आहत दिल्ली, बेसुध केजरीवाल

    दिनांक 17-जून-2020   
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दिल्ली  की केजरीवाल सरकार ने 12 मार्च को कोविड-19 को महामारी घोषित तो कर दिया, लेकिन इससे निपटने के लिए उसके पास कोई ठोस तैयारी नहीं थी। शुरू से ही आआपा का ध्यान इस पर केंद्रित रहा कि कहीं उसका ‘वोट बैंक’ नाराज न हो जाए। इसलिए सीएए विरोधी धरना खत्म करने की कोशिश करना तो दूर, रमजान के महीने में बाजार भी खोल दिए। राशन-भोजन वितरण के तरीके और इसकी गुणवत्ता भी आरोपों के घेरे में है। अस्पतालों की स्थिति पहले से ही बदहाल है
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निजामुद्दीन मरकज में बड़ी संख्या में देश और विदेश से तब्लीगी जमात के लोग इकट्ठा होते रहे, लेकिन दिल्ली सरकार आंख मंूदे रही। (फाइल चित्र)


बात 13 मार्च की है। तब तक देशभर में चायनीज वायरस के 81 मामले दर्ज किए गए थे। उस समय महामारी दिल्ली में पांव पसार रही थी। हालांकि संक्रमितों का आंकड़ा 6 ही था, लेकिन 69 वर्ष की एक महिला की मौत हो चुकी थी। कर्नाटक के बाद देश में कोरोना से यह दूसरी मौत थी। लेकिन मुख्यमंत्री केजरीवाल का ध्यान महामारी से निपटने की तैयारियों पर कम और नागरिकता संशोधन कानून (सीएए), राष्ट्रीय नागरिकता पंजी (एनआरसी) और राष्ट्रीय जनसंख्या पंजी (एनपीआर) के बहाने लोगों में डर फैलाने पर अधिक था। कोरोना से कैसे निपटना है, दिल्ली सरकार ने इसके लिए क्या-क्या तैयारियां कीं, किस-किस अस्पताल में संक्रमितों के इलाज की व्यवस्था की गई, डॉक्टरों, नर्सों और स्वास्थ्यकर्मियों को मास्क और सुरक्षा उपकरण उपलब्ध कराए गए या नहीं, इन सब सवालों के बारे में स्पष्ट रूप से न तो कुछ कहा और न ही किया। अलबत्ता विधानसभा में महामारी को लेकर अपने विधायकों की भ्रांति कुछ इस तरह से दूर कर रहे थे, ‘‘इस बीमारी को लेकर बहुत सारी भ्रांतियां हैं और यहां जितने लोग बैठे हैं, ये सब लोग दिल्ली के लोगों का नेतृत्व करते हैं। इसलिए यह जरूरी है कि कम से कम यहां बैठे लोगों के पास उन भ्रांतियों का स्पष्टीकरण होना चाहिए। तभी सब लोग आगे जाकर जनता को बता पाएंगे। स्वस्थ आदमी को मास्क बिल्कुल नहीं पहनना है। मास्क पहनने से कई बार उल्टा असर हो सकता है।’’

दिल्ली की स्थिति लगातार बिगड़ रही थी, लेकिन कट्टरपंथी मुसलमानों और जमातियों पर नकेल कसने की बजाए केजरीवाल सरकार उन्हें शह दे रही थी। 16 मार्च को केजरीवाल सरकार ने निषेधाज्ञा लागू कर 50 से अधिक लोगों के इकट्ठा होने पर रोक लगाई। उस के बावजूद शाहीनबाग और जाफराबाद में सीएए विरोधी धरने चलते रहे थे।

दिल्ली की स्थिति लगातार बिगड़ रही थी, लेकिन कट्टरपंथी मुसलमानों और जमातियों पर नकेल कसने की बजाए केजरीवाल सरकार उन्हें शह दे रही थी। 16 मार्च को राज्य सरकार ने निषेधाज्ञा लागू कर 50 से अधिक लोगों के इकट्ठा होने पर रोक लगाई। उस समय शाहीनबाग और जाफराबाद में सीएए विरोधी धरने चल रहे थे। सवाल है, क्या 49 लोगों के इकट्ठा होने पर संक्रमण नहीं फैलता? क्या ऐसा आदेश जारी करके केजरीवाल सरकार ने सीएए विरोधी प्रदर्शनों को पाबंदी के दायरे से बाहर नहीं रखा? हफ्ते भर बाद जब प्रदर्शनकारियों में कोरोना संक्रमण फैला तो प्रदर्शन भी स्वत: ही खत्म हो गया। इसी तरह, निजामुद्दीन मरकज में करीब 5,000 जमाती जुटे, लेकिन सरकार कान में तेल डालकर सोती रही। मौलाना साद पर कार्रवाई की बारी आई, तब भी हीला-हवाली करती रही। नतीजा साद पर थोक भाव में मामले दर्ज हैं, लेकिन आज तक पकड़ में नहीं आया है। जब जमातियों की करतूतों पर सोशल मीडिया से लेकर मुख्यधारा मीडिया तक उनकी मजम्मत करने लगा तो आआपा विधायक अमानतुल्ला खां उनके बचाव में उतर आए। अमानतुल्ला ने ट्वीट किया, ‘‘हमारे देश के कई न्यूज चैनल कोरोना के बहाने तब्लीगी जमात और मुसलमानों को बदनाम करने का काम कर रहे हैं और देश में नफरत फैला रहे हैं, जबकि मुसीबत की इस घड़ी में सबको साथ लड़ने की जरूरत है। मेरी सभी लोगों से दरख्वास्त है कि ऐसे चैनलों को देखना बन्द करें।’’ यह वही अमानतुल्लाह खां हैं, जो नफरत की फसल काटकर विधानसभा में पहुंचे हैं। यह वही अमानतुल्लाह खां हैं, जिन्हें इस्लाम और मुसलमान के अलावा कुछ नहीं दिखता। वह केवल अपने समुदाय से जुड़े मुद्दे ही मुखरता से उठाते हैं।


ऐसे बढ़ती गई बीमारी

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पूरी दिल्ली ‘रेड जोन’ होने के बावजूद दिल्ली सरकार ने रमजान पर बाजार खोलने का आदेश दिया।

पूरी दिल्ली ‘रेड जोन’ में बदल चुकी थी। लॉकडाउन जारी था। तब केजरीवाल ने रमजान के महीने में बाजार खोल दिए। आलम यह था कि दिल्ली की बड़ी आबादी घरों में बंद थी और रोजमर्रा की वस्तुओं की किल्लत झेल रही थी, लेकिन उस समय मुसलमानों के लिए शाहीन बाग, ओखला, जाफराबाद, पुरानी दिल्ली के कई इलाकों में बाजार खुले हुए थे और लोग सामाजिक दूरी की धज्जियां उड़ा रहे थे। इसी तरह, दिल्ली सरकार ने 4 मई को शराब की दुकानें खोल दीं और अब 8 जून से मॉल, बाजार, दुकानें, रेस्टोरेंट आदि भी खोल दिए। दिल्ली भाजपा के प्रवक्ता प्रवीण शंकर कपूर कहते हैं, ‘‘जब दिल्ली में कोरोना वायरस के करीब 4,000 मामले थे, तब कंटेनमेंट जोन 101 थे। जब मरीजों का आंकड़ा 8200 पहुंचा तो कंटेनमेंट जोन 78 रह गए और अब जबकि आंकड़ा 30,000 के करीब पहुंच गया है तो कंटेनमेंट जोन की संख्या बढ़कर 194 हो गई है। आखिर दिल्ली में क्या खेल चल रहा है?’’

इस तरह केजरीवाल बीमारी को रोकने की बजाए उसे फैलाते रहे। खुद उनके उपमुख्यमंत्री की मानें तो जून के अंत तक लगभग एक लाख और जुलाई में संक्रमितों का आंकड़ा 5.5 लाख तक पहुंच सकता है। फेडरेशन आॅफ ट्रेड एसोसिएशन आॅफ दिल्ली के अध्यक्ष अजय अरोड़ा का कहना है कि पहले सम-विषम के पैंतरे के जरिये दिल्ली सरकार ने बाजार खोलने का फरमान जारी कर दिया। लेकिन जिस प्रकार से खारी बावली, सदर बाजार, भगीरथ प्लेस जैसे भीड़भाड़ वाले बाजारों में कोरोना संक्रमण के मामले सामने आए हैं, उससे व्यापारियों में दहशत है। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री और उपराज्यपाल को पत्र के जरिए व्यापारियों की समस्या बताई गई है। लेकिन अब तक कोई कदम नहीं उठाया गया है। ऐसे में बाजार कब खोलना है, व्यापारी संघ अब खुद ही तय करने लगे हैं। इसी तरह, पीतमपुरा स्थित तरुण एन्क्लेव की आरडब्ल्यूए के अध्यक्ष राम गोपाल गोयल का एक वीडियो वायरल हुआ। इसमें वह अपनी कॉलोनी तरुण एन्क्लेव के बारे में बता रहे हैं, ‘‘हमारी कॉलोनी में कोरोना के कुछ मामले आए। 3 जून को कॉलोनी के सात मकानों को कंटेनमेंट जोन घोषित कर इलाके की बैरिकेडिंग कर दी गई। लेकिन इसके बाद दिल्ली सरकार का कोई अधिकारी या कर्मचारी वहां नहीं आया। यहां तक कि कोरोना संक्रमितों और उनके परिवारों के किसी भी सदस्य की जांच नहीं की गई। क्या कंटेनमेंट जोन के अंदर सभी घरों में कोरोना जांच कराना सरकार की जिम्मेदारी नहीं है? क्या हम लावारिस हैं? क्या हम दिल्ली के निवासी नहीं हैं?’’ यह स्थिति उस इलाके की है, जहां से सत्येंद्र जैन विधायक चुने गए हैं। सत्येद्र जैन दिल्ली सरकार में स्वास्थ्य मंत्री हैं, इसके बावजूद न तो खुद जैन और न ही उनका कोई प्रतिनिधि तरुण एन्क्लेव में झांकने गया।



भारी पड़ गया झूठ

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बिहार सरकार को श्रमिक ट्रेन  पर आए खर्च की जानकारी देने वाला  दिल्ली सरकार का पत्र

केंद्र सरकार ने लॉकडाउन में देश के विभिन्न हिस्सों में फंसे श्रमिकों को वापस उनके गृह राज्य भेजने के लिए श्रमिक ट्रेनें चलार्इं। केंद्र ने स्पष्ट कहा कि श्रमिकों को भेजने पर जो खर्च आएगा, उसका 85 प्रतिशत वह खुद वहन करेगा, जबकि शेष 15 प्रतिशत उस राज्य की सरकार को देना होगा जहां श्रमिक जाएंगे। लेकिन केजरीवाल सरकार ने इसमें भी ओछी राजनीति की। दिल्ली सरकार ने दावा किया कि ‘बिहार सरकार ने दिल्ली में फंसे प्रवासी श्रमिकों की सहायता से इनकार कर दिया, इसलिए उन्होंने 1200 श्रमिकों को अपने खर्च पर ट्रेन से मुजफ्फरपुर भेजा।’ हद तो तब हो गई, जब श्रमिकों को भेजने के बाद पत्र लिखकर बिहार सरकार से करीब 6.5 लाख रुपये मांगे गए। इधर, वाहवाही लूटने के लिए केजरीवाल सरकार में श्रम मंत्री गोपाल राय ने ट्वीट भी कर दिया कि श्रमिकों को भेजने का खर्च उनकी सरकार ने उठाया है। आआपा के आधिकारिक ट्विटर हैंडल से भी श्रमिकों को लेकर मुजफ्फरपुर रवाना होने वाली ट्रेन के वीडियो के साथ लिखा गया कि ‘बिहार सरकार ने 1200 प्रवासी मजदूरों के रेल का किराया देने से इनकार कर दिया है। इसलिए पूरा खर्च केजरीवाल सरकार वहन करेगी।’ इस पर, नीतीश सरकार में मंत्री संजय कुमार झा ने तल्ख टिप्पणी की। उन्होंने कहा, ‘‘मैंने दिल्ली सरकार के एक मंत्री का ट्वीट देखा, जिसमें उनका दावा है कि मुजफ्फरपुर जाने वाले 1200 मजदूरों के ट्रेन टिकट का खर्च उनकी सरकार ने उठाया है। लेकिन मेरे पास एक पत्र है जो बिहार सरकार से पैसा मांगने के लिए दिल्ली सरकार ने भेजा है। एक तरफ यह कहकर श्रेय ले रहे हैं कि आपने मजदूरों को अपने पैसे से उनके घर भेजा, दूसरी तरफ बिहार सरकार से भी पैसा मांग रहे हैं।’’ इस मुद्दे पर आआपा और जदयू के बीच जबरदस्त जबानी जंग चली।


मजदूरों के साथ जहाज से आआपा सांसद क्यों गए?

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 प्रवासी श्रमिकों के साथ विमान से पटना गए आआपा सांसद संजय सिंह (मध्य में)

आआपा सरकार की कार्यशैली समझ से परे है। जब मजदूरों को मदद की सबसे ज्यादा जरूरत थी, तब उन्हें दिल्ली से भगाने के लिए अफवाहें फैलाई गर्इं। पलायन करने वाले अधिकांश श्रमिक भूखे थे, जबकि सरकार लाखों लोगों को रोजाना राशन और खाना खिलाने के दावे कर रही थी। श्रमिकों को ट्रेन से भेजने का खर्च मांगने वाली आआपा सरकार के राज्यसभा सांसद ने जून की शुरुआत में विशेष विमान से प्रवासी श्रमिकों को बिहार भेजा। यही नहीं, सांसद संजय सिंह भी उनके साथ पटना पहुंच गए। क्या वह श्रमिकों को उनके घर तक पहुंचाने गए थे? क्या उनके बिना श्रमिक खुद नहीं जा सकते थे? दरअसल, बिहार में इस साल विधानसभा चुनाव होने हैं और संजय सिंह के पास बिहार का प्रभार है। संकट में फंसे श्रमिकों की सहायता करके उन्होंने बहुत अच्छा काम किया, लेकिन उनका यह कहना कि बिहार सरकार को अपने लोगों की चिंता नहीं है और वह उनकी मदद नहीं कर रही है, यह ओछी राजनीति का ही उदाहरण है। आआपा सांसद के आरोप पर पलटवार करते हुए बिहार के सूचना एवं जनसंपर्क मंत्री नीरज कुमार ने इसे चुनावी चाल करार दिया। उन्होंने कहा कि वह इस तरह के नाटक के जरिए बिहार में अपनी जगह तलाश रहे हैं। लेकिन उससे कोई फायदा नहीं होगा। जब हमारे प्रवासी मजदूरों को मदद की सबसे ज्यादा जरूरत थी, जब वह भारी संकट में थे, तब उनके साथ छल किया गया। उस स्थिति में उन्हें बहकाकर भगा दिया और अब हवाई जहाज से लाने की नौटंकी कर रहे हैं! अगर उनमें थोड़ी भी नैतिकता है तो वह बिहार के लोगों से माफी मांगें।





बेघरों को आश्रय और भोजन का दावा भी झूठा

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रैन बसेरों से उठतीं आग की लपटें

दिल्ली सरकार दावा करती है कि वह बेघरों को आश्रय गृह उपलब्ध करा रही है। रोजाना रैन बसेरों और स्कूलों के जरिए जरूरतमंदों को दो वक्त का खाना खिला रही है। सरकार तो आधी दिल्ली को राहत सामग्री और भोजन देने का भी दावा कर रही है, लेकिन सच्चाई इसके उलट है। 11 अप्रैल को गुस्साए करीब 200 लोगों ने कश्मीरी गेट स्थित तीन रैन बसेरों में आग लगाने के साथ पथराव किया और पुलिस वाहनों में भी तोड़फोड़ की थी।

दमकल की छह गाड़ियों को आग पर काबू पाने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ी थी। सामान्य दिनों में इन रैन बसेरों में 250 लोग सोते थे, लेकिन सामाजिक दूरी के कारण महज 60 लोग ही अंदर सो पा रहे थे। इस घटना पर भाजपा सांसद प्रवेश साहिब सिंह ने ट्वीट किया, ‘‘अरविंद केजरीवाल यह भी दावा करते रहे कि फुटपाथ पर रहने वालों के लिए रैन बसेरों में रहने की व्यवस्था की गई है, लेकिन इसकी पोल खोली सोशल मीडिया ने। यही नहीं, अप्रैल के दूसरे सप्ताह में एक रैन बसेरे में आग लग गई।

मुख्यमंत्री निवास से मुश्किल से 2 किलोमीटर की दूरी पर इस घटना का होना अत्यंत चिंताजनक है। हम सब आपके साथ मिलकर काम करने का आपको भरोसा दे चुके हैं और बिना कहे कर भी रहे हैं। ये क्या हो रहा है दिल्ली में केजरीवाल जी। ध्यान दें यह बहुत जरूरी है।’’



दिल्ली में 5.2 एकड़ सरकारी जमीन पर अतिक्रमण कर रोहिंग्याओं को बसाने, उन्हें तमाम तरह की सुविधाएं देने एवं फर्जी दस्तावेज पर आधार कार्ड बनाने से लेकर उन्हें संरक्षण देने तक में अमानतुल्लाह का ही नाम आ रहा है। खुद मुख्यमंत्री केजरीवाल, जो दिल्ली दंगों में हिंदुओं का हाल पूछने तक नहीं गए, वह जमातियों और कट्टरपंथियों के बचाव में उतर आए। 14 अप्रैल को उन्होंने ट्वीट किया, ‘‘इतने नाजुक दौर से जब अपना देश गुजर रहा है, तब भी कुछ लोग हिंदू और मुसलमान भाइयों के बीच नफरत फैलाने की कोशिश कर रहे हैं। हम कोरोना को तभी हरा पाएंगे, जब हम सब एकजुट होकर लड़ेंगे।’’ यही नहीं, जांच में बड़ी संख्या में जब जमाती पॉजिटिव आने लगे और देशभर में तब्लीगी जमात की करतूतों पर लोग प्रतिक्रिया देने लगे, तब केजरीवाल सरकार ने स्वास्थ्य सूचना से मरकज या तब्लीगी शब्द ही हटा दिया।

दिल्ली सरकार ने 12 मार्च को चायनीज वायरस को महामारी घोषित किया। इसी दिन पत्रकारों ने जब केजरीवाल से मास्क की कमी और सैनिटाइजर की कालाबाजारी पर रोक लगाने के बारे में सवाल पूछा तो वे यह कह कर जवाब टाल गए कि लोग बड़े पैमाने पर इसे खरीद रहे हैं। जब वे ऐसा करना बंद कर देंगे तभी कुछ होगा। उन्होंने यह भी दोहराया कि ‘‘स्वस्थ लोगों को मास्क की जरूरत नहीं है। कई बार यह हानिकारक हो सकता है। लोग सैनिटाइजर की बजाए साबुन से हाथ धोएं।’’ एक अन्य पत्रकार ने जब कहा कि डॉक्टरों को भी मास्क नहीं मिल रहा है, तब उन्होंने घूरते हुए उससे कहा, ‘‘कहां नहीं मिल रहा है? हमें बताइए, हम दिलवा देंगे। सरकार के पास पर्याप्त मात्रा में है।’’ इसके बाद वह चलते बने।

क्या पूरी दिल्ली भूखी थी?
इसी तरह, दिल्ली में फंसे प्रवासी श्रमिकों ने भी केजरीवाल की  बहुप्रचारित ‘उत्तम व्यवस्था’ की पोल खोली। बेरोजगार और कई दिनों से भूखे ये प्रवासी श्रमिक पैदल ही घर के लिए निकल गए। उनका कहना था कि ‘जब भूखे-प्यासे यहां मरना ही है तो रास्ते में ही मर जाएंगे।’ उनका कहना था कि उन्हें ट्रेन के बारे में कोई जानकारी भी नहीं मिल रही थी। केजरीवाल सरकार अप्रैल में 10 लाख से अधिक लोगों को राशन और भोजन उपलब्ध कराने का दावा कर रही थी। बाद में एक करोड़ लोगों को राशन और खाना देने का दावा किया। लेकिन सच्चाई यह है कि सरकार ने आज तक न तो राहत सामग्री वितरण केंद्र और न ही अपनी रसोइयों की सूची जारी की। दिल्ली में भाजपा सांसद-विधायक-पार्षद, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और इससे जुड़े संगठन, गुरुद्वारे, अन्य धार्मिक संगठन, सामाजिक संगठन और अन्य लोग भी अपने -अपने स्तर पर बड़े पैमाने पर लोगों को राहत सामग्री और भोजन बांट रहे थे। दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक समिति की ओर से रोजाना एक लाख लोगों के लिए लंगर चलाया जा रहा था। इस्कॉन (द्वारका) संस्था भी रोज सुबह-शाम 1.5 लाख लोगों को भोजन प्रसाद उपलब्ध करा रही थी। सवाल है कि क्या पूरी दिल्ली ही भूखी थी? दिल्ली सरकार किसे और क्या खिला रही थी? केजरीवाल के दावों की बखिया उधेड़ने वाले ऐसे कई वीडियो सोशल मीडिया पर उपलब्ध हैं। दिल्ली सरकार पर हमला बोलते हुए 6 अप्रैल को सांसद प्रवेश साहिब सिंह ने ट्वीट किया, ‘‘मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल झूठ बोल रहे हैं कि वो 8-10 लाख लोगों को रोज भोजन-राशन दे रहे हैं। ऐसा होता तो अखबार में किचन का विज्ञापन आ चुका होता। मैं चुनौती देता हूं मुख्यमंत्री को कि वह जगह दिखाई जाए, जहां खाना बन रहा है। डीएम-एसडीएम लोगों से लेकर बांट रहे हैं।’’

कीड़े वाला भोजन, दाल की जगह पानी
दिल्ली सरकार लोगों को जो खाना खिला रही थी, उसकी गुणवत्ता भी सवालों के घेरे में है। वितरण केंद्रों पर बांटे जाने वाले भोजन की सच्चाई एक बार फिर सोशल मीडिया ने खोली। सांसद प्रवेश साहिब सिंह ने 4 अप्रैल को ऐसा ही एक वीडियो सोशल मीडिया पर साझा किया था। यह वीडियो सीमापुरी के एक स्कूल का था। इसमें कीड़े वाला भोजन लोगों को परोसा जा रहा था। लोगों की शिकायत यह थी कि एक तो अधपका खाना बांटा जा रहा है, ऊपर से इसमें कीड़े भरे हुए हैं। भाजपा सांसद ने आरोप लगाया कि गरीबों को खिचड़ी के नाम पर उल्टी जैसा दिखने वाला पानी परोसा जा रहा है। यह कीड़ों से भी भरा हुआ है। उन्होंने केजरीवाल से कहा कि उनकी सरकार गरीबों को जो खाना खिलाकर अपनी पीठ थपथपा रही है, इसे उनकी पार्टी के विधायकों और नेताओं को खाकर देखना चाहिए। संकट के समय उनकी सरकार भ्रष्टाचार और निराशा ही परोस रही है। दिल्ली सरकार का यह कृत्य क्षमा योग्य नहीं है। भोजन वितरण में घोटाले का आलम यह है कि दाल की जगह पानी बांटा जा रहा था। हालांकि इसका रंग दाल की तरह ही पीला था, लेकिन उसे दाल तो कतई नहीं कहा जा सकता। इसके अलावा, कई जगहों पर जो खिचड़ी बांटी गई, वह जली हुई थी। लेकिन केजरीवाल को इन सब बातों से कोई फर्क नहीं पड़ता। वह रोज नए दावे करते हैं, जो अगले ही पल दम तोड़ते दिखते हैं।

राशन वितरण केंद्रों पर हमला
दिल्ली भाजपा के प्रवक्ता प्रवीण शंकर कपूर ने लॉकडाउन के दौरान दिल्ली सरकार के केंद्रों पर बांटे जाने वाले खाने की गुणवत्ता को लेकर लगातार मिलने वाली शिकायतों के मद्देनजर उपराज्यपाल अनिल बैजल को पत्र लिखकर खाने की जांच कराने की मांग भी की थी। उन्होंने यह आरोप भी लगाया कि गरीबों और प्रवासी श्रमिकों को मुफ्त राशन बांटने के लिए दिल्ली सरकार को जो कोटा दिया गया था, उसमें भी लापरवाही बरती गई। राशन बांटने की जिम्मेदारी सरकार की है, लेकिन यह काम निगम स्कूल के शिक्षकों पर थोप दिया गया और निगम स्कूलों को ही वितरण केंद्र बना दिया गया। कोरोना संक्रमण के खतरे के बीच शिक्षक ही राशन बांट रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि एक शिक्षिका और उनके पति की संक्रमण से मौत भी हो चुकी है। लापरवाही का आलम यह है कि केंद्र सरकार का राशन समय पर वितरण केंद्रों पर भी नहीं पहुंचता। ऐसी स्थिति में राशन नहीं मिलने से परेशान गरीब बौखलाहट में शिक्षकों पर ही हमला कर देते हैं। मई में किराड़ी में इसी तरह एक स्कूल पर लोगों ने हमला किया। लोगों में इतना आक्रोश था कि अगर शिक्षक सामने पड़ जाते तो शायद जिंदा नहीं बचते।

 एक के बाद एक झूठे दावे
दिल्ली सरकार रोज नए दावे करती है। 6 जून को उसने एक महत्वपूर्ण आदेश पारित किया। इसे भी सोशल मीडिया पर प्रचारित किया गया। कहा गया कि सरकार अस्पतालों में बिस्तरों की ‘कालाबाजारी’ नहीं होने देगी। साथ ही, सरकार दावा करती रही कि ‘अस्पतालों में बिस्तरों की कमी नहीं है। अस्पतालों में 8,645 बिस्तर  हैं, जिनमें से केवल 4,038 पर मरीज हैं, बाकि 4607 बिस्तर अभी खाली हैं। इसके बावजूद कुछ अस्पताल लोगों को भर्ती करने से मना कर रहे हैं। सरकार इसे बर्दाश्त नहीं करेगी।’ लेकिन इस दावे के उलट स्थिति यह है कि लोग मरीजों को लेकर इधर-उधर भटक रहे हैं। यहां तक कि सरकार जिन इलाकों को ‘कंटेनमेंट जोन’ घोषित कर रही है, वहां भी जांच नहीं की जा रही है। अब जबकि स्थिति बिगड़ चुकी है और 80,000 से 1,00,000 बिस्तरों की जरूरत पड़ने वाली है, तब भी सरकार 30,000 बिस्तरों के आंकड़े पर ही अटकी हुई है। अब केजरीवाल सरकार व्यवस्था सुधारने के लिए कुछ दिन की मोहलत मांग रही है। साथ ही, अस्पतालों की मनमानी पर अंकुश लगाने के लिए अपने चिकित्साकर्मी हर अस्पताल में तैनात करने की बात कर रही है। ‘दिल्ली कोरोना’ एप पर अस्पताल में उपलब्ध बिस्तर की सही जानकारी देना तथा जरूरतमंदों को भर्ती कराना इन चिकित्सा पेशेवरों की जिम्मेदारी होगी। सरकार कहती है कि कोई भी अस्पताल संदिग्ध मरीजों को मना नहीं कर सकता। उन्हें संदिग्ध को कोरोना पॉजिटिव मान कर तत्काल इलाज शुरू करना होगा, जबकि पहले सरकार ने ही कहा था कि संदिग्ध लोग जांच या इलाज के लिए अस्पताल की ओर न भागें, इससे अस्पतालों की व्यवस्था बिगड़ेगी। कोरोना संक्रमितों को भी घर से इलाज कराने को कहा था।

केजरीवाल चाहे कितने ही दावे कर लें, लेकिन सच यही है कि दिल्ली भगवान के भरोसे है। निजी अस्पताल कोरोना संक्रमितों के इलाज के लिए मुंहमांगा पैसा मांग रहे हैं। दिल्ली की स्थिति देखकर आम लोगों के मन में आक्रोश लगातार बढ़ रहा है। लोगों का कहना है कि किसी सरकार को यह तय करने की इजाजत कैसे दी जा सकती है कि वह किसी को कोरोना जांच कराने से रोके। इस तरह की सोच ही शर्मनाक है। ऐसे तो न कोरोना की जांच होगी और न बिना जांच के अस्पतालों में दाखिला मिलेगा। लोग इसी तरह मरते रहेंगे, अस्पताल में बिस्तर खाली रहेंगे और कोरोना से मरने वालों का आंकड़ा भी नहीं बढ़ेगा। इस सरकार को क्यों झेला जाए? दिल्ली सरकार पल-पल रंग बदल रही है। यही केजरीवाल पहले स्वस्थ लोगों के लिए मास्क को हानिकारक बता रहे थे और अब अपील कर रहे हैं कि अगर कोरोना से बचना है तो सभी को मास्क लगाना होगा।  


अस्पताल में ‘खाली’ बिस्तरों का सच
अजीब हाल है, कुछ समझ में नहीं आ रहा? आज एक अस्पताल गया था। वहां एक 70 साल के डॉक्टर के बेटे कोरोना पॉजिटिव होने की वजह से भर्ती थे। अस्पताल के मालिक उस डॉक्टर के दोस्त हैं, जिनका बेटा भर्ती है। मरीज अभी कोरोना वायरस पॉजिटिव है और उसे कोई खतरा नहीं। मरीज के परिवार वाले गुहार लगा रहे थे कि अभी अस्पताल से छुट्टी मत दो। मरीज घर पहुंच गया तो 70 साल के बुजुर्ग पिता को कोरोना हो जाएगा और उन्हें बचाना मुश्किल होगा। अस्पताल के मालिक कह रहे थे कि वह भी इस बात को मान रहे हैं, लेकिन वह मरीज को अस्पताल में नहीं रख सकते, क्योंकि केजरीवाल सरकार ने बिना लक्षण वाले पॉजिटिव मरीजों को भी घर भेजने का आदेश दिया है। अस्पताल मालिक अपने डॉक्टर दोस्त की मदद नहीं कर पा रहे थे और मरीज के परिजन उन्हें अपने बेटे की जान बचाने की कसम देकर गुहार लगा रहे थे। दोनों की बेबसी मैं नहीं देख पाया और वहां से चला आया। पता नहीं क्या हुआ? लेकिन एक सवाल मेरे मन में है जिसका जवाब ढूंढने में मदद कीजिए। आखिर कसूरवार कौन है? क्या बुजुर्ग डॉक्टर को अपने बेटे को अस्पताल में रखने का हक नहीं? क्या एक कोरोना पॉजिटिव मरीज को अस्पताल में रहने का हक नहीं? क्या एक डॉक्टर को अपनी जान बचाने के लिए बेटे को अस्पताल में रखने का हक नहीं? कौन गलत है? अस्पतालों में कोरोना मरीजों के लिए खाली बिस्तर का डंका पीटने से किसका भला होगा? अस्पतालों में बिस्तर हैं और मरीज अस्पतालों के गेट पर दाखिले के बगैर मर रहे हैं। क्या केंद्र सरकार लोगों को यूं ही मरते देखती रहेगी? कसौटी पर कोई एक पार्टी नहीं समूची सियासी बिरादरी है। 
-रविशंकर प्रसाद की फेसबुक वॉल से


पहले बीमारी फैलाई, अब दिल्ली बंद
केजरीवाल जता रहे हैं कि बाहर के लोग दिल्ली के अस्पतालों में आकर इलाज कराना चाहते हैं। इसीलिए उन्होंने दिल्ली सीमा बंद करने और बिस्तर आरक्षित करने का पैंतरा चला है, जबकि सच यह है कि वह खुद चाहते हैं कि किसी तरह सीमा खुल जाए और वह यहां के मरीजों को यूपी, हरियाणा में ठेल सकें। वैसे ही जैसे दिल्ली में दुनिया की सर्वश्रेष्ठ शिक्षा व्यवस्था होने के बावजूद हर रोज सैकड़ों स्कूल बसें भर-भर कर नोएडा, गुरुग्राम के स्कूलों में जाती हैं। नोएडा के अस्पताल भी हमेशा से पूर्वी दिल्ली के मरीजों से भरे रहते हैं। इसी तरह, केरल ने कासरगोड जिले के अपने सैकड़ों कोरोना मरीजों को कर्नाटक में धकेल दिया था और फिर मीडिया में अपने ‘कमाल की स्वास्थ्य प्रणाली’ का ढोल बजाना शुरू कर दिया था।
    -चंद्र्रप्रकाश की फेसबुक वॉल से