...तो इसलिए महादान है ‘रक्तदान’

    दिनांक 15-जून-2020   
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पूनम नेगी
 
क्याआप जानते हैं कि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने रक्तदान को बढ़ावा देने के लिए 14 जून का ही दिन क्यों चुना! इस दिन नोबल पुरस्कार विजेता जीव विज्ञानी कार्ल लैंडस्टाईन का जन्म हुआ था। 14 जून 1868 को जन्मे इस आस्ट्रेलियाई वैज्ञानिक ने मानव रक्त में उपस्थित एग्ल्युटिनिन की मौजूदगी के आधार पर रक्तकणों का ए, बी और ओ समूह में वर्गीकरण किया था। उनकी इस शोध ने चिकित्सा विज्ञान में अत्यंत क्रांतिकारी योगदान दिया

 
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गत 14 जून को रक्तदान दिवस था। इस दौरान बहुत से लोगों ने रक्त दान किया भी होगा। हम सभी जानते हैं कि रक्त की एक—एक बूंद बड़ी कीमती है। किसी स्वस्थ व्यक्ति के रक्त की कुछ बूंदें किसी मरते हुए व्यक्ति की जान बचा सकती हैं। रक्त अनमोल है। इसका कोई दूसरा विकल्प नहीं है क्योंकि न ही इसका निर्माण किया जा सकता और न ही मनुष्य को किसी मनुष्येत्तर जीव का रक्त चढ़ाया जा सकता है। इसीलिए रक्तदान को महादान माना जाता है। हर दूसरे सेकेंड में दुनिया भर में कोई न कोई जिंदगी मौत से जूझ रही होती है, ऐसे में हमारा रक्तदान किसी को जीवनदान दे सकता है। वर्तमान में कोरोना संक्रमण की महामारी के गंभीर संकट के समय में तो इसकी आवश्यकता कई गुना अधिक बढ़ गयी है; मगर इसे विडंबना ही कहेंगे कि जागरूकता के अभाव में देश में स्वैच्छिक रक्तदाताओं का आंकड़ा कुल आबादी का एक प्रतिशत भी नहीं है।
  
सभ्यता व तकनीक के विकास की दौड़ में हमारा समाज भले ही कितना ही आगे निकल आया हो मगर भ्रांतियों तथा जन चेतना के अभाव के कारण आज के अत्याधुनिक युग में भी देश के लोग रक्तदान करने से हिचकिचाते हैं। जरूरत पड़ने पर मनुष्य को मनुष्य का रक्त खरीदना पड़ता है। इससे बड़ी दुःख व पीड़ा की बात और क्या हो सकती है कि विभिन्न दुर्घटनाओं में समय पर रक्त की आपूर्ति न हो पाने के कारण देश में प्रतिवर्ष लाखों लोग असमय मौत के मुंह में चले जाते हैं।
 
बताते चलें कि 1997 में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने सौ फीसदी स्वैच्छिक रक्तदान की शुरुआत की थी। इसके तहत 124 प्रमुख देशों का समूह बनाकर सभी देशों से स्वैच्छिक रक्तदान को बढ़ावा देने की अपील की गयी। इस पहल का मुख्य उद्देश्य था कि किसी भी नागरिक को रक्त की आवश्यकता पड़ने पर उसे पैसे देकर रक्त न खरीदना पड़े। इस उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए अब तक 49 देश स्वैच्छिक रक्तदान को अमलीजामा पहना चुके हैं। हालांकि कई देशों में अब भी रक्तदान के लिए पैसों का लेनदेन होता है। इनमें भारत भी शामिल है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानक के तहत भारत में सालाना एक करोड़ यूनिट रक्त की जरूरत है लेकिन 75 लाख यूनिट रक्त ही उपलब्ध हो पाता है।

राजधानी दिल्ली में आंकड़ों के मुताबिक यहां हर साल 350 लाख रक्त यूनिट की आवश्यकता रहती है लेकिन स्वैच्छिक रक्तदाताओं से इसका महज 30 फीसदी ही जुट पाता है। कमोवेश यही स्थिति समूचे देश की है। भले ही देश में रक्तदान को लेकर विभिन्न संस्थाओं व व्यक्तिगत स्तर पर उठाए गए कदम भारत में स्वैच्छिक रक्तदान को बढ़ावा देने में कुछ कारगर हैं मगर खेद का विषय है कि भारत की आबादी भले ही 135 करोड़ का आंकड़ा पार कर गयी हो मगर रक्तदाताओं का आंकड़ा कुल आबादी का एक प्रतिशत भी नहीं पहुंच पाया है। विशेषज्ञों के अनुसार भारत में कुल रक्तदान का 59 फीसद स्वैच्छिक होता है। राजधानी दिल्ली में तो स्वैच्छिक रक्तदान महज 32 फीसदी है। एक अनुमान के अनुसार दिल्ली में तकरीबन पांच दर्जन ब्लड बैंक हैं फिर भी एक लाख यूनिट रक्त की कमी है। इसकी मूल वजह है इस दिशा में समाज में फैली अज्ञानता।


रक्तदान को लेकर भ्रांतियां व समाधान


लखनऊ के केजीएमयू मेडिकल कालेज की पैथालॉजी से सेवानिवृत चिकित्सक डा. जी. एस. राणा कहते हैं कि आज भी हमारे देश में बहुत सारे लोग यह समझते हैं कि रक्तदान से शरीर कमजोर हो जाता है और उस रक्त की भरपाई होने में महीनों लग जाते हैं। यह गलतफहमी है कि नियमित रक्त देने से लोगों की रोग प्रतिकारक क्षमता कम हो जाती है और उसे बीमारियां जल्दी जकड़ लेती हैं। जबकि सच्चाई इससे बिल्कुल अलग है। स्वस्थ लोग स्वैच्छिक रक्तदान कर कितने ही अन्य के जीवन को बचा सकते हैं। आमजन को यह ज्ञात होना चाहिए कि मनुष्य के शरीर में रक्त बनने की प्रक्रिया हमेशा चलती रहती है और रक्तदान से कोई भी नुकसान नहीं होता। रक्तदान के सम्बन्ध में चिकित्सा विज्ञान कहता है कि कोई भी स्वस्थ व्यक्ति जिसकी उम्र 16 से 60 साल के बीच हो, जो 45 किलोग्राम से अधिक वजन का हो, जिसका हीमोग्लोबिन 12.5 हो और जिसे एचआईवी, हेपाटिटिस बी या सी जैसी बीमारी न हुई हो, वह बिना किसी भय के सहर्ष रक्तदान कर सकता है।

जो व्यक्ति नियमित रक्तदान करते हैं उन्हें हृदय सम्बन्धी बीमारियां कम परेशान करती हैं क्योंकि रक्तदान करने से खून में कोलेस्ट्रॉल जमा नहीं होता। तीसरी अहम बात यह है कि हमारे रक्त की संरचना ऐसी है कि उसमें समाहित लाल रक्त कणिकाएं तीन माह में स्वयं ही मर जाती हैं। इस कारण प्रत्येक स्वस्थ व्यक्ति तीन माह में एक बार रक्तदान कर सकता है। आधा लीटर रक्त से तीन लोगों की जान बच सकती है। हालांकि बड़ी संख्या में लोग सोचते हैं इतने लोग रक्तदान कर रहे हैं तो मुझे अपना खून देने की क्या जरूरत है...मेरा ब्लड ग्रुप तो बहुत आम है इसलिए यह तो किसी को भी आराम से मिल सकता है... या फिर कई लोग यह सोचते हैं कि मेरा ग्रुप तो "रेयर" है इसलिए जब किसी को इस ग्रुप की जरूरत होगी तभी मैं रक्त दूंगा। इस संकुचित सोच को बदलने की जरूरत है। किसी की जान बचाने से बड़ा पुण्य दूसरा नहीं हो सकता। 



रक्तदान दिवस 14 जून को ही क्यों !


क्या आप जानते हैं कि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने रक्तदान को बढ़ावा देने के लिए 14 जून का ही दिन क्यों चुना! इस दिन नोबल पुरस्कार विजेता जीव विज्ञानी कार्ल लैंडस्टाईन का जन्म हुआ था। 14 जून 1868 को जन्मे इस आस्ट्रेलियाई वैज्ञानिक ने मानव रक्त में उपस्थित एग्ल्युटिनिन की मौजूदगी के आधार पर रक्तकणों का ए, बी और ओ समूह में वर्गीकरण किया था। उनकी इस शोध ने चिकित्सा विज्ञान में अत्यंत क्रांतिकारी योगदान दिया तथा इस महत्वपूर्ण खोज के लिए कार्ल लैंडस्टाईन को सन 1930 में नोबल पुरस्कार दिया गया था। बताते चलें कि वर्ष 1937 में विश्व का पहला ब्लड बैंक अमेरिका में खोला गया था तथा भारत में वर्ष 1942 में कलकत्ता में पहला ब्लड बैंक स्थापित किया गया।


सराहनीय है इनका जज्बा

अमूमन पुरुषों द्वारा रक्तदान की खबरें सामने आती हैं। मगर बीते कुछ सालों में इस दिशा में कुछ जागरूक महिलाओं ने सराहनीय योगदान किया है। लखनऊ की 23 वर्षीय एमबीए स्टूडेंट दीप्ति बताती हैं कि उन्होंने पहली बार 18 साल की उम्र में रक्तदान किया था। वे कहती हैं कि मुझे ब्लड डोनेशन करने से मानसिक खुशी मिलती है। इसके लिए मैं खुद की सेहत का खास ख्याल रखती हूं। इसी तरह लखनऊ की ही रहने वाली रीता मित्तल और उनकी बेटी ईशा मित्तल तथा शिक्षिका सृष्टि दुबे भी चार   वर्षो से रक्तदान दिवस पर लगातार रक्तदान कर रही हैं। इसका फायदा यह भी है कि इसके लिए ये सभी अपने स्वास्थ्य का भरपूर ध्यान रखती हैं।  नवयुग कन्या महाविद्यालय की एनसीसी कैडेट निधि बताती हैं कि कुछ साल पहले कॉलेज में ब्लड डोनेशन कैंप लगा था मगर कोई भी लड़की ब्लड डोनेट के लिए आगे नहीं आ रही थी मैंने शुरुआत की तो कुछ अन्य लड़कियां भी आगे आ गयीं। निधि कहती हैं कि मैं अपने आस-पास रहने वाली महिलाओं को भी रक्तदान करने के लिए प्रेरित करती हूं।