कोविड-19/एचसीक्यू : दवा-विरोधी दावे हवा

    दिनांक 11-जून-2020
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डॉ. राजेन्द्र ऐरन
 
मुख्य रूप से भारत में बनने वाली हायड्रॉक्सीक्लोरोक्विन (एचसीक्यू) दवा पर विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कहा है कि इससे कोरोना के मरीजों को कोई फायदा नहीं मिल रहा है, जबकि भारतीय चिकित्सक इसे बहुत कारगर मान रहे हैं। भारत ही नहीं, दुनियाभर के अनेक वैज्ञानिक डब्ल्यूएचओ के इस दावे पर सवाल उठा रहे हैं

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भारत 77 देशों में एचसीक्यू दवा  निर्यात करता है।

कारगर है एचसीक्यू 
कोरोना एक वायरस जनित वैश्विक महामारी है जिसने 216 देशों में 65,00000 से अधिक लोगों को संक्रमित कर रखा है और लगभग 4,00000 व्यक्तियों की मृत्यु का कारण बना है। कोरोना के संक्रमण से बचाव और संक्रमण हो जाने के बाद इलाज में एचसीक्यू एक कारगर दवा साबित हो रही है।  एचसीक्यू मलेरिया, गठिया जैसी बीमारियों में भी नियमित रूप से उपयोग में आती है।

इन दिनों विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की गंभीरता और निष्पक्षता को लेकर पूरी दुनिया में विवाद छिड़ा हुआ है। उस पर पहले कोरोना संक्रमण के मामलों की सही जानकारी नहीं देने के आरोप लगे, तो अब एक दवा  हायड्रॉक्सीक्लोरोक्विन (एचसीक्यू) को लेकर उसने जो कदम उठाया और फिर वापस लिया, उससे भी कई तरह के सवाल उठ रहे हैं। उल्लेखनीय है कि इंग्लैंड से छपने वाली चिकित्सा जगत की एक अंतरराष्ट पत्रिका ‘लांसेट’ में 22 मई को एक लेख प्रकाशित हुआ है। इस लेख में कई खामियां हैं, जिन्हें इसके लेखकों ने भी स्वीकारा है।

मुख्य रूप से इस लेख में एचसीक्यू दवा को लेकर हुए एक अध्ययन के बार में बताया गया है। लेख में कहा गया है कि 6 महाद्वीपों के 671 अस्पतालों में 20 दिसम्बर, 2019 से 14 अप्रैल, 2020 के बीच भर्ती 96,032 मरीजों का अध्ययन किया गया और यह पाया कि 81,144 कोरोना के मरीजों को एचसीक्यू नहीं दी गई, जबकि 14,888 मरीजों को एचसीक्यू या क्लोरोक्वीन अकेले या ‘मैक्रोलाइड एंटीबायोटिक’ के साथ दी गई। इस आधार पर लेख में दो निष्कर्ष निकाले गए हैं। पहला यह है कि जिन मरीजों को यह दवाई नहीं दी गई, उनमें मृत्यु दर 9.3 प्रतिशत और जिनको दी गई उनमें मृत्यु दर 18 प्रतिशत रही। अगर इसी के साथ ‘मैक्रोलाइड एंटीबायोटिक’ भी दी गई तो मृत्यु दर 23.8 प्रतिशत हो गई। क्लोरोक्वीन में मृत्यु दर 16.4 प्रतिशत और इसी के साथ अगर ‘मैक्रोलाइड एंटीबायोटिक’ दी गई तो मृत्यु दर बढ़ कर 22.2 हो गई। इस बढ़ी हुई मृत्यु दर का कारण ह्दय की गति में व्यवधान माना गया। दूसरे निष्कर्ष में यह कहा गया है कि इन दवाओं के उपयोग से मरीजों को किसी भी प्रकार का लाभ नहीं मिला।

इस लेख के छपने के अगले दिन ही 23 मई को डब्ल्यूएचओ, जो इस महामारी की उचित दवाई खोजने के लिए 35 से अधिक देशों के 400 से ज्यादा अस्पतालों में एक विशेष परिस्थिति की दवा का परीक्षण कर रहा है, ने दवाई परीक्षण करने वाली टीम की बैठक बुलाकर एचसीक्यू के अध्ययन और प्रयोग पर रोक लगा दी। इसके बाद इंग्लैंड और फ्रांस ने भी अपने यहां एचसीक्यू पर हो रहे अध्ययन को रोक दिया। हालांकि इस लेख के लेखकों ने अपने अध्ययन की कमियां भी गिनाई हैं। वे लिखते हैं, ‘‘हमारे अध्ययन की बहुत सारी सीमाएं हैं और हम इन मरीजों में बढ़ी हुई मृत्यु दर में अन्य कारणों को भी नहीं नकार सकते हैं।’’ साथ ही वे यह भी लिखते हैं, ‘‘चलते-फिरते मरीजों पर इन दवाओं का क्या असर होता है, इसका अध्ययन हमने नहीं किया है। इसके लिए ‘रेन्डोमोजिएड’ दवा परीक्षण होना चाहिए।’’ लेखकों ने ‘क्यूटी इंटरवल’ और ‘कार्डियक अरीदमिया’ का भी विस्तृत रूप से अध्ययन नहीं किया और न ही इन दवाओं की मात्रा का जोखिम के साथ परीक्षण किया।

इतनी कमियों के बाद भी इस लेख का एक प्रतिष्ठित पत्रिका में छपने से चिकित्सा जगत का भारी नुकसान हुआ है। कुछ लोग तो कह रहे हैं कि यह भारत के विरुद्ध डब्ल्यूएचओ की साजिश है। वह इस दवा को कमतर दिखाकर भारत को नुकसान पहुंचाना चाहता है। उनकी इस बात में दम भी लग रहा है, क्योंकि इस लेख ने पूरे विश्व में एचसीक्यू को लेकर इसके ‘बचाव’ और ‘इलाज’, दोनों तरह के उपयोग को लेकर एक डर का माहौल बना दिया है।

अब इस लेख की पूरी दुनिया में आलोचना हो रही है। विश्व भर के 140 से अधिक प्रतिष्ठित चिकित्सकों, वैज्ञानिकों ने इस लेख के लेखकों और ‘लांसेट’ के सम्पादक रिचर्ड हॉर्टन को एक खुला पत्र लिखा है। इन चिकित्सकों और वैज्ञानिकों ने पत्रिका और लेख की विश्वसनीयता पर भी गंभीर सवाल खड़े किए हैं।

प्रमुख रूप से यह बात उठाई गई है कि पहले ग्रुप, कंट्रोल ग्रुप, (जिन मरीजों में एचसीक्यू और क्लोरोक्वीन के मैक्रोलाइड के साथ या बिना उपयोग नहीं किया गया) और दूसरे ग्रुप (जिसमें इन दवाओं का उपयोग किया गया) में तुलनात्मक रूप से मरीजों की एक समान गंभीरता, दवाइयों की समान मात्रा और मृत्यु के अन्य कारणों की समानता का ध्यान नहीं रखा गया।

‘लांसेट’ ने इस महामारी के समय ‘आंकड़े साझा’ करने के एक दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने के बावजूद इस लेख में दिए गए आंकड़ों के बारे में कुछ नहीं बताया है। केवल कहा गया है कि इतने अस्पतालों के मरीजों पर अध्ययन किया गया है। इससे काम नहीं चलेगा। उसे अस्पतालों के नाम और वहां भर्ती मरीजों के आंकड़े भी देने चाहिए थे, तभी उसकी विश्वसनीयता कायम रह सकती है। यही नहीं, इस लेख का अवलोकन पत्रिका की ‘एथिक्स कमेटि’ ने भी नहीं किया।

जिन 6 महाद्वीपों के 671 अस्पतालों से जो आंकड़े लिए गए उनका खुलासा नहीं किया गया और लेखकों से अनुरोध के बाद भी मना कर दिया गया। आॅस्ट्रेलिया में केवल 5 अस्पताल के आंकड़ों के हिसाब से मरीजों की संख्या बेहद ज्यादा है और जितने मरीजों की मृत्यु कोरोना के कारण अस्पतालों में बताई गई वह संख्या तो उस दौरान पूरे देश में हुई मृत्यु के आंकड़ों से भी ज्यादा थी। जब यह खामी सर्जीस्फैर (आंकड़े उपलब्ध करवाने वाली कंपनी) को बताई तो उसने गलती मानते हुए इसमें सुधार किया, जो इस लेख में और सुधार की गुंजाइश को इंगित करता है।

‘लांसेट’ ने हटाया लेख
‘लांसेट’ में प्रकाशित लेख के संबंध में जो फर्जीवाड़ा किया गया था, वह सामने आ चुका है। इसके बाद पत्रिका ने उस लेख को हटा लिया है। डब्ल्यूएचओ ने भी एचसीक्यू के अध्ययन और परीक्षण को हरी झंडी दे दी है। इसका अर्थ यह है कि जिन मरीजों ने स्वयं पर कोरोना दवाओं के परीक्षण की सहमति दे रखी है, उन्हें एचसीक्यू दी जाएगी। यह भारत के चिकित्सकों और वैज्ञानिकों की जीत है।  

अफ्रीका में सर्जीस्फैर कंपनी से जुड़े अस्पतालों में कोरोना के मरीजों और उनकी मृत्यु के जो आंकड़े दिए गए वे अविश्वसनीय लगते हैं। कोरोना के मामलों में अलग-अलग देशों में रोग की गंभीरता तथा मृत्यु दर में काफी फर्क है। जैसे अमेरिका और यूरोप में मृत्यु दर काफी अधिक है, जबकि एशिया में यह दर काफी कम है। इस लेख में अलग-अलग महाद्वीपों में बहुत कम भिन्नता दिखाई गई है, वह भी अविश्वसनीय लगती है।

इन सभी कमियों को इंगित करते हुए यह मांग की गई कि इस लेख से संबंधित सभी 671 अस्पतालों के आंकड़े उपलब्ध कराए जाएं जिससे इनकी विश्वसनीयता पर पूरे विश्व का चिकित्सक समुदाय आश्वस्त हो सके। साथ ही इस लेख का डब्ल्यूएचओ के विशेषज्ञों या फिर कोई अन्य प्रतिष्ठित समिति पुनरावलोकन करे।

आईसीएमआर के अलग विचार
भारत में इंडियन काउंसिल आफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) और काउंसिल आफ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च (सीएसआईआर) ने इस लेख से अलग अपने आंकड़े और विचार रखे हैं। आईसीएमआर के ताजा प्रकाशित जर्नल में यह दावा किया गया है कि भारत में चिकित्साकर्मियों की कोरोना से संक्रमण और मृत्यु दर कम है। इसका मुख्य कारण है हायड्रॉक्सीक्लोरोक्विन और पीपीए किट का उपयोग। आईसीएमआर के अध्ययन में दावा किया गया है कि चार या ज्यादा खुराक लेने के बाद ‘संक्रमण’ की दर कम हो जाती है। यह भी दावा किया गया है कि एचसीक्यू लेने से कोरोना वायरस शरीर में अपनी जड़ें नही जमा पाता है।

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मुम्बई में 10,000 पुलिसकर्मियों पर एक अध्ययन किया गया है। इनमें से 4,500 पुलिसकर्मियों ने नियमित रूप से एचसीक्यू का सेवन किया और 5,500 ने नहीं किया। इसका परिणाम डब्ल्यूएचओ की दलील से बिल्कुल उलट है। आईसीएमआर ने कहा है कि 618 पुलिस वाले संक्रमित हुए। इनमें से अधिकांश वे थे, जिन्होंने दवाई नहीं ली थी और इन्हीं में से 9 पुलिस वालों की मृत्यु हुई।

इस अध्ययन में ‘कंट्रोल ग्रुप’ में 549 व्यक्ति थे और ‘स्टडी ग्रुप’ में 624 व्यक्ति थे। इसी अध्ययन में पाया गया कि इस दवाई का कुछ उल्टा असर भी होता है, लेकिन वह भी मामूली। जैसे इसको लेने से 8 प्रतिशत मरीज को उल्टी की इच्छा होती है, 5 प्रतिशत मरीजों में सिरदर्द और 4 प्रतिशत में दस्त लगने की शिकायत देखी गई है। किसी मरीज में ह्दय से संबंधित कोई गंभीर बीमारी नहीं मिली है।

पुलिसकर्मियों पर अध्ययन
मुम्बई में 10,000 पुलिसकर्मियों पर एक अध्ययन किया गया है। इनमें से 4,500 पुलिसकर्मियों ने नियमित रूप से एचसीक्यू का सेवन किया और 5,500 ने नहीं किया। इसका परिणाम डब्ल्यूएचओ की दलील से बिल्कुल उलट है। आईसीएमआर ने कहा है कि 618 पुलिस वाले संक्रमित हुए। इनमें से अधिकांश वे थे, जिन्होंने दवाई नहीं ली थी और इन्हीं में से 9 पुलिस वालों की मृत्यु हुई। हायड्रॉक्सीक्लोरोक्विन लेने वालों में से किसी की मृत्यु नहीं हुई और बहुत ही कम लोगों को कोरोना संक्रमण हुआ और जिनको हुआ उनमें संक्रमण का असर कम था।

यहां पर ध्यान देने योग्य बात यह है कि भारत में एचसीक्यू का उपयोग दो तरह से कोरोना संक्रमितों पर हो रहा है। किसी को कोरोना न हो, इसके लिए उसे पहले दिन सुबह-शाम एचसीक्यू की 400 एमजी दी जाती है और इसके बाद एक हफ्ते तक दिन में एक बार 400 एमजी की खुराक दी जाती है। वहीं कोरोना पीड़ित को पहले दिन सुबह-शाम एचसीक्यू की 400 एमजी दी जाती है और उसके बाद चार दिन तक सुबह-शाम 200 एमजी की खुराक दी जाती है। इस तरह कुल मात्रा होती है 2,400 एमजी। 

अब यहां पर दो तथ्यों पर ध्यान देने की जरूरत है। जिस लेख के आधार पर एचसीक्यू के अध्ययन और उपयोग के परीक्षण को रोका गया, उसमें कहीं भी कोरोना की रोकथाम की बात नहीं कही गई है, जबकि अंतरराष्ट्रीय अध्ययन में दवा की मात्रा काफी ज्यादा है। उसमें पहले दिन 800 एमजी की खुराक 6 घंटे के अंतराल से और उसके बाद 400 एमजी सुबह-शाम अगले दस दिन तक दी जाती है। इस प्रकार दवा की कुल मात्रा 9600 एमजी हो जाती है।

भारतीय अनुभव इस दवा पर दोनों ही दृष्टि से, कोरोना के संक्रमण को रोकने और इसके इलाज में बेहद सकारात्मक है। इन सबके बावजूद ‘लांसेट’ में इस लेख का प्रकाशित होना, उसके सम्पादक और पत्रिका की नैतिकता पर सवाल उठाता है।

77 देशों में एचसीक्यू का निर्यात  

उल्लेखनीय है कि एचसीक्यू का 70 प्रतिशत उत्पादन भारत में होता है और 77 देशों में निर्यात होता है। एचसीक्यू की महत्ता इस बात से भी स्थापित होती है कि स्वयं अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने कोरोना से बचाव के लिए इसे भारत से मंगाया है। याद कीजिए वह वक्त जब अमेरिका को एचसीक्यू की जरूरत महसूस हुई तब वहां के राष्ट्रपति ने जिस भाषा का उपयोग करके हमारे प्रधानमंत्री से एचसीक्यू देने का आग्रह किया, वह भी इस दवा की महत्ता को स्थापित करता है।

डब्ल्यूएचओ पर सवाल
यह तथ्य भी महत्वपूर्ण है कि कोरोना महामारी की शुरुआत में डब्ल्यूएचओ ने जो जानकारी विश्व के सामने रखी उससे मानव जाति का बहुत नुकसान हुआ है। डब्ल्यूएचओ की विश्वसनीयता पर सवाल उठ रहे हैं। वर्तमान में सौम्या स्वामीनाथन डब्ल्यूएचओ में मुख्य वैज्ञानिक हैं। वह कुछ वर्ष पहले तक आईसीएमआर में थीं। अब केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन डब्ल्यूएचओ के कार्यकारी बोर्ड के अध्यक्ष हो गए हैं। इस हालत में डब्ल्यूएचओ सेविश्व-हितैषी जनकल्याणकारी निर्णयों की अपेक्षा बढ़ गई है।  (लेखक ‘इंडियन मेडिकल एसोसिएशन’ की ‘एथिक्स कमेटी’  के अध्यक्ष हैं)