लक्ष्य स्वावलंबन सूत्र स्वदेशी

    दिनांक 10-जून-2020   
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भारत आज एक ऐतिहासिक मोड़ पर है। कोरोना संक्रमण से बने वैश्विक हालात में हमें अपने पैरों पर खड़े होकर पूर्णत: आत्मनिर्भर बनना ही होगा। विदेशी बैसाखियों से सहारा लेना छोड़कर प्रधानमंत्री के 'बाय लोकल, बी वोकल' के मंत्र पर चलना होगा। शासन ने हमारे सूक्ष्म, लघु व मध्यम उद्योगों के लिए विशेष आर्थिक सहायता का जो संबल दिया है उसका भरपूर उपयोग करके औद्योगिक जगत में नई क्रांति लानी होगी   
 
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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के दिए आत्मनिर्भर भारत के मंत्र को साकार करना होगा


आज के दौर को देखते हुए, विश्व की सर्वाधिक कृषि-योग्य भूमि, सबसे ज्यादा युवा जनसंख्या और सर्वाधिक सूक्ष्म व लघु उद्योगों से युक्त भारत का आर्थिक स्वावलम्बन के पथ पर अग्रसर होना अत्यन्त महत्वपूर्ण है। देश में उपलब्ध जल संसाधनों के अनुकूलतम उपयोग से हम अपनी 16 करोड़ हेक्टेयर कृषि योग्य भूमि के सिंचित क्षेत्रफल को 7 करोड़ से बढ़ाकर 14 करोड़ हेक्टेयर कर विश्व की दो तिहाई जनसंख्या की खाद्य आपूर्ति कर विश्व की खाद्य महाशक्ति बन सकते हैं। विश्व की तीसरी विशालतम तकनीकी जनशक्ति के बल पर, आज चीन से विश्व की विमुखता के बाद, भारत विश्व का औद्योगिक उत्पादन केन्द्र बनने में भी समर्थ है। उच्च आयातों व विदेशी निवेश के कारण, आज चाहे ‘मेन्युफेक्चरिंग’ क्षेत्र में चीन के विश्व के 28 प्रतिशत हिस्से की तुलना में भारत का मात्र 3 प्रतिशत हिस्सा होने पर भी स्वदेशी व स्वावलम्बन से यह सम्भव है।


अब जरूरत है कि देश में ऐसे उत्पाद बनें जो ‘मेड इन इंडिया’ हों,
‘मेड फॉर द वर्ल्ड’ हों। कैसे हम देश का आयात कम से कम करें,
इसे लेकर क्या नए लक्ष्य तय किये जा सकते हैं? हमें तमाम क्षेत्रों में
उत्पादकता बढ़ाने के लिए अपने लक्ष्य तय करने ही होंगे।
-प्रधानमंत्री, नरेंद्र्र मोदी

 
स्वावलम्बन का आधार-स्वदेशी
अपनी आवश्यकता की वस्तुओं व सेवाओं के क्रय में ‘स्वदेशी’ अर्थात ‘मेड बाई भारत’ वस्तुओं व ब्राण्डों को प्राथमिकता देकर हम देश में उत्पादन, रोजगार, आय व सकल घरेलू उत्पाद में तेजी से वृद्धि कर सकते हैं। इससे सरकार के राजस्व में वृद्धि और देश के व्यापार घाटे पर भी नियंत्रण सम्भव हो सकेगा। इससे रुपया सुदृढ़ होगा, उन्नत प्रौद्योगिकी का विकास होगा और समावेशी विकास का लक्ष्य प्राप्त हो सकेगा।

जापान का वैश्विक जनसंख्या में मात्र 1.6 प्रतिशत हिस्सा होने पर भी प्रबल स्वदेशी व स्वावलम्बन की भावना के कारण विश्व ‘मेन्युफेक्चरिंग’ में उसका हिस्सा विगत 3 दशकों में निरन्तर 7 से 12 प्रतिशत तक रहा है। जापान में 4 प्रतिशत विदेशी कारों के बरअक्स 96 प्रतिशत स्वदेशी अर्थात ‘मेड बाई जापान’ कारें बिकती हैं। ऐसा खाद्य पदार्थों से लेकर टीवी, मोबाइल सहित सभी वस्तुओं व सेवाओं के सम्बन्ध में है, वे चाहे कितनी ही महंगी हों या उनकी गुणवत्ता में कितना ही अन्तर रहे। भारत में आज केवल 13 प्रतिशत कारें ही स्वदेशी या ‘मेड बाई भारत’ (टाटा व महिन्द्रा) की और शेष 87 प्रतिशत कारें विदेशी कम्पनियों की बिकती हैं। ये विदेशी कम्पनियां पुर्जे बाहर से लाकर कारों को भारत में ‘असेम्बल’ करती हैं।

भारत में कई उद्योग संकुल चीनी व अन्य आयातित उत्पादों की स्पर्धा के कारण समस्याग्रस्त या विलोपन के  कगार पर हैं। उन सबकी  प्रौद्योगिकी, स्पर्धा क्षमता, आय, उपार्जन क्षमता, उनके   उत्पादों की गुणवत्ता, वैश्विक बाजारों पर पकड़, उनके  ब्राण्डों की वैश्विक बाजारों में  प्रतिष्ठा, वहां पर बिक्री, उनकी उत्पादन लागतों  में मितव्ययिता और लाभ, इन सभी में वृद्धि के लिए इन उद्योग संकुलों में से  प्रत्येक   को  उद्योग   सहायता संघ में बदलना आवश्यक है।

स्वदेशी अर्थात ‘मेड बाई इण्डिया’
आज शीतल पेय, साबुन, पेस्ट व कपड़े धोने का पाउडर व जूतों की पॉलिश से लेकर मोबाइल फोन, टीवी, फ्रिज आदि की 70 से 100 प्रतिशत उत्पादन क्षमता पर विदेशी कम्पनियों का स्वामित्व है। इन अनेक उत्पादों पर ‘मेड इन इण्डिया’ लिखा रहता है, जिन्हें विदेशी कम्पनियां ‘मेक इन इण्डिया’ के नाम पर यहां ‘असेम्बल’ मात्र करती हैं। उनके भी अधिकांश हिस्से व पुर्जे विदेश में बनने से अधिकांश रोजगार सृजन व मूल्य संवर्द्धन विदेशों में ही होता है। नब्बे के दशक में आयात व विदेशी निवेश प्रोत्साहन की नीतियों के प्रारम्भ से पहले देश में शत—प्रतिशत टी.वी, फ्रिज, शीतल पेय, सीमेण्ट, स्वचालित वाहन आदि वस्तुएं पूर्ण ‘स्वदेशी’ या ‘मेड बाई भारत’ श्रेणी की ही थीं। वैश्वीकरण के अन्तर्गत आयात उदारीकरण और विदेशी निवेश को प्रोत्साहन के चलते भारतीय उद्यम रुग्ण या बन्द होते गये अथवा उन्हें विदेशी कम्पनियों द्वारा अधिग्रहीत कर लिया गया। उदाहरण के लिए, भारतीय रेफ्रीजरेटर कम्पनी केल्वीनेटर को अमेरिकी कम्पनी व्हर्लपूल द्वारा, बिरला समूह की आल्विन व एक अन्य कम्पनी महाराजा इण्टरनेशनल को स्वीडिश कम्पनी इलेक्ट्रोलक्स द्वारा अधिग्रहीत किया गया। इससे पूर्व सारे रेफ्रीजरेटर स्वदेशी होते थे। टाटा समूह के सीमेण्ट संयत्रों, ए.सी.सी, रेमण्ड के सीमेण्ट संयत्रों, जुआरी सीमेण्ट, गुजरात अम्बुजा आदि के यूरोपीय कम्पनियों यथा लाफार्ज, हाल्सिम आदि द्वारा अधिग्रहण के पूर्व हमारा सारा सीमेण्ट भारतीयों द्वारा ही बनाया जाता था। गत 29 वर्षों में बोतलबन्द पानी, शीतल पेय, आइसक्रीम, साबुन, सौन्दर्य प्रसाधन से लेकर फ्रिज व सीमेण्ट पर्यन्त देश के उत्पादन संयत्रों के विदेशी स्वामित्व में जाने के क्रम में प्रश्न उभरता है कि देश के उद्योग-व्यापार-वाणिज्य व कृषि के ऊपर किसका नियंत्रण रहेगा?

कृषि पर भी दृष्टि डालें तो अमेरिकी कम्पनी देश में ठेके पर गेहूं की खेती करवाकर अपना ‘नेचर फ्रेश आटा’ बाजार में बेचती है या यूरोपीय कम्पनी लीवर अन्नपूर्णा आटा, टमाटर सॉस, आलू के चिप्स आदि बाजार में लाने के लिए ठेके पर खेती कराती है। खेत—खलिहानों से रसोई घर तक की खाद्य आपूर्ति श्रृंखला के विदेशी कम्पनियों के नियंत्रण मे जाने के ऐसे अनेक उदाहरण हैं। इसलिये स्वावलम्बन का प्रथम मंत्र है-स्वदेशी और उसमें भी मात्र ‘मेड इन इण्डिया’ नहीं वरन् ‘मेड बाई इण्डिया’ या ‘मेड बाई भारत’।

समाप्त हो चीन पर निर्भरता

आज चीन से हमारा इलेक्ट्रॉनिक सामान का आयात लगभग 45 प्रतिशत है, मशीनरी का आयात 35 प्रतिशत, कार्बनिक रसायन 40 प्रतिशत, मोटर वाहन पुर्जे और उर्वरक 25—25 प्रतिशत, सक्रिय फार्मास्युटिकल सामग्री 65-70 प्रतिशत, मोबाइल के साज—सामान 90 प्रतिशत तथा सोलर पेनल भी 90 प्रतिशत चीन से आते हैं। भारत को विविध उत्पादों व औद्योगिक उत्पादन की आपूर्ति में चीन पर निर्भरता समाप्त करनी होगी। इसके अतिरिक्त ‘मेक इन इण्डिया’ के नाम पर मोबाइल फोन आदि के पुर्जे बाहर से देश में लाकर, उन पर 5-10 प्रतिशत मूल्य संवर्द्धन कर चीनी या अन्य विदेशी कम्पनियां ‘मेड इन इण्डिया’ का लेबल लगा देती हैं। उससे स्वावलम्बन सम्भव नहीं है। उसका अधिकांश लाभ विदेशों को जाता है।

वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में प्राथमिकताएं तय हों

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भारत-निर्मित उत्पादों के निर्माण में तेजी आए और भारतीय उत्पाद खरीदने के प्रति बढ़े जन-जाग्रति

वैश्विक औद्योगिक आपूर्ति श्रृंखलाओं के चीन से बाहर निकलने का दौर चल पड़ने से चिकित्सा उपकरण, खाद्य प्रसंस्करण, वस्त्रोद्योग, चर्मोद्योग व आॅटो पार्ट्स उत्पादक आदि बड़ी संख्या में भारत में आने को इच्छुक हैं। हमारे हिताहित को दृष्टिगत रखकर विचार करें तो चिकित्सा उपकरणों, इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादों आदि क्षेत्रों में जहां भारत में आवश्यक उत्पादन क्षमताओं का अभाव है, विदेशी कम्पनियों का आना तो वांछित है। लेकिन वस्त्रोद्योग, चर्मोद्योग, खाद्य प्रसंस्करण आदि के क्षेत्रों में सुस्थापित उद्यम हैं, जो देश में भारी मात्रा में रोजगार सुलभ करा रहे हैं, वहां विदेशी उत्पादकों के आने से उद्यमबन्दी भी हो सकती है। आज देश में वस्त्रोद्योग में ही 1.20 करोड़ लोग मध्यम आकार व वृहदाकार के उद्योगों में नियोजित हैं और इससे भी अधिक 1.50 करोड़ लोग घरों से संचालित गारमेण्ट उत्पादन इकाइयों में लगे हैं। इस सम्बन्ध में उचित चयन व घरेलू श्रृंखलाओं का सशक्तिकरण भी आवश्यक है।

विदेशी  नहीं, घरेलू निवेश
वर्तमान ‘रिवर्स ग्लोबलाइजेशन’ अर्थात वैश्वीकरण के प्रतिगमन के दौर में देश में ‘ग्रीन फील्ड मेन्युफेक्चरिंग’ के क्षेत्र में स्वदेशी उद्यमों का प्रवेश, विशेषकर रोजगार प्रधान सूक्ष्म व लघु उद्यमों सहित, स्वदेशी कम्पनियों द्वारा नवीन उत्पादन क्षमताओं का विकास कर ‘मेड बाई भारत’ उत्पादों व ब्राण्डों का प्रवर्तन देशहित में सिद्ध होगा। देश में पहले से ही सीमा से कहीं अधिक विदेशी प्रत्यक्ष निवेश हो जाने व भारत के बाहर हमारा निवेश अर्थात ‘आउटबाउन्ड डायरेक्ट इनवेस्टमेंट’ कम होने से पहले ही 40 अरब डालर से अधिक ‘इनवेस्टमेण्ट इनकम डेफिसिट’ है। लगभग 160 अरब डॉलर के विदेश व्यापार घाटे के साथ 40 अरब डॉलर से अधिक का निवेश आय का घाटा जुड़ जाने से ही रुपये की कीमत मे गिरावट आती है। आर्थिक सुधारों के प्रारम्भ में 1991 में 18 रुपए तुल्य एक डॉलर था, वह अब गिरकर 75 रुपये बराबर एक डालर रह गया है। इसलिये घरेलू निवेश संवर्द्धन हेतु मौद्र्रिक तरलता के साथ-साथ राजकोषीय सहयोग भी आवश्यक है।

समेकित ग्राम विकास और कृषि का खाद्य तंत्र से एकीकरण

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समावेशी विकास के लिए हमें विकेन्द्र्रित नियोजन व समेकित ग्राम विकास के लिए ग्राम संकुल विकेन्द्रित उत्पादन, ग्रामीण उद्योगों के विकास, ग्रामीण लघु उद्योग संकुलों के विकास, कृषक उत्पादन संगठनों के निर्माण करने के साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों में ग्रामोद्योग व कृषि को देशज व वेश्विक खाद्य श्रृंखलाओं से जोड़ना होगा। तहसील स्तर पर कितना पशुधन है, कितनी जनशक्ति है, किस प्रकार के प्राकृतिक संसाधन हैं, कौन सी कृषि उपजें होती हैं, किस प्रकार के कुटीर, सुक्ष्म, लघु व बड़े उद्योग सम्भव हैं आदि जैसी सूचनाओं के माध्यम से विकेन्द्रित नियोजन, पूर्वक जीरो तक्नोलॉजी व न्यून तक्नोलॉजी वाले उद्योग गांवों में ले जाने होंगे।


उचित पारिस्थितिकी तंत्र व राजकोषीय सहायता
देश आज 2जी, 3जी, 4जी व 5जी टेलीकॉम तकनोलॉजी, बायो मेडिकल उपकरण, ‘आर्टिफिशियल इण्टेलिजेन्स’ आधारित निदान व चिकित्सा उत्पाद से लेकर अधिकांश कम्प्यूटर हार्डवेयर, मेट्रो रेल, रोलिंग स्टॉक, सुपर फास्ट रेल, कम्प्यूटर आपरेटिंग सिस्टम, डाटा विश्लेषण साफ्टवेयर उत्पाद, आवश्यक रसायन, 'एक्टिव फार्मास्यूटिकल इनग्रीडिएण्ट्स', उन्नत इलेक्ट्रानिक उपकरण के लिए चीनी व विदेशी कम्पनियों पर आश्रित है। इन सबमें भी स्वावलम्बन लाना होगा।

वर्तमान चतुर्थ औद्योगिक क्रान्ति के दौर में बेट्री चलित या हाइड्रोजन फ्यूल सेल आधारित कारें, बस व अन्य वाहन कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित निदान चिकित्सा सम्बन्धी सेवा उत्पाद, मशीन लर्निंग, डीप लर्निंग, 3डी प्रिंटिंग, ब्लाक चेन, आई ओटी, बुलेट ट्रेन, जैव प्रौद्योगिकी आधारित औषधियां, पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान आदि के लिए भी देश में अनुसंधान, उत्पाद विकास व उनके उत्पादन की क्षमता विकसित करनी होगी। इस हेतु उदार राजकोषीय सहायता व अनुदान की भी आवश्यकता रहेगी।

स्वावलम्बन हेतु राजकोषीय सहायता का औचित्य
स्वावलम्बन हेतु देश औद्योगिक विकास के लिए उदार राजकोषीय सहायता भी परम आवश्यक है। ऐसे उद्योग जिनमें हम आयातों पर आधारित हैं, घरेलू प्रौद्योगिकी का अभाव है, हमारी प्रौद्योगिकी पुरानी व अप्रचलित हो गयी है अथवा जिन क्षेत्रों में उच्च जोखिम व उच्च पूंजी निवेश की आवश्यकता होने से निजी उद्यमी सम्पूर्ण जोखिम उठाकर आवश्यक निवेश करने में सक्षम नहीं हैं, उन सभी क्षेत्रों में राजकोषीय अनुदान व सहयोग, संवर्द्धन, 'इक्विटी कैपीटल' भागीदारी, सह-अनुसन्धान, प्रौद्योगिकी विकास, उद्योग सहायता संघों के संवर्द्धन आदि के लिये उदार राजकोषीय सहायता देना आवश्यक है। आज उन्नत प्रौद्योगिकी में निवेश व राजकोषीय सहायता के अभाव में विश्व में पोत निर्माण में भारत का अंश एक प्रतिशत से भी न्यून है। जबकि कोरिया का अंश 24 प्रतिशत है। इसी प्रकार भारत की तुलना में, सिंगापुर व चीन के उच्च प्रौद्योगिकी निर्यात क्रमश: 7.5 व 30 गुना हैं। देश में वस्त्रोद्योग, कांच के सामानों, फाउण्ड्री, इलेक्ट्रोनिक्स सहित 400 प्रमुख व 3000 अन्य उद्योग सकुलों में औद्योगिक इकाइयों में रुग्णता, तकनीकी अप्रचलन, कारोबार हृास आदि की गम्भीर समस्याएं हैं। अन्तरराष्ट्रीय वस्त्र निर्यात में भारत का अंश 6.5 प्रतिशत रहा, जो अब घटकर 3 प्रतिशत से भी नीचे हो गया है। देश में घोषित 21.97 लाख करोड़ के पैकेज में मौद्रिक तरलता पर पर्याप्त बल दिया गया है। लेकिन, स्वावलम्बन के लिये राजकोषीय पैकेज भी कहीं अधिक देना होगा। इसके लिए मुद्रा आपूर्ति के विस्तार पर भी विचार आवश्यक है। 2008 की मंदी के बाद अमेरिका ने 30 खरब डॉलर, यूरोप ने 17 खरब डॉलर व जापान ने 800 अरब डॉलर का मात्रात्मक सहजीकरण कर मुद्रा आपूर्ति में वृद्धि की थी।
 
 
 
मौद्रिक संसाधनों का सृजन
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विदेशी निवेश पर निर्भरता के स्थान पर देश में घरेलू निवेश वृद्धि के लिए आन्तरिक संसाधन अर्थात मौद्रिक संसाधन सृजित करने हेतु मुद्र्रा आपूर्ति बढ़ाने के अमेरिका, जापान, कोरिया आदि प्रमुख औद्योगिक देशों के मुद्रा आपूर्ति के उदाहरणों को भी दृष्टिगत रखने की आवश्यकता है। औद्योगिक देशों ने औद्योगिकीकरण के लिए, मौद्र्रिक विस्तार से उत्पादन वृद्धि या जी.डी.पी. वृद्धि के ही मार्ग का ही अनुसरण किया है। वस्तुत: उत्पादन वृद्धि के लिए निवेश बढ़ाने के लिए मौद्रिक आपूर्ति में विस्तार कभी भी मुद्रास्फीतिजनक नहीं होता है। नयी मुद्रा सीधे जनता या उपभोक्ताओं में बांटने से महंगाई या मुद्रास्फीति उत्पन्न होती है। नयी मुद्रा के उत्पादन वृद्धि हेतु आवंटन सुनिश्चित करने हेतु कोई विशेष उद्देश्य माध्यम बीच में लाया जा सकता है। भारत के सकल घरेलू उत्पाद में मुद्रा-आपूर्ति अनुपात तो अनेक देशों से अत्यन्त अल्प, लगभग 0.778 ही है। जबकि जापान, कोरिया आदि अनेक देशों में मुद्रानुपात सकल घरेलू उत्पाद की तुलना में 1.00 से अधिक है। यथा सकल घरेलू उत्पाद की तुलना में मुद्रा-आपूर्ति अनुपात स्विट्जरलेण्ड, जापान, इंग्लैण्ड, थाइलैण्ड, सिंगापुर, मलेशिया, आस्ट्रेलिया, अमेरिका व चीन में क्रमश: 1.96, 1.83, 1.162, 1.2, 1.408,    1.292, 1.198, 1.14 एवं 1.282 है। इसलिये अन्य औद्योगिक देशों की भांति देश में उत्पादन, रोजगार व आय विस्तार के लिए विदेशी पूंजी के स्थान पर आन्तरिक मुद्रा आपूर्ति से निवेश प्रोत्साहन देना उचित रहेगा।

प्रौद्योगिकी विकास सहकारी संघ व समझौते

उन्नत व उदीयमान उद्योगों के विकास, उन्नत प्रौद्योगिकी आधारित उन्नत उत्पादों के विकास और देश में विद्यमान उद्योगों की वैश्विक प्रतिस्पर्धा क्षमता बढ़ाने के लिये ताईवान, जापान, यूरोप व अमेरिका में उद्योग सहायता संघों का प्रचुरता से उपयोग किया जाता रहा है। अमेरिका ने तो 1984 में एक सहकारी अनुसन्धान अधिनियम ही बना लिया था। आज वहां घरेलू प्रौद्योगिकी विकास हेतु राजकोषीय सहयोग से 1000 से अधिक उद्योग सहायता संघ चल रहे हैं। इनमें सरकार का 70-90 प्रतिशत तक सहयोग मिल रहा है। आटोमोबाइल से इलेक्ट्रोनिक्स तक, सभी उद्योगों के लिये इन्हीं के माध्यम से तकनीक विकसित हो रही है। अमेरिका में विगत 50 वर्ष में विकसित उन्नत प्रौद्योगिकियों के विकास व अभिनवन में 70-90 प्रतिशत तक निवेष उद्योग सहायता संघों के माध्यम से अमरीकी प्रशासन ने किया है। भारत में भी हमें ऐसे उद्योग सहायता संघों, प्रौद्योगिकी विकास संघों व तत्सम समझौतों का शासकीय सहयोग से विकास करना होगा।

ऐसे उद्योग सहायता संघ व सहकारी अनुसन्धान संघ सरकार की पहल अथवा उद्योगों की पहल, दोनों ही प्रकार से बनते हैं। उनमें नव विकसित प्रौद्योगिकी का उपयोग संघ की सभी सदस्य इकाइयां करती हैं।

जब बड़े वायुयान केवल अमेरिका में ही बनते थे तब यूरोपीय वायुयान कम्पनी ‘एयर बस' भी प्रारम्भ में एक कन्सोर्टियम के रूप में ही बनायी गयी थी। यह यूरोप के चार देशों में फैली ऐसी सैकड़ों इकाइयों का उद्योग सहायता संघ था जो वायुयान के लिये अलग-अलग छोटे-छोटे पुर्जे अन्य यूरो अमेरिकी वायुयान निमार्ताओं के लिये बनाते थे या बनाने में सक्षम थे। यूरोप की चार सरकारों के राजकोषीय सहयोग से ‘एयर बस कन्सोर्टियम’ अर्थात सहायता संघ बनाकर यूरोप में बड़े वायुयान निर्माण की पहल की गयी। बड़े यात्री विमानों में अमेरिकी एकाधिकार तोड़ने एवं यूरोपीय गौरव की वृद्धि के लिये एयर बस कन्सोर्टियम बनाकर एयर बस को बाजार में उतारा गया और बहुत वर्ष बाद उसे कन्सोर्टियम से कम्पनी में बदला गया।

देश में 400 आज प्रमुख व 7000 सूक्ष्म उद्योगों के संकुल या क्लस्टर हैं। इन उद्योग संकुलों में उतार-चढ़ाव के दौर आते रहते हैं। अनेक उद्योग संकुल चीनी व अन्य आयातित उत्पादों की स्पर्धा के कारण समस्याग्रस्त या विलोपन के कगार पर भी हैं। उन सबकी प्रौद्योगिकी, स्पर्धा क्षमता, आय, उपार्जन क्षमता, उनके उत्पादों की गुणवत्ता, वैश्विक बाजारों पर पकड़, उनके ब्राण्डों की वैश्विक बाजारों में प्रतिष्ठा, वहां पर बिक्री, उनकी उत्पादन लागतों में मितव्ययिता और लाभ, इन सभी में वृद्धि के लिए इन उद्योग संकुलों में से प्रत्येक को उद्योग सहायता संघ में बदलना आवश्यक है।

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घरेलू उद्योगों को देना होगा आर्थिक संबल


सक्षम हैं हम 
वस्तुत: प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 12 मई 2020 को देश के स्वावलम्बी विकास की बात करते हुए वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं से कड़ी स्पर्धा का आवाहन किया है। उन्होंने स्थानीय उत्पादों को समर्थन के साथ वर्तमान चुनौती को भी एक अवसर में बदलने का आवाहन किया है। उपरोक्त व अन्य भी कई उपायों से ‘स्वदेशी’ अर्थात ‘लोकल’ या ‘मेड बाई भारत’ वस्तुओं व ब्राण्डों के प्रवर्तन व उन्हें अपनाकर भारत आज विश्व का आर्थिक नेतृत्व करने की दिशा में द्रुत गति से अग्रसर होने में सब प्रकार से सक्षम है। (लेखक गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय, गौतम बुद्ध नगर के कुलपति हैं)