जम्मू-कश्मीर: प्रशासनिक परिवर्तन से टूटता आतंकी तंत्र, आतंकियों को चुन-चुन कर ढेर कर रहे सुरक्षाबल

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कश्मीरी इस्लामिक अलगाववादियों और कुछ राजनीतिक दलों के शक्ति विहीन होने से आतंकियों से नैतिक, सामाजिक, राजनीतिक और मजहबी सहानुभूति रखने वालों की संख्या भी लगातार कम होती जा रही है। इसका कारण है कि कुछ समय से पुलिस और प्रशासन इस्लामिक लोकतान्त्रिक व्यवस्था के जिहादी दबाव से मुक्त होकर राष्ट्रहित में कार्य कर पाने में सक्षम हुआ है।

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तड़के सुबह शोपियां में हुई मुठभेड़ में सुरक्षा बलों ने 3 आतंकियों को मार गिराया। अकेले इस महीने ही हमारे सैनिकों ने घाटी में अब तक 17 आतंकियो को मार गिराया है। यकीनन सेना की आतंकरोधी ग्रिड के साथ-साथ ग्रामों, उपनगरों और नगरों में पुलिस की सख्ती से उनका जन सहायता तंत्र भी कमजोर हुआ है। कश्मीरी इस्लामिक अलगाववादियों और कुछ राजनीतिक दलों के शक्ति विहीन होने से आतंकियों से नैतिक, सामाजिक, राजनीतिक और मजहबी सहानुभूति रखने वालों की संख्या भी लगातार कम होती जा रही है।

इसका कारण है कि कुछ समय से पुलिस और प्रशासन इस्लामिक लोकतान्त्रिक व्यवस्था के जिहादी दबाव से मुक्त होकर राष्ट्रहित में कार्य कर पाने में सक्षम हुआ है। इस कड़ी में जम्मू-कश्मीर पुलिस के एक ऐसे अधिकारी की भी गिरफ्तारी हुई जो धन के बदले आतंकियों की सहायता कर रहा था। ऐसे ही अनेक पाक परस्त राज्य कर्मचारी इस्लामिक आतंकियों के खुलकर प्रबल समर्थक थे।

कश्मीर के सरकारी कार्यालयों में खुलकर आतंकियों और उनके संगठनों का महिमामंडन होता था। भारतीय सेवा के प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों को सरकार के सभी महत्वपूर्ण विभागों और कार्यों से दूर रखा जाता था जिससे कि गलत कार्यों को सरलता से किया जा सके। ऐसे वातावरण में एक ऐसा तंत्र विकसित हुआ जो इस्लामिक आतंक की वृद्धि में सहायक सिद्ध हुआ।
 
5 अगस्त, 2019 को कश्मीर से अनुच्छेद—370 और 35 A के निष्प्रभावी होने और जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को केंद्र शासित राज्य बनाने से इस्लामिक आतंक की जड़ें उखड़ना आरंभ हो गयी। राष्ट्र विरोधी इस्लामिक शासन तंत्र की समाप्ति के साथ-साथ राजनीतिक आतंकी संरक्षण भी समाप्त हुआ। आतंकियों के परिवारी जनों को नौकरी और ठेके देने की परिपाटी का अंत हुआ। आतंकी जनाजा आंदोलन और भीड़ आतंकवाद से मुक्ति मिली। कश्मीरी खिलाफत को समय रहते ध्वस्त कर दिया गया। आज सुरक्षा बलों को सैन्य अभियानों को सम्पन्न करने की पूर्ण रणनीतिक स्वतन्त्रता है। बड़े घेराबंदी और खोजी अभियानों से होती दैनिक असुविधा से जनसाधारण पर भी आतंकियों को शरण न देने का दबाव है। सहयोगियों के विरुद्ध भी दंडात्मक कार्रवाई का भय है।

आज किसी छोटे या बड़े आतंकी कार्य के लिए समुचित दंड है, अन्यथा छोटी आतंकी गतिविधियों से ही बड़े आतंक का जन्म होता है। पूर्व की इस्लामिक लोकतान्त्रिक सरकारों की नीति पूर्ण रूप से आतंकियों के समक्ष समर्पण और सहयोग की थी। इस्लामिक कट्टरता और आतंक के साथ सहयोग उनकी राजनीतिक विवशता थी।
 
कश्मीर में आज इस्लामिक आतंक और उसके पाकिस्तानी पोषक दोनों ही बौखलाए हुये हैं और उसी छटपटाहट में उन्होंने 8 जून को एक हिन्दू सरपंच अजय पंडिता की दक्षिण कश्मीर के अनंतनाग में गोली मारकर कर हत्या कर दी। पूरी कश्मीर घाटी में आज कुछ गिने चुने हिन्दू परिवार ही शेष हैं परंतु जिहादियों का लक्ष्य तो एक-एक काफिर का अंत है। यकीनन इससे पहले कश्मीर से इस्लामिक आतंक के सभी स्वरूपों को चिन्हित कर समूल नष्ट करने की आवश्यकता है। यकीनन इस वर्ष कई बड़े आतंकी सरगनाओं का अंत हुआ। परंतु अब तक 48 नई जिहादी भर्तियां सुरक्षा एजेंसियों को चिंतित करने वाली हैं।
 
अफगानिस्तान से अमेरिकी वापसी और वहां पाकिस्तान के प्रोक्सी तालिबान की मजबूती कश्मीर में भारत के लिए चिंताजनक है। पाकिस्तान सैकड़ों अफगानिस्तान प्रशिक्षित और युद्ध अनुभवी जिहादियों को कश्मीर भेजने की फिराक में है। एक खुफिया अनुमान के अनुसार इस समय लगभग 300 आतंकी पाक अधिक्रांत कश्मीर में नियंत्रण रेखा से कश्मीर में घुसपैठ के लिए प्रतीक्षारत हैं। ऐसे में कश्मीर में आतंकियों के साथ-साथ उसके आधारभूत ढाँचे को समाप्त करना भी आवश्यक है। यह आधारभूत ढाँचा जिहादी विचारधारा से लेकर ओवर ग्राउंड वर्कर्स के रूप में सक्रिय है।

नयी प्रशासनिक व्यवस्था और सुरक्षा एजेंसिया काफी हद तक इस तंत्र को निष्क्रिय करने में सफल हुयी हैं। परंतु दशकों की गंदगी को 10 महीनों में ही समाप्त कर पाना आसान नहीं है। कश्मीर में कर्तव्यनिष्ठ और देशभक्त भारतीय सेवा के प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों की नितांत आवश्यकता है।