आयुर्वेदिक और अंग्रेजी औषधियों के जरिए ठीक हो रहे हैं चायनीज वायरस से पीड़ित मरीज

    दिनांक 07-मई-2020
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डॉ. नितिन अग्रवाल 
 
गोवा, गुजरात, उत्तर प्रदेश और दिल्ली में अंग्रेजी और आयुर्वेदिक औषधियों के जरिए ठीक हो रहे हैं चायनीज वायरस से पीड़ित मरीज। यह प्रयोग देश के अन्य अस्पतालों में हो तो महामारी से जल्दी मुक्ति मिल सकती है

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गत दिनों गोवा सरकार ने घोषणा की कि अब गोवा में चायनीज वायरस से पीड़ित एक भी मरीज नहीं है। इसे सुनकर पूरे देश को आश्चर्य हुआ कि जब पूरा देश महामारी से पीड़ित है, तब गोवा में ऐसा क्या हुआ कि सारे मरीज ठीक हो गए! इस कमाल के पीछे आयुर्वेदिक और एलोपैथिक दवाओं का समन्वय है। विशेषज्ञों की सलाह पर संक्रमित रोगियों को अंग्रेजी के साथ-साथ आयुर्वेदिक दवाइयां भी दी गई।
 
अब गोवा से निकल कर गुजरात चलते हैं। यहां वायरस से पीड़ित लोगों के कारण जो लोग चिकित्सकीय देखरेख में थे, उन्हें आयुर्वेदिक औषधियां दी गई। गुजरात के स्वास्थ्य विभाग की मुख्य सचिव जयंती रवि के अनुसार 7,778 मरीजों को आयुर्वेदिक औषधियां दी गई। इन लोगों को संशमनी वटी, दशमूल क्वाथ, त्रिकटु चूर्ण और हल्दी आदि दवाइयां दी गई। 14 दिन के बाद इनमें से केवल 21 लोग ही वायरस से पीड़ित मिले। बाकी लोग अपने-अपने घर जा चुके हैं।
  

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अब दिल्ली की बात। यहां के चौधरी ब्रह्मप्रकाश आयुर्वेद चरक संस्थान में इन दिनों वायरस संक्रमित 105 मरीजों का इलाज चल रहा है। 10 से 14 दिन के इलाज के बाद 15 मरीज पूरी तरह ठीक होकर घर जा चुके हैं। उम्मीद है कि बाकी मरीज भी जल्दी ही ठीक होकर अपने-अपने घर चले जाएंगे।
उत्तर प्रदेश के 179 केंद्रों पर 6,210 वायरस संक्रमित मरीजों को आयुर्वेदिक औषधियां सफलतापूर्वक दी गई हैं। यही नहीं, वहां आयुर्वेद और योग चिकित्सा पद्धति को स्थापित करने के लिए ‘आयुष कवच’ शुरू किया गया है। अस्पतालों में ऐसा प्रयोग तब शुरू हुआ, जब प्रधानमंत्री ने ‘अपनी बात’ कार्यक्रम में आयुर्वेदिक चिकित्सकों का आह्वान किया वे शोध आधारित प्रमाण दें कि आयुर्वेदिक दवाइयां किसी भी रोग के लिए कारगर हैं। इसके बाद कई राज्य सरकारों ने इस दिशा में कदम उठाया और अब परिणाम सामने है। वहीं भारत के आयुष मंत्रालय ने रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने तथा अपनी श्वसन तंत्र को मजबूत करने के लिए लोगों को आयुर्वेद की औषधियां लेने का परामर्श दिया है। आयुर्वेद और एलोपैथ की यह संधि व्याधि को भगाने में सक्षम हो रही है, यह बहुत बड़ी बात है। यदि इन दोनों पद्धतियों के बीच आगे इसी तरह का समन्वय रहा तो भारत को एक बार फिर से विश्व गुरु बनने से कोई रोक नहीं सकता है।
विदेशों में बढ़ी आयुर्वेद की मांग

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यह भी समाचार है कि इन दिनों अमेरिका, यूरोप और रूस में रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने के लिए करक्यूमिन-युक्त हल्दी, अश्वगंधा, आमला (आमलकी) ओजस पुष्टि, च्यवनप्राश आदि की मांग बहुत बढ़ गई है। यूरोप के कई देशों में तो बहुत पहले से एलोपैथ के डॉक्टर अंग्रेजी दवा के साथ-साथ आयुर्वेदिक दवा मरीजों को लेने की सलाह देते रहे हैं। इस कोरोना काल में उन्हीं चिकित्सकों की सलाह पर विदेशी आर्युेवद की दवा ढंूढ रहे हैं।
(लेखक ‘विश्व आयुर्वेद परिषद’ के राष्ट्रीय सचिव और जाने-माने आयुर्वेदिक चिकित्सक हैं)