उत्तर प्रदेश से नकारात्मक समाचार ढूंढकर भ्रम फैलाने में लगा है सेकुलर मीडिया

    दिनांक 07-मई-2020
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उत्तर प्रदेश से नकारात्मक समाचार ढूंढने की जिम्मेदारी कई संवाददाताओं को दी गई है। अब जब कुछ खास नहीं मिल रहा तो झूठ ही गढ़ने का काम जारी है।

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देश में चायनीज वायरस फैलाने में तब्लीगी जमात के योगदान पर पर्दा डालने का काम जारी है। इसी उद्देश्य से अचानक ऐसी खबरें आने लगीं कि जमात के लोग बड़ी संख्या में ‘प्लाज्मा’ दान कर रहे हैं। ये वे ‘दानवीर’ थे जिनमें वायरस पाया गया था और उपचार के बाद जो स्वस्थ घोषित किए गए। उनके ‘प्लाज्मा दान’ को महादान बताने की होड़ लग गई। अखबारों में लंबे-लंबे लेख छप गए कि कैसे जमात के लोग दूसरों की जान बचा रहे हैं। यह प्रश्न उठा कि जिन लोगों की करतूतों को लोगों ने देखा है उनका यह महिमामंडन कहां तक उचित है? अगर वे ‘प्लाज्मा’ दान कर भी रहे हैं तो उनका कर्तव्य है, न कि देश और समाज पर किया गया कोई एहसान। इसी बीच जानकारी सामने आ गई कि प्लाज्मा से उपचार अभी परीक्षण की अवस्था में है और इसके खतरनाक और जानलेवा प्रभाव भी हो सकते हैं। मीडिया को यह बताना चाहिए कि ऐसी क्या विवशता थी कि उन्होंने बिना किसी विशेषज्ञ की राय के ही प्लाज्मा को रामबाण औषधि की तरह प्रचारित करना शुरू कर दिया?
पिछले सप्ताह अमदाबाद और कुछ अन्य जगहों पर मरीजों के इलाज में मजहब के आधार पर भेदभाव की झूठी खबरें छपवाई गईं। सचाई तो सामने आ गई, लेकिन दोषी पत्रकारों और मीडिया समूहों पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। शायद इसी का नतीजा है कि सेकुलर मीडिया ऐसे झूठ फैलाने की कोशिश कर रहा है जिनसे सांप्रदायिक सौहार्द बिगड़े। एक समाचार वेबसाइट ने लिखा कि प्रयागराज में प्रशासन मुसलमानों के घर पर पोस्टर लगा रहा है कि यहां लोगों को अलग रखा गया है और कोई इस घर के पास न आए। समय रहते प्रयागराज पुलिस ने इस झूठ का संज्ञान लिया और पत्रकार के खिलाफ शिकायत दर्ज की।
 
प्रयागराज में ही बीबीसी के एक पत्रकार ने प्रवासी मजदूरों को ले जाने के लिए बनाए गए एक केंद्र का वीडियो दिखाकर दावा किया कि वह ‘क्वारंटाइन सेंटर’ है। इस वीडियो की मंशा भी उत्तर प्रदेश में सरकारी व्यवस्थाओं को लेकर भ्रम फैलाने की ही थी। यह सब उस समय हो रहा है जब सेकुलर मीडिया बंगाल और महाराष्ट्र की अव्यवस्था पर पर्दा डालने की कोशिश कर रहा है।
उत्तर प्रदेश से नकारात्मक समाचार ढूंढने की जिम्मेदारी कई संवाददाताओं को दी गई है। अब जब कुछ खास नहीं मिल रहा तो झूठ ही गढ़ने का काम जारी है। इसी प्रयास के तहत नोएडा में रहने वाली एक महिला पत्रकार ने सोशल मीडिया पर लिखा, ‘‘उसके दरवाजे पर एक गरीब महिला खाना मांगने आई थी, क्योंकि कई दिनों से वह भूखी थी।’’ बाद में पता चला कि वह महिला पत्रकार अपने अपार्टमेंट में 41वीं मंजिल पर रहती है और जो कहानी उसने गढ़ी थी वह पूरी तरह फर्जी थी। इसी तरह केंद्रीय कर्मचारियों के वेतन-भत्तों में कटौती का झूठ फैलाने की बार-बार कोशिश हो रही है।
 
‘मोदी सरकार ने उद्योगपतियों का लाखों करोड़ रुपए का कर्ज माफ कर दिया!’ यह वह झूठ है जो लगभग 4 साल से सेकुलर मीडिया के माध्यम से फैलाया जा रहा है। फिर सरकार सफाई देती है कि किसी का एक भी पैसा माफ नहीं हुआ है। सिर्फ कर्ज को ‘राइट आॅफ’ यानी बट्टे खाते में डाला गया है, ताकि अब इसकी वसूली के दूसरे रास्तों पर काम शुरू हो सके। यह एक तय कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा है। इसके बाद भी हर साल यह अफवाह उड़ाई जाती है। अब यह नहीं माना जा सकता कि व्यापारिक शब्दावली की कम जानकारी के कारण यह भ्रम पैदा होता है। इंडिया टुडे पत्रिका के एक संपादक ने ट्विटर पर लिखा,‘‘मेहुल भाई का लोन बट्टे खाते में डाल दिया गया।’’ भाषा ऐसी रखी कि लोग यही समझें कि सरकार ने इस भगोड़े को कोई राहत दे दी है, जबकि सचाई इसके ठीक विपरीत है।
इंडिया टुडे टीवी की खूबी है कि वह पहले खुद ही झूठी खबर उड़ाता है और फिर उसके तथ्यों की जांच करके उसे गलत साबित करता है। अभिनेता ऋषि कपूर के निधन को लेकर भी इंडिया टुडे ने यही काम किया। ऋषि कपूर के एक वीडियो को उनके देहावसान के ठीक पहले का बताकर फैलाया और फिर जब पोल खुल गई तो तथ्य जांच करके साबित किया कि वह वीडियो पुराना था।