कश्मीर के निरीह आम लोगों का हत्यारा है आतंकी रियाज नाइकू, घाटी के लोगों को यह याद रखना चाहिए

    दिनांक 07-मई-2020
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ले. कर्नल (से.नि.) आदित्य प्रताप सिंह 
 
 
रियाज़ नाइकू के लगभग 8 साल के आतंकी जीवन में उस पर 16 से अधिक आतंक के आपराधिक मुकदमे दर्ज हुए। इनमें सबसे महत्त्वपूर्ण हैं— 17 मार्च, 2014 को पुलवामा के गुलजारपुरा के सरपंच मुहम्मद आमीन एवं 2 अक्टूबर, 2017 को पुलवामा के ही पोतगमपुरा आशिक हुसैन (मुंशी) की निर्मम हत्या। इसी तरह नवम्बर, 2018 को उसने इस्लामिक स्टेट के रास्ते पर चलते हुए दक्षिण कश्मीर में दो मुस्लिम युवकों— नदीम मंज़ूर और हूज़ाइफ़ की हत्या कर दी थी।
 
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6 मई को आतंकी संगठन हिजबुल मुजाहिदीन का बर्बर जिहादी आतंकी रियाज़ नाइकू का सेना के हाथों दक्षिण कश्मीर के पुलवामा में अंत हुआ। 1986 में पैदा हुआ रियाज़ नाइकू उर्फ़ ज़ुबैर कश्मीर में हिजबुल मुजाहिदीन का पोस्टर बॉय था। दक्षिण कश्मीर का रहने वाले नाइकू के पिता खेती के साथ कपड़े सिलाई का काम करते थे। नाइकू विज्ञान में स्नातक होने के बाद गांव के ही एक इस्लामिक शिक्षण संस्थान में अस्थायी रूप से पढ़ाने के साथ-साथ इस्लामिक शिक्षण भी करने लगा। राजनीतिक इस्लाम के प्रति झुकाव और कश्मीर में खिलाफ़त की स्थापना के लक्ष्य ने 2012 में घर से भगाकर वह आतंकी संगठन हिजबुल मुजाहिदीन में शामिल हो गया।
रियाज़ नाइकू के लगभग 8 साल के आतंकी जीवन में उस पर 16 से अधिक आतंक के आपराधिक मुकदमे दर्ज हुए। इनमें सबसे महत्त्वपूर्ण हैं— 17 मार्च, 2014 को पुलवामा के गुलजारपुरा के सरपंच मुहम्मद आमीन एवं 2 अक्टूबर, 2017 को पुलवामा के ही पोतगमपुरा आशिक हुसैन (मुंशी) की निर्मम हत्या। इसी तरह नवम्बर, 2018 को उसने इस्लामिक स्टेट के रास्ते पर चलते हुए दक्षिण कश्मीर में दो मुस्लिम युवकों— नदीम मंज़ूर और हूज़ाइफ़ की हत्या कर दी थी। हालांकि इसी बीच सुरक्षा बलों की सक्रियता और दबाव ने अनेक आतंकियों को मौत के घाट उतारा। इसी भय के चलते इस इलाके में काफी हद तक आतंकी संगठनों की भर्ती पर लगाम लगी। यही कारण था कि पाकिस्तान में बैठे आतंकी सरगनाओं ने रियाज़ नाइकू को कश्मीर का सरगना बना दिया। ज्ञात रहे कि अगस्त, 2017 में यासीन याटू के खात्मे के बाद उसे हिजबुल मुजाहिदीन का कश्मीर का सरगना बनाया गया था।
निरीह आम नागरिकों के खून से रंगे हैं हाथ
रियाज़ नाइकू का नाम अनेक सुरक्षा बलों और पिछले साल छह प्रवासी श्रमिकों की हत्या में आया था। स्थानीय लोगों में अच्छी खासी घुसपैठ के चलते घाटी में वह लगभग 8 वर्षों तक जीवित रहा। गौरतलब है कि रियाज़ नाइकू जैसे आतंकी जिस दौर में पैदा हुये वह कश्मीर के इस्लामीकरण का दौर था। कश्मीर में बड़े पैमाने पर हिन्दू नरसंहार चल रहा था, जिसका चरम 1990 में 8 लाख से अधिक हिन्दुओं के पलायन के रूप में देखने को मिला। पता नहीं कितने हिन्दुओं को मौत के घाट उतारा गया। कितनी बहन—बेटियों की इज्जत तार—तार की गईं। कितनों की निर्मम हत्याएं की गईं। यही कारण है कि उस समय के पैदा हुए कटृटरपंथी कश्मीरी युवक घाटी को इस्लामिक कश्मीर बनाने के धोखे में हैं। वह भारत के खिलाफ जहर उगलते हैं। हिन्दुओं को काफिर मानते हैं और भारत के खिलाफ जिहाद को अपना कर्तव्य मानकर लड़ते हैं। रियाज नाइकू भी इसी रास्ते पर था और घाटी में आतंक फैलाने के काम में लगा हुआ था।
सोशल मीडिया ने दी आतंकियों को वृद्धि
आज की संचार क्रांति से उपजे इंटरनेट और सोशल मीडिया ने आतंकियों की वृद्धि को नई ऊँचाइयाँ दीं। इस्लामिक स्टेट के 2011 में जन्म के बाद पूरे विश्व में जो इस्लामिक आतंक को नई ऊर्जा मिली वह अप्रत्याशित थी, जिसका प्रभाव सोशल मीडिया और इंटरनेट के माध्यम से कश्मीर पहुंचा। आतंकी बुरहान वानी और उसके दर्जनों सहयोगी जिहादी इसी की देन थे। सोशल मीडिया के प्रयोग ने पहले आतंकी बुरहान वानी फिर रियाज़ नाइकू की कश्मीर में लोकप्रियता को खूब बढ़ाया। इसी लोकप्रियता के परिणाम स्वरूप 2017 में कुल 128 मुस्लिम युवा आतंकी बने जिसमें 76 हिजबुल में सम्मिलित हुये। बुरहान वानी, रियाज़ नाइकू और जाकिर मूसा जैसे सभी आतंकी सरगनाओं की लोकप्रियता के पीछे सोशल मीडिया का बहुत बड़ा योगदान रहा। अगर यह कहें कि सोशल मीडिया ने वह काम किया जो कभी 80 के दशक में जमात-ए-इस्लामी भी न कर पायी थी तो गलत बात नहीं होगी। रियाज़ नाइकू का आठ वर्षों तक एक जिहादी के रूप में बचे रहना इसी का प्रमाण है।
जिहाद के लिए उकसाने वाला नाइकू

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रियाज़ नाइकू ने कश्मीर में आतंकी जनाजों को गन सैलूट की पुरानी परिपाटी को जीवित किया था। उसने अपने वीडियो और आडियो संदेशों के माध्यम से मुस्लिम युवाओं को आज़ादी और जिहाद के लिए उकसाया। उसने लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद के साथ साझा आतंकी गतिविधियों की रूपरेखा तैयार की। यह आतंकी रणनीति सुरक्षा बलों के लिए चिंता का विषय थी। कभी इन संगठनों की वर्चस्व की लड़ाई ने सुरक्षा बलों को बहुत लाभ पहुंचाया था। फरवरी, 2018 में लश्कर आतंकी नाविद जट को अस्पताल से भगाने में रियाज़ नाइकू का ही हाथ था। जाकिर मूसा के आतंकी संगठन से भी उसका बेहतर संबंध था। पुलवामा और अवन्तीपुरा नाइकू के आतंकी गतिविधियों के प्रमुख केंद्र थे। वह कश्मीर में शरिया कानून लागू करने का पक्षधर और इच्छुक था। इस्लामिक स्टेट और अबूबकर अल बगदादी उसका आदर्श थे। 2018 में कश्मीर में उसने पुलिस और उनके परिवार वालों तक को अगवा कर कश्मीरियों को सुरक्षा बलों से दूरी रखने का कठोर संदेश दिया। वह स्थानीय लोगों से मुखबिरी के संदेह पर उसी क्रूरता से पेश आने लगा पहले जैसा लश्कर और जैश के पाकिस्तानी आतंकी करते थे। नाइकू से पहले हिजबुल में ऐसा कभी नहीं था क्योंकि उसके सारे आतंकी स्थानीय थे। शायद यह इस्लामिक स्टेट की क्रूरतम विचारधारा का असर था। उसने पैसे की उगाही के लिए अनेक बागवानों और व्यवसायियों को निशाना बनाया। दक्षिण कश्मीर में अफीम और गांजे की खेती भी उसके फंडिंग के स्रोत थे।

इस्लामिक स्टेट के पद चिन्हों पर चलाने की कोशिश में था नाइकू
रियाज़ नाइकू ने हिजबुल की आतंकी मुहिम को भारतीय कुफ़्र के विरुद्ध बिलकुल इस्लामिक स्टेट के पद चिन्हों पर चलाने की कोशिश की। उसने 2010 से 2015 के हिजबुल के मुक़ाबले एक सशक्त हिजबुल खड़ा किया। हिजबुल को अपने 90 के दौर का प्रभावी समय वापस किया। परंतु इन सबके पीछे आज के कश्मीरी युवा का सोशल मीडिया द्वारा कट्टर इस्लामीकरण भी है। जहाँ 2010 और 2013 के बीच आतंकियों की संख्या घटकर एकल इकाई में जा पहुंची थी, वहीं इस्लामिक स्टेट के प्रसार के साथ-साथ यह तीव्र गति से बढ़ी। बुरहान वानी हो या रियाज़ नाइकू, यह सब इस्लामिक हिंसक विचारधारा से जन्मे रक्तबीज हैं, जिनका संहार इन आतंकियों के साथ न होकर इस विचारधारा के अंत के साथ ही संभव होगा।
 
उल्लेखनीय है कि हिजबुल मुजाहिदीन कश्मीर का बड़ा आतंकी संगठन है। इसका आतंकी संगठन का संचालन आतंकी सरगना सैय्यद सलाहुद्दीन जो कि पाक अधिक्रांत कश्मीर के मुजफ्फराबाद में बैठा है। कश्मीर का यह संगठन कश्मीर के पाकिस्तान में विलय की मांग करता है। ध्यान रहे कि हिजबुल मुजाहिदीन जमात-ए-इस्लामी का ही सैन्य संगठन था, जिसको पाकिस्तान ने कश्मीर में आतंकवाद फैलाने के लिए 1989 में गठित किया।