बलूचों का सब्र टूटा तो जान बचाकर भागी पकिस्तानी फौज

    दिनांक 12-जून-2020   
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पाकिस्तान के प्रति बलूचों में गुस्सा भरा हुआ है और इसी का परिणाम है कि हाल ही में बलूचों की भीड़ के आगे टैंक में बैठकर पाकिस्तानी फौजियों को जान बचाकर भागना पड़ा। पाकिस्तान ने जिस तरह बलूचों पर जुल्म ढाए हैं, उनके सब्र का बांध तो लगता है, टूटने को तैयार है

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जब सेना के टैंक पर लोग पथराव करने लगें और फौजी सिर पर पैर रखकर भागने लगें, तो समझ लेना चाहिए कि एक बड़ी क्रांति आकार ले रही है। बलूचिस्तान में ऐसा ही हुआ है। हजारों निहत्थे लोगों ने सेना की चौकियों पर हमला कर दिया और स्थिति यह हुई कि फौजियों को जान बचाकर भागना पड़ा। फौज के पास टैंक भी था, लेकिन लोगों का गुस्सा ऐसा था कि वह भी भाग खड़ा हुआ।
अफगानिस्तान के साथ लगता हुआ बलूचिस्तान का इलाका है ब्राबचाह। सीमा के दोनों ओर बलूचों की आबादी है और इनका आपस में रोज का कारोबारी रिश्ता है और दोनों ओर से लोगों का आना-जाना होता रहा है। सीमा पार काम के लिए जाने वाले लोगों में बड़ी संख्या मजदूरों की होती थी जो दिन भर वहां काम करते और शाम तक लौट आते। लेकिन अभी कुछ दिन पहले पाकिस्तानी फौज ने अचानक इस चौकी पर लोगों को उधर जाने से रोक दिया। इसी कारण पाकिस्तान में रह रहे बलूचों में गुस्सा भड़कता जा रहा था। रोजाना चौकी पर बलूच इकट्ठा होते और उसपर जाने की कोशिश करते लेकिन फौजी रोक देते। अंततः बलूचों का गुस्सा भड़क उठा और उन्होंने फौज पर हमला कर दिया। हजारों लोगों के गुस्से के आगे फौजियों के हौसले पस्त हो गए और वे जान बचाकर भाग खड़े हुए। जमाल बलोच उन लोगों में थे जिन्होंने फौजियों को भागने के लिए मजबूर किया। वह कहते हैं, “ फौज ने शुरू में हम लोगों पर टैंक चढ़ाने की कोशिश की, लेकिन जब भीड़ नहीं डरी और पत्थर बरसाते लोग आगे बढ़ते रहे तो फौजी टैंक को वापस मोड़कर भाग खड़े हुए।” काफी दूर तक लोगों ने भागते टैंक का पीछा भी किया। उसके बाद भीड़ का गुस्सा चौकी और वहां खड़ी गाड़ी पर फूटा और लोगों ने उन्हें आग लगा दी। बलूचिस्तान में इस तरह निहत्थे लोगों के गुस्से के कारण टैंक के साथ फौजियों के भाग खड़े होने की यह संभवतः पहली घटना है
बड़े आंदोलन का संकेत
निहत्थे लोगों के टैंक के सामने अड़ने के जिक्र के साथ ही हमारे जेहन में दो तस्वीरें उभरती हैं- एक अरब क्रांति के दौरान की जब एक के बाद एक तानाशाही सरकारें गिरती चली जा रही थीं और दूसरी चीन के थ्येआनमन चौक पर छात्रों का शांतिपूर्ण प्रदर्शन और टैंक का रास्ता रोके एक निहत्थे शख्स की। बलूचिस्तान में ऐसा नजारा बहुत कुछ कहता है। बलूचिस्तान की आजादी के लिए आंदोलन कर रहे राजनीतिक कार्यकर्ता कमाल बलोच कहते हैं, “ इस घटना को अकेले वाकये के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। पाकिस्तान, उसकी फौज, उसकी खुफिया एजेंसी और उनके पाले हुए डेथ स्क्वायड ने बलूचिस्तान को ज्वालामुखी के मुहाने पर ला दिया है। इस तरह के वाकये छिटपुट निकलते लावे की तरह हैं जो बताते हैं कि वह दिन दूर नहीं जब एक तेज आवाज के साथ लावे का सैलाब निकलेगा और पाकिस्तान की सरकारी दहशतगर्दी का अंत कर देगा।”
ब्रम्श को इंसाफ की मांग
वैसे, ब्राबचाह में लोगों के गुस्से के फूटने की एक और वजह है। इस वजह का नाम है ब्रम्श बलोच। यह एक चार साल की बच्ची है और मौत से जूझ रही है। इस नन्ही जान ने पूरे बलूचिस्तान को आंदोलित कर दिया है। बलूचिस्तान के हर शहर-हर कस्बे में ब्रम्श को इंसाफ दिलाने की मांग तो उठ ही रही है, कराची और इस्लामाबाद जैसे पाकिस्तानी शहरों में भी रैलियां निकाली जा रही हैं और ब्राबचाह समेत सीमाई इलाके भी इससे अछूते नहीं। वहां के लोगों में भी वैसे ही गुस्सा उबल रहा है और हाल के समय में ब्रम्श को इंसाफ दिलाने की जो मांग एक आंदोलन का रूप लेती जा रही है, उसकी झलक इन सीमाई इलाकों में भी दिख रही है। दरअसल, ब्रम्श बलोच डेथ स्क्वॉयड की गोली से घायल है।
पाकिस्तान में राजनीतिक, सैन्य और खुफिया विभागों के संरक्षण में पल रहे डेथ स्क्वॉयड के लोगों ने कुछ ही दिन पहले तुरबत के केच इलाके में ब्रम्श बलोच के घर पर धावा बोला था। ब्रम्श की मां मलिक नाज बीवी निहत्थी ही एके-47 जैसे खतरनाक हथियारों से लैस हमलावरों के रास्ते में खड़ी हो गईं ताकि परिवार के दूसरे लोगों की हिफाजत हो सके। डेथ स्क्वॉयड के लोग मलिक नाज की गोली मारकर हत्या कर देते हैं और नन्ही ब्रम्श को भी गोली मारकर घायल कर देते हैं। शोर-शराबा सुनकर आसपास के लोग घर के बाहर जुटने लगते हैं। डेथ स्क्वॉयड के इस हमलवार दस्ते में अल्ताफ और बसीत भी थे। अल्ताफ को लोगों ने उसी समय पकड़ लिया जबकि बसीत को बाद में पकड़ लिया गया। केच के रहीम बलोच कहते हैं, “ ऐसा नहीं कि बलूचिस्तान ने ब्रम्श बलोच जैसी घटनाएं पहले नहीं देखीं। यहां कोई ऐसा इलाका नहीं जहां इंसानियत को शर्मसार करने वाले जुल्म नहीं हुए हों, कोई ऐसा घर नहीं जिसके पास अपनी ऐसी कोई दर्द भरी कहानी न हो। लेकिन जब घड़ा भर जाता है तो उससे सबसे पहले बाहर निकलने वाला एक बूंद ही होता है और वह इस बात का ऐलान होता है कि अब इस घड़े में और पानी के लिए कोई जगह नहीं। क्या पता, ब्रम्श की घटना वैसी ही हो क्योंकि इसने पूरे बलूचिस्तान को एक कर दिया है।”
चुन-चुनकर मार रहे फौजियों को
बहरहाल, बलूचिस्तान की आजादी के लिए छापामार लड़ाई कर रहे लोकप्रिय नेता डॉ. अल्लाह नजर बलोच ने ब्रम्श बलोच पर हुए हमले को बलूचिस्तान की इज्जत पर हमला करार दिया है। बलूच समाज में औरतों को काफी इज्जत हासिल है और पाकिस्तानी फौज ने बलूचों का हौसला तोड़ने के लिए जुल्म के जो तरीके अपना रखे हैं, उनमें औरतों-बच्चों पर अमानवीय जुल्म करना भी शामिल है। बलूचिस्तान का एक बड़ा इलाका अंग्रेजों के अधीन रहा था और वहां अंग्रेजों ने पहली बार 1901 में जनगणना कराई थी। अंग्रेजों के शासन करने के तरीके को तय करने में यह जनगणना आधारभूत दस्तावेज का काम करती थी। यह भूगोल, समाज, संसाधन, संस्कृति, हर उस कारक का संकलन होता जिससे समाज को समझने में मदद मिलती। इसी दस्तावेज में अंग्रेजों ने कहा है कि बलूच अत्यधिक ईमानदार, उसूल के पक्के लोग हैं और उनके संस्कृति में औरतों को बड़े ही सम्मान के साथ देखा जाता है। इस संदर्भ में देखें तो अल्लाह नजर बलोच की प्रतिक्रिया मानवाधिकारों के प्रति संवेदनशील आज की दुनिया की चिंताओं को समेटे हुए तो है ही, सांस्कृतिक तौर पर औरतों का सम्मान करने की बलोच संस्कृति की भी अभिव्यक्ति है। कहा जा सकता है कि आजादी की लड़ाई लड़ रहे बलूचों को कुछ कर गुजरने के लिए प्रेरित करने में औरतों-बच्चों पर किया जा रहे जुल्म की बड़ी भूमिका है। वैसे, बेकसूर लोगों पर जैसे-जैसे फौजी जुल्म बढ़ता जा रहा है, बलूचों की ओर से सेना पर हमलों की घटनाएं भी बढ़ती जा रही हैं। अप्रैल के अंत में केच में हुए फौजी ऑपरेशन को याद रखना चाहिए जिसमें तमाम बेकसूर लोगों को मार डाला गया था। इस घटना के कुछ दिनों के बाद ही इस ऑपरेशन को अंजाम देने वाली फौजी टीम पर बलूचिस्तान की आजादी के लिए सशस्त्र अभियान चला रहे बलूची राजी आजोही संगर (ब्रास) ने हमला किया जिसमें 12 से ज्यादा सैनिक मारे गए।
बलूचिस्तान ने फौजी जुल्म का लंबा दौर देखा है और इस्लामाबाद की तख्त पर बैठने वाले बदलते रहे लेकिन बलूचिस्तान के लोगों की आजाद होने की चाहत को फौजी बूटों से रौंदने की उनकी चाहत कभी खत्म नहीं हुई। बलूच वो कौम है जिसके आजाद होने का हौसला हर जुल्म के साथ और मजबूत होता गया और अब बलूच समाज उस राह पर है जहां से उसे आजादी की मंजिल दिखने लगी है। ब्राहबाच की घटना बलूचों की उस मानसिक अवस्था का प्रमाण है जो सात दशकों की कुर्बानी के बाद अब इंसाफ के लिए बेताब हो रही है।