सरकार बीमार है!

    दिनांक 16-जून-2020
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डॉ. राजेन्द्र ऐरन

दिल्ली में कोरोना का संकट लगातार गहराता जा रहा है। ऐसी स्थिति में भी राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र की आम आदमी पार्टी सरकार तुच्छ राजनीति से बाज नहीं आ रही है। अपनी नाकामी का ठीकरा कभी वह अस्पतालों पर फोड़ रही है तो कभी आंकड़ों में हेरफेर करके मरीजों की तादाद कम दिखा रही है

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दिल्ली के गुरु तेग बहादुर अस्पताल के बाहर मरीजों के परिजन। प्रकोष्ठ में मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल

कोरोना महामारी के इस संकट काल में दिल्ली चर्चा के केंद्र में है पर, दुर्भाग्य से, एक के बाद एक विनाशकारी निर्णयों के कारण। दिल्ली की केजरीवाल सरकार के अनेक निर्णय इस आपदा को और बढ़ाने का काम कर रहे हैं। 10 जून की सुबह तक 31,309 मरीजों और 905 मौतों के साथ दिल्ली देश मे सर्वाधिक प्रभावित 3 राज्यों में से एक बनी हुई है। जनमानस में एक भय पैदा हो रहा है जो मानसिक स्वास्थ्य को तो नुकसान पहुंचा ही रहा है, साथ ही कार्यक्षमता को भी लंबे समय तक प्रभावित करने वाला है। केजरीवाल सरकार के तुगलकी फरमान देश के संवैधानिक ढांचे को भी नुकसान पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं। पूरे देश और दुनिया की निगाहें राजधानी दिल्ली पर हैं कि वह इस आपदा से कैसे निपट रही है, लेकिन ऐसे में केजरीवाल सरकार अपने निर्णयों से राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि को धूमिल कर रहे हैं। कैसे, आइए इसको विस्तार से समझते हैं।

दिल्ली के अस्पताल दिल्ली वालों के लिए

7 जून 2020 को केजरीवाल सरकार ने आदेश जारी किया कि दिल्ली के सरकारी और निजी अस्पतालों में केवल दिल्ली के निवासियों का इलाज होगा। लेकिन अगले ही दिन उपराज्यपाल ने वह फरमान पलटकर अस्पताल की सुविधा देश के सब नागरिकों के लिए कर दी। उल्लेखनीय है कि संविधान के अनुच्छेद 21 में स्वास्थ्य को नागरिकों का मौलिक अधिकार बताया गया है। इसमें कहा गया है कि यह सरकार का केवल नैतिक ही नहीं बल्कि कानूनी कर्त्तव्य भी है कि वो अपने नागरिकों को वह अपने नागरिकों को मुफ्त और सही चिकित्सा, दवाइयां और अस्पताल की अन्य सुविधाएं उपलब्ध करवाये। इसी के आधार पर दिल्ली उच्च न्यायालय की दो जजों की पीठ ने एक फैसले में कहा था कि प्रत्येक नागरिक को एक गरिमापूर्ण सार्थक जिंदगी जीने का पूरा अधिकार संविधान देता है।

इसके बावजूद केजरीवाल सरकार का वह आदेश दिया जाना समझ से परे है। 7अप्रैल 2020 को राजधानी के बैंक्वेट हॉल, धर्मशालाओं का उपयोग करते हुए 10,000 बिस्तरों की तैयारी की बात भी केजरीवाल सरकार ने की थी। साफ है कि केजरीवाल सरकार लॉकडाउन के दो महीनों से अधिक समय का सदुपयोग स्वास्थ्य सुविधाओं में सुधार करने में नाकाम रही। इसलिए वह अपनी नाकामियों को इस प्रकार के गैर संवैधानिक आदेश से छुपाना चाहती थी। अगर सभी राज्य सरकारें ऐसे निर्णय करने लगें तो हमारे देश में केंद्र और राज्य सरकारों के आपसी सम्बंध कितने तनावपूर्ण हो जाते। केजरीवाल का यह फैसला एक तरफ जनता को बेवकूफ बनाने के लिए था तो दूसरी तरफ वे संवैधानिक संकट खड़ा करना चाहते थे, सिर्फ अपनी असफलता को छुपाने के लिये।

कोई मरीज केवल मजबूरी में ही अपने घर से दूर इलाज करवाता है और इस समय हमें ना केवल कोरोना बल्कि अन्य रोगों से भी हमारे नागरिकों की जान बचानी है। अगर दिल्ली का प्रत्येक अस्पताल इलाज के पहले मरीजों के दिल्ली के मूल निवासी होने के कागज जांचता तो इलाज कम होता, कागजी खानापूर्ति में समय ज्यादा बर्बाद होता।

बिना लक्षण कोविड-19 की जांच नहीं

दूसरा बेतुका आदेश केजरीवाल सरकार ने गत 3 जून को पारित किया था। कैसे, आइए, इसे समझें। विश्व स्वास्थ्य संगठन, भारत सरकार की कोरोना से लड़ाई में नोडल एजेंसी इंडियन काउंसिल आफ मेडिकल रिसर्च और भारत का स्वास्थ्य मंत्रालय जिन घटकों पर जोर दे रहा  है, वे हैं जांच, ‘ट्रेसिंग’, इलाज, ‘आइसोलेशन’। इन्हीं को आधार बनाकर केजरीवाल ने कोरोना से लड़ाई की शुरुआत में गत 7अप्रैल को अपनी ‘5 टी’ योजना के तहत ‘टेस्टिंग, ट्रेसिंग, ट्रीटमेंट, टीमवर्क और ट्रैकिंग एवं मोनिटरिंग’ को प्रमुख 5 हथियार माना था। हाल ही में न्यूजीलैंड सरकार ने इसी रणनीति को अपनाते हुए कोरोना को न्यूजीलैंड से खत्म कर दिया है। वहां पिछले 19 दिन से कोई नया कोरोना का मरीज नहीं मिला है। पर यहां जब केजरीवाल सरकार अपनी वैज्ञानिक तरीकों की तैयारी में बुरी तरह नाकाम हो गई तो उसने कोरोना के मरीजों की संख्या कम दिखाने की चाल चली।

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लॉकडाउन के दौरान दिल्ली में खुलीं शराब की दुकानों पर इस तरह लंबी कतारें लग गर्इं। (फाइल चित्र)


सलाह दी कि बिना लक्षणों के लोगों, डाक्टरों तथा स्वास्थ्यकर्मियों की जांच मत करो। सीधा सा गणित था कि जब जांच नहीं होगी तो मरीज भी कम ही होंगे। पर इस आदेश ने डॉक्टरों और अन्य स्वास्थ्यकर्मियों में एक भय और अविश्वास का माहौल बना दिया। इस बीमारी में जिस परिवार में एक कोरोना का मरीज हो जाये तो उसके परिजनों, पड़ोसियों की मानसिक हालात का अंदाजा लगाया जा सकता है। लेकिन अगर जांच ही नहीं हो तो सिर पर लटकती तलवार के साये में 15 से 20 दिन जीने की कल्पना से ही सिहरन होने लगती है। अगर इन बिना जांच वाले व्यक्तियों में कोई अन्य रोग हो, जैसे कि दिल, किडनी, कैंसर इत्यादि तो बगैर इन मरीजों की कोरोना सम्बंधी जानकारी के इलाज कहां हो?

कोविड अस्पताल में या सामान्य अस्पताल में? इन मरीजों से दूसरे मरीजों में कोरोना संक्रमण न फैले, इसकी व्यवस्था कैसे होगी? ‘लैंसेट’ में छपे एक लेख के मुताबिक जो मरीज कोरोना संक्रमित हैं, उनमें 30 दिन के भीतर आॅपरेशन के बाद मृत्यु दर 23.8 फीसदी और फेफड़ों सम्बंधी जटिलताओं की दर 51.2 फीसदी होती है। ये दोनों दरें इतनी अधिक हैं कि बगैर कोरोना की स्थिति जाने आॅपरेशन करना मरीज को मौत के मुंह में धकेलने के समान है।

ध्यान दीजिए, चिकित्सा जगत में उपलब्ध संसाधनों (जांच, इलाज, उपकरण, दवाओं इत्यादि) का कैसे सर्वश्रेष्ठ उपयोग हो सकता है, जब इसका निर्णय किसी चिकित्सक के बजाय कोई प्रशासनिक अधिकारी या राजनेता करता है तो हम बहुत सारे व्यक्तियों को मौत के मुंह मे धकेल देते हैं। इस अमानवीय आदेश के खिलाफ कई मरीजों, डॉक्टरों ने दिल्ली उच्च न्यायालय का रुख किया। दिल्ली के उपराज्यपाल ने अपनी शक्तियों का उपयोग करते हुए जनहित में इस आदेश को पलट दिया।

बिना तैयारी के जारी किया एप

दिल्ली सरकार ने गत 2 जून को कोरोना से लड़ने के लिये एक एप जारी किया, जिसका मुख्य उद्देश्य जनता को यह बताना था कि किस अस्पताल में कितने बिस्तर खाली हैं। पर यह बिना तैयारी के जारी किया गया था, जिसमें एप में खाली और भरे हुए बिस्तरों की संख्या देखकर जब मरीजों के परिजन मरीज को लेकर अस्पताल पहुंचते तो स्थिति वैसी नहीं होती थी। परिजन एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल में धक्के खाने को मजबूर होते रहे। जब इस बारे में जानकारी ली गई तो केजरीवाल ने अस्पतालों पर दोषारोपण करते हुए कहा कि कुछ अस्पताल बिस्तरों की कालाबाजारी कर रहे हैं। साथ ही उन्होंने यह भी माना कि इस एप की यह शुरूआत है अत: कुछ कमियां होंगी। जब अस्पताल प्रबंधन से बात की गई तो उनका कहना था कि वे एप में बिस्तरों की स्थिति की जानकारी सीधे नहीं भर सकते, उनको सरकार को जानकारी देना होती है और सरकार ही अपने तरीके से यह जानकारी एप पर डालती है। इस प्रकार के बगैर तालमेल के एप को जारी करके दिल्ली सरकार ने जनता को सुविधा के बजाय मुश्किल में डाला। इस कमी ने कई मरीजों को मौत के मुंह में धकेल दिया।

आंकड़ों से छेड़छाड़
दिल्ली सरकार ने एक तरफ तो मरीजों के आंकड़े कम दिखाने के लिये जांच को कम करने की कोशिश की, दूसरी तरफ मौत के आंकड़ों से छेड़छाड़ की। कोशिश की कि मृत्यु दर कम दिखे, पर अस्पतालों में क्षमता से ज्यादा भरे मुर्दाघर, जहां लाशें जमीन पर एक के ऊपर एक रखी हुई दिखीं। अंतिम संस्कार स्थलों पर पूरी ताकत से अंतिम संस्कार करा देने के बाद भी सच्चाई छुपाने के लिये सरकार ने पूरी ताकत लगा दी। आशय था कि आरोप अस्पतालों पर लगा दें कि वे आंकड़े उपलब्ध नहीं करवा रहे हैं।

डॉक्टरों और अस्पतालों से ठाना वैर 
केजरीवाल सरकार ने इस महामारी से लड़ाई में प्रमुख भूमिका निभाने वाले डॉक्टरों और अस्पतालों को विश्वास में लेकर एक सकारात्मक माहौल में काम करने के लिये तैयार करने के बजाय उनसे सख्ती करने की रणनीति बनाई जिसने पूरे चिकित्सा जगत में अविश्वास और डर का माहौल बना दिया। गत 5 जून को अस्पताल प्रबंधकों के साथ बैठक मे मुख्यमंत्री केजरीवाल ने चिन्हित अस्पतालों में 20 फीसदी बिस्तर कोरोना के मरीजों के लिये आरक्षित रखने के लिये धमकाते हुए कहा कि अगर सरकार के आदेशों का पालन नहीं किया तो सरकार उस अस्पताल को अधिग्रहित कर लेगी। सर गंगाराम अस्पताल को एक मामूली तकनीकी खामी, कि अस्पताल कोरोना जांच के आंकड़े जिस प्रारूप में भेज रहा है वह प्रारूप सरकारी प्रारूप से अलग है, के चलते निशाना बनाया गया। इसकी प्रतिक्रियास्वरूप 3 जून से सर गंगाराम अस्पताल में कोरोना जांच बन्द हो गई। दिल्ली मेडिकल एसोसिएशन ने सरकार के फैसले की आलोचना करते हुए कहा कि ऐसी परिस्थितियों में काम करना बेहद मुश्किल होगा। यहां यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि निजी अस्पतालों में कोरोना के लिये चिन्हित बिस्तरों में सबसे ज्यादा बिस्तर इसी अस्पताल में हैं।

‘आआपा’ के प्रवक्ता राघव चड्डा ने राममनोहर लोहिया अस्पताल पर गलत जांच रिपोर्ट देने का आरोप चस्पां कर दिया। उन्होंने कहा कि राममनोहर लोहिया अस्पताल की 30 पॉजिटीव मरीजों की दोबारा रिपोर्ट करवाई गई जिनमें से 12 नेगेटिव निकले और 2 की रिपोर्ट बिना निष्कर्ष की आई। इसके जवाब में राममनोहर लोहिया अस्पताल प्रबंधन ने कहा कि दोनों नमूनों में 7 से 14 दिनों तक का फर्क था, जिसके कारण रिपोर्ट नेगेटिव आ सकती है। राममनोहर लोहिया अस्पताल की रिपोर्ट की प्रामाणिकता अकाट्य और नेशनल सेंटर फॉर डिसीज कंट्रोल द्वारा भी

समर्थित है। इस प्रकार केजरीवाल सरकार ने सही मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए अनावश्यक विवाद पैदा किया। जब कानून के विशेषज्ञों की राय ली गई कि जिस महामारी कानून—2005 की धाराओं और संविधान की धारा 188 का डर दिखाकर अस्पतालों को धमकाया जा रहा है उसमें सजा का क्या प्रावधान है। इसमें अधिकतम 6 महीने की जेल या 1000 रुपये का जुर्माना लगाया जा सकता है और वह भी लंबी पेचीदा कानूनी प्रक्रिया के बाद। अत: केजरीवाल सरकार डॉक्टरों और अस्पतालों को डराने का काम कर रही है। इसके बजाय अगर वह डॉक्टरों और अस्पतालों में एक विश्वास बनाकर उनका सहयोग ले तो कोरोना से लड़ाई आसान होगी। दिल्ली सरकार के एप के अनुसार ही सरकारी अस्पतालों में कोरोना के लिये चिन्हित अधिकांश बिस्तर खाली हैं और निजी अस्पतालों के अधिकांश बिस्तर भरे हुए हैं तो क्यों नहीं वह सरकारी अस्पतालों के बिस्तरों को प्राथमिकता से भरे, उसके बाद निजी अस्पतालों से सहयोग ले। ताजा आदेश के द्वारा दिल्ली के प्राइवेट के लगभग 7500 बिस्तरों में से अलग-अलग अस्पतालों में अलग-अलग हिसाब से लगभग 50 फीसदी बिस्तर कोरोना के लिए आरक्षित कर दिये हैं। इसका खामियाजा ये होगा कि दूसरी बीमारियों के मरीजों को बिस्तर नहीं मिल पाएंगे और वे असमय बिना चिकित्सा के मौत के मुंह में जा सकते हैं।

प्रशासनिक अक्षमता

जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लॉकडाउन की घोषणा की थी, तब उनके दो उद्देश्य बेहद साफ थे। एक, कोरोना की श्रृंखला को तोड़ना, जिसके लिये उन्होंने कहा था कि जो जहां है वह वहीं रहे। उनकी जरूरी आवश्यकताओं की पूर्ति राज्य सरकारें करें। दूसरा, राज्य सरकारें अपनी चिकित्सा व्यवस्थाओं को सुधार लें। केजरीवाल ने अपने ताजा साक्षात्कार में स्वीकार किया कि वे इन दोनों उद्देश्यों को अच्छी तरह समझ गये थे। लॉकडाउन की जरूरत को गम्भीरता से स्वीकार किया था, पर दुर्भाग्य से दिल्ली सरकार इन दोनों उद्देश्यों में विफल रही। पहले उद्देश्य की धज्जियां उड़ाते हुए उसने प्रवासी मजदूरों को लाखों की तादाद में उत्तर प्रदेश सीमा पर पहुंचा दिया। दूसरी अव्यवस्था के तहत शराब की दुकानें खोलीं पर उन पर कई किलोमीटर लंबी कतारें पूरे देश ने देखीं।

दिल्ली में कोरोना मरीजों के दोगुने होने की रफ्तार राष्ट्रीय औसत 15 दिनों के मुकाबले 12.6 दिन की है, नमूनों में पॉजिटिव मरीजों का अनुपात 25.7 फीसदी से 38 फीसदी तक है। ऐसे में दिल्ली पूरे भारत में कोरोना से बेहद बुरी तरह प्रभावित क्षेत्रों में से एक बन गई है। कम जांच के बाद भी प्रतिदिन 1000 से ऊपर नये मरीज आ रहे हैं और मृतकों का आंकड़ा लगभग 1000 पहुंच रहा है। कम से कम अब तो केजरीवाल सरकार को हठधर्मिता छोड़कर, सब का साथ लेकर इस आपदा को सुरक्षित ढंग से निपटना चाहिए। (लेखक ‘इंडियन मेडिकल एसोसिएशन’ की ‘एथिक्स कमेटी’  के अध्यक्ष हैं)



सरसंघचालक के विरुद्ध टिप्पणी करने वाले विवेक को नहीं मिली जमानत
गत दिनों इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने राष्टÑीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत के विरुद्ध सोशल मीडिया में आपत्तिजनक टिप्पणी करने वाले युवक विवेक मिश्र की एक याचिका पर सुनवाई की। उल्लेखनीय है कि याची के विरुद्ध राष्टÑीय स्वयंसेवक संघ, शाहजहांपुर के  विभाग कार्यवाह रवि मिश्र ने प्राथमिकी दर्ज कराई है। इसमें आरोप लगाया है कि विवेक ने कुछ दिन पहले सरसंघचालक के विरुद्ध आपत्तिजनक टिप्पणी की थी। विवेक ने गिरफ्तारी से बचने के लिए इलाहाबाद उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था। लेकिन न्यायमूर्ति पंकज नकवी व न्यायमूर्ति राजवीर सिंह की खंडपीठ ने याची को राहत देने से मना कर दिया। न्यायालय ने उसकी याचिका खारिज करते हुए कहा कि वह अग्रिम जमानत के लिए आवेदन कर सकता है।

   बता दें कि श्री भागवत ने कुछ समय पहले सामाजिक एकता और भाईचारा बढ़ाने वाला एक बयान दिया था। उनका यह बयान विवेक को पसंद नहीं आया और उसने सोशल मीडिया में अनेक आपत्तिजनक बातें लिखीं। विवेक की इन बातों से बहुत लोग असहमत थे। आखिर में संघ के एक कार्यकर्ता ने उसके विरुद्ध शिकायत दर्ज कराई और अब विवेक को डर सता रहा है कि कहीं पुलिस उसे गिरफ्तार न कर ले, इसलिए वह अपनी जमानत कराने के लिए भटक रहा है।