बाबासाहेब की नजरों में सधर्म या धर्म का कार्य क्या है ?

    दिनांक 07-मई-2020
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हम लगातार आपको बाबासाहेब के जीवन से जुड़े कुछ अनछुए प्रसंगों को बताने का प्रयास कर रहे हैं। आगे भी यह प्रयास जारी रहेगा। ये प्रसंग “डॉ. बाबासाहब आंबेडकर राइटिंग्स एंड स्पीचेज”, “पाकिस्तान ऑर पार्टीशन ऑफ इंडिया”, “द सेलेक्टेड वर्क्स ऑफ़ डॉ. बी. आर. आंबेडकर”, “द डिक्लाइन एंड फॉल ऑफ़ बुद्धिज़्म” आदि पुस्तकों से लिए गए हैं. बाबासाहेब को जानें भाग 30 :-

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मन को शुद्घ रखना। विश्व को सदाचारी राज्य बनाना। धर्म सद्धम बनने हेतु प्रज्ञा को बढ़ावा देना। शिक्षा को सभी के लिए खुली रखना।
सिर्फ कोरी शिक्षा सबकुछ नहीं इसलिए प्रज्ञा का होना जरूरी है। प्रज्ञा का मतलब है साक्षात् अनुभव जो प्रयोगसिद्घ हो, यह अनुभव सार्वजनिक हो, और सच्चे तथ्यों पर आधारित हो
धर्म को सद्धम यानी सद्धर्म बनने हेतु, मैत्री को बढ़ावा देना। प्रज्ञा से ज्यादा शील हो । शील से ज्यादा करुणा हो। करुणा से ज्यादा मैत्री हो। यहां ये ध्यान रखें कि इनका मूल्य बढ़ते क्रम में है जैसे प्रज्ञा-शील-करुणा-मैत्री।
सामाजिक समता, सामाजिक एकता के लिए मैत्रीपूर्ण और कारुणिक चरित्र बहुत आवश्यक है इसलिए व्यक्ति की गुणवत्ता व चरित्र प्रमाण है न कि उसका जन्म।
धर्म सद्धम बनने हेतु व्यक्ति-व्यक्ति के बीच में से सभी सामाजिक दीवारें हटा देना जरूरी है। व्यक्ति का दर्जा उसकी गुणवक्ता पर हो न कि उसके जन्म पर। व्यक्ति-व्यक्ति के बीच में समता को बढ़ाएं। समता और गुणवत्ता से समाज में एकता और बंधुत्व को बढ़ावा मिलता है। सब एक हैं तो समाज है।
धर्म का उद्देश्य: पहले यह बात समझ लें कि समाज में चारों ओर दु:ख व्याप्त है, समाज को दु:ख से मुक्त करें। दु:ख के कारण का निवारण करें। दु:ख को उचित उपाय करके सुख-शांति, बंधुत्व और मैत्री को बढ़ाएं।
धर्म का मार्ग मंगल है, पंचशील का मार्ग मंगल है। पंचशील का अनुकरण करें। हिंसा न करें। चोरी न करें। व्यभिचार न करें। झूठ न बोलें। मद्य आदि मादक पदार्थों का सेवन न करें।
धर्म का मार्ग सदाचार है। इसके आठ अंग हैं:
सम्यक् दृष्टि, सम्यक् वाचा, सम्यक् संकल्प, सम्यक् व्यायाम, सम्यक् कर्म, सम्यक् आजीविका, सम्यक् स्मृति, सम्यक् समाधि।
इस मार्ग पर प्रयास करने के लिए मिच्छा (पालि भाषा में इसका अर्थ अधर्म है) दृष्टि को सम्यक् समाधि से हटाना होता है। यह मार्ग चार आर्य सत्यों का दर्शन है। यहां पर विज्ञान और नैतिकता का उचित प्रयोग होने से सामाजिक कल्याण और एकता का कार्य बढ़ सकता है। सम्मा, समाधि और श्रद्घा को बल देता है। सम्मा समाधि मन को मंगल, अचल और एकाग्र रखता है जिससे व्यक्ति की क्षमता व गुणवत्ता बढ़ती है।