सामाजिक दरार पैदा करने वाली पत्रकारिता

    दिनांक 16-जून-2020
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सेकुलर मीडिया दलाली के साथ-साथ समाज में दरार पैदा कर रहा है। 
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दिल्ली के हिंदू विरोधी दंगों में आरोपपत्र न्यायालय में दाखिल करने का काम चल रहा है। पुलिस पूरी जांच-पड़ताल के बाद वैज्ञानिक साक्ष्यों के साथ गिरफ्तारियां कर रही है। इसके बाद भी मीडिया का एक वर्ग किसी दंगाई के गर्भवती होने, तो किसी के छात्र होने के नाम पर सहानुभूति पैदा करने की कोशिश कर रहा है। ठीक उसी तरह जैसे कश्मीरी आतंकी सरगनाओं की पहचान ‘गणित के टीचर’ के तौर पर करने की कोशिश होती है। आरोपियों में सभी वर्ग के लोग शामिल हैं, लेकिन मीडिया का सहज झुकाव एक खास मजहब के लिए है। हाल ही में गिरफ्तार एक आरोपी खालिद सैफी की तमाम पत्रकारों के साथ तस्वीरें देखकर समझना कठिन नहीं है कि सहानुभूति का कारण क्या है। खालिद सैफी ने ही दंगों के लिए पैसे का बंदोबस्त किया था। इसमें हैरानी नहीं होनी चाहिए कि पैसों का एक हिस्सा मीडिया तक भी पहुंचा हो।

यौन शोषण के आरोपी विनोद दुआ अब जमानतशुदा भी बन गए हैं। उन्होंने अमेरिका की तर्ज पर भारत में भी हिंसा के लिए मुसलमानों को उकसाने की कोशिश की थी। फिलहाल वे इस मामले में जमानत पर छोड़ दिए गए हैं। विनोद दुआ के खिलाफ शिकायत एक पूर्व पत्रकार ने ही की थी। लेकिन कांग्रेस की जेबी पत्रकारीय संस्थाओं ने इसे अभिव्यक्ति की आजादी का मुद्दा बनाने की कोशिश की। लेकिन बंगाल, छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र में पत्रकारों पर दर्ज किए जा रहे फर्जी मुकदमों और उनकी प्रताड़ना पर अब तक वे बोल नहीं सके।

 जाति के आधार पर हिंदुओं को बांटने के लिए झूठी खबरों की फिर से बाढ़ आ गई है। ‘द टेलीग्राफ’ ने छापा कि उत्तर प्रदेश के अमरोहा में एक दलित को मंदिर जाने पर गोली मार दी गई। मामला दो ‘बिजनेस पार्टनर’ के बीच झगड़े का था। पुलिस और स्थानीय लोगों ने भी मंदिर या किसी जातीय कोण का खंडन किया। लेकिन देखते ही देखते यह समाचार आजतक समेत पूरे प्रोपोगेंडा नेटवर्क पर छा गया। इस मामले में ‘द वायर’ की एक जिहादी पत्रकार के खिलाफ पुलिस कार्रवाई की खबरें हैं। जरूरत है कि इस पूरी साजिश को समझा जाए और इसकी जड़ों पर प्रहार किया जाए। पत्रकारिता के नाम पर इस तरह समाज में दरार डालने वालों पर कार्रवाई जरूरी है। उनकी नीयत को आप इसी से समझ सकते हैं कि दो दिन बाद जब उत्तर प्रदेश के ही जौनपुर में दलितों की एक बस्ती मुसलमानों ने जला दी, तो सबने मुंह बंद कर लिया। मुख्यधारा के अधिकांश मीडिया संस्थानों ने आरोपियों की पहचान ‘दबंग’ के तौर पर बताई। प्रदेश सरकार की दंडात्मक कार्रवाई को भी ज्यादा तूल नहीं दिया गया।

लद्दाख सीमा पर तनाव के बीच भारतीय मीडिया का एक वर्ग लगातार ऐसी अफवाहें फैला रहा है जिनका स्रोत निश्चित रूप से चीन है। शेखर गुप्ता की प्रोपोगेंडा वेबसाइट ने तो दोनों देशों की सेनाओं की बातचीत के ठीक पहले एक ऐसा लेख प्रकाशित किया जिसका उद्देश्य देश के मनोबल को गिराना था। इसी तरह ‘द वायर’ ने हथियारों की दलाली के लिए संदिग्ध रहे कांग्रेस के करीबी पत्रकार के लेख के जरिए दावा किया कि चीन भारत के अंदर तक घुस आया है। यह स्थिति तब है जब सेना लगातार इसका खंडन कर रही है। हद हो गई तब रक्षा मंत्रालय को एक बयान जारी करके मीडिया को अपुष्ट समाचार देने से बाज आने को कहना पड़ा। ब्रिटिश सरकार की एजेंसी बीबीसी की संदेहास्पद हरकतें लगातार जारी हैं। यह मुख्यतया फर्जी खबरों की ‘फैक्ट्री’ बन चुकी है। ज्यादातर खबरें वे होती हैं जिन्हें भारत की संप्रभुता पर हमला माना जा सकता है। बीबीसी ने सूचना और प्रसारण मंत्रालय की ‘फैक्ट चेक विंग’ के खिलाफ रिपोर्ट छापी और लिखा कि ऐसा पत्रकारों पर दबाव बनाने के लिए किया जा रहा है? चूंकि बीबीसी और उसके जैसी दूसरी फेक न्यूज वेबसाइटों की तरफ से फैलाई जा रही अफवाहों की पीआईबी तेजी से पोल खोल रहा है इसलिए अब वह उनकी आंखों में खटकने लगा है।

दिल्ली में चायनीज वायरस संक्रमण से पैदा स्थिति पर लंबे समय तक पर्दा डालने वाले चैनल और अखबार अचानक नींद से उठे हैं। वरना 2-4 दिन पहले तक ही लोग सोशल मीडिया पर दर्द बता रहे थे और मुख्यमंत्री पत्रकारों को ‘हेयरकट के मजे’ दिला रहे थे। इंडिया टीवी ने इस अघोषित सेंसरशिप का बोझ उतारकर अस्पतालों का हाल दिखाया। कुछेक दूसरे चैनलों और अखबारों ने भी दिल्ली की सही स्थिति बताना शुरू की है। आज अगर स्थिति बद से बदतर हो चुकी है तो इसमें सरकार के साथ-साथ उस मीडिया की भी भूमिका है जिसने लाखों-करोड़ों के विज्ञापनों के लालच में केजरीवाल सरकार के आगे आत्मसमर्पण करने को अपनी आदत बना लिया है।