ग्रंथों को अपने प्राण मानते थे बाबासाहेब

    दिनांक 01-जून-2020
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हम लगातार आपको बाबासाहेब के जीवन से जुड़े कुछ अनछुए प्रसंगों को बताने का प्रयास कर रहे हैं। आगे भी यह प्रयास जारी रहेगा। ये प्रसंग “डॉ. बाबासाहब आंबेडकर राइटिंग्स एंड स्पीचेज”, “पाकिस्तान ऑर पार्टीशन ऑफ इंडिया”, “द सेलेक्टेड वर्क्स ऑफ़ डॉ. बी. आर. आंबेडकर”, “द डिक्लाइन एंड फॉल ऑफ़ बुद्धिज़्म” आदि पुस्तकों से लिए गए हैं. बाबासाहेब को जानें भाग 49:-

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बाबासाहेब ने वैचारिक विश्व में जो परिवर्तन किया, उसका प्रमुख आधार रहा उनका अखंड ग्रंथ पठन। ग्रंथों की ऐसी भूख रखने वाला ज्ञानमार्गी विरला ही होगा। विदेशी विश्वविद्यालयों के छात्रावासों में प्याला भर दूध और ब्रेड के दो-चार टुकड़े खाकर 18-18 घंटे अध्ययन करने वाला यह विद्यार्थी। पेट काटकर उन्होंने 35,000 ग्रंथ खरीदे। हर ग्रंथ बारीकी से पढ़ा हुआ और हाशिए में टिप्पणी किया हुआ था। ग्रंथ तो मानो उनके बहिश्वर प्राण थे। बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के लिए पं. मदनमोहन मालवीय जी ने इन ग्रंथों की मांग की थी। वे इन ग्रंथों के लिए मुंहमांगा दाम देने के लिए तैयार थे। उसे बड़ी नम्रता से अस्वीकार करते हुए बाबासाहेब ने कहा, ‘आप तो मानों मेरे प्राण ही मांग रहे हैं।’ बाबासाहेब के भक्तों, उनके विरोधियों और समाज के युवकों ने उनकी ज्ञानसाधना के शतांश का भी अनुसरण किया होता, तो यह देश प्रगति के शिखर पर जा पहुंचता।