विध्वंस के वाहक वहाबी

    दिनांक 17-जून-2020   
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पाकिस्तान, अफगानिस्तान,  इंडोनेशिया और  मलेशिया-ये  चारों  इस्लामी  देश हैं। पर जो मजहबी कट्टरता पाकिस्तान और अफगानिस्तान में दिखती है, वह इंडोनेशिया और  मलेशिया  में  नहीं दिखाई देती। यही कारण है कि तालिबान ने बामियान में भगवान बुद्ध की मूर्ति तोड़ दी, तो इंडोनेशिया में एक ऊंची पहाड़ी पर भगवान विष्णु की भव्य प्रतिमा स्थापित की गई

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इंडोनेशिया में एक पहाड़ी पर स्थापित भगवान विष्णु की भव्य प्रतिमा


गत दिनों पाकिस्तान अधिक्रांत कश्मीर (पीओके) में बौद्ध पंथ से जुड़े प्रतीकों को मिटाने का समाचार आया तो भारतीय विदेश मंत्रालय ने कड़ा विरोध दर्ज कराया। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अनुराग श्रीवास्तव ने कहा, ‘‘यह गंभीर चिंता का विषय है कि पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले भारतीय क्षेत्र में बौद्ध प्रतीकों को नष्ट किया जा रहा है, सांस्कृतिक अधिकारों और स्वतंत्रता को कुचला जा रहा है।’’ उन्होंने यह भी कहा, ‘‘हमने फिर एक बार पाकिस्तान से कहा है कि इस क्षेत्र से अवैध कब्जे को हटाए और लोगों के राजनीतिक, सांस्कृतिक और आर्थिक अधिकारों का हनन बंद करे।’’

पीओके में पाकिस्तान की यह हरकत 2001 के उन दिनों की याद दिला रही है, जब बामियान में तालिबान ने बौद्ध मूर्ति को विस्फोट से उड़ा दिया था। इसके साथ ही यह भी सवाल उठ रहा है कि आखिर पाकिस्तान, अफगानिस्तान जैसे देश ही इतने कट्टर क्यों हैं? जबकि मलेशिया और इंडोनेशिया जैसे देश आज भी अपनी प्राचीन हिन्दू परंपरा और संस्कृति का सम्मान
करते हैं। इतिहास को देखते हुए कहा जा सकता है कि सुन्नी समुदाय के वहाबी फिरके के लोगों के कदम जहां पड़े, वहां मजहबी कट्टरता बढ़ी। पाकिस्तान, अफगानिस्तान जैसे देश इसके उदाहरण हैं। इन दोनों देशों में कट्टरवादी उन्माद चरम पर है, मुल्ला-मौलवी इतने हावी हैं कि वहां की सरकारें भी इनके आगे नतमस्तक हैं। कट्टरवादियों के हावी होने से पाकिस्तान और अफगानिस्तान में हिंदू धर्म, संस्कृति और इनको मानने वाले सिमटते जा रहे हैं। कभी अखंड भारत का हिस्सा रहे इन देशों में मंदिर और अन्य धार्मिक स्थल नाममात्र के ही बचे हैं। 

वहीं तालिबान के शासन में अफगानिस्तान में रहने वाले हिंदुआें, सिखों और अन्य मतावलंबियों का बहुत नुकसान किया गया। यही कारण है कि अफगानिस्तान में अब हिंदू नाम मात्र के भी नहीं रह गए हैं। कुछ सिख हैं, तो उन्हें भी आएदिन निशाने पर रखा जाता है। हाल में भी काबुल के एक गुरुद्वारे में बम विस्फोट कर 25 सिखों को मौत की नींद सुला दिया गया। काबुल में रहने वाले नरिंदर सिंह बताते हैं कि उनके पिता हिंदू-सिख सम्मेलन में भाग लेने एक दिन जलालाबाद गए, तो फिर वापस नहीं आए। एक आत्मघाती बम धमाके में 19 लोग मारे गए, जिनमें उनके पिता भी थे। वे बताते हैं कि अफगानिस्तान में अब अल्पसंख्यकों का रहना मुश्किल है। वे पिछले 40 वर्ष से कट्टरवादियों की ज्यादतियां झेल रहे हैं। यहां ऐसे हालात बनाए दिए गए हैं कि वे अपने चार बच्चों को अच्छी शिक्षा भी नहीं दिला सकते। उनके समुदाय के लोगों को अब पांथिक रस्म और पर्व-त्योहार मनाने में भी दिक्कत आने लगी है। कट्टरवादी उनकी जमीन और दूसरी संपत्तियां हड़पने लगे हैं।


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पीओके में बौद्ध प्रतीक चिन्हों को मिटाकर उन पर इस तरह के इस्लामी संदेश लिखे जा रहे हैं।

नरिंदर सिंह के परिवार की कई पीढ़ियां अफगानिस्तान में रहती आई हैं। इनके पिता अफगानिस्तान के सीनेटर और सांसद भी रहे। अल्पसंख्यकों को अधिकांशत: काबुल, गजनी, हेलमंद, खोस्त और नंगरहार प्रांत में निशाना बनाया जा रहा है। इससे परेशान होकर 70 के दशक में बड़ी संख्या में हिंदू और सिख देश छोड़कर चले गए।

तालिबानी शासन में बामियान में बलुआ पत्थर से बनी विश्व की सबसे ऊंची बुद्ध की प्राचीन प्रतिमा को बारूद से उड़ा दिया था। तालिबान हिंदुओं और बौद्धों को इस्लाम का दुश्मन मानते हैं। इसलिए इनका नामो-निशान मिटाने के लिए बामियान की प्रतिमा को उड़ाया गया था। इसके लिए कट्टरवादी अपनी पीठों पर लाद कर विस्फोटक ले गए थे। प्रतिमा नष्ट होने पर तालिबान के गुर्गों ने जश्न मनाया और हवा में गोलियां चलाई थीं। बामियान में साइकिल मिस्त्री मिर्जा हुसैन कहते हैं कि तालिबान ने अफगानिस्तान की अधिकांश हिंदू और बौद्ध प्रतिमाएं नष्ट कर दी हैं। यही हाल पाकिस्तान में भी है। वहां भी हिंदुओं को निशाने पर रखा जाता है। उनके मंदिर भी ढहाए जा रहे हैं। इसके इतर इंडोनेशिया और मलेशिया के लोग प्राचीनकाल से न केवल हिंदू और बौद्ध संस्कृति सहेज कर रखे हुए हैं, बल्कि कई अवसरों पर इससे लगाव जाहिर करना भी नहीं भूलते। इन दो मुस्लिम-बहुल देशों में सनातन धर्म का बड़ा प्रभाव रहा है।

90 फीसदी मुस्लिम जनसंख्या वाले देश इंडोनेशिया में बच्चों को अच्छा इंसान बनाने के लिए ‘रामायण’ पढ़ाई जाती है। देश के 20,000 के नोट पर गणेश जी की तस्वीर छपी है। इस देश के उत्सवों एवं झांकियों में कठपुतलियों के माध्यम से पौराणिक परंपराओं के प्रदर्शन किए जाते हैं। यहां की हर चीज पर हिंदू संस्कृति की छाप मिलती है। इंडोनेशिया गणराज्य दक्षिण-पूर्व एशिया एक विशाल देश है। 18 हजार द्वीपों वाले इस देश की जनसंख्या लगभग 40 करोड़ है। यह दुनिया का चौथा सबसे अधिक आबादी और बड़ी मुस्लिम आबादी वाला देश है। ईसा पूर्व चौथी शताब्दी में यह एक महत्वपूर्ण व्यापारिक क्षेत्र हुआ करता था। बुनी अथवा मुनि इंडोनेशिया की पुरानी सभ्यता है।

यहां के लोग पहले हिंदू एवं बौद्ध धर्मावलंबी थे। वे ऋषि परंपरा का अनुकरण करते थे। दो हजार साल तक इंडोनेशिया हिंदू और बौद्ध संस्कृति के प्रभाव में रहा। बाद में मुस्लिम व्यापारियों के साथ यहां इस्लाम ने प्रवेश किया। उसके बाद धीरे-धीरे यहां की हिंदू और बौद्ध संस्कृति समाप्त होती चली गई। इंडोनेशिया के लोग आज भले इस्लाम को मानते हों, पर उन्होंने हिंदू धर्म और परंपरा नहीं छोड़ी है। उनकी संस्कृति में हिंदू धर्म पूरी तरह रचा, बसा है। आज भी यहां के लोग स्थानों के नाम अरबी के साथ संस्कृत में रखते हैं। यहां पवित्र कुरान संस्कृत भाषा में पढ़ी व पढ़ाई जाती है।

दुनिया में भगवान विष्णु की सबसे ऊंची मूर्ति इंडोनेशिया में है। यह मूर्ति करीब 122 फुट ऊंची और 64 फुट चौड़ी है। इस मूर्ति का निर्माण तांबे और पीतल से किया गया है। इसे बनाने में करीब 28 साल का समय लगा है। यह मूर्ति 2018 में बनकर पूरी हुई थी और पूरी दुनिया से लोग इसे देखने और दर्शन करने आते हैं।

इसी तरह मलेशिया में हिंदू और बौद्ध पंथ की छाप नहीं मिटी है। हालांकि इसके कुछ हिस्से में वहाबियों का प्रभाव बढ़ने लगा है। इसलिए वहां भी मंदिरों पर हमले होने के समाचार कभी-कभी आ जाते हैं। मलेशिया में हिंदू चौथा सबसे बड़ा धर्म है। 2010 की जनगणना के अनुसार यहां हिंदुओं की जनसंख्या 6.3 प्रतिशत है। अधिकांश मलेशियाई हिंदू मलेशिया के पश्चिमी हिस्से में रहते हैं।

मलेशिया को 1957 में ब्रिटिश औपनिवेशिक साम्राज्य से स्वतंत्रता मिली है। इसके बाद देश का आधिकारिक मजहब  इस्लाम घोषित कर दिया गया। इसके बावजूद यहां पाकिस्तान या अफगानिस्तान जैसी कट्टरता देखने को नहीं मिलती है। मलेशिया के शहरी क्षेत्र में बड़े और ग्रामीण क्षेत्रों में अनेक छोटे मंदिर हैं। यहां दक्षिणी भारतीय शैली के कई मंदिर भी हैं।

निष्कर्ष यह है कि मुसलमानों को कट्टर बनाने में वहाबियों का योगदान है। ऐसी कट्टर विचारधारा पूरी दुनिया में शांति के लिए खतरनाक है।      (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)