पुलित्जर पुरस्कार पर उठते सवाल, साजिश की सहभागी कांग्रेस

    दिनांक 07-मई-2020
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शिवानंद द्विवेदी
पुलित्जर पुरस्कार की घोषणा के बाद कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने एक ट्वीट में तीनों ही फोटो पत्रकारों को बधाई दी। लेकिन पुरस्कार के पीछे की कहानी बधाई तक सीमित नहीं है। जिस 'पुलित्जर' नाम की संस्था द्वारा यह सम्मान दिया गया है, उस विदेशी संस्था की इन 'विजेता' तस्वीरों को लेकर क्या दृष्टि है, इसे समझने पर स्थिति चिंताजनक लगती है।

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एक बार ध्यान से इन पंक्तियों को पढ़िए, ‘कश्मीर के विवादास्पद क्षेत्र में जीवन की मार्मिक तस्वीरों के लिए, क्योंकि भारत ने यहां पर संचार बाधित करके यहां की आजादी वापस ले ली।'
 
भारत से प्रेम करने वाले किसी व्यक्ति को कहीं अचानक ये पंक्तियां पढ़ने को मिल जाएं, तो उसे पहला ख्याल क्या आएगा ? कम से कम इन पंक्तियों को पढ़ने वाले के मन में इन तस्वीरों के प्रति रुचि कम और इस बात में रुचि ज्यादा होगी कि आखिर इसे लिखा किसने है ? बहुत संभावना इसकी भी है कि पढ़ने वाले को यह ख्याल आए कि जरूर ये पंक्तियां किसी ने भारत विरोधी मंशा से लिखी हैं।
हाल ही में 2020 की फोटो पत्रकारिता के लिए पुलित्जर पुरस्कार पाने वाले जम्मू-कश्मीर के तीन भारतीय फोटो पत्रकारों के नाम की घोषणा हुई है। ऊपर लिखी पंक्तियों को अंग्रेजी में पुरस्कार देने वाली विदेशी संस्था 'पुलित्जर' की वेबसाइट पर पुरस्कार विजेता फोटो पत्रकारों द्वारा ली गयी तस्वीरों के परिचय शीर्षक में लिखा गया है।
 
इसे संयोग कहें या पुलित्जर का किया प्रयोग, लेकिन तीनों ही पुरस्कार विजेता पत्रकार जम्मू-कश्मीर से हैं। इन तीन फोटो पत्रकारों के नाम हैं- डार यासीन, मुख्तार खान और चन्नी आनंद। यह पुरस्कार उन्हें आठ महीने पहले जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद-370 हटाए जाने के बाद की अपनी सुविधानुसार चयनित घटनाओं के दौरान कैमरे में कैंद की गयी तस्वीरों के लिए मिला है। लोकतंत्र में 'प्रेस की स्वतंत्रता' जायज है और भारत में इस अधिकार को व्यवस्था का संरक्षण हासिल है। अगर ऐसा नहीं होता तो ये तीनों पत्रकार इन तस्वीरों को नहीं ले पाते। पुरस्कार के बाद कई सवाल उठे हैं। इन सवालों पर बात करने से पहले जरा दशकों पुराने इतिहास की कुछ कड़ियों को वर्तमान से जोड़कर समझना जरूरी है।
2019 में एक फिल्म आई थी-द ताशकंद फाइल्स। फिल्म का कथानक पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की रहस्यमयी मौत पर केंद्रित था। यह एक ऐसी फिल्म थी जो ‘दुखांत या सुखांत’ के निष्कर्ष तक दर्शक को नहीं ले जाकर, कुछ सवाल छोड़ जाती है। सवाल यही कि भारतीयता के खिलाफ भारत के अंदर लोगों को खड़ा करने की मंशा रखने वाली शक्तियों की बागडोर किन अदृश्य ताकतों के हाथ में है। भारत के अंदर भारत और भारतीयता के मूल चिंतन के खिलाफ लड़ने वाली विचारधाराओं का बीज इन्हीं अदृश्य ताकतों द्वारा रोपा जाता रहा है।
 
साठ-सत्तर के दशक में दुनिया में सोबियत संघ के समाजवादी प्रभाव का बोलबाला था। वहां की ख़ुफ़िया एजेंसी दुनिया की राज व्यवस्थाओं पर पैनी नजर रखे हुए थी। नवोदित लोकतंत्र वाला भारत भी उसी रडार पर था। चूंकि दो ध्रुवीय वैश्विक परिस्थिति में भारत ने गुट-निरपेक्षता का रास्ता चुना था, लिहाजा दोनों ध्रुव भारत पर अपना चुंबकीय प्रभाव बनाने की कोशिश में रहे। यद्यपि पचास के दशक में ही भारत का नेतृत्व ‘समाजवाद’ के आकर्षण में था, किंतु देश के लोकतंत्र और व्यवस्था को ‘समाजवाद’ के वशीभूत करने के लिए सिर्फ नेतृत्व का समाजवादी आकर्षण में होना पर्याप्त नहीं था। आखिरकार 1976 में वैश्विक पटल को अभारतीय व आयातित समाजवाद के चाबुक से हांकने की मंशा रखने वाले सफल हुए। संविधान की प्रस्तावना में 42वां संशोधन उसी चाबुक की चोट का परिणाम था। यह संशोधन इंदिरा गांधी ने किया, इतना कहकर खतरे को कमतर करने का ही प्रयास हुआ है। इसके पीछे की वैश्विक साजिश को देश ने वैसे ही नजरंदाज कर दिया, जैसे लाल बहादुर शास्त्री की रहस्यमयी मौत को कोई याद नहीं करता।
 
पचास साल पुरानी उस घटना का उल्लेख यहां इसलिए जरूरी था, क्योंकि भारत की आन्तरिक व्यवस्था में हस्तक्षेप करने वाली शक्तियां आज भी सक्रिय हैं। परदे के पीछे बैठकर देश की व्यवस्था को अपनी चाबुक से चलाने की हर कवायद में लगी उन भारतीयता विरोधी शक्तियों को दशकों पहले जिन लोगों ने शह दिया था, आज भी उनके वारिस उसी भूमिका में हैं। यह सवाल भारत में भारत के खिलाफ खड़े लोगों से जुड़ा है।
 
 
 
पुरस्कार की घोषणा के बाद कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष ने एक ट्वीट में तीनों ही फोटो पत्रकारों को बधाई दी। अच्छी बात रही कि बधाई देते हुए उन्होंने तीनों को 'इंडियन' बताया। लेकिन पुरस्कार के पीछे की कहानी बधाई तक सीमित नहीं है। जिस 'पुलित्जर' नाम की संस्था द्वारा यह सम्मान दिया गया है, उस विदेशी संस्था की इन 'विजेता' तस्वीरों को लेकर क्या दृष्टि है, इसे समझने पर स्थिति चिंताजनक लगती है। इन तस्वीरों के बारे में 'पुलित्जर' की वेबसाइट ने जो कुछ लिखा है, उसे पढ़ने के बाद हर भारतीय के मन में शंका के बादल गहराने स्वाभाविक हैं। पता नहीं राहुल गांधी कभी विषयों को इस प्रकार सोचते भी होंगे कि नहीं !
वेबसाइट पर तीनों फोटो पत्रकारों द्वारा ली गयी 20 तस्वीरों को जारी किया गया है। इन तस्वीरों के अलग-अलग कैप्शन दिए गये हैं। एक अन्तर्राष्ट्रीय और बहुचर्चित पुरस्कार होने के नाते इसकी चर्चा भी वैश्विक स्तर पर मायने रखती है। राहुल गांधी और कांग्रेस को भले ही इसमें सिर्फ एक 'पुरस्कार' नजर आता हो, जिस पर बधाई देकर छुट्टी पा लेना पर्याप्त है, किंतु इसके निहितार्थ महज पुरस्कार की घोषणा तक सीमित नहीं हैं। तस्वीरों के परिचय में लिखी पंक्ति-‘भारत ने यहां (कश्मीर) पर संचार बाधित करके यहां की आजादी वापस ले ली है‘, से उभरते नैरेटिव और उसके खतरे की अनदेखी करने की भूल कम से कम कोई भारत प्रेमी संजीदा व्यक्ति नहीं कर सकता है। आखिर इन पंक्तियों के माध्यम से 'पुलित्जर' संस्था क्या साबित करना चाहती है ? किसके लिए करना चाहती है ? किसका हित इससे सधता है ? इन सवालों पर गौर किये बिना केवल बधाई का ढोल पीट लेना पर्याप्त नहीं है।
 
सवाल इतना ही नहीं है। पुलित्जर ने लगभग विजेता घोषित हर तस्वीर को परिभाषित किया है। हर तस्वीर के कैप्शन गढ़े हैं। अब पुरस्कार विजेता फोटो पत्रकारों को भी सार्वजनिक तौर पर यह स्पष्ट करना चाहिए कि पुलित्जर ने उनके द्वारा ली गयी तस्वीरों को जिस शीर्षक के साथ जारी किया है, उससे उनकी सहमति है क्या ? क्या ये तीनों पत्रकार इस धारणा में भरोसा करते हैं कि 'भारत ने कश्मीर की आजादी खत्म की है।' अगर वे इसमें भरोसा नहीं करते हैं तो उन्हें यह पुरस्कार न सिर्फ वापस करना चाहिए बल्कि इसकी सार्वजनिक निंदा भी करनी चाहिए।
अब जरा बात इनमें कुछ तस्वीरों के कैप्शन की करते हैं। डार यासीन की एक तस्वीर का कैप्शन देते हुए 'पुलित्जर की वेबसाईट ने लिखा है- A Kashmiri boy tries to take out a bullet out from the wall of a damaged house after a gun battle in Tral, south of Srinagar, Indian controlled Kashmir, Friday, May 24, 2019. क्या इस परिचय में ‘भारत द्वारा कब्जाया कश्मीर' लिखे जाने से कांग्रेस तथा राहुल गांधी एवं इस तस्वीर को लेने वाले पत्रकार को कोई आपत्ति नहीं है ? इसका भी जवाब आना ही चाहिए।
 
पुलित्जर की वेबसाइट पर कश्मीर से जुड़ी तस्वीरों का जिक्र करते हुए लगभग 16 बार ‘भारत द्वारा कब्जाया कश्मीर' शब्द विन्यास का प्रयोग किया गया है। वहीं जम्मू में ली गयी तस्वीरों के साथ ‘भारत द्वारा कब्जाया’ वाक्य का प्रयोग नहीं किया गया है।
दरअसल कश्मीर को लेकर अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर एक नैरेटिव गढ़ने की कोशिश पहले से ही की जाती रही है। एक तरफ मानवाधिकार के नाम पर खड़े किये जाने वाले खोखले विमर्शों तो वहीं दूसरी तरफ भारत के अंदर अलगाववादी ताकतों को परदे के पीछे से खुलकर समर्थन करने वाले राजनीतिक दलों द्वारा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इस नैरेटिव को भारत में खाद-पानी देने का काम होता है। अनुच्छेद-370 का हटना इस नैरेटिव को चलाने वाली ताकतों को लगा एक बड़ा झटका था। एक ऐसा झटका जिसकी कल्पना भी उन्होंने नहीं की थी। हालांकि ऐसा बिलकुल नहीं है कि उन ताकतों ने आत्मसमर्पण कर दिया है। कश्मीर में अस्थिरता को हवा देने वाले हर घटनाक्रम में वे अलग-अलग भेष धारण करके आने की फिराक में हैं। इस बार वही ताकतें 'पुलित्जर पुरस्कार' के घोड़े पर सवार होकर आई हैं।
 
 
अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर जब ऐसी घटनाएं घटती हैं तो देखने में बहुत साधारण लगती हैं। ऊपर से साफ़-सुथरी और सुलझी दिखने वाली इन घटनाओं के भीतर का उलझा हुआ जाल दिखाई नहीं पड़ता। लेकिन उसके परिणाम इतिहास और भूगोल दोनों को बदलने वाले साबित हो सकते हैं। साठ के दशक में भी कुछ घटनाएं ऐसी ही घट रही थीं, जो दिख तो सामान्य रही थीं लेकिन परिणाम में 'संविधान को ही बदल देने वाली' साबित हुईं। कांग्रेस ने 'पुलित्जर पुरस्कार' पर बधाई देकर भारत द्वारा कब्जाया कश्मीर' तथा भारत ने कश्मीर की आजादी छीन ली है' की विचारधारा का समर्थन किया है। राहुल गांधी और कांग्रेस यदि इसे चूक मानकर अपनी बधाई वापस नहीं लेते तो उन्हें भी ऐसी अदृश्य साजिशों के सहभागी के नाते इतिहास में दर्ज होना ही पड़ेगा।
सक्रिय हैं अलगाववाद के मास्टर
कश्मीर को लेकर भारत में अलगाववाद का जो जहर पनपा है, उसकी खुराक का इंतजाम कई देशों से हो रहा है। कश्मीर में रूचि लेकर अलगाववाद का विमर्श गढ़ने वाले दुनिया के अनेक देशों से लोग सक्रिय हैं। कोरोना की त्रासदी में भी उनकी कश्मीर पर बहस जारी है। गत 3 मई को वीडियो कांफ्रेंस के माध्यम से तहरीक-ए-कश्मीर संगठन ने 'भारत की घेराबंदी में कश्मीर: दुनिया की अंतर्चेतना पर दस्तक' विषय पर सेमिनार किया।
 
सेमिनार को लेकर जो पोस्टर जारी हुआ उसमें बतौर वक्ता मानवाधिकार संगठन, कम्युनिस्ट लीग, यूरोपियन पार्लियामेंट सहित दुनिया के कई देशों के वे लोग शामिल हुए जो कश्मीर के अलगाववाद का झंडा उठाते रहते हैं। एक तरफ कश्मीर में आतंकी हमले होते हैं, दूसरी तरफ अलगाववाद को हवा देने वाले ऐसे विदेशी नाम वाले लोग कांफ्रेंस करके कश्मीर को भारत की 'घेराबंदी' वाला हिस्सा बता रहे होते हैं। ऐसे में यह समझने की जरूरत है कि भारत में भारत के खिलाफ विचार खड़े करने के लिए ऐसी ताकतें हर परिस्थिति में सक्रिय हैं। इनका कोई युद्ध विराम नहीं होता है।
(लेखक डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी रिसर्च फाउंडेशन में सीनियर रिसर्च फेलो हैं.)