सहमति बने ‘असहमति’ पर

    दिनांक 11-जून-2020   
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असहमति जीवंत लोकतंत्र का प्रतीक है। लेकिन विरोध का स्वरूप और इसकी सीमा का निर्धारण भी जरूरी है। अहसमति या विरोध जताने के लिए हिंसा या इस तरह की किसी साजिश को कोई  भी व्यवस्था न तो बर्दाश्त करेगी और  न ही इसे कानून सम्मत माना जाएगा। क्या अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की भारत यात्रा के दौरान दिल्ली में हिंसा की साजिश को असहमति की श्रेणी में रखा जा सकता है


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किसी भी देश के जीवंत और सफल लोकतंत्र का पहला सिद्धांत है, असहमति को समुचित सम्मान देना। लोकतांत्रिक व्यवस्था में असहमति का सम्मान होना चाहिए, लेकिन असहमति या वैचारिक विरोध का स्वरूप और इसकी सीमा क्या होनी चाहिए? असहमति या वैचारिक विरोध अहिंसक होना चाहिए या हिंसक? असहमति जताने की आड़ में हिंसा, तोड़फोड़ और विघटनकारी गतिविधियों की भी इजाजत होनी चाहिए? इन सवालों पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है।

नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) और कोरोना महामारी से संघर्ष के तौर-तरीकों से लेकर सीमा पर चीन के साथ जारी तनाव जैसी स्थिति के आलोक में लोकतंत्र में असहमति की सीमा को लेकर ऐसे सवाल उठना स्वाभाविक है। हाल के वर्षों में सर्वोच्च न्यायालय के कई न्यायाधीशों ने इस विषय पर खुलकर अपनी राय दी है। कुछ न्यायाधीशों ने विभिन्न मामलों की सुनवाई के दौरान अपने फैसलों के माध्यम से जीवंत लोकतंत्र के लिए असहमति को महत्वपूर्ण बताया है तो कुछ न्यायाधीशों ने सार्वजनिक मंचों से देश में विपरीत विचारधारा के लिए बढ़ती असहिष्णुता पर चिंता व्यक्त की है।

संविधान ने देश के नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार दिया है और न्यायपालिका गंभीरता से इसकी रक्षा भी करती आ रही है। पर हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) में प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार निर्बाध नहीं है। जरूरत पड़ने पर इसे सीमित भी किया जा सकता है। उच्चतम न्यायालय ने कई फैसलों में असहमति को जीवंत लोकतंत्र का प्रतीक बताया है। साथ ही, कहा है कि अगर नागिरकों की गतिविधियों पर पुलिस की निगरानी रहेगी तो देश जेल बन कर रह जाएगा जो किसी भी तरह से लोकतंत्र के लिए शुभ नहीं होगा।

सीएए और राष्ट्रीय जनसंख्या पंजी (एनआरसी) के विरुद्ध शांतिपूर्ण आंदोलन या ऐसे अन्य राष्ट्रीय व स्थानीय मुद्दों पर अहिंसक आंदोलन पर किसी को आपत्ति नहीं हो सकती है। लेकिन अहसमति या विरोध जताने के अधिकार की आड़ में हिंसा या इस तरह की साजिश को कोई भी व्यवस्था न तो बर्दाश्त करेगी और न ही इसे कानून सम्मत माना जाएगा। भले ही किसी आंदोलन में शामिल होने जा रहे लोगों की पकड़-धकड़ या उन्हें हिरासत में लेना उचित नहीं है, लेकिन व्यक्ति और समूह की मंशा अराजकता पैदा करने की हो तो शासन और प्रशासन के सामने क्या विकल्प होगा? वह एहतियाती कदम उठाए या नहीं?

न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता के अनुसार, असहमति का अधिकार संविधान द्वारा प्रदत्त सबसे बड़ा और सबसे महत्वपूर्ण अधिकार है। इसमें आलोचना का अधिकार भी शामिल है। लेकिन सार्वजनिक मंच या सोशल मीडिया पर आलोचना करते हुए हिंसा का सहारा लेना, तोड़फोड़ करना या अभद्र भाषा का प्रयोग करना आदि को इस अधिकार के दायरे में नहीं रखा जा सकता।

सरकार की नीतियों पर असहमति जताते हुए देश में कई आंदोलन हुए, जिसने लोकतांत्रिक व्यवस्था और इसके मूल्यों को मजबूत किया है। लोकनायक जयप्रकाश नारायण की संपूर्ण क्रांति से लेकर भ्रष्टाचार के विरुद्ध जन लोकपाल के गठन की मांग को लेकर समाजसेवी अण्णा हजारे के अहिंसक आंदोलन को इसी श्रेणी में रखा जाएगा। लेकिन माओवादी, जो अक्सर सुरक्षाबलों पर सशस्त्र हमले करते हैं, उनकी गतिविधियों को असहमति की श्रेणी में रखा जा सकेगा? क्या अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की भारत यात्रा के दौरान दिल्ली में हिंसा की साजिश को असहमति की श्रेणी में रखा जा सकता है?

हाल के वर्षों में न्यायमूर्ति डॉ. धनंजय वाई. चंद्र्रचूड़, न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता और न्यायमूर्ति संजय किशन कौल सहित शीर्ष अदालत के अनेक न्यायाधीशों का कहना है कि समाज में विपरीत विचारधारा के लिए असहिष्णुता बढ़ रही है। इनके विचार निश्चित ही समाज में सांप्रदायिक सद्भाव बिगड़ने की आशंकाओं की ओर संकेत कर रहे हैं, लेकिन क्या इसके लिए किसी एक वर्ग को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है? शायद नहीं। वास्तव में हो यह रहा है कि लोकतांत्रिक अधिकारों की आड़ में आंदोलन के नाम पर नाम पर कुछ शरारती तत्व तर्कवादी युवा पीढ़ी को अपनी विचारधारा की ओर आकर्षित करने या अपनी दलीलों से उन्हें गुमराह करने का प्रयास करते हैं।

न्यायमूर्ति संजय किशन कौल ने हाल ही में ‘फेक न्यूज और इसके खतरे’ विषय पर अपने वक्तव्य में लोकतंत्र में असहमति का सम्मान करने पर जोर दिया था। साथ ही, फेक न्यूज के संदर्भ में व्हाट्सएप संदेशों को अग्रेषित करने की प्रवृत्ति पर कहा था कि ऐसा करने से पहले इनकी सत्यता परखने की जरूरत है, क्योंकि बिना सोचे-समझे ऐसे संदेशों को अगे्रषित करने से ये अक्सर पांथिक और नस्लीय रूप ले लेते हैं। उन्होंने इसके दुष्परिणामों की ओर तो इशारा किया, लेकिन यहां भी सवाल यही है कि व्हाट्सएप और सोशल मीडिया पर निर्बाध रूप से प्रवाहित हो रहे ऐसे संदेशों पर कैसे अंकुश लगाया जाए?

न्यायमूर्ति कौल का मत है कि सोशल मीडिया पर किसी तरह की पाबंदी नहीं लगाई जानी चाहिए, क्योंकि इससे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बाधित होती है। लोगों को ही तय करना होगा कि वह किस प्रकार के संदेश अग्रेषित करें। हालांकि वह स्वीकार करते हैं कि फेक न्यूज के मामले में प्रेस को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है और उसके विरुद्ध उचित कार्रवाई भी की जा सकती है। लेकिन सोशल मीडिया के मामले में यह संभव नहीं है, क्योंकि यहां जांच-परख की कोई व्यवस्था नहीं है। न्यायमूर्ति कौल का यह कथन स्पष्ट रूप से सोशल मीडिया पर अनियंत्रित तरीके से प्रसारित होने वाली फर्जी खबरों से उत्पन्न खतरों की ओर संकेत करता है। लिहाजा इस खतरे से निपटने का उपाय खोजना बहुत जरूरी है, अन्यथा फर्जी खबरों का मायाजाल देश में अराजकता पैदा कर सकता है।

हाल ही में सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता का मत है कि कार्यपालिका, न्यायपालिका, नौकरशाही तथा सशस्त्र बलों की आलोचना को राष्ट्र-विरोधी नहीं कहा जा सकता। उनके अनुसार, असहमति, असंतोष और संवाद ही लोकतंत्र को चला सकते हैं। सरकार और देश दो अलग-अलग चीजें हैं। देश की आलोचना किए बगैर भी आप सरकार के आलोचक हो सकते हैं। न्यायमूर्ति गुप्ता कहना सही है, लेकिन क्या आलोचना की कोई लक्ष्मण रेखा है या शालीनता की सारी सीमाएं लांघकर आलोचना के लिए अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल किया जा सकता है? इसका उदाहरण हाल ही में देखने को मिला। सोशल मीडिया पर न्यायपालिका तथा सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के बारे में बेहद अपमानजनक भाषा का प्रयोग करने पर आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय ने प्रदेश के सत्तारूढ़ वाईएसआर कांग्रेस के एक सांसद और अन्य नेताओं सहित 49 लोगों के विरुद्ध अवमानना की कार्यवाही की है।

न्यायमूर्ति गुप्ता के अनुसार, असहमति का अधिकार संविधान द्वारा प्रदत्त सबसे बड़ा और सबसे महत्वपूर्ण अधिकार है। इसमें आलोचना का अधिकार भी शामिल है। लेकिन सार्वजनिक मंच या सोशल मीडिया पर आलोचना करते हुए हिंसा का सहारा लेना, तोड़फोड़ करना या अभद्र्र भाषा का प्रयोग करना आदि को इस अधिकार के दायरे में नहीं रखा जा सकता। हाल की कुछ घटनाओं की जांच में यह तथ्य उभर कर आया है। उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुई हिंसा को लेकर अदालत में दायर आरोपपत्र में ऐसे कई खुलासे किए गए हैं।

न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ का कहना है कि असहमति को एक सिरे से राष्ट्र विरोधी और लोकतंत्र विरोधी बता देना लोकतंत्र पर हमला है। विचारों का दबाना देश की अंतरात्मा को दबाना है। उनका कहना बिल्कुल सही है, लेकिन अहसमति के विचारों के आदान-प्रदान में यदि हिंसा करने, विघटनकारी गतिविधियों को सही ठहराने या सरकार से अपनी बातें मनवाने के लिए लोगों को हिंसा के लिए उकसाने जैसी गतिविधियों का सहारा लिया जाए, तो क्या इसे जीवंत लोकतंत्र के लिए सही माना जाएगा? इसलिए लोकतंत्र में असहमति और असहमति जताने के लिए हिंसा, तोड़फोड़ या विघटनकारी गतिविधियों का सहारा लेने जैसे कृत्यों के बीच अंतर करना होगा। अगर ऐसा नहीं किया गया तो समाज का हर वर्ग या समूह शासकीय व्यवस्था के विरुद्ध असहमति जताने के लिए कानून हाथ में लेने से गुरेज नहीं करेगा।  (लेखक कानूनी मामलों के जानकार हैं)