गंगा दशहरा: बनी रहे मां गंगा निर्मल

    दिनांक 01-जून-2020
Total Views |
 पूनम नेगी
गंगा केवल एक नदी नहीं है। यह हमारी मां है। हमारी जीवन रेखा है, जो जीवनपर्यंत साथ-साथ चलती है। लेकिन ज्यादातर भारत वासी इसका महत्व समझ ही नहीं पाए। कल-कारखानों का जहरीला रसायन, नाले का पानी और मल-मूत्र तक इसकी धारा में छोड़ते रहे। गंगा प्रदूषित होती गई, पर इसकी पवित्रता कम नहीं हुई। कोरोना महामारी के कारण लॉकडाउन के दौरान गंगा फिर से स्वच्छ और निर्मल हो गई है, यह हर्षित करने वाली बात है 
g_1  H x W: 0 x

एक बार अमेरिका में कुछ पत्रकारों ने स्वामी विवेकानन्द से भारत की नदियों के बारे में प्रश्न पूछा-आपके देश में किस नदी का जल सबसे अच्छा है? स्वामीजी बोले-यमुना। पत्रकार ने कहा-आपके देश के लोग तो बोलते हैं कि गंगा का जल सबसे अच्छा है। स्वामी जी का उत्तर था-कौन कहता है गंगा नदी है, वह तो हमारी मां है। जीवनदायिनी मां की तरह वह धरती के सभी जड़-चेतन प्राणियों एवं वनस्पतियों का भरण-पोषण करती है।

जापान के वैज्ञानिक डॉ. मसारू इमोटो गंगाजल की अलौकिक महिमा के बारे में जानकर इस कदर प्रभावित हुए थे कि उन्होंने रामायण में उल्लेखित श्राप की घटनाओं को अपने शोध का विषय बना लिया। उनके शोध का विषय था-पानी के सोचने-समझने की क्षमता। नदी विशेषज्ञ डॉ. अभय मिश्र के मुताबिक डॉ. मसारू गंगाजल की उस क्षमता को जानना चाहते थे, जिसे हमारे ऋषि-मुनि हथेली में लेकर संकल्प लेते थे या श्राप दिया करते थे। इसी तरह, सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य के काल में भारत आने वाले यूनानी राजदूत मेगस्थनीज ने अपने यात्रा वृत्तांत ‘इंडिका’ में गंगा को बहुत बढ़िया तरीके से परिभाषित करने की कोशिश की है। मेगस्थनीज पाश्चात्य जगत का पहला विद्वान था, जिसने 2,000 वर्ष पूर्व गंगा का उल्लेख अपनी पुस्तक में किया था।

कोरोना संकट काल मोक्षदायिनी गंगा के लिए वरदान साबित हो रहा है। बरसों से प्रदूषण की मार से बेजार गंगा का पावन जल इन दिनों शीशे की तरह पारदर्शी और निर्मल दिख रहा है। आॅक्सीजन की मात्रा भी बढ़ गई है, जिससे गंगाजल की गुणवत्ता में भी सुधार आया है। गंगा के तटों पर मछलियां नजर आ रही हैं। घाटों पर श्रद्धालुओं की आवाजाही ठप होने, कल-कारखानों और चमड़ा उद्योग बंद होने के कारण गंगा में गंदा पानी नहीं गिर रहा है। इस कारण ऋषिकेश और हरिद्वार ही नहीं, बल्कि कानपुर, प्रयाग, काशी से लेकर पटना तक सभी जगह गंगाजल की शुद्धता पहले के मुकाबले काफी बढ़ गई है। इसकी सहायक नदियां मसलन दिल्ली में यमुना, लखनऊ में गोमती से लेकर गुजरात की साबरमती तक भी इस अवधि में काफी साफ हो गई हैं। साधु-संत और पर्यावरणविद् के अलावा वैज्ञानिक भी गंगा और इसकी अन्य सहायक नदियों के जल की स्वच्छता एवं निर्मलता को देखकर उत्साहित और आश्चर्यचकित हैं।

आईआईटी बीएचयू केमिकल इंजीनियरिंग और टेक्नोलॉजी विभाग के प्रोफेसर डॉक्टर पी. के मिश्रा का कहना है कि लॉकडाउन के दौरान गंगा के पानी में 40 प्रतिशत का सुधार देखने को मिला है। गंगा को साफ करने की कोशिश में सालों से अलग-अलग सरकारों ने अनेकानेक योजनाएं और समितियां बनार्इं और हजारों करोड़ रुपये खर्च कर दिए, लेकिन ऐसे नतीजे कभी नहीं दिखे, जो लॉकडाउन के दौरान अपने आप ही सामने आए हैं। परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष चिदानंद मुनि की माने तो आधी सदी पूर्व गंगा ऐसी ही निर्मल थी। अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत नरेन्द्र्र गिरि का कहना है कि गंगा और यमुना का यही स्वरूप बरकरार रहे, इसके लिए वह केंद्र और प्रदेश सरकारों से मांग करेंगे कि गंगा के किनारे लगे कल-कारखानों का पानी गंगा में न छोड़ा जाए।

गंगा हिंदू सभ्यता और संस्कृति की सबसे अनमोल धरोहर है। इसी के तट पर ही रामायण और महाभारत जैसी दिव्य सभ्यताओं का उद्भव और विकास हुआ, जिसने भारत को विश्वगुरु का दर्जा दिलाया। वेद-पुराण, श्रुति, उपनिषद, ब्राह्मण व आरण्यक जैसे ज्ञान के अनमोल खजाने मां गंगा की दिव्य गोद में ही सृजित हुए। पावन गंगा के तटों पर ही आरण्यक व आश्रम विकसित कर हमारे महान तत्वदर्शी ऋषियों ने पर्यावरण संतुलन के सूत्रों के द्वारा नदियों, पहाड़ों, जंगलों व पशु-पक्षियों सहित समूचे जीव-जगत के साथ सहअस्तित्व की अद्भुत अवधारणा विकसित की थी। सही मायने में गंगा केवल एक नदी नहीं, अपितु भारत की सांस्कृतिक महारेखा है जिसके चारों ओर हमारा भारत जीता है। मान्यता है कि गंगा के निर्मल जल में स्नान करने से समस्त पाप धुल जाते हैं। जीवन के अंतिम क्षण में मुंह में गंगा जल डाल दिया जाए तो बैकुंठ मिल जाता है। इसीलिए हमारे मनीषियों ने गंगा को भारत की सुषुम्ना नाड़ी की संज्ञा दी है।
  
इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि प्रकृति के साथ स्नेहिल दृष्टि से आबद्ध ऋषि संस्कृति का वह तानाबाना आजादी के बाद देश में हुए अनियोजित, अनियंत्रित विकास और अंधाधुंध औद्योगिकीकरण के कारण तेजी से दरकता चला गया। नतीजा, हमारे राष्ट्र की जीवनधारा, जिस पर देश के तकरीबन 40 करोड़ लोगों की आजीविका टिकी है, जिसके तट पर विकसित धार्मिक स्थल और तीर्थ भारतीय सामाजिक व्यवस्था के विशेष अंग हैं। कृषि, पर्यटन, साहसिक खेलों तथा उद्योगों के विकास में भी जिसका महत्त्वपूर्ण योगदान है, वह जीवनदायनी मां गंगा अपनी कलियुगी संतानों की क्रूरता, निष्ठुरता और अमानवीय व्यवहार के कारण देखते-देखते दुनिया की दस सबसे प्रदूषित नदियों में गिनी जाने लगी। बड़े-बड़े बांधों द्वारा गंगा के अविरल प्रवाह को बाधित करने के कारण ही नहीं, बल्कि तटों पर बने कल-कारखानों से छोड़े जाने वाले बेहिसाब जहरीले रासायनिक कचरे और मल-मूत्र को गंगा में गिराया जाने लगा।

इस पवित्र देव सरिता दुर्गति किसी भी भावनाशील सनातनधर्मी के लिए अत्यंत कष्टपूर्ण है। अत्यंत दु:ख की बात है कि पतित पावनी मां गंगा आज ‘सुपरबग’ पैदा करने लगी है। सुपरबग यानी ऐसा जीवाणु जिस पर एंटीबायोटिक्स का कोई असर नहीं होता। ऐसा तब है जब प्रयोगशालाओं में साबित हो चुका है कि गंगाजल में पाया जाने वाला बैक्टीरियोफेज नामक जीवाणु इसे सड़ने नहीं देता। है न कितना विरोधाभासी तथ्य! पर मां गंगा की इस दौर की करुण कथा यही है। 
    
अधिकांश भारतीय आज यह भूल गए हैं कि गंगा हमारे लिए देवलोक का वह महाप्रसाद है जो मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के वंशज राजा भगीरथ के महापुरुषार्थ से हमें प्राप्त हुआ। लेकिन हमने गंगाजल पीने की तो छोड़िए, आचमन लायक तक नहीं छोड़ा। फिर भी उदास, निराश मां गंगा हमारे पाप धोती आ रही है। मां गंगा यानी करुणा एवं दया की ऐसी महासरिता जो सदियों से हमारी चिता भस्म और अस्थियों को स्वयं में समाहित कर हमें मोक्ष का उपहार देती आ रही है।

इसकी दुर्दशा हम भारतीयों के लिए वाकई राष्ट्रीय शर्म का विषय है। पर कहते हैं न कि प्रकृति खुद सर्वोपरि चिकित्सक है। कोरोना एक इशारा है उस ईश्वर का, जिसने हमारा एवं इस प्रकृति का सृजन किया है। इस कोरोना काल में मां गंगा मानो अपनी स्वार्थी संतानों को भूल सुधारने की हिदायत दे रही हों कि अब मेरा और दोहन-शोषण मत करो। कोरोना के इस दंश से यह सबक लेने की आवश्यकता है कि प्रकृति से खिलवाड़ बहुत हो चुका, अब हमें चेत जाना चाहिए वर्ना परिणाम भयंकर होंगे। ज्ञात हो कि अठारहवीं सदी के उतरार्द्ध व उन्नीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में पनपे जड़ के साथ जड़ जैसा व्यवहार के भौंडे तत्व दर्शन से विकसित दोहन और शोषण की नीति के फलस्वरूप घोर लालची सोच ने ही आज हमें दुर्गति के इस मुकाम पर ला खड़ा कर दिया है कि सुविधाओं और विलासिता के अंबार के बीच हम जीवन और सेहत के संकट से बुरी तरह जूझ रहे हैं।

वस्तुत: कोरोना महामारी एक तरह से नींद से झकझोरने वाला है और लॉकडाउन प्रकृति के साथ जोड़ने का नायाब तरीका। महसूस कर देखें कि इस दौरान कितना कुछ बदल गया। निर्मल होती नदियां और साफ-सुथरी हवा, मानो संदेश देना चाहती हैं कि खुद को सभ्य समझने वाले इनसान ने आधुनिकता की होड़ में अपना कितना नुकसान किया है। हितोपदेश में कहा गया है- ‘आत्मवत्सर्वभूतेषु य: पश्यति स पंडित:’ अर्थात् जो अपने समान ही सभी प्राणियों और पदार्थों को देखता है, वही ज्ञानी और समझदार है। आधुनिक पर्यावरण चिंतक भी अब ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की इस भारतीय अवधारणा को स्वीकार कर लालच पर लगाम लगाने की हिदायत दे रहे हैं।

ज्येष्ठ शुक्ल दशमी को हुआ था गंगा व गायत्री का अवतरण

राजा भगीरथ ने कठोर तप करके गंगा को स्वर्ग से धरती पर उतारा तो मुनि विश्वामित्र प्रचंड तप साधना कर गायत्री को देवलोक से धरती तक लाए। गंगा दशमी और गायत्री जयंती, दोनों पर्वों का एक ही तिथि (ज्येष्ठ शुक्ल दशमी) पर आगमन भारतीय संस्कृति की विलक्षणता साबित करते हैं।

शास्त्रों के ज्ञाता कहते हैं कि गंगा दशहरा पर सूर्यवंशी राजा भगीरथ का कठोर तप सार्थक हुआ और स्वर्ग नदी गंगा देवाधिदेव शिव की जटाओं से होती हुई धराधाम पर उतरीं। शिव की जटाओं से प्रवाहित होती हुई गंगा ब्रह्मा द्वारा निर्मित बिंदुसर सरोवर में उतरीं। इस सरोवर की आकृति गाय के मुख के समान दिखने के कारण इस स्थल का नाम ‘गोमुख’ पड़ा। इसी तरह, गायत्री जयंती के दिन ही गायत्री मंत्र का भी प्रादुर्भाव हुआ था। ॐ भूभुर्व: स्व: तत सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्। अर्थात् उस प्राण स्वरूप, दुख नाशक, सुख स्वरूप श्रेष्ठ तेजस्वी, पाप नाशक देव स्वरूप परमात्मा को हम अंत:करण में धारण करें। वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग में प्रेरित करे। चारों वेदों का सार इस महामंत्र में निहित है। गायत्री गुरु मंत्र भी है एवं भारतीय धर्म के ज्ञान विज्ञान का स्रोत भी। इसीलिए गायत्री को ‘ज्ञान गंगा’ भी कहा जाता है।

गायत्री महाविद्या के सिद्ध साधक युग ऋषि पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य गायत्री जयंती की पावन तिथि को पार्थिव देह त्याग कर अपनी आराध्य सत्ता में विलीन हुए थे। गायत्री महाशक्ति की तात्विक विवेचना करते हुए इस महामनीषी ने लिखा है कि हिंदू धर्म में मां गायत्री को पंचमुखी माना गया है जिसका अर्थ है कि यह संपूर्ण ब्रह्माण्ड जल, वायु, पृथ्वी, तेज और आकाश के पांच तत्वों से बना है। संसार में जितने भी प्राणी हैं, उनका शरीर भी इन्हीं पांच तत्वों से बना है। इस पृथ्वी पर प्रत्येक जीव के भीतर गायत्री प्राण-शक्ति के रूप में विद्यमान है। यही कारण है गायत्री को सभी शक्तियों का आधार माना गया है। मां गायत्री का यह वरद पुत्र इस तथ्य से भली भांति अवगत था कि एक सदी तक विदेशी शासन के मातहत रहने के कारण भारतीयों की गुलाम मानसिकता सिर्फ सांस्कृतिक जनजागरण से ही परिवर्तित हो सकती है। इसलिए आचार्य ने जनजीवन में आध्यात्मिक नवजागरण का जो महापुरुषार्थ किया, उसके लिए समूची मानव जाति सदैव इस विलक्षण राष्ट्र संत की सदैव ऋणी रहेगी। मानवी चेतना में सुसंस्कारिता संवर्धन, अध्यात्म व विज्ञान के समन्वय, पर्यावरण व लौकिक जीवन का शायद कोई ऐसा पक्ष हो जो इस युग व्यास की लेखनी से अछूता रहा हो। समय की मांग के अनुरूप जीवन के विभिन्न पहलुओं पर अभिनव, प्रेरणा व संवेदना जगाती 3200 पुस्तकों का सृजन उनकी अद्वितीय लेखकीय क्षमता का द्योतक है।