कोरोना काल में शिक्षक और शिक्षार्थी

    दिनांक 11-जून-2020
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कश्यप कुमार दुबे
 
कोविड-19 से पैदा हुए संकट ने शिक्षा का पूरा परिदृश्य ही बदल दिया है। इसके कारण देश में डिजिटल शिक्षा का चलन तेजी से बढ़ा है। शिक्षण प्रक्रिया में तकनीक और प्रौद्योगिकियों का भी प्रयोग हो रहा है, जिससे छात्रों के समक्ष रोजगार की चिंता नहीं रहेगी। शिक्षा 4.0 इसी नई डिजिटल औद्योगिक प्रौद्योगिकी से जुड़ा हुआ है, जो छात्रों को सीखने का एक नया दृष्टिकोण देती है
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 शिक्षण प्रक्रिया में तकनीक और प्रौद्योगिकी के बढ़ते प्रयोग के कारण शिक्षा क्षेत्र में तेजी से बदलाव आ रहा है।


शिक्षण और प्रशिक्षण का मूल उद्देश्य व्यक्ति को सफल जीवन जीने के लिए सशक्त बनाना तथा स्वयं, परिवार, समाज, राष्ट्र और मानवता के लिए सर्वश्रेष्ठ योगदान देना है। इसमें शिक्षक और शिक्षार्थी की भूमिका सबसे प्रभावी साबित हो सकती है। पूर्व में भारतीय शिक्षण संस्थान महान विचारों, नवाचार और उद्यमशीलता की गतिविधियों के केंद्र रहे हैं। भारत को एक बार फिर विश्व गुरु बनाने का अवसर मिला है। इस वैश्विक महामारी के दौर में भारत में शिक्षक ओर शिक्षार्थी नई चुनौतियों का सामना कर रहे  हैं। कोविड-19 ने जहां जीवन को नए सिरे से जीने का रास्ता दिखाने के साथ अकेले रहने की मानवीय क्षमता एवं स्वयं के साथ नए प्रयोग के लिए प्रेरित किया है। इस विषम परिस्थिति से शीघ्र निकलने के लिए शिक्षाविद और शिक्षार्थी नए सिरे से सोचने के लिए विवश हैं। कोविड-19 के झटके ने शिक्षण, अधिगम एवं मूल्यांकन को एक महत्वपूर्ण मोड़ दिया है। साथ ही अब इसके पुन: मूल्यांकन की भी आवश्कता है।

शिक्षा 4.0: सीखने का नया दृष्टिकोण
सीखने का एक नया दृष्टिकोण है- शिक्षा 4.0; यह उभरती हुई चौथी औद्योगिक क्रांति (उद्योग 4.0) के साथ खुद को जोड़ता है। औद्योगिक क्रांति के केंद्र में स्मार्ट तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और रोबोटिक्स है, जिसका असर अब धीरे-धीरे हमारे पाठ्यक्रमों पर पड़ रहा है। विश्वविद्यालयों को अपने छात्रों को एक ऐसी दुनिया के लिए तैयार करना होगा ताकि वे औद्योगिक क्रांति प्रणालियों के साथ दो-दो हाथ कर सकें। इसका मतलब है कि छात्रों को इन तकनीकों के बारे में पढ़ाने, सीखने के दृष्टिकोण को बदलने के साथ उन्हें सफल, स्वरोजगारी स्नातक बनाना होगा। इससे उनमें एक नया दृष्टिकोण पैदा होगा, जिससे  स्वावलंबी शिक्षा का मार्ग प्रशस्त होगा। भविष्य में आवश्यक कौशल के साथ शिक्षण और सीखने के तरीकों को जोड़ कर विश्वविद्यालय छात्रों को चौथी औद्योगिक क्रांति के लिए सफलतापूर्वक तैयार कर सकते हैं। शिक्षा 4.0 के रूप में जो सबसे बड़ा बदलाव दिखने की संभावना है, उसका शिक्षण प्रक्रिया में प्रौद्योगिकी से गहरा संबंध है। डिजिटल तकनीक का उपयोग और नए तरीके अपनाने का उद्देश्य छात्रों को शिक्षा प्रक्रिया में जोड़ कर रखना है। आज के दौर में उच्च शिक्षा संस्थान सीखने के अधिक व्यक्तिगत तरीके की ओर बढ़ रहे हैं। इसलिए भविष्य के स्वरोजगार की स्थिति के लिए स्नातकों को तैयार करने की आवश्कता है। विश्वविद्यालयों के डिजिटल विकास के साथ कुछ पारंपरिक प्रक्रियाओं में बदलाव भी जरूरी हैं। आज दुनिया के 91 प्रतिशत से अधिक छात्र कोरोना वायरस महामारी से प्रभावित हुए हैं। शिक्षा पर यूनेस्को की रिपोर्ट के अनुसार, संक्रमण का प्रसार रोकने के लिए कोविड-19 से प्रभावित कई देशों में स्कूल और उच्च शिक्षण संस्थान बंद कर दिए गए हैं। इससे 191 देशों में 157 करोड़ से अधिक छात्र प्रभावित हुए हैं। लॉकडाउन के कारण भारत में भी लगभग 32 करोड़ से अधिक विद्यार्थी प्रभावित हुए हैं।

आनलाइन शिक्षा का सबसे जटिल कारक है इंटरनेट कनेक्टिविटी। इसलिए मजबूत इंटरनेट कनेक्टिविटी  सुनिश्चित करनी होगी ताकि सीखने की प्रक्रिया में कोई बाधा न आए। वर्तमान में शिक्षक दूरस्थ शिक्षा उपकरणों का उपयोग करके पठन और पाठन करा  रहे हैं। माता-पिता भी घर पर नई शिक्षण तकनीक को सीख  रहे हैं। 40 दिनों के लॉकडाउन के दौरान देशभर के स्कूलों और कॉलेजों  में आॅनलाइन शिक्षा में वृद्धि हुई है। हालांकि ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के छात्रों में आॅनलाइन शिक्षण का उपयोग एवं दक्षता अलग-अलग है।

आॅनलाइन शिक्षा के क्षेत्र में भारत की गिनती दुनिया के अग्रणी देशों में होती है। इसलिए भारत में आॅनलाइन शिक्षा का चलन नया नहीं है। देश के कई सरकारी और निजी शिक्षण संस्थानों में आॅनलाइन कक्षाएं काफी पहले से चल रही हैं। नेशनल डिजिटल लाइब्रेरी, डएफ२, रहअअट, टडडउ२, ज्ञानदर्शन, विद्याधन आदि  इंटरनेट और दूरदर्शन के माध्यम से प्रसारित किए जा रहे हैं।  हालांकि, कोविड-19 के कारण आॅनलाइन शिक्षा के क्षेत्र में काफी तेजी आई है और अब मोबाइल नेटवर्क सबसे सहज माध्यम बन गया है। तेजी से बदलती प्रौद्योगिकी ने ही ज्ञान अर्थव्यवस्था को जन्म दिया है, जिसमें शैक्षणिक संस्थानों की भूमिका महत्वपूर्ण है। भविष्य की शिक्षा प्रणाली में शिक्षकों की भूमिका सीखने की प्रक्रिया को आसान बनाने के साथ व्यक्तिगत विकास पर केंद्रित रहेगी। पारंपरिक तरीकों से शिक्षा जारी रखने के बजाय परिणाम आधारित शिक्षण पर ध्यान अधिक हो, इसके लिए उनके दृष्टिकोण में बड़े पैमाने पर बदलाव की आवश्यकता होगी। इस परिवर्तन में रोजगार, छात्रों के अनुभव, उत्कृष्ट अनुसंधान तथा सामाजिक प्रभाव जैसे क्षेत्र महत्वपूर्ण हैं। भविष्य के शैक्षणिक संस्थानों को सामाजिक समस्याओं का समाधान खोजने की दिशा में लगातार काम करना होगा। संस्थानों को भविष्य का पाठ्यक्रम सिखाना चाहिए, क्योंकि शिक्षार्थियों को दुनियाभर से भविष्य की प्रौद्योगिकी द्वारा लाए गए बदलावों पर काम करना है। इसलिए अब  हमें अपने पाठ्यक्रमों को अद्यतन करने में तेजी लानी होगी। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि इस वैश्विक महामारी के दौर में आने वाली पीढ़ियों को कैसे तैयार करेंगे? अधिकांश पाठ्यक्रमों की विषय सामग्री को बदलते समय की मांग को ध्यान में रख कर भविष्य के पाठ्यक्रम के बारे में सार्थक चर्चा होनी चाहिए।

मानवता पर चोट करती वैश्विक महामारी

पौराणिक ग्रंथों में मानवता को धर्म बताया गया है।
अथर्ववेद में कहा गया है- यथा द्यौश्च पृथिवी च न बिभीतो न रिष्यत:।
एवा मे प्राण मा विभे:।
अर्थात व्यक्ति को कभी किसी भी प्रकार का भय नहीं पालना चाहिए। भय से शारीरिक और मानसिक रोग उत्पन्न होते हैं। डरे हुए व्यक्ति का कभी किसी भी प्रकार का विकास नहीं होता। संयम के साथ निर्भीक होना जरूरी है। डर सिर्फ ईश्वर का होना चाहिए।
यह महामारी मानवता पर भारी पड़ रही है। आज वैश्विक महामारी के कारण हर व्यक्ति एक-दूसरे से आशंकित है। यह सोचकर कि सामने वाला व्यक्ति कहीं कोरोना वायरस से संक्रमित तो नहीं है। एक-दूसरे पर न तो पहले जैसा विश्वास रहा और न ही पहले जैसी नजदीकी। ऐसी स्थिति समाज के लिए घातक हो सकती है। आने वाले समय में इसके घातक परिणाम होंगे। एक समय था जब आतंकवाद के कारण व्यक्ति लावारिस सामान छूने से डरता था कि कहीं उसमें बम न हो। मौजूदा समय में कुछ भी छूने की मनाही तो है ही, अपनों को गले लगाने, उनसे हाथ मिलाने की अनुमति भी नहीं है। यहां तक कि कोरोना वायरस के संक्रमण से किसी की मौत हो जाए तो परिवार के लोग अंत्येष्टि में शामिल होने से भी कतरा रहे हैं, क्योंकि उन्हें संक्रमण का खतरा है। इसलिए आपसी प्रेम, विश्वास और भाईचारा कायम रहे, कोरोना काल के बाद हमें इस पर विशेष ध्यान देना होगा।

डिजिटल कौशल की आवश्यकता
आज के समय में कृत्रिम बुद्धिमता, रोबोटिक्स, बिग डाटा और इंटरनेट आफ थिंग्स शिक्षा क्षेत्र के नए संसाधन हैं। इनके प्रयोग में दक्षता बेहद जरूरी हो गई है, क्योंकि इनका सीधा संबंध रोजगार और उद्योग से है। इसलिए शिक्षा के क्षेत्र में क्रांति की बहुत आवश्यकता है। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि छात्रों और शिक्षकों को समान रूप से सर्वोत्तम शिक्षण तथा शिक्षण अनुभव प्राप्त हो। यह छात्रों और शिक्षकों के लिए शिक्षा 4.0 का अनुभव विकसित करने का जरिया है जो हमारे चारों ओर तेजी से हो रहे बदलाव की जरूरतों को पूरा करता है। इस तरह से हम संकाय 4.0 को पाठ्यचर्या 4.0 के साथ जोड़ सकते हैं। शिक्षकों को भी तकनीकी अनुप्रयोगों का उपयोग करने के प्रयासों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए जो संज्ञानात्मक सीखने की क्षमताओं में सहायता करते हैं। इसे आकर्षक और दिलचस्प बनाने के लिए शिक्षक-छात्र की बातचीत एक स्मार्ट दृष्टिकोण पर आधारित होनी चाहिए। लोग डिजिटल कौशल की कमी की बात कर रहे हैं। उन्हें लगता है कि शिक्षण संस्थान अपनी मांगों को पूरा करने के लिए वर्तमान कार्यबल को बनाए रखने और डिजिटल युग की मांग को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

संस्थानों और विश्वविद्यालयों के लिए अवसर विश्वविद्यालय 4.0 के बिना उद्योग 4.0 संभव नहीं हो सकता। यदि हम अपनी शिक्षा प्रणाली को उन्नत नहीं करेंगे तो हमारे स्नातक भविष्य को नौकरी के लिए जद्दोजहद करनी पड़ेगी। उद्योग 4.0 में शैक्षणिक संस्थानों के लिए खुद को अगले स्तर पर अपग्रेड करने के ढेरों अवसर हैं। डिजिटल अर्थव्यवस्था में कुशल श्रम की मांग-आपूर्ति की कमी को पूरा करने के लिए संस्थान एक अग्रिम योजना विकसित कर सकते हैं। उसी समय, प्रौद्योगिकी का उपयोग करके परिचालन दक्षता प्राप्त करने के लिए अपने कामकाज में सुधार भी लाना होगा। उद्योग 4.0 का एकमात्र उद्देश्य आधुनिक उपकरणों और तकनीकों के साथ छात्रों को शिक्षित करना है। शिक्षण संस्थानों को इस पर विचार करना होगा कि वे भविष्य के सीखने का तंत्र कैसे स्थापित कर सकते हैं जो बड़े सपने की ओर बढ़ने का मार्ग प्रशस्त करता है। पाठ्यक्रम 4 .0 उपयोगकर्ता के अनुकूल होना चाहिए। इस पर कई तरह से विचार किया जा सकता है। जैसे- आॅनलाइन, मिश्रित या आॅन-कैंपस मोड के बीच स्विच करने की सहूलियत, ताकि शिक्षार्थी को किसी तरह की समस्या न हो। पाठ्यक्रम 4.0 में मशीन लर्निंग (एमएल) जैसी आधुनिक तकनीकों का उपयोग छात्रों की प्रगति के मूल्यांकन के लिए किया जा सकता है।

चुनौतियों को अवसर में बदलने की जरूरत
आॅनलाइन शिक्षा का सबसे जटिल कारक है इंटरनेट कनेक्टिविटी। इसलिए मजबूत इंटरनेट कनेक्टिविटी  सुनिश्चित करनी होगी ताकि सीखने की प्रक्रिया में कोई बाधा न आए। वर्तमान में शिक्षक दूरस्थ शिक्षा उपकरणों का उपयोग करके पठन और पाठन करा  रहे हैं। माता-पिता भी घर पर नई शिक्षण तकनीक को सीख  रहे हैं। 40 दिनों के लॉकडाउन के दौरान देशभर के स्कूलों और कॉलेजों में आॅनलाइन शिक्षा में वृद्धि हुई है। हालांकि ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के छात्रों में आनलाइन शिक्षण का उपयोग एवं दक्षता अलग-अलग है। (लेखक हरियाणा केंद्रीय विवि, महेंद्रगढ़ में जैव प्रौद्योगिकी विभाग में सह-आचार्य हैं)