पालघर प्रकरण : सवालों के घेरे में चर्च

    दिनांक 01-जून-2020
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फ्राविआ
 
पालघर में दो संतों और एक चालक की निर्मम हत्या पर लीपापोती की कोशिश की जा रही है ताकि परदे के पीछे से इस हत्याकांड को अंजाम देने वालों को बचाया जा सके। सारा दोष सोशल मीडिया पर मढ़ा जा रहा है। लेकिन ‘आदिवासी एकता परिषद ’ और चर्च की साठगांठ पर कोई कुछ नहीं बोल रहा है
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पालघर में 16 अप्रैल,2020 को हुई दर्दनाक घटना के दृश्य, जिसमें जूना अखाड़ा के दो संतों और उनके चालक की निर्मम हत्या कर दी गई थी।

वामपंथी गुटों और चर्च की कार्यशैली में एक समानता है। ये अपनी पहचान और एजेंडा छिपाने के लिए संगठनों का संजाल खड़ा करते हैं। परत दर परत पड़ताल करने पर ही इसकी पोल खुलती है। इसका ताजा उदाहरण है-पालघर में संतों की निर्मम हत्या, जिसने हिंदुओं को भावनाओं को बहुत ठेस पहुंचाई है। लेकिन इसका सारा दोष सोशल मीडिया पर मढ़ा जा रहा है। कहा जा रहा है कि सोशल मीडिया पर ‘मुसलमानों के कोरोना फैलाने’ और ‘बच्चों की किडनी चुराने वाले गिरोह’ जैसी अफवाहें फैलाई गर्इं, जिसके कारण यह घटना घटी। मानो किडनी न होकर कोई फूल हो गया, जिसे शरीर से तोड़ कर निकाला जा सकता है। आखिर इस खबर का स्रोत क्या है? दरअसल, इनके काम करने का तरीका ही यही है। गौरतलब है कि महाराष्ट्र के पालघर जिले में 16 अप्रैल,2020 को जूना अखाड़े के दो संत 65 वर्षीय महंत कल्पवृक्ष गिरि महाराज और 35 वर्षीय महंत सुशील गिरि महाराज और उनके चालक निलेश तेलगडे की भीड़ ने पीट-पीट कर हत्या कर दी थी। दोनों मुंबई से सूरत में अपने गुरुभाई के अंतिम संस्कार के लिए जा रहे थे।
 
वेबसाइट ‘द प्रिंट’ और कई अन्य मीडिया समूहों ने ‘आदिवासी एकता परिषद’ के किसी राजू पंधारा के हवाले से दावा किया कि सोशल मीडिया पर इस तरह की ‘अफवाहें’ फैलाई जा रही थीं। इस संवेदनशील स्थिति में अगर वह आगे आकर इस तरह का दावा कर रहा है यह तो यह मानना गलत नहीं होगा कि ‘आदिवासी एकता परिषद,’ जिसे मीडिया ‘पश्चिमी भारत में गरीबों के लिए जमीनी स्तर पर काम करने वाला संगठन’ बता रहा है, और उसके कार्यकर्ता इस कहानी को प्रचारित करने में दिलचस्पी दिखा रहे हैं, जबकि अभी जांच भी पूरी नहीं हुई है। अब सवाल यह है कि ‘आदिवासी एकता परिषद’ के पीछे कौन लोग सक्रिय हैं।
 
‘आदिवासी एकता परिषद’ के दो चेहरे
‘आदिवासी एकता परिषद’ अपनी वेबसाइट पर ‘अखिल मानव जाति और प्रकृति के लिए समर्पित कार्य’ करने का दावा करती है। जनवरी 2020 में परिषद ने पालघर में एक बड़ी ‘सांस्कृतिक’ सभा का आयोजन किया था, जिसमें कई नेता शामिल हुए थे। उनका कहना है कि हर साल इस सभा का आयोजन किया जाता है, जिसमें लगभग 2 लाख लोग शामिल होते हैं। यह दर्शाता है कि उनकी मौजूदा गतिविधियों का केंद्र्र पालघर और दादरा नगर हवेली क्षेत्र के आस-पास का इलाका है, क्योंकि 2019 की सभा दादरा नगर हवेली में सिलवासा के पास आयोजित की गई थी।
 
परदे के पीछे की गतिविधियां
ठीक इसी समय, कैथोलिक बिशप्स कांफ्रेस आॅफ इंडिया (सीबीसीआई) की आधिकारिक वेबसाइट भी 2019 में एक सभा आयोजित करने का दावा करती है। तीन दिनों तक चले इस कार्यक्रम में ‘आदिवासी एकता परिषद’ के सदस्य और आयोजकों में से एक सीबीसीआई के जनजातीय मामलों के कार्यालय के सचिव (सोसाइटी आॅफ द डिवाइन वर्ड) फादर  निकोलस बारला, उसी कार्यालय की  सिस्टर ललिता रोशनी लाकड़ा (डॉटर आॅफ सेंट ऐन) शामिल हुए थे। इसमें निकोलस बारला ने जनजातीय मुद्दों पर संयुक्त राष्ट्र संघ में दिए अपने संबोधन के बारे में भी प्रस्तुति दी थी। इटली में रोमन कैथोलिक पोंटिफिकल इंस्टीट्यूट फॉर फॉरेन मिशन्स (पीआईएमई) की आधिकारिक प्रेस एजेंसी एशियान्यूजडॉटआईटी का दावा है कि ‘पालघर जिले में 13 से 15 जनवरी तक चलने वाली सभा को भारत के कैथोलिक बिशप सम्मेलन ने प्रायोजित किया था। यह चर्च के मिशन का एक हिस्सा था, जिसमें यीशु के संदेशों और ईसाई मत के महत्व संबंधी प्रवचन हुए।’ फादर बारला ने कहा, ‘हम खुश हैं, क्योंकि इसमें स्वदेशी मुद्दों के संयुक्त राष्ट्र स्थायी मंच के उपाध्यक्ष फूलन चौधरी ने भी भाग लिया।’
 
 
‘आदिवासी एकता परिषद’ अपनी वेबसाइट पर ‘अखिल मानव जाति और प्रकृति के लिए समर्पित कार्य’ करने का दावा करती है।  इसकी मौजूदा गतिविधियों का केंद्र पालघर और दादरा नगर हवेली के आसपास का क्षेत्र है, क्योंकि इसने 2019 में सिलवासा के पास एक सालाना सभा का आयोजन किया था। कैथोलिक बिशप्स कांफ्रेस आॅफ इंडिया की आधिकारिक वेबसाइट भी इसी समय एक सभा आयोजित करने का दावा करती है।
 
 
यह संयुक्त राष्ट्र मंच क्या बला है, अब जरा इस पर गौर करते हैं। यह संयुक्त राष्ट्र का एक ‘सलाहकार निकाय’ है, जिसके 8 सदस्यों को विभिन्न सरकारों और 8 अन्य सदस्यों को ‘स्वदेशी जन संगठनों’ की ओर से नामित किया जाता है। फूलन चौधरी नेपाल से हैं और उन्हें ‘स्वदेशी संगठनों’ ने नामित किया है। अगर ‘आदिवासी एकता परिषद’ को एक संकेत माना जाए तो कोई आश्चर्य नहीं कि ये वैश्विक ‘स्वदेशी संगठन’ चर्च द्वारा तैयार किए गए अन्य मोर्चे हैं। लेकिन चूंकि संयुक्त राष्ट्र के एक निकाय के तौर पर इन्हें एक निष्पक्ष परोपकारी चेहरा करार दिया जाता है और ‘दुनिया के सभी देशों में गरीब वर्ग’ के बीच इन्हें काम करने की छूट मिल जाती है। ‘आदिवासी एकता परिषद’ के मामले में यही हुआ।
 
संयुक्त राष्ट्र निकाय में अपने विचार प्रस्तुत करने के लिए ‘आदिवासी एकता परिषद’ ने अंतरराष्ट्रीय यात्राएं कीं, जिनमें फादर निकालेस बारला हमेशा मौजूद रहे। दिलचस्प बात यह है कि सोशल मीडिया पर वे फादर निकोलस बारला का परिचय केवल निकोलस बारला के रूप में देते हैं। जब कुछ स्वतंत्र लेखकों ने ‘आदिवासी एकता परिषद’ की गतिविधियों की पड़ताल की तो उनके हाथ एक दिलचस्प जानकारी हाथ लगी। उदाहरण के लिए, हैरी गॉलबोर्न द्वारा संपादित पुस्तक ‘रेस एंड इथनिसिटी’ में लिखा है कि ‘आदिवासी एकता परिषद’ आदिवासियों को जागरूक कर उन्हें हिंदुओं के चंगुल से मुक्त होने का आह्वान करती है।’ इन सब बातों पर विचार करने के बाद असली सवाल यह है कि क्या ‘सोशल मीडिया पर अफवाह’ भी एक छलावा है, ताकि जनजातीय लोगों को अलग-थलग किया जा सके और ‘पत्थलगढ़ी आंदोलन’ की तर्ज पर पालघर के जनजातीय इलाकों में ‘बाहरी लोगों’ के प्रवेश पर रोक लगाई जा सके?
 
कुछ सवाल
यह सब तो वर्षों से चल रहा है। लेकिन भीड़ द्वारा दो संतों और एक चालक की पीट-पीट कर हत्या करने का मामला अप्रत्याशित है। इसके लिए ‘आदिवासी एकता परिषद’ को स्पष्टीकरण देना होगा। उसे इन सवालों का जवाब देना होगा कि क्या उसके द्वारा आयोजित की जाने वाली वार्षिक सभाएं, जिनमें लाखों की संख्या में शामिल होते हैं, चर्च द्वारा प्रायोजित होती हैं? क्या सीबीसीआई प्रतिनिधि फादर निकोलस बारला उनकी प्रबंध समिति में शामिल हैं? क्या ‘आदिवासी एकता परिषद’ हिंदू विरोधी अभियान में शामिल है, जैसा कि कुछ पुस्तकों में उल्लेख किया गया है? संतों की निर्मम हत्या का दोष सोशल मीडिया की अफवाहों पर मढ़ने की हड़बड़ी के पीछे क्या कारण हैं?
 
चर्च भी जवाब दे
कुछ सवालों के जवाब चर्च को भी देने होंगे। उन्हें यह बताना होगा कि ‘आदिवासी एकता परिषद’ के साथ उनके संबंधों की प्रकृति कैसी है? क्या चर्च का लक्ष्य ऐसे संगठनों के जरिए पालघर और दादरा-नागर हवेली क्षेत्रों को प्रभावित करन‘ और उन्हें निशाना बनाना है?    ल