जब रोकना था, तब श्रमिकों को भगाया, ये हैं केजरीवाल सरकार की कोरानाकाल की कारगुजारियां

    दिनांक 10-जून-2020
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अवंतिका
 
जब मजदूरों को मदद की सख्‍त जरूरत थी, तब दिल्‍ली से उन्‍हें भगाया गया। आधी रात को अफवाहें फैलाई गईं कि उन्‍हें ले जाने के लिए उत्‍तर प्रदेश की सीमा पर बसे खड़ी हैं। जब हताश मजदूर पलायन करने लगे, तब केजरीवाल सरकार का दावा कि 4 लाख मजदूरों के खाने की व्‍यवस्‍था की जा रही है, यह दोहरापन नहीं तो क्या ?

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 लॉकडाउन 1.0 का तीसरे दिन यानी 27 मार्च की बात है। रात 12 बजे का समय था। अचानक लाउडस्पीकर पर दिल्ली के बाहरी इलाकों, जहां बड़ी संख्‍या में प्रवासी श्रमिक रहते रहे हैं, में तेज आवाज सुनाई दी, ‘जिस किसी को भी अपने घर जाना है, उनके लिए कल सुबह आनंद विहार से बस चलाई जाएगी।’ यह संदेश सुनकर एकबारगी तो लगा कि दिल्‍ली सरकार को लॉकडाउन में फंसे श्रमिकों की चिंता है, जिनके सामने रोजी-रोटी से लेकर खाने-पीने तक की समस्‍या खड़ी हो गई थी। लेकिन 28 मार्च की सुबह जैसे-जैसे आनंद विहार पर लोगों की भीड़ एकत्रित होने लगी और सीमा पर पुलिस ने उन्‍हें आगे बढ़ने से रोका, तब सभी को यह समझते देर नहीं लगी कि बड़ी सफाई से उनके साथ छल किया गया है।

इस घटना से एक दिन पहले ही मुख्‍यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने मकान मालिकों से अपील की थी कि प्रवासी श्रमिकों से कोई किराया न वसूला जाए। कहा गया कि इन श्रमिकों के बिजली-पानी के कनेक्‍शन काट दिए गए। महेंद्र सिंह नामक एक व्‍यक्ति ने ट्वीट किया, ‘दिल्‍ली में रह रहे मजदूरों के घर का पानी, बिजली काट दिया गया। अफवाह फैलाई कि लॉकडाउन तीन महीने का होगा। अफरा-तफरी मच गई। बसों में भर कर लोगों को यूपी सीमा पर भेज दिया। रातभर गाजियाबाद, बुलंदशहर, हापुड़ में 1,000 से ज्‍यादा बसें लगाकर इनको गंतव्‍य तक पहुंचाने की व्‍यवस्‍था की गई।’ इस पूरे प्रकरण में आआपा विधायक राघव चड्ढा ने आग में पेट्रोल डालने का काम किया। यह यह झूठ फैलाया कि उत्‍तर प्रदेश की सीमा पर मजदूरों को पीटा जा रहा है।


बहरहाल, श्रमिकों को दिल्‍ली से भगाने की चाल सफल रही। दिल्‍ली में उत्‍तर प्रदेश सीमा पर हजारों प्रवासी मजदूरों की भीड़ जमा हो गई। भूख-प्यास से बेहाल इन मजदूरों के पास खाने-पीने को कुछ नहीं था। हालांकि जरूरतमंदों को राहत सामग्री और भोजन मुहैया कराने सहित तमाम दावे करने वाली दिल्‍ली सरकार और उसके नुमाइंदे इस मौके पर दूर-दूर तक नहीं दिखे। ऐसी स्थिति में राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता देवदूत बनकर आए और उन्‍हें भोजन के पैकेट और पानी की बोतलें दीं तथा बच्‍चों के लिए दूध की व्‍यवस्‍था की। यही स्थिति धौला कुंआ पर भी थी। वहां भी भारी संख्या में श्रमिकों में अपने घर लौटने की बेताबी साफ दिख रही थी, लेकिन इनके लिए कोई व्‍यवस्‍था नहीं थी। हैरत की बात यह है कि मुख्‍यमंत्री अरविंद केजरीवाल, उपमुख्‍यमंत्री मनीष सिसोदिया ट्वीट कर रहे थे कि दिल्ली सरकार की तरफ से बसों की व्यवस्था की गई है, जो श्रमिकों को सीमा पर छोड़ेंगी और वहां से उत्‍तर प्रदेश सरकार दूसरी बसों में उन्‍हें आगे भेजगी, जबकि उस समय तक ऐसी व्‍यवस्‍था नहीं थी। लिहाजा लोग पैदल ही घर की ओर चल पड़े।

कुल मिलाकर 21 दिन के लॉकडाउन में न केवल सामाजिक दूरियां की धज्जियां उड़ाई गईं, बल्कि मदद की बजाए लोगों में असुरक्षा की भावना भर कर उन्‍हें पलायन के लिए मजबूर किया गया। आलम यह था कि उधर लोग पलायन कर रहे थे और इधर केजरीवाल और उनके मंत्री टृवीट कर रहे थे कि दिल्‍ली में कोई भूखा नहीं सोएगा। उनकी सरकार 28 मार्च से 568 स्‍कूल और 238 आश्रय गृहों द्वारा रोजाना 4 लाख लोगों को खिलाने के लिए तैयार है। इसी दिन से 1,000 राशन दुकानों में मुफ्त राशन देने और बाकी दुकानें 2-3 दिन में खोलने का दावा किया। सवाल यह है कि कहीं लॉकडाउन को विफल करने के लिए यह सारा प्रपंच तो नहीं रचा गया ?

मजदूरों को उत्‍तर प्रदेश की सीमा तक छोड़ने के लिए डीटीसी बसें क्‍यों चलाई गईं ? मजदूरों को पलायन के लिए विवश करने के बाद ये घोषणाएं क्‍यों की गई़ ? सच्‍चाई तो यह है कि पलायन करने वाले काफी लोग दो-दो दिन से भूखे थे। अगर उत्‍तर प्रदेश पुलिस ने सही तरीके से भीड़ को नियंत्रित नहीं किया होता तो वहां भगदड़ मच सकती थी। इतनी भीड़ थी कि सैकड़ों लोग मरते।