लापरवाह सरकार का घातक वार

    दिनांक 16-जून-2020
Total Views |
अवंतिका
प्रवासी मजदूरों को जब मदद की सख्त जरूरत थी, तब दिल्ली से उन्हें निकलने को मजबूर किया गया। फर्जी खबर फैलाई गई कि उन्हें ले जाने के लिए उत्तर प्रदेश की सीमा पर बसें खड़ी हैं। जब हताश मजदूर पलायन करने लगे, तब केजरीवाल सरकार ने झूठा दावा किया कि  चार लाख मजदूरों के खाने की व्यवस्था की जा रही है
p19_1  H x W: 0
फर्जी खबर उड़ाकर आआपा सरकार ने आनंद बिहार बस अड्डे पर प्रवासी श्रमिकों की लाखों की भीड़ जुटा दी थी। (फाइल चित्र)
 
 
लॉकडाउन 1.0 के तीसरे दिन यानी 27 मार्च की बात है। रात के 12 बज रहे थे। अचानक लाउडस्पीकर पर दिल्ली के बाहरी इलाकों, जहां बड़ी संख्या में प्रवासी श्रमिक रहते हैं, में तेज आवाज सुनाई दी, ‘‘जिस किसी को भी अपने घर जाना है, उनके लिए कल सुबह आनंद विहार से बसें चलाई जाएंगी।’’ यह संदेश सुनकर एकबारगी तो लगा कि दिल्ली सरकार को लॉकडाउन में फंसे श्रमिकों की चिंता है, जिनके सामने रोजी-रोटी से लेकर खाने-पीने तक की समस्या खड़ी हो गई थी। लेकिन 28 मार्च की सुबह जब आनंद विहार में लोगों की भीड़ जमा होने लगी और और सीमा पर पुलिस ने उन्हें आगे बढ़ने से रोका, तब यह समझते देर नहीं लगी कि बड़ी सफाई से उनके साथ छल किया गया है।

इस घटना से एक दिन पहले ही मुख्यमंत्री केजरीवाल ने मकान मालिकों से प्रवासी श्रमिकों से किराया नहीं लेने की अपील की थी। प्रवासी श्रमिकों के पलायन पर महेंद्र सिंह नामक एक व्यक्ति ने ट्वीट किया, ‘‘दिल्ली में रह रहे मजदूरों के घर का पानी, बिजली काट दिया गया। अफवाह फैलाई कि लॉकडाउन तीन महीने का होगा। अफरा-तफरी मच गई। बसों में भर कर लोगों को उ.प्र. सीमा पर भेज दिया। रातभर गाजियाबाद, बुलंदशहर, हापुड़ में 1,000 से ज्यादा बसें लगाकर इनको गंतव्य तक पहुंचाने की व्यवस्था की गई।’’ इस पूरे प्रकरण में आआपा विधायक राघव चड्ढा ने आग में पेट्रोल डालने का काम किया। यह झूठ फैलाया कि उत्तर प्रदेश की सीमा पर मजदूरों को पीटा जा रहा है।

बहरहाल, श्रमिकों को दिल्ली से भगाने की चाल सफल रही। उ.प्र. सीमा पर हजारों प्रवासी मजदूरों की भीड़ जमा हो गई। इनमें अधिकांश भूख-प्यास से बेहाल थे। लेकिन लाखों लोगों को राशन-खाना खिलाने का दावा करने वाली दिल्ली सरकार के नुमाइंदे दूर-दूर तक नहीं दिखे। ऐसी स्थिति में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता देवदूत बनकर आए और श्रमिकों को खाना, पानी की बोतलें दीं तथा बच्चों के लिए दूध की व्यवस्था की। धौला कुआं में भी यही स्थिति थी। वहां भी भारी संख्या में श्रमिक घर जाने के लिए जमा हुए थे, लेकिन उनके लिए कोई व्यवस्था नहीं थी।

हैरत की बात यह है कि मुख्यमंत्री केजरीवाल, उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ट्वीट कर रहे थे कि उनकी तरफ से बसों की व्यवस्था की गई है, जो श्रमिकों को सीमा पर छोड़ेंगी और वहां से उ.प्र. सरकार दूसरी बसों से उन्हें आगे भेजेगी, जबकि ऐसी कोई व्यवस्था ही नहीं थी। लिहाजा लोग पैदल ही घर की ओर चल पड़े। कुल मिलाकर 21 दिन के लॉकडाउन में न केवल सामाजिक दूरी की धज्जियां उड़ाई गईं, बल्कि मदद की बजाए लोगों में असुरक्षा की भावना भर कर उन्हें पलायन के लिए मजबूर किया गया। उधर लोग पलायन कर रहे थे और इधर केजरीवाल और उनके मंत्री ट्वीट कर रहे थे कि दिल्ली में कोई भूखा नहीं सोएगा।

उनकी सरकार दावा कर रही थी कि 28 मार्च से 568 स्कूलों और 238 आश्रय गृहों के जरिए रोजाना 4 लाख लोगों को खिलाने की तैयारी है। साथ ही, 1,000 राशन दुकानों में मुफ्त राशन देने और बाकी दुकानें 2-3 दिन में खोलने का दावा किया। सवाल है कि कहीं लॉकडाउन को विफल करने के लिए तो यह प्रपंच नहीं रचा गया? मजदूरों को सीमा तक छोड़ने के लिए डीटीसी बसें क्यों चलाई गर्इं? मजदूरों को पलायन के लिए विवश करने के बाद ये घोषणाएं क्यों की गर्इं? जब सरकार लाखों लोगों को राशन-भोजन मुहैया करा रही थी तो प्रवासी श्रमिक दो दिन से भूखे क्यों थे? प्रशंसा उ.प्र. पुलिस की होनी चाहिए, अगर उसने सही तरीके से भीड़ को नियंत्रित नहीं किया होता तो वहां भगदड़ मच सकती थी। इतनी भीड़ थी कि सैकड़ों लोग मरते, क्योंकि अराजकता फैलाने की पूरी तैयारी थी।

राशन वितरण में भी फर्जीवाड़ा
लॉकडाउन में एक भी गरीब, जरूरतमंद या श्रमिक भूखा न रहे, इसके लिए केंद्र सरकार ने आठ करोड़ प्रवासी श्रमिकों को राशन देने का लक्ष्य रखा और प्रत्येक राज्य को तय संख्या के अनुपात में धन और राशन दिया। लेकिन देशभर में कुल 20.36 लाख श्रमिकों को ही राशन दिया गया है। फिर दिल्ली सरकार कैसे 72 लाख लोगों को राशन देने का दावा कर रही है? महत्वपूर्ण बात यह है कि 2016 के बाद से दिल्ली में नए राशन कार्ड बने ही नहीं। राशन कार्ड बनाने के नाम पर केजरीवाल सरकार के पूर्व मंत्री और विधायकों की करतूत कितनी शर्मनाक थी, यह जगजाहिर है। लेकिन इन सब से बेपरवाह केजरीवाल का ध्यान केवल इस बात पर होता है कि किसी भी तरह उनका और उनकी पार्टी का प्रचार होना चाहिए, इसके लिए चाहे झूठा दावा भी क्यों न करना पड़े।

p19_1  H x W: 0
राघव चड्ढा के फर्जी ट्वीट (ऊपर) के विरुद्ध उ. प्र. के अधिकारी ने ट्वीट करके कार्यवाही करने की बात कही
फर्जी खबरें उड़ाकर  मजदूरों को पलायन के लिए मजबूर करने के बाद दिल्ली के मुख्यमंत्री  और उपमुख्यमंत्री ने  ट्वीट करके ‘मासूमियत’भरी सलाहें दीं

बहरहाल, केजरीवाल सरकार ने पहले 72 लाख लोगों को राशन देने का दावा किया, लेकिन परेशानियां अधिक प्रचारित होने पर मामला शांत करने के लिए उन्होंने अन्य पार्टियों के दबाव में ई-कूपन के जरिए राशन देने की व्यवस्था शुरू की। लेकिन कभी तो सर्वर डाउन रहा तो कभी सरकारी सस्ते गल्ले वालों की लापरवाही रही। इन सब कारणों से कूपन बने ही नहीं और किसी तरह बन भी गए तो कुछ ही लोग राशन ले सके। कारण, ई-कूपन 24 घंटे के लिए ही मान्य था। बात यहीं खत्म नहीं हुई। खुद को गरीबों और मजदूरों का मसीहा दिखाने के लिए केजरीवाल ने नया शिगूफा छोड़ा कि सभी विधायकों को 2,000 ई-कूपन और राशन किट दी जाएंगी ताकि वह अपने क्षेत्र में प्रवासी श्रमिकों और जरूरतमंदों के बीच उन्हें बांट सकें। लेकिन करावलनगर से भाजपा विधायक मोहन सिंह बिष्ट का साफ कहना था कि यह भी केजरीवाल द्वारा लोगों को गुमराह करने का तरीका था। अव्वल तो उन्हें कूपन और राशन मिला नहीं और यदि मिलता तो भी समस्या होती, क्योंकि उनके विधानसभा में करीब तीन लाख लोग हैं। इनमें अधिकतर गरीब और प्रवासी श्रमिक हैं। ऐसे में वह किस तरह से इन कूपनों और सीमित राशन किट के भरोसे लोगों को राहत दे पाते।

यही कारण रहा कि उन्होंने न केवल उपराज्यपाल अनिल बैजल और मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को पत्र लिखकर कूपन वापस करने की बात कही, बल्कि भाजपा के प्रतिनिधिमंडल के साथ उनके आवास पर जाकर कूपन लौटा भी दिए। यह अलग बात है कि भाजपा प्रतिनिधिमंडल केजरीवाल से समय लेकर मुख्यमंत्री आवास पर गया, लेकिन उन्होंने मिलना मुनासिब नहीं समझा। ऐसे में प्रतिनिधिमंडल को अपना ज्ञापन वहां मौजूद अधिकारियों को ही सौंपना पड़ा।

बस चालकों से बिना सुरक्षा उपकरण चलवा रहे एंबुलेंस
दिल्ली सरकार खुद को आम आदमी की सरकार बताती है। लेकिन आम आदमी उसकी नीतियों और कार्यशैली में कहीं दिखता ही नहीं। सच तो यह है कि केजरीवाल को आम आदमी की चिंता ही नहीं है। इसीलिए इस संकट काल में भी द्वारका में डिपो के बाहर क्लस्टर बसों के चालक और संवाहक प्रदर्शन करने को विवश हैं। आरोप है कि उन्हें दो माह से वेतन नहीं मिला है। डीटीसी बस चालकों की स्थिति तो इससे भी बदतर है। एक तो उन्हें समय पर वेतन नहीं दिया जा रहा, ऊपर से उनसे जबरन कैट्स एंबुलेंस चलवाया जा रही है। लेकिन उन्हें एंबुलेंस जैसी आपातकालीन चिकित्सा सेवा से संबंधित न तो कोई जानकारी दी गई और न ही प्रशिक्षण। यही नहीं, डीटीसी चालकों को जरूरी सुरक्षा उपकरण भी नहीं दिए गए हैं। ऐसी नौबत क्यों आई, इसके पीछे एक कारण है। दिल्ली में जिस रफ्तार से कोरोना संक्रमण के मामले बढ़े, उसके कारण कैट्स एंबुलेंस के कई चालक और अन्य स्टाफ भी संक्रमित हो गए। लिहाजा, उन्होंने दो टूक शब्दों में कह दिया कि सुरक्षा के समुचित इंतजाम के बिना वे एंबुलेंस नहीं चलाएंगे। दिल्ली सरकार कैट्स चालकों पर दबाव नहीं बना सकी तो फरमान जारी कर डीटीसी चालकों को तत्काल प्रभाव से एंबुलेंस चलाने के काम में लगा दिया। नजफगढ़ निवासी डीटीसी चालक एम. सिंह शेखावत का कहना है कि बिना किसी प्रशिक्षण और अनिवार्य सुरक्षा उपकरणों के उन्हें जान-बूझकर मौत के मुंह में धकेलने की कोशिश की गई है। डीटीसी चालकों को बिना मास्क, सैनिटाइजर और पीपीई किट दिए ही धमका कर आपात चिकित्सा सेवा में लगा दिया गया, ठीक इसी वजह से कैट्स चालकों ने एंबुलेंस चलाने से इनकार किया था।

कोरोना संक्रमितों के शव खुले में जलाने का आदेश
केजरीवाल सरकार ने निगमबोध घाट और पंजाबी बाग सहित सभी बड़े श्मशान घाटों पर कोविड-19 से मरने वालों के शव खुले में लकड़ी से जलाने का आदेश दिया है। अधिकारी श्मशान घाट पर काम करने वालों पर इसके लिए दबाव बना रहे हैं। लेकिन अंत्येष्टि करवाने वाले पुरोहित एवं कर्मी इसका कड़ा विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि श्मशान घाट पर खुले में शव जलाने पर राख उड़ती है। ऐसे में जब कोरोना संक्रमित शव खुले में जलेंगे तो उनकी भी राख उड़ेगी जो वहां मौजूद लोगों के लिए खतरनाक हो सकती है। सवाल है कि जब लोगों के स्वास्थ्य की सुरक्षा के मद्देनजर सरकार ने सीएनजी से शवों की अंत्येष्टि का निर्णय किया था तो अब यह फैसला क्यों? दिल्ली भाजपा प्रवक्ता प्रवीण शंकर कपूर ने राज्यपाल और मुख्यमंत्री से खुले में लकड़ी से कोरोना संक्रमितों के शवों की अंत्येष्टि का फैसला लोकहित में वापस लेने का अनुरोध किया है।     


सफाईकर्मियों को भी कई माह से वेतन नहीं

p19_1  H x W: 0
बिना सुरक्षा उपकरण दिए  काम करवाने के विरोध में सफाई कर्मचारी  एक्शन  कमेटी ने यह पत्र लिखा उपराज्यपाल को ।

निगम के सफाईकर्मी भी आक्रोश में हैं। कहने को सफाईकर्मी कोरोना योद्धा हैं, लेकिन उन्हें कई माह से वेतन नहीं मिला है। केजरीवाल ने ड्यूटी के दौरान कोरोना योद्धा की मृत्यु पर एक करोड़ रुपये देने की घोषणा की है, लेकिन असलियत में इन्हें उस श्रेणी में ही नहीं रखा गया है। ऐसे में केजरीवाल की यह घोषणा भी जुमला साबित हो रही है।

चाहे राशन दुकान पर निगरानी के लिए तैनात महिला शिक्षिका बी.सरकार का मामला हो, महिला सिपाही शैली, अमित राणा का या सफाई कर्मचारियों का, सरकार को किसी की सुध नहीं है। गौरतलब है कि हाल ही में उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने यह कहते हुए केंद्र सरकार से 5,000 करोड़ रुपये की मांग की है कि दिल्ली सरकार के पास कर्मचारियों को वेतन देने के लिए पैसे नहीं हैं। हैरत की बात है कि किसी भी सरकार के बजट में पहले से ही कर्मचारियों के वेतन की राशि अलग रखी जाती है।

यह रकम केजरीवाल सरकार ने कहां खर्च कर दी? या बजट ही नहीं बनाया जिससे कर्मचारियों को समय पर वेतन मिल सके? दिल्ली सरकार जिस अतिरिक्त राजस्व का दम भरती थी, वह कहां गया?