बदल गई शिवसेना : हिंदुओं के कातिल टीपू सुल्तान को दे रही श्रद्धांजलि

    दिनांक 08-मई-2020
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गोपाल गोस्वामी
बाला साहेब के आदर्शों और सिद्धांतों को ताक पर रखकर शिवसेना एक ऐसे मुस्लिम आक्रांता का महिमामंडन करने में जुटी है जिसने अधिसंख्‍य मंदिर ध्‍वस्‍त कर दिए, हिन्‍दुओं को बर्बरता से मारा,उनका कन्‍वर्जन कराया

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17 नवंबर, 2012 को श्रद्धेय बाला साहेब ठाकरे का निधन हुआ था। उस दिन उनके सम्‍मान में मुंबई जैसे ठहर गई थी। भारतीय राजनीति में प्रबल हिन्‍दुत्‍व प्रवर्तकों में बाला साहेब का नाम बड़े सम्‍मान से लिया जाता है। हालांकि वे चुनाव कभी नहीं लड़े, फिर भी राजनीति में उनका दखल जबरदस्‍त था। भारत के इतिहास में संभवत: वह पहले व्‍यक्ति थे, जिन्‍हें मुसलमानों के विरुद्ध बोलने पर वोट देने के अधिकार से वंचित कर दिया गया था। आज उन्‍हीं की संतान और पार्टी नेता सत्‍ता के लोभ में उनके आदर्शों और मूल्‍यों को मुंह चिढ़ा रहे हैं।
रामटेक से शिवसेना सांसद कृपाल तुमाने ने हाल ही में टीपू सुल्‍तान जयंती का बैनर बनवाया। इस पर तुमाने ने पार्टी का नाम तो लिखवाया ही, बाला साहेब का चित्र भी लगाया। जिस पार्टी की नींव आक्रांताओं के विरोध पर रखी गई हो, जो छत्रपति शिवाजी महाराज को प्रेरणास्रोत मानती हो, उसी ने आक्रांताओं को अपना आदर्श और राजा घोषित कर दिया! 20-30 साल की अपनी राजनीतिक यात्रा में शिवसेना इस स्थिति में पहुंच गई, यह देख कर बाला साहेब की आत्‍मा को बहुत कष्‍ट हो रहा होगा। भारत की संस्‍कृति को ध्‍वस्‍त कर इस्लामिक जिहाद के सिपहसालारों को महिमामंडित कर मुसलमानों का वोट हासिल करने का यह प्रपंच हालांकि नया नहीं है, पर अभी तक यह कांग्रेस और वामपंथी दलों तक ही सीमित था। जिस टीपू सुल्तान को शिवसेना ने अपना नया आदर्श चुना है, उसके बारे में सभी को जानना चाहिए।
ऐसा था टीपू सुल्‍तान
टीपू सुल्तान ने 17 वर्षों के शासनकाल में दक्षिण के लगभग सभी बड़े नगरों को नष्‍ट कर दिया। इनमें कोडागु (कुर्ग), कालीकट (कोझिकोड), मालाबार भी शामिल थे। उसने 1788 में कुर्गनगर में भी तोड़फोड़ के बाद आग लगा दी, मंदिर तोड़ डाले और समूचे नगर को वीरान कर दिया। वह हिन्‍दुओं का बलात् कन्‍वर्जन भी कराता था। कुर्नूल के नवाब को लिखे उसके पत्र से इसकी पुष्टि होती है। टीपू ने लिखा है कि उसने 4,000 कोड़वा लोगों को बंदी बनाकर उनका कन्‍वर्जन कर मुसलमान बनाया। कोडागु को तहस-नहस कर बाहर से 7,000 शेख व सैय्यद मुसलमानों को लाकर वहां बसाया। उसके शासनकाल में कोडागु के सभी मंदिर तोड़ दिए गए। एक मंदिर को पत्‍तों से ढक दिया गया था, इसलिए वह बच गया। मेडकरी का ओंकारेश्वर मंदिर नष्‍ट होने से बच गया, क्‍योंकि वहां के शासक ने पहले ही उसका गोपुरम तोड़कर उसे गुम्बद का आकर दे दिया था ताकि दूर से लगे कि वह मस्जिद है। आज भी यह मंदिर उसी गुंबद के साथ खड़ा उस आक्रांता की बर्बरता की याद दिलाता है। कोडागु के कन्‍वर्टेड मुसलमान आज भी हिन्‍दू उपनाम लगाते हैं।
बर्बरता की पराकाष्‍ठा
कालीकट के विनाश का वर्णन अनेक पुर्तगाली, जर्मन, ब्रिटिश मिशनरियों और सेना के अधिकारियों ने अपने संस्‍मरणों में किया है। इन्‍होंने लिखा है कि कैसे 30,000 आक्रांता आगे-आगे लोगों को मारते हुए बढ़ते थे और पीछे से 30,000 की सेना लेकर हाथी पर सवार टीपू हिन्‍दुओं को हाथियों के पैरों से बांध कर मार डालता था। बच्चों को माताओं के गले में लटका कर और माताओं को पेड़ से लटका कर मार डाला जाता था। टीपू के राज में पुरुषों को इस्लाम में कन्‍वर्ट किया जाता था और बेटियों का जबरन मुसलमानों से निकाह करा दिया जाता था। चारों ओर मौत का भयंकर दृश्य होता था । मिशनरी गुनसेट लिखता है, ‘टीपू ने कालीकट को जमीन में मिला दिया था।‘
टीपू ने सय्यद अब्दुल ढुलाई को पत्र लिखा, "अल्लाह के करम व मुहम्मद की प्रेरणा से कालीकट के सभी हिन्दू मुसलमान हो गए हैं। चीन की सीमा में कुछ हिंदू जो बच गए हैं, उन्‍हें भी जल्‍दी ही मुसलमान बना दिया जाएगा। आपका पत्र मिला आपने नायर ब्राह्मणों को मारा और उन्‍हें मुसलमान बनाया। मालाबार में 4 लाख हिन्दुओं को मुसलमान बनाया, 800 मंदिर जमींदोज कर डाले, आप अल्‍लाह का काम कर रहे हैं। विलियम लोगस ने मालाबार मैनुअल्स में इसका विवरण दिया है। यदि किसी मलबारी को इसकी स्मृति करवानी हो तो केवल एक शब्द 'पादयोत्तम" बोलकर देखें।
कांग्रेस ने शुरु कि आक्रांता का महिमामंडन
ऐसे बर्बर आक्रांता का कोई महिमामंडन करेगा तो किसी भी स्वाभिमानी देश भक्त का खून उबलेगा। लेकिन यह जानना भी जरूरी है कि महिमामंडन की शुरुआत कैसे हुई। 70 के दशक में कांग्रेस ने तुष्टिकरण की नीति के तहत टीपू सुलतान पर एक डाक टिकट जारी किया। भगवन गिडवानी ने ‘द सोर्ड ऑफ टीपू सुल्‍तान’ नामक उपन्‍यास लिखकर इस फैसले को न्‍यायोचित बताया। इसके बाद गिरीश कर्नाड ने
"टीपू विनाकाणा सुगालु" (The Dreams of Tipu Sultan) नामक नाटक लिखा। नई पीढ़ी इसे ही सच मानती है। आज के सूचना माध्यमों पर इनके द्वारा रचित-कल्पित टीपू पुराण ही हावी हैं।
गिडवानी ने अपने उपन्‍यास में टीपू को महान देशभक्त, कुशल रणनीतिकार ,हिन्दू-मुस्लिम एकता का प्रतीक , मंदिरों का उद्धारक घोषित किया। 1799 की श्रीरंगपट्टनम की अंतिम लड़ाई में टीपू के मरने तक पूरे राज्‍य में केवल दो मंदिरों में पूजा होती थी। उसने दक्षिण की प्रमुख भाषा कन्नड़ को हटाकर फारसी को राजभाषा बना दिया। उसके मरने के बाद कर्नल विलियम को 22,000 हस्‍तलिखित पत्र मिले। इनमें हिन्‍दुओं को काफिर और विधर्मी बताया गया है। पूरे देश में केवल कन्नड़ मुसलमान ही ऐसा है जो अपनी मातृभाषा कन्नड़ नहीं बोल सकता। इसका पूरा श्रेय गिडवानी के टीपू को ही जाता है। आज भी कन्नड़ में बलपूर्वक घुसाए गए शब्द जैसे- खाता, खिरडी , खानसुमरी, गुदास्ता, तख़्त ,जमाबन्दी, अमलदार आदि चलन में हैं। टीपू ने मुहम्मद के जन्म से आरम्भ कर कैलेंडर बनवाया था, जिसके महीनों के नाम अरबी शब्दों से शुरू होते थे।
देशभक्‍त नहीं था
कुछ लोग कहते हैं कि टीपू ने मंदिरों के पास महल बनाया, जो हिन्दुओं के प्रति उसका सम्‍मान दर्शाता है। लेकिन सच यह है कि मुसलमान मंदिर के पास अपना महल या मस्जिद भाईचारे की भावना से नहीं बनाता है। वह मंदिर आने वालों को यह बताना चाहता है कि तुम्हारा भगवान है ही नहीं, केवल अल्लाह है। धिम्‍मी हिन्‍दुओं को यही समझने की जरूरत है। टीपू को देशभक्त व स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बताने वालों को यह पता होना चाहिए कि उसने अंग्रेजों के विरुद्ध केवल इसलिए लड़ाई लड़ी, क्‍योंकि वह फ्रांसिसियों का आधिपत्य स्वीकार कर चुका था। उसने फ्रांस से संधि की थी कि जीतने के बाद आधा राज्‍य टीपू और आधा फ्रांसिसियों का होगा। टीपू द्वारा 2 अप्रैल, 1797 को फ्रांस की सेना को दिए गए आमंत्रण में इसका स्पष्ट उल्लेख है। यह ब्रिटिश अभिलेखागार में आज भी उपलब्ध है।
जब मराठा साम्राज्य उत्कर्ष पर था, तब भयभीत टीपू ने 1797 में अफगान शासन जमनशाह को भारत पर उत्‍तर की ओर से आक्रमण करने के लिए पत्र लिखा था। इसमें उसने स्‍वयं दक्षिण से आक्रमण करने की बात लिखी है। वह भारत से इस्‍लाम के दुश्‍मन काफिरों को खत्‍म करना चाहता था। यह पत्र उसे कट्टरपंथी घोषित करने के लिए उपयुक्‍त है। अंग्रेजों से अपने साम्राज्‍य को बचाने के लिए दुश्मन से हाथ मिलाकर अंग्रेजों से लड़ने वाले एक क्रूर आक्रांता को स्वतंत्रता सेनानी बताया जा रहा है तो मराठों, मेवाड़ के राजपूतों , गोरखाओं को यह सम्मान क्यों नहीं दिया गया? क्योंकि वे देश की अस्मिता व हिन्‍दुओं के सम्मान के लिए लड़े थे ? वीर सावरकर से शुरू कर आज शिवसेना टीपू सुल्‍तान तक पहुंच गई है। वह दिन दूर नहीं, जब इसके सहयोगी उसे छत्रपति शिवाजी महाराज को भी दूर कर देंगे।