दिल्ली दंगा: यमुनापार में हुए दंगों के पीछे का सच

    दिनांक 01-जून-2020   
Total Views |
यह संयोग था या प्रयोग कि दिल्ली सरकार के शपथ ग्रहण को एक सप्ताह भी पूरा नहीं होता और दिल्ली दंगों की आग में झोंक दी जाती है। सीएए के विरोध के नाम पर दिल्ली की सड़कों को जाम करके बैठे अराजक तत्वों का मनोबल केजरीवाल के सत्ता में आने के बाद बढ़ गया था। सीएए विरोध को हवा देने से लेकर दिल्ली सरकार के दंगाइयों से लगातार संपर्क तक के निशान मिलते हैं। आम आदमी पार्टी के नेता न सिर्फ दंगाइयों का नेतृत्व करते हुए देखे गए, बल्कि एक नेता के घर से पूरा दंगा आपरेट होता है, जिसे आस—पास के लोग कैमरे में उतार लेते है। वहां एक गैर कानूनी तेजाब का कारखाना भी मिलता है।
l_1  H x W: 0 x

दिल्ली में यमुना पार को केन्द्र में रखकर किया गया दंगा बेहद संगठित था, इसे देखकर साफ कहा जा सकता है कि इसकी पटकथा पहले से लिखी गई।

दिल्ली के चुनाव परिणाम आने के बाद दिल्ली में दंगों की पृष्ठभूमि बना दी गई थी।  कैप्टन आर विक्रम सिंह के शब्दों में इस बात को कहें तो '' राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के स्वागत की तैयारी भारत सरकार के साथ-साथ भारत विरोधी शक्तियों ने भी कर रखी थी।''

जिस तरह दंगों के दौरान पेट्रोल बम, पत्थर, अवैध हथियारों का जखीरा यमुना पार में इस्तेमाल में लाया गया। वह बिना किसी पूर्व योजना के संभव ही नहीं था। जिसके बाद अंतरराष्ट्रीय मीडिया के लिए दिल्ली दंगा ट्रंप की यात्रा से बड़ा समाचार बन गया।

टुकड़े—टुकड़े गैंग से लेकर विपक्ष में बैठे कई राजनीतिक दल तक चाह रहे थे कि ऐसा हो। गुजरात में बढ़े कोविड 19 के मरीजों को महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे आज तक ट्रम्प की यात्रा से जोड़ रहे हैं और जब कोई उनसे पूछता है कि महाराष्ट्र सरकार ने जो पूरे राज्य की दुर्दशा की है, वह किसकी यात्रा से हुआ है? लगातार राज्य में भगवा पहनने वालों पर हमला हो रहा है, वह किसके इशारे पर हो रहा है तो वह जवाब नहीं देते।

दिल्ली दंगों को समझने के लिए, यह समझना बहुत जरूरी है कि साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण का फायदा किस पार्टी को मिला ? सीएए—एनआरसी के विरोध से उपजे साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण को अपने हक में किसने इस्तेमाल किया? इस ध्रुवीकरण की शुरुआत दिल्ली विधानसभा चुनाव से ठीक पहले प्रारम्भ हुई, क्योंकि इससे ठीक पहले आम मुस्लिम समाज ने तीन तलाक, 370, राम मंदिर पर आए निर्णयों को स्वीकार किया था। इस स्वीकार्यता के बाद देशभर में कट्टरपंथी मुसलमानों, तब्लीगियों और विपक्ष में बैठकर हिन्दू—मुस्लिम पर देश को बांटने की राजनीति करने वाली पार्टिंयां सक्रिय हुईं।

इस सक्रियता का परिणाम यह हुआ कि दिल्ली में मुसलमानों का सारा का सारा वोट आम आदमी पार्टी के खाते में गया। यह थी नफरत की राजनीति की फसल, जिसे बोया गया कट्टरपंथी मुसलमानों और तब्लीगियों द्वारा और जिसे काटा विधानसभा चुनाव 2020 में आम आदमी पार्टी ने।

यह कैसे हुआ होगा कि दिल्ली में कांग्रेस को वोट देने वाले मुसलमानों ने तय कर लिया कि इस बार सारा वोट आम आदमी को देना है और यह तय करने के लिए न कोई मीटिंग की गई, ना वाट्सएप पर कोई मैसेज का अभियान चलाया गया। उसके बावजूद दिल्ली के एक—एक मुसलमान मतदाता तक यह संदेश पहुंचाया गया कि भाजपा को वोट नहीं करना है और इस बार, कांग्रेस को भी वोट नहीं करना है। वोट फॉर केजरीवाल।

l_1  H x W: 0 x
 
साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के जाल में आम मुसलमान भी फंस जाता है, जिसे न तब्लीगियों से मतलब है, न कट्टरपंथियों से। वह तो दो वक्त की रोटी के लिए जुझ रहा है। वह तो 10—10 घंटे की मेहनत कर रहा है कि अपने बच्चे को अच्छा भविष्य दे पाए लेकिन उसकी यदि पहचान मुस्लिम है तो उसे कई तरह से मजबूर किया जाता है कि वह इस्लामिक इको सिस्टम का हिस्सा बनकर रहे। किसी मुसलमान ने कट्टरपंथियों से असहमति जताई तो उसका हर स्तर पर बहिष्कार होता है।

भारत में सक्रिय कुछ इस्लामिक संगठन इस्लाम को मजहब नहीं रहने देना चाहते, वे इसे गिरोह की तरह आपरेट करते हैं। ऐसे संगठनों की पूरी ताकत अपना कुनबा बढ़ाने में और असहमतियों को दबाने में खर्च होती है। यहां विमर्श के लिए कोई स्थान नहीं है। असहमति का स्वर कहीं सुनने को नहीं मिलता।

युवा लेखक अर्चित यादव आल्हा के अनुसार — ''जुम्मे की नमाज धार्मिक से अधिक राजनीतिक जुटान ही है। जिसकी वजह से एक मुस्लिम व्यक्ति स्वतंत्र चिन्तन नहीं कर पाता।''

एक मुस्लिम युवक क्या सोचेगा इसकी दिशा मस्जिद ही तय कर देती है। वर्ना यह कैसे संभव है कि देश भर में मुसलमानों के वोट गिरने का पैटर्न है। वह बिना अधिक शोर शराबे के एक तरफ ही जाता है। वहां सिर्फ वोट ही तय नहीं होता। पत्थरबाजी भी तय होती है। श्रीनगर के लाल चौक पर एक समय ऐसा था कि जुमे की नमाज के बाद पत्थरबाजी की घटना तय मानी जाती थी। उस दिन पुलिस की विशेष व्यवस्था करनी ही पड़ती थी। क्या कभी हम सोच सकते हैं कि मंदिर, चर्च या गुरूद्वारे से लोग निकले और उनके हाथों में पत्थर हो। ऐसी घटनाएं जुमे की नमाज के बाद आम हैं।

इंटरनेट पर दंगों और मस्जिदों के जुमा कनेक्शन से जुड़ी कई खबरे मिल जाएंगी। 14 दिसम्बर 2019 को ‘ऑप इंडिया’ की खबर है— ममता बनर्जी के बंगाल में जुमे की नमाज के बाद मुसलमानों ने योजना बनाकर जमकर हिंसा, पत्थरबाजी, आगजनी की। 20 दिसम्बर 2019 को ‘दैनिक हिन्दुस्तान’ लिखता है— ''अलीगढ़-हाथरस में जुमे की नमाज के बाद पुलिस पर पथराव, फायरिंग।''20 दिसम्बर 2019 को ‘उत्तम हिन्दू’ लिखता है— ''जुमे की नमाज के बाद उत्तर प्रदेश के कई शहरों में पत्थरबाजी, वाहनों में तोड़फोड़।'' 11 मई 2019 को श्रीनगर से ‘अमर उजाला’ लिखता है— जुमे की नमाज के बाद हिंसक प्रदर्शन, जवानों ने आंसू गैस के गोले दागे, पैलेट गन भी चलाना पड़ा।

l_1  H x W: 0 x

जब दिल्ली वालों के सामने दिल्ली के दंगे की पूरी कहानी परत—दर—परत खुल रही थी, टुकड़े—टुकड़े गैंग को एक नाम चाहिए था। जिस पर यमुना पार में हुए दंगों की पर्ची फाड़ी जा सके। उन्होंने इसके लिए भाजपा नेता कपिल मिश्रा को चुना। यह उनकी नामसझी थी। क्या भारतीय जनता पार्टी का कोई नेता ऐसी गलती कर सकता है कि जब अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प भारत में हैं तो वह राजधानी में दंगे की योजना बनाएगा। वे बार—बार अपने स्क्रीप्टेड झूठ को दोहरा कर सच साबित करने का प्रयत्न कर रहे हैं लेकिन यह स्क्रीप्ट इतनी खराब है कि इस पर यकीन कर पाना मुश्किल है।

दंगों को लेकर कपिल के खिलाफ सबसे अधिक सक्रिय एनडीटीवी था। जबकि घटना वाले दिन यमुना पार जब कपिल किसी के निमंत्रण पर पहुंचे, वहां मौजूद एक प्रत्यक्षदर्शी का कहना है कि कपिल की बात को एनडीटीवी ने गलत तरह से समाज के सामने रखा। जिसकी वजह से जो लोग वहां नहीं थे, उनकी नजर में विलेन बनाने की कोशिश की गई।  एकपक्षीय रिपोर्ट दिखाने के दौरान चैनल ने कपिल का पक्ष जानने की भी कोशिश नहीं की।

दिल्ली वाले भली भांति जानते हैं कि इन दंगों के पीछे कौन सी लॉबी है, यह वही लॉबी है सबसे पहले हिंदू मुसलमान करती है। तथ्यों को अपने हिसाब से तोड़ती मरोड़ती है और भ्रामकता फैलाती है।