भारत-चीन तनाव : अब नहीं झुकेंगे हम

    दिनांक 16-जून-2020
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फुंसोक स्तोब्दान

लद्दाख में चीन हमारी सीमाओं का साल में सैकड़ों बार अतिक्रमण करता रहा है। आजादी के बाद से ही हमारी सरकारों ने लद्दाख के साथ सौतेला व्यवहार किया और उसे विकास की दौड़ से दूर रखा। लेकिन 2014 के बाद से भारत ने चीनी आक्रामकता का दमदार उत्तर देना सीख लिया है। चीन समझ गया है कि भारत को अब ‘हिन्दी-चीनी भाई भाई’ के जुमले का झांसा नहीं दिया जा सकता

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मोदी सरकार लद्दाख और अन्य सीमा क्षेत्रों में भारत की रणनीतिक स्थिति मजबूत करने के लिए सड़कों और पुलों का निर्माण करने में जुटी है। ऊपर दिए चित्र में वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों के साथ रक्षामंत्री राजनाथ सिंह लद्दाख में एक महत्वपूर्ण पुल का निरीक्षण करते दिख रहे हैं।  (फाइल चित्र)


भारतीय और चीनी सेनाओं के बीच गत 6 जून को हुई शीर्ष सैन्य कमांडरों की वार्ता हालांकि किसी निश्चित हल तक नहीं पहुंची, लेकिन इसका अंत एक ‘सकारात्मक’ दृष्टिकोण के साथ हुआ। दोनों पक्ष इस बात पर सहमत दिखे कि पूर्वी लद्दाख में एक महीने से चल रहे गतिरोध को शांतिपूर्ण संवाद के जरिए दूर किया जाए। भारतीय सेना ने स्पष्ट शर्त रखी कि चीनी सेना को वास्तविक नियंत्रण रेखा के पास गत अप्रैल से पहले वाली स्थिति बहाल करनी होगी, साथ ही उसे मई से तैनात की गई अपनी सभी अतिरिक्त टुकड़ि़यों को  वापस बुलाना होगा।

सैन्य स्तर की इस वार्ता से पहले दोनों देशों के बीच कूटनीतिक वार्ता भी हुई थी। उसमें दोनों पक्षों में सहमति बनी थी कि मतभेदों को विवाद में तब्दील करना सही नहीं, मसले का हल दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व के रणनीतिक मार्गदर्शन में शांतिपूर्ण बातचीत के जरिए निकाला जाए। लद्दाख में ताजा गतिरोध मई महीने की शुरुआत में उभरा जब पैगोंग त्सो झील, गलवान घाटी, डेमचोक और दौलत बेग ओल्डी के सभी विवादित क्षेत्रों में चीनी सेना के आक्रामक रुख का सामना करने के लिए भारतीय सेना ने अपना रक्षा कवच मजबूत किया था। तिलमिलाए चीन ने इसी दौरान पैगोंग त्सो झील और गलवान घाटी में करीब 2,500 सैनिक तैनात कर दिए, साथ ही पूर्वी लद्दाख के पास भी सैन्य लामबंदी शुरू कर दी। पैगोंग त्सो इलाके से करीब 180 किलोमीटर दूर नगारी कुंशा के पास स्थित सैन्य एयरबेस को भी वह तैयार करने लगा। चीन इस बात पर तिलमिलाया था कि भारत ने गलवान घाटी में रणनीतिक तौर पर अहम 255 किमी. दुरबुक-श्योक-दौलग बेग ओल्डी सड़क को जोड़ने के लिए एक प्रमुख मार्ग तैयार करने के साथ पैगोंग त्सो झील के आसपास एक महत्वपूर्ण संपर्क रोड क्यों बनाई है।

बहरहाल, ताजा गतिरोध दूर करने के लिए भारत ने निम्नलिखित शर्तें रखी हैं-पहली, किसी भी समाधान की ओर कदम बढ़ाने से पहले चीन को अप्रैल से पहले वाली स्थिति पर लौटना होगा। दोनों तरफ की सेनाओं को पैगोंग त्सो इलाके के विवादास्पद स्थानों से अपनी-अपनी सेनाएं हटानी होंगी। दूसरी, दोनों सेनाओं को चरणबद्ध तरीके से अपनी अतिरिक्त टुकड़ियां, तोपखाने और बख्तरबंद वाहनों को ‘पीछे’ लौटाना होगा। चीन ने इस बार पैगोंग त्सो झील के उत्तरी किनारे पर सेरिजाब में ‘फिंगर-1 से 8’ क्षेत्रों में जिस तरह अपनी सेना की गतिविधि बढ़ाई, उससे भारत हैरान था। भारत की अग्रिम तैनाती ‘फिंगर-4’ पर है, लेकिन हमारे सैनिक वास्तविक नियंत्रण रेखा के अनुसार निर्धारित ‘फिंगर-8’ के अपने इलाके तक गश्त लगाते रहे हैं। हालांकि, गत मई महीने की शुरुआत में ही चीन भारतीय सेना को ‘फिंगर-4’ से आगे गश्त लगाने से रोकने लगा था। उसने सेरिजाब में एक पुराने मार्ग ‘ब्लैक-टॉपिंग’ को भी बंद कर दिया है। भारत को कड़े स्वर में चीन को समझाना होगा कि वह ‘फिंगर-4’ से पीछे लौट जाए और ‘फिंगर-8’ इलाके में भारतीय सैनिकों के गश्त लगाने के अधिकार में अड़ंगा न डाले। 

तीसरी शर्त यह कि, भारत को एलएसी के पास भारतीय इलाके या अपनी जमीन पर सड़क और पुल-निर्माण संबंधी कार्य करने का पूरा हक है और वह चीनी दबाव से समझौता नहीं कर सकता। 255 किलोमीटर दूर दरबूक-श्योक-दौलत बेग ओल्डी सड़क को जोड़ने वाले संपर्क मार्ग और पुल का निर्माण भारत के लिए सामरिक नजरिए से बहुत महत्वपूर्ण है, लिहाजा इस बिन्दु पर झुकने का सवाल ही नहीं उठता। चौथी शर्त यह कि, पीएलए सीमा समझौतों में परस्पर सहमति के बाद हस्ताक्षर करने के बाद भी कई बिन्दुओं, प्रोटोकॉल और दिशानिर्देशों का उल्लंघन करता रहा है। ऐसा गलत है। पैगोंग त्सो में 5-6 मई 2020 को हुई हाथापाई, जिसके दौरान चीनी सैनिकों ने भारतीय सैनिकों पर कील लगी छड़ों और पत्थरों से हमला किया, बर्बर हरकत है और प्रोटोकॉल के खिलाफ भी। पांचवीं शर्त, चीन ने भारत की सीमा के पास हजारों सैनिकों को अचानक तैनात कर दिया, ऐसे में भारत उस पर कैसे भरोसा कर सकता था? जाहिर है, जवाब में भारत का उसके बराबर सैन्य बल तैनात करके अपनी सुरक्षा व्यवस्था चाक-चौबंद करना अनिवार्य था। ऐसी स्थितियों से बचने के लिए चीन को विश्वास का माहौल
बनाना होगा।

रणनीतिक पृष्ठभूमि
जाहिर है, चीन की इस सुनियोजित सैन्य व्यूह रचना का कोई रणनीतिक आयाम होगा। कई विश्लेषकों ने इस बार चीन के भड़कने के कई कारण बताए हैं, जिसमें वैश्विक स्तर पर उभरे विभिन्न घटनाक्रमों की खास भूमिका है। कुछ लोगों के मुताबिक अमेरिका और चीन के बीच भारी मतभेद है, जिसकी बुनियाद है व्यापार संबंधी विवाद। कोविड-19 ने चीन के खिलाफ एक वैश्विक रोष पैदा कर दि़या है, क्योंकि पश्चिमी देश मानते हैं कि चीन ने पिछले साल के अंत में इस महामारी को रोकने में कोई सावधानी नहीं बरती। हांगकांग में भड़के विरोध से निपटने में भी चीनी कार्यशैली को आलोचनाओं का सामना करना पड़ा। दक्षिण चीन सागर में अपने दावों को लेकर चीन सुस्त पड़ चुका है। उधर ताइवान के साथ भी तनाव बढ़ गया है। इसके अलावा सिंक्यांग प्रांत में बिगड़ती स्थिति से भी चीन परेशान है।

इन हालातों में, खासकर महामारी के बाद चीन की छवि स्याह होती जा रही है। दुनियाभर में उसे अलग-थलग करने और दंड देने की मांग बढ़ती जा रही है। आज वह हाशिए पर खिसकता जा रहा है। ऐसे में स्वाभाविक है कि वह खुद को और भी ज्यादा शक्तिशाली दिखाने की कवायद में जुटेगा। इसी सोच के तहत उसने लद्दाख में ऐसा कदम उठाया, जो उसके लिए ताइवान के विवाद का सामना करने और हिन्द-प्रशांत महासागर में अन्य मोर्चे खोलने की तुलना में ज्यादा आसान था।

भारत की सीमा रक्षा में मजबूती
चीन की चिंता का कारण और भी है। 2014 के बाद से भारत ने सीमा सुरक्षा पर पैनी निगरानी और खास तैयारी शुरू करते हुए अपने तेवर बदले हैं, जिससे चीन तिलमिला उठा है। चीन पिछले दशकों के दौरान भारत के ‘ढुलमुल’ रवैये का अभ्यस्त रहा है। लेकिन, 2014 के बाद केन्द्र में भाजपा सरकार के नेतृत्व में भारत ने नियंत्रण रेखा पर चीनी टुकड़ियों की मनमानी गतिविधियों पर 'कड़ा रुख' जताना शुरू कर दिया, जिससे झड़पों की संख्या बढ़ने लगी। जो घुसपैठ पहले एक महीने में एकाध बार होती थी, अब करीब-करीब रोज होने लगी। वर्षों से चीनी सैनिक इस मुगालते में जी रहे थे कि वे भारतीय सैनिकों पर अपनी धौंस चला सकते हैं। पर कमांडरों की वार्ता में भारतीय सेना का नया रुख, किसी भी आक्रामकता का जवाब देने की चुस्त और मजबूत तैयारी देख चीन हैरान-परेशान हो उठा है। लद्दाख में सड़कों और बुनियादी ढांचे पर भारत की चरणबद्ध निर्माण गतिविधियों से उसकी नींद उड़ गई है। इसलिए वह भारत पर नियंत्रण रेखा में बदलाव करने का आरोप लगा रहा है। दुर्गम भौगोलिक चुनौतियों के बावजूद  बीआरओ 2014 से लद्दाख में सड़क निर्माण गतिविधियों को तेजी से पूरा करने में जुटा है।

 चीन का व्यापक अतिक्रमण

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लद्दाख में अब चीन की किसी भी आक्रामकता का जवाब देने में सक्षम है भारत की सेना  (फाइल चित्र)

पूर्वी लद्दाख में सीमा पर मौजूदा टकराव का इतिहास लंबा है और अक्सर समाचारों की सुर्खियां बनता रहा है। यह मुद्दा वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) से लगी लंबी विवादित सीमा को स्पष्ट निर्धारित करने से नहीं जुड़ा, बल्कि चीन के हमारी जमीन के एक बड़े टुकड़े पर अतिक्रमण से संबंधित है, जो 1960 के दशक से विवाद खड़ा करता रहा है। पूर्व की केन्द्र  सरकारों ने लद्दाख को ज्यादातर उपेक्षित रखा था। इसकी बागडोर जम्मू-कश्मीर राज्य के हाथ में दे रखी थी जो इसकी सीमा की रक्षा प्रणाली को कमजोर करने का बड़ा कारण बना। पिछली सरकारों ने इस इलाके में बुनियादी ढांचे के विकास को कोई खास तरजीह नहीं दी। सितंबर, 2009 में मीडिया की सुर्खियों में छाई जम्मू-कश्मीर सरकार की एक रिपोर्ट में बताया गया कि चीनी भारतीय जमीन, खासकर पूर्वी लद्दाख के स्काकजंग क्षेत्र में छोटे-छोटे हिस्सों पर कब्जा करते जा रहे हैं।

1950 और '60 के दशक में अक्साई-चिन (चांग-चेनमो के पूर्व में स्थित) और मेन्सर गांवों को हथियाने के बाद भी चीनियों को संतोष नहीं हुआ था और उनकी नजर पूर्वी लद्दाख के हिस्सों पर भी थी। जमीनी तथ्योंं का बारीकी से अध्ययन करने पर पता चलता है कि 1962 के बाद भी जम्मू—कश्मीर प्रशासन ने अपने क्षेत्र की रक्षा प्रणाली के विकास के लिए कोई व्यापक कदम नहीं उठाए, न ही चीन को लद्दाख में चांगपास चारागाह में अतिक्रमण करने से रोका। सबसे महत्वपूर्ण दुमत्सेले और देमचोक के बीच का करीब 45 किलोमीटर क्षेत्र स्काकजंग, जो लेह से 300 किलोमीटर पूर्व में स्थित है, परंपरागत रूप से चुशुल, त्सगा, निडार, न्योमा, मड, डुंगती, कुयुल, लोमा सहित कई गांवों के मवेशियों के लिए एकमात्र शीतकालीन चारागाह है।


करनी होगी महत्वपूर्ण पहल
वक्त आ गया है कि हम रक्षा तैयारी में स्थानीय कारकों को नजरअंदाज न करें और बिना वक्त गंवाए निम्नलिखित फैसले लें-
  • लेह माफीज खाना में मौजूद प्रामाणिक जम्मू और कश्मीर राजस्व मानचित्र (संवत् 1958) सभी कार्यों के लिए प्रयोग किया जाए।

  • केंद्र शासित लद्दाख का प्रशासन पूर्वी लद्दाख (चुमुर से कराकोरम तक) की सारी निर्जन भूमि को कृषि, बागवानी और अन्य आर्थिक गतिविधियों के लिए लेह जिले के लोगों में बांट दे।

  • सरकार पूर्वी लद्दाख में मजबूत बुनियादी ढांचों, जैसे हवाई अड्डे, सड़कों आदि का निर्माण करे। 

  •  स्थानीय अधिकारी उन निर्जन इलाकों में लोगों को उपयुक्त कानूनी स्वामित्व के साथ बसाना शुरू करें और इन इलाकों को खाली न छोड़ें।

  • सरकार को वर्तमान में लेह में (खारंग-लिंग बसाहट) बसे चांगपा घुमंतू पशुपालकों को अपने सीमावर्ती क्षेत्रों में लौटने और चांगरा बकरियों और याकों के परंपरागत मवेशी पालन व्यवसाय को पुनर्जीवित करने के लिए प्रोत्साहन और सहायता देनी चाहिए।

  •  सुरक्षा बलों को निर्देशित किया जाए कि वे सीमांत क्षेत्रों में स्थानीय चरवाहों को अपनी बकरियों को चराने से न रोकें। 

  •  स्थानीय सरकार के साथ-साथ अन्य संबंधित एजेंसियां जंगलों की तादाद बढ़ाएं और घास रोपने के काम को प्रोत्साहित करें। 

  • नीति आयोग क्षेत्र विकास के लिए भारतीय सेना, सीमा सड़क संगठन और डीआरडीओ की मदद से एक रक्षा-विकास योजना तैयार करे।

  • भारतीय वायु सेना नागरिक और सैन्य उपयोग, दोनों के लिए फुकवे हवाई अड्डे को फिर से चालू किया जाए। 
  • पुराने चुशूल हवाई अड्डे को फिर से चालू किया जाए, उसे अत्याधुनिक बनाया जाए। 

  • भारतीय सेना और पीएलए, दोनों को दुमत्सले और देमचोक जैसे विशिष्ट स्थानों पर सीमा के आर-पार चल रहे व्यापार को वैध बनाने के विचार पर फिर से चर्चा करनी चाहिए जो फिलहाल अवैध माना हुआ है। 

  • भारत को हेमिस मठ (अन्य इच्छुक गैर-सरकारी संगठनों) को देमचोक में अपने क्षेत्र में एक बड़ा द्वार ग्यास-गो-वांगचुक-चेंगो या शिव-द्वार बनाने की अनुमति देनी चाहिए ताकि यह इलाका अमरनाथ की तरह एक तीर्थ स्थल के रूप में विकसित किया जा सके।



भारत के कदम और चीन की प्रतिक्रिया
पिछले साल जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को केन्द्र शासित प्रदेश बनाने का भारत सरकार का फैसला चीन के रोष का कारण बन गया। जाहिर है, मौजूदा विवाद कोई रणनीतिक चाल है या चीन और पाकिस्तान मिल कर कोई व्यूह रच रहे हैं। पिछले साल, अगस्त में यह मुद्दा पाकिस्तान-चीन के संयुक्त बयान में उठाया गया था। चीन भारत को गलवान घाटी में श्योक घाटी की ओर धकेलने की कोशिश कर रहा है। संभवत:, उसे डर है कि दक्षिण एशिया में पाकिस्ताान से गुजरने वाली चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (सीपीईसी) और नेपाल से गुजरते बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरई) जैसी उसकी कई प्रमुख क्षेत्रीय संपर्क मार्ग परियोजनाएं प्रभावित न हो जाएं। चीन ने अवैध रूप से हमारे अक्साई चिन पर कब्जा कर रखा है।

अब वह तीन नदियों-श्योक, गलवान और चांग-चेनमो वाले जल समृद्ध क्षेत्रों का रुख कर रहा है। वह एक सधी और स्पष्ट रणनीति और लक्षित उद्देश्य के साथ एक बड़ी तस्वीर पर ध्यान केंद्रित किए हुए है। अभी उसके सारे संपर्क मार्ग कराकोरम घाटी के उत्तर में हैं जहां से सीपीईसी गुजरता है।

वह सियाचिन ग्लेशियर के उत्तर में ताशकुरगन में एक नया हवाई अड्डा बना रहा है।  लद्दाख को केन्द्र शासित प्रदेश घोषित करने और लद्दाख में आधारभूत संरचना और संपर्क मार्गों का निर्माण करने का निर्णय लेने के बाद, चीन को बराबरी की टक्कर देने के लिए भारत को अपने रणनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए मजबूत कदम उठाने होंगे। खासकर, अपने व्यापार को सिंक्यांग प्रांत की मजार घाटी में कराकोरम से आगे बढ़ाने के प्रयास करने होंगे, पुराने लेह-काशगर सिल्क मार्ग को पुन: बहाल करना होगा।

लिपूलेख मार्ग के जरिए हमें तिब्बत के साथ अपने पारंपरिक तीर्थयात्रा और सीमा व्यापार मार्गों को फिर से खोलने पर जोर देना चाहिए। वास्तविक नियंत्रण रेखा के संबंध में सालों से चर्चा हो रही है। पर हम सिर्फ गिलगित—बाल्टिस्तान पर प्रतिक्रिया देते हैं, अक्साई चिन का जिक्र नहीं करते। अक्साई चिन संबंधी अधिकार क्षेत्र पर बात करने से यह परहेज क्यों?

चीन इसे अपने सिंक्यांग क्षेत्र का हिस्सा  बताता है। अब समय आ चुका है कि सिर्फ पाकिस्तान अधिक्रांत कश्मीर पर ही नहीं, बल्कि चीन के अवैध कब्जे में हमारे अक्साई चिन संबंधी अध्याय को भी खंगाला जाए। 
(लेखक पूर्व राजदूत और सुरक्षा मामलों के विशेषज्ञ हैं)