर सकता है। पीट्सबर्ग यूनिवर्सिटी के स्कूल आॅफ मेडिसन के न्यूरोलाजिस्ट डा. शेरी एच.वाई. चाऊ के मुताबिक इस वायरस के स्नायुतंत्र पर पड़ने वाले असर के बारे में अभी बहुत कुछ पता करना शेष है।
अन्य अंगों पर दुष्प्रभाव
कोरोना संक्रमितों के कई मामलों में मरीज की आंखों पर भी इसका प्रभाव देखा गया। एक अध्ययन के मुताबिक चीन में कोरोना के तीन में से हर एक मरीज को ‘पिंक आई’ अथवा ‘कंजक्टिवाइटिस’ रोग की शिकायत थी। यह अध्ययन चीन में 38 कोरोना मरीजों पर किया गया था, जिसमें पाया गया कि हर तीसरे मरीज को ‘कंजक्टिवाइटिस’ हुआ था। हालांकि कुछ शोधकर्ताओं का कहना है कि ऐसा प्राय: तभी होता है, जब कोरोना वायरस आंखों के जरिये शरीर में प्रवेश करता है। कोरोना के काफी मरीजों में इस वायरस का असर मरीज के जठरांत्र पथ (गैस्ट्रोइन्टेस्टाइनल ट्रैक्ट) पर भी देखा गया। चीनी शोधकर्ताओं के मुताबिक कोरोना के आधे मरीजों को डायरिया, दस्त तथा उल्टी जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ा। कई मरीजों में लीवर पर भी इस वायरस का प्रभाव देखा जा चुका है। ऐसे जिन मरीजों में गंभीर हेपेटाइटिस की समस्या उत्पन्न हुई, उसका कारण शोधकतार्ओं ने कोरोना वायरस को ही माना है।
स्पष्ट है कि कोरोना का हमला मरीज के केवल फेफड़ों तक ही सीमित नहीं रहता बल्कि यह शरीर के कई महत्वपूर्ण अंगों पर प्रहार कर किसी भी व्यक्ति के लिए जानलेवा बन सकता है। कोरोना के वैश्विक संकट के इस दौर में लापरवाही बरतने वालों को ऐसे में भली-भांति समझ लेना चाहिए कि इस वायरस को बेहतर तरीके से समझ पाना अब तक पूरी दुनिया के वैज्ञानिकों और डॉक्टरों के लिए ही बहुत बड़ी चुनौती बना हुआ है, इसलिए पूर्ण सावधानी बरतना और सरकार द्वारा दिए जाने वाले तमाम दिशा-निदेर्शों का पालन करना ही आज के समय में इससे बचाव का एकमात्र रास्ता है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)