कोरोनाकाल में तुष्‍टीकरण के सिवाय कुछ नहीं किया केजरीवाल ने

    दिनांक 10-जून-2020   
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केजरीवाल सरकार ने 12 मार्च को कोविड-19 को महामारी तो घोषित कर दिया, लेकिन इसे फैलने से रोकने और अस्‍पतालों की स्थिति सुधारने की बजाए तुष्‍टीकरण में जुटी रही। मॉल, स्‍कूल, कॉलेज, रेस्‍तरां, जिम आदि बंद करने के साथ सांस्‍कृतिक, धार्मिक, राजनीतिक और पारिवारिक कार्यक्रमों पर रोक लगाई गई, लेकिन शाहीनबाग और जाफराबाद में सीएए विरोधी प्रदर्शन जारी रहा
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बात 13 मार्च की है। तब तक देशभर में चायनीज वायरस के 81 मामले दर्ज किए गए थे। उस समय महामारी दिल्‍ली में पांव पसार रही थी। हालांकि संक्रमितों का आंकड़ा 6 ही था, लेकिन 69 वर्षीया एक महिला की मौत हो चुकी थी। कर्नाटक के बाद देश में कोरोना से यह दूसरी मौत थी। लेकिन मुख्‍यमंत्री केजरीवाल का ध्‍यान महामारी से निपटने की तैयारियों पर कम और नागरिकता संशोधन कानून (सीएए), राष्‍ट्रीय नागरिकता रजिस्‍टर (एनआरसी) और राष्‍ट्रीय जनसंख्‍या रजिस्‍टर (एनपीआर) के बहाने लोगों में डर फैलाने पर अधिक था। कोरोना से कैसे निपटना है ?  दिल्‍ली सरकार ने इसके लिए क्‍या-क्‍या तैयारियां की हैं ? किस-किस अस्‍पताल में संक्रमितों के इलाज की व्‍यवस्‍था की गई है ? डॉक्‍टरों, नर्सों और स्‍वास्‍थ्‍यकर्मिंयों को मास्‍क और सुरक्षा उपकरण उपलब्‍ध कराए गए या नहीं ? इसके बारे में स्‍पष्‍ट रूप से न तो कुछ कहा और न ही किया। अलबत्‍ता विधानसभा में महामारी को लेकर अपने विधायकों की भ्रांति कुछ इस तरह से दूर कर रहे थे, ''इस बीमारी को लेकर बहुत सारी भ्रांतियां हैं और यहां जितने लोग बैठे हैं, ये सब लोग दिल्‍ली के लोगों का नेतृत्‍व करते हैं। इसलिए यह जरूरी है कि कम से कम यहां बैठे लोगों के पास उन भ्रांतियों का स्‍पष्‍टीकरण होना चाहिए। तभी सब लोग आगे जाकर जनता को बता पाएंगे। स्‍वस्‍थ आदमी को मास्‍क बिल्‍कुल नहीं पहनना है। मास्‍क पहनने से कई बार उल्‍टा असर हो सकता है।''



 दिल्‍ली की स्थिति लगातार बिगड़ रही थी, लेकिन कट्टरपंथी मुसलमानों और जमातियों पर नकेल कसने की बजाए केजरीवाल सरकार उन्‍हें शह दे रही थी। 16 मार्च को केजरीवाल सरकार ने निषेधाज्ञा लागू कर 50 से अधिक लोगों के इकट्ठा होने पर रोक लगाई। उस समय शाहीनबाग और जाफराबाद में सीएए विरोधी धरने चल रहे थे। सवाल यह है कि क्‍या 49 लोग इकट्ठा होते तो संक्रमण नहीं फैलता ? क्‍या ऐसा आदेश जारी करके केजरीवाल सरकार ने सीएए विरोधी प्रदर्शनों को पाबंदी के दायरे से बाहर नहीं रखा ? हफ्ते भर बाद जब प्रदर्शनकारियों में कोरोना संक्रमण फैला तो प्रदर्शन भी स्‍वत: ही खत्‍म हो गया। इसी तरह, निजामुद्दीन मरकज में 5,000 जमाती जुटे, लेकिन सरकार कान में तेल डालकर सोती रही। मौलाना साद पर कार्रवाई की बारी आई तब भी हीला-हवाली करते रहे। नतीजा साद पर थोक भाव में मामले दर्ज हैं, लेकिन आज तक वह पुलिस की पकड़ में नहीं आया है।

जब जमातियों की करतूतों को लेकर सोशल मीडिया से लेकर मुख्‍यधारा मीडिया तक उनकी मजम्‍मत करने लगा तो आआपा विधायक अमानतुल्‍ला खां उनके बचाव में उतर आए। अमानतुल्‍ला ने ट्वीट किया, ‘’हमारे देश के कई न्यूज़ चैनल करोना के बहाने तब्लीगी जमात और मुसलमानों को बदनाम करने का काम कर रहे हैं और देश में नफरत फैला रहे हैं, जबकि मुसीबत की इस घड़ी में सबको साथ लड़ने की जरूरत है। मेरी सभी लोगो से दरखुवास्त है कि ऐसे चैनलों को देखना बन्द करें।‘’ यह वही अमानतुल्‍लाह खां हैं, जो नफरत की फसल काटकर विधानसभा पहुंचे हैं। यह वही अमानतुल्‍लाह खां हैं, जिन्‍हें इस्‍लाम और मुसलमान के अलावा कुछ नहीं दिखता। वह केवल अपने समुदाय से जुड़े मुद्दे ही मुखरता से उठाते हैं। दिल्‍ली में 5.2 एकड़ सरकारी जमीन पर अतिक्रमण कर रोहिंग्‍याओं को बसाने, उन्‍हें तमाम तरह की सुविधाएं देने एवं फर्जी दस्‍तावेज पर आधार कार्ड बनाने से लेकर उन्‍हें संरक्षण देने तक में अमानतुल्‍लाह का ही नाम आ रहा है। खुद मुख्‍यमंत्री अरविंद केजरीवाल, जो दिल्‍ली दंगों में हिंदुओं का हाल पूछने तक नहीं गए वह जमातियों और कट्टरपंथियों के बचाव में उतर आए। 14 अप्रैल को उन्‍होंने ट्वीट किया, ‘ इतने नाजुक दौर से जब अपना देश गुजर रहा है, तब भी कुछ लोग हिंदू और मुसलमान भाइयों के बीच नफरत फैलाने की कोशिश कर रहे हैं। हम कोरोना को तभी हरा पाएंगे, जब हम सब एकजुट होकर लड़ेंगे।’ यही नहीं, जांच में बड़ी संख्‍या में जब जमाती पॉजिटिव आने लगे और देशभर में तब्‍लीगी जमात की करतूतों पर लोग प्रतिक्रिया देने लगे, तब केजरीवाल सरकार ने हेल्‍थ बुलेटिन से मरकज या तब्‍लीगी शब्‍द ही हटा दिया।

दिल्‍ली सरकार ने 12 मार्च को चायनीज वायरस को महामारी घोषित किया। इसी दिन 12 मार्च को पत्रकारों ने जब केजरीवाल से मास्‍क की कमी और सैनिटाइजर की कालाबाजारी पर रोक लगाने के बारे में सवाल पूछा तो वे यह कह कर जवाब टाल गए कि लोग बड़े पैमाने पर इसे खरीदना बंद कर देंगे तभी कुछ होगा। उन्‍होंने यह भी कहा कि स्‍वस्‍थ लोगों को मास्‍क की जरूरत नहीं है। कई बार यह हानिकारक हो सकता है। लोग सैनिटाइजर की बजाए साबुन से हाथ धोएं। एक अन्‍य पत्रकार ने जब कहा कि डॉक्‍टरों को भी मास्‍क नहीं मिल रहा है, तब उन्‍होंने घूरते हुए उससे कहा, कहां नहीं मिल रहा है ? हमें बताइए, हम दिलवा देंगे। सरकार के पास पर्याप्‍त मात्रा में है।