पुनर्निर्माण का संकल्प

    दिनांक 01-जून-2020
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उमेश्वर कुमार

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नए सिरे से अर्थव्यवस्था की व्याख्या कर उसके पुनर्निर्माण की प्रक्रिया शुरू कर दी है। यह स्वावलंबन और स्वदेशी के सिद्धांत पर आधारित है। सरकार ने कृषि, मत्स्य पालन से लेकर सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योगों के साथ रेहड़ी-पटरी वालों की भी चिंता करते हुए 20 लाख करोड़ रुपये के आर्थिक पैकेज की घोषणा की है


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आर्थिक पैकेज में सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योगों को गति देने के लिए तीन लाख करोड़ रुपये की आपातकालीन ‘क्रेडिट लाइन’ दी गई है।

रक्षा क्षेत्र
  • रक्षा उत्पादों के निर्माण में विदेशी निवेश बढ़ाकर 74% किया गया।
  • बोर्ड से कंपनी में बदल जाएगा आयुध कारखानों का स्वरूप।
  •  रक्षा क्षेत्र की कंपनियों का नहीं होगा निजीकरण।
  • सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों की तरह होगा इनका प्रबंधन।
  • रक्षा क्षेत्र की कंपनियां शेयर बाजार के जरिए जुटा सकेंगी रकम।
  • देश में उत्पादन होने से कुछ खास तरह के हथियारों का आयात हो जाएगा प्रतिबंधित।
  • रक्षा क्षेत्र में सभी निवेश स्वचालित मार्ग के जरिए होंगे।
कोरोना महामारी के विरुद्ध लड़ाई के साथ आत्मनिर्भरता के संकल्प के साथ भारत नए सिरे से आर्थिक पुनर्निर्माण में भी जुट गया है। कोरोना काल में उपजी समस्याओं के मद्देनजर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नए सिरे से अर्थव्यवस्था की व्याख्या करते हुए उस पर अमल शुरू कर दिया है। यह स्वावलंबन और स्वदेशी के सिद्धांत पर आधारित है, जिसमें श्रमिकों का खास ध्यान रखा जाएगा। जिस तरह से श्रमिकों के पास कई तरह के कौशल हैं, उसी प्रकार देश के अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों में उत्पादों की विशिष्टताएं हैं। हालांकि सरकार ‘एक जिला एक उत्पाद’ कार्यक्रम की शुरुआत पहले ही कर चुकी है, लेकिन कोरोना के बाद इसकी उपादेयता बढ़ गई है। देश की अर्थव्यवस्था के पुनर्निर्माण और इसे नई दिशा देने के लिए सरकार ने 20 लाख करोड़ रुपये के आर्थिक पैकेज की घोषणा की है।

रिजर्व बैंक ने सस्ता किया कर्ज

अर्थव्यवस्था को जल्द पटरी पर लाने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक लगातार मौद्र्रिक नीतियों में बदलाव कर रहा है। इसलिए मौद्रिक नीति पर जून में प्रस्तावित बैठक पर रिजर्व बैंक ने काफी पहले निर्णय ले लिया ताकि बाजार में तरलता को लेकर देरी न हो। साथ ही, रेपो दर में 0.40 प्रतिशत की बड़ी कटौती भी की है। यानी अब रेपो दर 4 प्रतिशत है। इससे बैंक से कर्ज लेकर कारोबार करने वालों को बहुत राहत मिलेगी। हालांकि इसका असर जमा पर ब्याज पर भी पड़ेगा। रिवर्स रेपो दर भी घट कर 3.35 प्रतिशत रह गया है। रेपो दर वह दर है, जिस पर व्यावसायिक बैंक रिजर्व बैंक से उधार लेते हैं, जबकि रिवर्स रेपो दर वह है, जिस पर वे रिजर्व बैंक के पास अपनी अधिशेष रकम जमा रखते हैं। रिवर्स दर में कटौती से बैंकों के लिए रिजर्व बैंक के पास रकम जमा करना फायदे का सौदा नहीं रह जाएगा और उनका प्रयास अधिक से अधिक कारोबारियों को कर्ज देने का रहेगा।
इसका असली फायदा अर्थव्यवस्था को तभी मिल सकता है जब बैंक रेपो दर में कटौती का लाभ कर्ज लेने वाले ग्राहकों तक पहुंचाएं। इस दिशा में रिजर्व बैंक के साथ सरकार को भी यथोचित संज्ञान लेना चाहिए।

अर्थव्यवस्था में जान फूंकेंगे किसान

सरकार किसानों को सस्ते दर पर दो लाख करोड़ रुपये के ऋण मुहैया कराएगी। ऋण किसान क्रेडिट कार्ड पर दिए जाएंगे, इससे करीब 2.5 लाख किसान लाभान्वित होंगे। यह राशि प्रधानमंत्री किसान योजना के तहत दी गई 6,000 करोड़ रुपये के अतिरिक्त होगी। पहली बार पशुपालकों और मछली पालकों को भी सस्ते दर पर ऋण मिलेगा। इस योजना का उद्देश्य किसानों को साहूकारों के ऋण जाल से निकाल कर बैंकिंग प्रणाली से जोड़ना है ताकि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बैंकिंग प्रणाली का लाभ मिल सके। इसके अलावा, छोटे किसानों के लिए 30,000 करोड़ रुपये की कामकाजी रकम भी व्यवस्था की गई है ताकि उन्हें कृषि कार्य के लिए समुचित पूंजी मिल सके। इस योजना का क्रियान्वयन नाबार्ड के जरिए किया जा रहा है। यह राशि नाबार्ड द्वारा दी जाने वाली 90,000 करोड़ रुपये के अतिरिक्त होगी। किसानों को यह राशि 33 राज्यों के सहकारी बैंक, 351 जिला सहकारी बैंक और 43 क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक देंगे। इससे वे रबी फसल के बाद के कार्य और खरीफ की बुवाई कर सकेंगे। नाबार्ड के जरिए चलने वाली इस योजना से तीन करोड़ किसानों को लाभ होगा।

इसके अलावा, खाद्य के क्षेत्र से जुड़े दो लाख छोटे उद्यमियों को 10,000 करोड़ रुपये की सहायता दी जाएगी ताकि वह अपने तकनीक का आधुनिकीकरण कर सकें। इसके अलावा, गांवों में जैविक, हर्बल देसी उत्पादों के क्लस्टर विकसित किए जाएंगे। जैसे उत्तर प्रदेश में आम, जम्मू और कश्मीर में केसर, उत्तर पूर्वी राज्यों में बांस के उत्पाद, बिहार में मखाना, कर्नाटक में रागी, आंध्र प्रदेश में मिर्च, तेलंगाना में हल्दी के लिए क्लस्टर विकसित किए जाएंगे। इन क्लसटर्स के जरिए निर्यात को बढ़ावा दिया जाएगा। योजना के तहत देसी और ‘लोकल को ग्लोबल’ बनाने पर जोर दिया जाएगा। इन्हें ग्लोबल स्वरूप प्रदान कराने में तकनीकी सहयोग के साथ, ब्रांडिंग और विपणन की व्यवस्था भी की जाएगी।
 


देश का आर्थिक कायाकल्प

वास्तव में आर्थिक पैकेज 20.97 लाख करोड़ रुपये का है, जो प्रधानमंत्री की 20 लाख करोड़ रुपये के पैकेज की घोषणा से अधिक ही है। जीडीपी के 10 प्रतिशत से अधिक वाले इस पैकेज की विकसित देशों के पैकेजों से सहज तुलना की जा सकती है। कोरोना संकट के बाद भारत के आर्थिक कायाकल्प को मजबूती देने के लिए किसानों को बेहद आवश्यक आजादी, लचीलापन और वित्तीय शक्ति मिल सकेगी। वहीं, इस प्रोत्साहन से तैयार होने वाले परिवेश से देसी कंपनियों को वैश्विक बनने में भी मदद मिलेगी। इससे भारतीय उत्पादो को विश्व बाजार में बड़ी हिस्सेदारी मिलेगी और वे वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में सफलतापूर्वकसहभगिता कर सकेंगे। — राजीव कुमार, उपाध्यक्ष, नीति आयोग



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सरकार सस्ती दर पर 2.5 लाख किसानों को दो लाख करोड़ रुपये के ऋण मुहैया कराएगी।
कृषि ढांचा
  •  एक लाख करोड़ रुपये से होगा कृषि ढांचे का विस्तार।
  • कृषि एवं बागवानी उत्पादों के लिए ‘कोल्ड चेन’ की व्यवस्था।
  • ग्रामीण और कृषि सहयोग प्रणाली बनेगी।
  • ‘वैल्यू चेन’ में आने वाली खामियां दूर होंगी।
  •  ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मिलेगा नया स्वरूप।
नया कानून
  •  कानून में बदलाव के बाद कृषि उपज की कीमत निर्धारण, बिक्री, वितरण व भंडारण की बंदिशें खत्म होंगी।
  • किसान अपनी मर्जी से उपज का भंडारण, बिक्री या प्रसंस्करण कर सकेंगे।
  • बुवाई के समय ही किसान उपज की गुणवत्ता और कीमत तय कर सकेंगे। उनकी अनिश्चितता खत्म होगी।
  • खास परिस्थितियों में निर्यात को प्रोत्साहित किया जाएगा।


संकट को अवसर में बदल रहे योगी
इस योजना के मद्देनजर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने तैयारी भी शुरू कर दी है। उनके अनुसार, लॉकडाउन के दौरान सूबे में वापस लौटने वाले श्रमिक इस बड़े आर्थिक आंदोलन के सूत्रधार होंगे। उन्होंने ट्वीट किया कि दूसरे राज्यों से लौटकर आने वाले श्रमिकों के कौशल के आधार पर पहली सूची तैयार कर ली गई है। इन्हें प्रदेश में ही रोजगार मुहैया कराने के लिए कामगार, श्रमिक  (सेवायोजन और रोजगार) कल्याण आयोग के गठन की तैयारी शुरू कर दी गई है। अब इनका हुनर, दक्षता व मेहनत जन्मभूमि को अभिसिंचित करेगी। इस तरह की मुहिम देशभर के सभी जिलों में चलाने की जरूरत है। उदाहरण के लिए, पश्चिम चंपारण में बेंत से बने उत्पाद दुनिया भर में अपना स्थान बना सकते हैं। यहां के आसपास के कई जिलों में इतने बड़े स्तर पर शहद उत्पादन हो सकता है कि आॅस्ट्रेलिया जैसे देश पीछे छूट जाएं। इस तरह के अवसर लगभग सभी जिलों में हैं। जिला प्रशासन और राज्य सरकारों को बेहतर श्रम नियोजन के साथ हर संभव मदद देने की जरूरत है।

इसी तरह, केंद्र सरकार ने मछली पालन को बढ़ावा देने के लिए 20,000 करोड़ रुपये का प्रावधान किया है। इसमें 11,000 करोड़ रुपये मछली पालन क्षेत्रों के विकास और शेष 9,000 करोड़ रुपये मछली पालन से जुड़े ढांचागत विकास पर खर्च किए जाएंगे। सरकार के इस कदम से 70 लाख टन मछली का अतिरिक्त उत्पादन होगा और 55 लाख लोगों को मिलेगा। सरकार का लक्ष्य पांच साल में मछली निर्यात दोगुना यानी एक लाख करोड़ रुपये करने का है। यही नहीं, मछुआरों और उनकी नाव का भी बीमा किया जाएगा।

ग्रामीण रोजगार और उद्योग पर जोर
डेयरी उद्योग को बढ़ावा देने के लिए 15,000 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। इसे डेयरी उद्योग और पशुधन विकास पर खर्च किया जाएगा। इसमें निजी क्षेत्र की भागीदारी के साथ दुग्ध प्रसंस्करण को बढ़ावा दिया जाएगा और निर्यात बढ़ाने के लिए प्रोत्साहन भी दिए जाएंगे। औषधीय और हर्बल खेती को बढ़ावा देने के लिए 4,000 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। फिलहाल 2.25 लाख हेक्टेयर भूमि पर हर्बल खेती होती है। अगले दो साल में अतिरिक्त 10 लाख हेक्टेयर भूमि शामिल कर औषधीय और हर्बल खेती का दायरा बढ़ाया जाएगा। इससे किसानों को करीब 5,000 करोड़ रुपये की आमदनी होगी। इसके अलावा, गंगा नदी के किनारे 800 हेक्टेयर जमीन पर औषधीय और हर्बल कृषि गलियारा विकसित करने के साथ औषधीय उत्पादों के विपणन के लिए क्षेत्रीय मंडियों का नेटवर्क तैयार किया जाएगा।

मधुमक्खियां नैसर्गिक परागण में बड़ी भूमिका निभाती हैं, जिससे उपज भी बढ़ती है। मधुमक्खी पालन से भी किसान अपनी आय बढ़ा सकते हैं। मधुमक्खी पालन को बढ़ावा देने के लिए 500 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है, जिससे दो लाख मधुमक्खी पालक लाभान्वित होंगे। इस क्षेत्र में महिला शक्ति को जोड़ने का लक्ष्य भी है। मधुमक्खी पालन में प्राकृतिक मोम प्राप्त होता है, जिसका इस्तेमाल औषधि और सौंदर्य प्रसाधन में भी होता है। इनसे नए उत्पाद तैयार करने पर भी जोर दिया जाएगा। इसके अलावा, सरकार नहीं चाहती है कि किसान आलू, प्याज और टमाटर औने-पौने दाम पर बेचें। इसलिए इन फसलों के भंडारण और परिवहन के लिए सरकार 50 प्रतिशत सब्सिडी देगी। पायलट परियोजना के तौर पर आने वाले समय में इस योजना को अन्य सब्जियों और फलों पर भी लागू किया जाएगा।
 

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परमाणु क्षेत्र
  •  न्यूक्लियर पावर कॉरपोरेशन अब निजी क्षेत्र के साथ मेडिकल आइसोटोप्स (चिकित्सा समस्थानिक) का विकास करेगी।
  • समस्थानिक का प्रयोग कैंसर के साथ दूसरी बीमारियों के इलाज में होगा।
  • खाद्य प्रसंस्करण और संरक्षण के क्षेत्र में विकिरण तकनीक का इस्तेमाल होगा। निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ेगी।
  • सब्जी और फलों की बर्बादी रोकने में मिलेगी मदद।
  • अभी 24 प्रतिशत फसल बर्बाद हो जाती है।
 

फसल बेचने के नियम होंगे सरल
केंद्र सरकार आवश्यक वस्तु अधिनियम-1955 में बदलाव करेगी ताकि फसलों की बिक्री में राज्यों का नियंत्रण खत्म हो और किसान अपनी उपज वहां बेच सकें, जहां उन्हें अच्छी कीमत मिलेगी। नए कानून के तहत उपज की गुणवत्ता और कीमत का निर्धारण बुवाई के समय ही किया जा सकेगा। इससे किसानों का शोषण रुकेगा और निजी क्षेत्र की भागीदारी भी बढ़ेगी। लेकिन यह तभी संभव होगा, जब राज्य सरकारें अपनी कृषि उत्पाद विपणन समिति (एपीएमसी) अधिनियम को समाप्त कर दें। इसके लिए राज्यों को अपनी सहमति देनी होगी। माना जा रहा है कि कुछ राज्य दिक्कतें खड़ी कर सकते हैं। इससे जुड़ा एक विधेयक संसद में लंबित है। कृषि क्षेत्र में ढांचागत सुधार पर सरकार एक लाख करोड़ रुपये खर्च करेगी। इसका उपयोग अनाज भंडारण और कोल्ड स्टोरेज बनाने में किया जाएगा। इससे ग्रामीण क्षेत्र को काफी संबल मिलेगा। कृषि सहकारी सोसाइटी, कृषि उत्पादक संगठन, स्टार्ट अप और कृषि क्षेत्र के उद्यमी इस निधि से लाभ ले सकेंगे। हालांकि इस योजना का लाभ तत्काल नहीं दिखेगा, लेकिन मध्यम और दीर्घावधि में इसके परिणाम शानदार होंगे।

छोटे उद्योग देंगे चीन को टक्कर
अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने में सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग का बड़ा योगदान रहेगा। इसलिए सरकार ने इस क्षेत्र को गति देने के लिए तीन लाख करोड़ रुपये का आपातकालीन क्रेडिट लाइन दिया है। सरल शब्दों में कहें तो इसके तहत देश की 45 लाख कंपनियां बिना कुछ नया गिरवी रखे लोन ले सकेंगी। बैंक चाहे तो उनके पिछले बकाए का 20 प्रतिशत कर्ज को नए कर्ज में समाहित कर सकते हैं। जिन कंपनियों पर 25 से 100 करोड़ रुपये तक का कर्ज है, वह नए सिरे से कर्ज ले सकेंगी। यह आपातकालीन ऋण चार वर्षों के लिए होगा, जिसमें उन्हें एक साल तक कर्ज चुकाने से छूट मिलेगी। सरकार की इस नीति का दोहरा लाभ होगा। पहला, जरूरतमंद उद्योग को ऋण मिलेगा और दूसरा बैंकों को ऋण प्रक्रिया को दुरुस्त करने का मौका मिलेगा। अभी स्थिति यह है कि कंपनियों के कर्ज मंजूर हो गए हैं, पर लॉकडाउन के चलते कर्ज की राशि रिजर्व बैंक के पास पड़ी है। अब इस स्थिति में परिवर्तन आएगा। इस नए ऋण की शत प्रतिशत गारंटी सरकार देगी। लिहाजा बैंकों और गैर-बैंकिंग फाइनेंसिंग कंपनियों को नया ऋण देने में जोखिम नहीं रहेगा। इसके अलावा, संकट ग्रस्त एमएसएमई के लिए 20,000 करोड़ रुपये की निधि की व्यवस्था की गई है। इससे करीब दो लाख छोटे उद्योगों को लाभ मिलेगा, जो बंद होने के कगार पर हैं। इस निधि का प्रबंधन क्रेडिट गारंटी ट्रस्ट द्वारा किया जाएगा। इसके लिए सरकार पर तत्काल 4,000 करोड़ रुपये का बोझ आएगा। एमएसएमई क्षेत्र की वैसी कंपनियां जो ठीक चल रही हैं और विस्तार करना चाहती हैं, उनके लिए 50,000 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। इसका उद्देश्य इनसे वैसे उत्पाद तैयार कराना है, जो चीन से आयातित माल का विकल्प बन सकें।
 

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अंतरिक्ष क्षेत्र
  • अंतरिक्ष क्षेत्र में निजी क्षेत्र के निवेश का रास्ता खुला।
  •  निजी कंपनियां, इसरो से स्पर्धा कर सकेंगी।
  •  इसरो की सुविधाएं लेने के लिए कंपनियों को कीमत चुकानी होगी।
  • उपग्रह प्रक्षेपण में निजी कंपनियों के साथ भागीदारी का रास्ता खुला।
  • भारतीय कंपनियों के साथ रिमोट सेंसिंग डाटा साझा किए जाएंगे।
  • स्टार्टअप को बढ़ने का मौका मिलेगा।


एमएसएमई का कद बढ़ा
एमएसएमई की परिभाषा में बदलाव भी किया गया है। इससे इस क्षेत्र की वैसी कंपनियों को लाभ होगा जिनका आकार बढ़ रहा है। पहले आकार बढ़ने से उन्हें कई तरह की रियायतें और छूट मिलनी बंद हो जाती थीं, जो अब जारी रहेंगी। एक करोड़ रुपये की निवेश और पांच करोड़ रुपये तक का कारोबार करने वाली कंपनियों को माइक्रो माना जाएगा और इन्हें सभी तरह के कर लाभ दिए जाएंगे। इन्हें कर में छूट भी मिलेगी। 10 करोड़ रुपये तक की निवेश और 50 करोड़ रुपये तक का कारोबार करने वाली कंपनियों को छोटी कंपनी की श्रेणी में रखा गया है। 20 करोड़ रुपये तक के निवेश और 100 करोड़ रुपये का कारोबार वाली कंपनियां मध्यम श्रेणी में आएंगी। यही नहीं, उत्पादन और सेवा क्षेत्र की कंपनियों के बीच अंतर भी समाप्त कर दिया गया है। दोनों के लिए अब एक ही तरह के नियम लागू होंगे। इन परिवर्तनों से कंपनियां कर रियायतों को गंवाए बिना अपना आकार बढ़ा सकेंगी। यही नहीं, सरकारी विभाग और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के लिए 200 करोड़ रुपये तक की खरीदारी स्थानीय कंपनियों से करना अनिवार्य होगा। इसके लिए अब वैश्विक निविदा जारी नहीं की जाएगी। इसका लाभ यह होगा कि निविदा की दौड़ से चीन की छोटी कंपनियां बाहर हो जाएंगी। 200 करोड़ रुपये तक की सारी निविदाएं आॅनलाइन और डिजिटल होंगी जिससे किसी तरह की अनियमितता पर लगाम लगेगी। भारत की छोटी कंपनियों और विदेशी कंपनियों के बीच गैरवाजिब प्रतियोगिता भी समाप्त होगी। कोविड-19 के तुंरत बाद भारतीय कंपनियां और पीएसयू किसी भी प्रदर्शनी में भाग नहीं लेंगे। सरकार इनके लिए ई-मार्केट लिंकेज उपलब्ध कराएगी ताकि उन्हें अंतरराष्ट्रीय ग्राहक मिल सकें। इसके अलावा, 12 माह तक छोटे कारोबारियों के ब्याज का दो प्रतिशत सरकार वहन करेगी, जिन्होंने शिशु लोन लिया है। इस मद में सरकार 1,500 करोड़ रुपये खर्च का वहन करेगी। अभी तक देश में 1.62 करोड़ शिशु ऋण बांटे गए हैं, जिसमें कर्ज की राशि 50,000 रुपये तक है। यह सहायता रिजर्व बैंक द्वारा घोषित रियायतों के अतिरिक्त है। साथ ही, सरकार ने वैसे रेहड़ी-पटरी वालों के लिए भी कर्ज की विशेष सुविधा शुरू की है, कोरोना के कारण जिनका कारोबार चौपट हो गया है। इस योजना का लाभ 50 लाख रेहड़ी-पटरी वाले उठा सकेंगे। इस योजना के तहत कारोबार फिर से शुरू करने के लिए 10 हजार रुपये ऋण देने का प्रावधान है। डिजिटल या मोबाइल के माध्यम से ऋण लौटाने वालों को रियायत तो मिलेगी ही, उन्हें अधिक कर्ज भी मिल सकेगा।


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कोयला खदान
  • कोयला खनन में कोल इंडिया का एकाधिकार खत्म।
  •  खनन में निजी क्षेत्र को लाने के लिए 50 हजार करोड़ रुपये ढांचागत खर्च की व्यवस्था।
  • खुले बाजार में बिक्री के लिए कोयले के व्यावसायिक खनन की अनुमति।
  •  कोयले के गैसीकरण और तरलीकरण के लिए बनेंगे केंद्र। निजी क्षेत्र की कंपनियां कर सकेंगी केंद्रों का इस्तेमाल।
  • 50 नए कोल ब्लॉक निजी कंपनियों को दिए जाएंगे। खनन के लिए पूर्व योग्यता की जरूरत नहीं।
 

अंतरिक्ष क्षेत्र में निजी कंपनियों की पहुंच

अंतरिक्ष क्षेत्र को निजी कंपनियों के लिए खोला गया है। अब वे इसरो जैसे सरकारी संगठन के साथ स्पर्धा कर सकेंगी। इसके लिए दीर्घावधि योजनाएं बनाई जाएंगी। निजी क्षेत्र की कंपनियां इसरो की सुविधाओं का इस्तेमाल कर सकेंगी। इसके लिए उन्हें भुगतान करना होगा। निजी कंपनियां उपग्रह, लांचिंग और अंतरिक्ष सेवा में इसरो के साथ मिल कर काम कर सकेंगी। इसके लिए भी नियम बनाए जाएंगे। सरकार भारतीय कंपनियों को रिमोट डाटा सेंसिंग भी उपलब्ध करा सकती है। फिलहाल भारत की स्टार्टअप कंपनियां ऐसे डाटा के लिए विदेशी कंपनियों पर निर्भर हैं। इसके अलावा, रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में मेक इन इंडिया को बढ़ावा देने के लिए विदेशी कंपनियों की निवेश सीमा 49 से बढ़ाकर 74 प्रतिशत की गई है। सरकार आयुध निर्मात्री संयंत्रों के स्वरूप को बोर्ड से बदल कर कंपनी करना चाहती है, लेकिन इन कंपनियों का निजीकरण नहीं होगा, बल्कि इनका प्रबंधन सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों के तहत किया जाएगा। ये कंपनियां शेयर बाजार के जरिए धन जुटा सकेंगी। मेक इन इंडिया को बढ़ावा देने के साथ कुछ खास तरह के हथियारों का आयात प्रतिबंधित किया जाएगा। इससे रक्षा उपकरणों पर खर्च घटेगा। उल्लेखनीय है कि भारत दुनिया में रक्षा हथियारों का सबसे बड़ा आयातक है।

कुल मिलाकर नए भारत की नई अर्थव्यवस्था की पटकथा लिखी जा चुकी है, जिसका आधार स्थानीय, स्वदेशी और आत्मनिर्भरता है। इस नई व्यवस्था में समाज के सभी वर्गों के साथ सभी भूभागों की चिंता है। इस बात पर खास जोर है कि स्थानीय संसाधन का उपयोग उसी जगह किस प्रकार हो और कैसे वह दुनिया के बाजार में प्रतियोगी भी बने। नई अर्थव्यवस्था का प्रारूप तकनीक से लेकर मानव बल और खेती-किसानी से लेकर परमाणु संयंत्र तक सभी क्षेत्रों पर केंद्रित है।
    (लेखक वरिष्ठ अर्थ विश्लेषक हैं)