इस उबाल के पीछे क्या!

    दिनांक 17-जून-2020
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मोरेश्वर जोशी

अमेरिका में भड़के दंगों की चिंगारी यूरोप के कई देशों तक पहुंच गई है। लोग कह रहे हैं इसके पीछे वे अश्वेत लोग हैं, जिनके साथ रंग-भेद की आड़ में भेदभाव किया गया है और जिन्होंने सदियों तक  गुलामी झेली है। अश्वेत अब बहुत प्रभावशाली हो गए हैं और अपने साथ हुए अन्याय के विरोध में खड़े हो रहे हैं

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लंदन स्थित विंस्टन चर्चिल की मूर्ति को प्रदर्शनकारियों ने तोड़ने की कोशिश की।  इस पर नारा  लिखा है -‘चर्चिल नस्लवादी थे।’ 

वर्तमान वैश्विक महामारी के दौरान अमेरिका में एक अश्वेत व्यक्ति जॉर्ज फ्लॉइड की हत्या हुई। मियामी प्रांत के दो पुलिस वालों पर जॉर्ज की ‘हत्या’ का आरोप है। अमेरिका के लोग गुस्से में सड़कों पर उतर आए। देखते ही देखते अमेरिका के  अनेक शहरों में विरोध की आग भड़क उठी। इसके बाद यह आग दुनिया के 50 देशों में भड़क गई।

अमेरिका की घटना पर दूसरे देशों के लोगों का भड़कना, आश्चर्यचकित कर देने वाला है। इसके पीछे के कारणों की तलाश करने से एक बात तो साफ दिखती है कि लोगों में गुलामी और रंग-भेद को लेकर बड़ा उबाल है। यह उबाल आने वाले समय में अनेक राष्टÑीय और अंतरराष्टÑीय घटनाओं को जन्म दे सकता है।

इस उबाल को समझने से पहले अमेरिका की जनजातियों को समझना होगा। इन्हें ही अश्वेत कहा जाता है। उल्लेखनीय है कि उत्तरी अमेरिका और दक्षिणी अमेरिका में 500 के करीब जनजातियां सदियों से रहती हैं। 1492 में कोलंबस ने अमेरिका की भूमि पर कदम रखा तो उसने इन जनजातियों को ‘इंडियन’ कहा। इसके बाद इन जनजातियों ने अपने को ‘इंडियन’ ही कहना शुरू किया। बता दें कि इन लोगों का वर्तमान के भारतीयों से कोई संबंध नहीं है। इन्हीं लोगों का संगठन है-‘अ‍ॅब ओरिजिनल इंडियन’। अब अमेरिका में यह संगठन बहुत मजबूत हो गया है। इस संगठन ने पिछले 50 साल में अफ्रीका से कितने गुलाम पश्चिमी देशों में गए, इसका हिसाब लेना शुरू कर दिया है। बेशक, इसकी शुरुआत अमेरिका से हुई है।

उल्लेखनीय है कि कोलंबस यूरोप का था। इसलिए यूरोप के लोगों ने 1992 में उसके अमेरिका पहुंचने की 500वीं वर्षगांठ मनाने का निर्णय लिया। यह अमेरिका की जनजातियों को पसंद नहीं आया और उन्होंने यूरोपीय लोगों के इस आयोजन के विरुद्ध मोर्चा खोल दिया। इसके बाद अमेरिकी जनजातियों में शिक्षा, रोजगार आदि के प्रति जागरूकता बढ़ गई। वे अपने बच्चों को पढ़ाने लगे और अपने समाज को आगे बढ़ाने के लिए और जो भी कर सकते थे, करने लगे।

उल्लेखनीय है कि सैकड़ों साल तक इन लोगों को दबाया गया है। इन्हें पढ़ने से रोका गया, जब पढ़ने ही नहीं दिया गया तो नौकरी कहां से मिलेगी? इन लोगों को शराब बेचने जैसे छोटे-मोटे कामों तक ही सीमित करके रखा गया। इन्हें खासकर उन कामों में लगाया गया, जिन्हें बुरा माना जाता है। लेकिन जैसे-जैसे उनका संगठन मजबूत होता गया उनकी युवा पीढ़ी आगे बढ़ने लगी। अब ये लोग हर क्षेत्र में प्रगति कर रहे हैं। इसी वर्ग के मेटुकतीरे को पिछले साल नोबल पुरस्कार के लिए नामित किया गया था। हालांकि उन्हें पुरस्कार तो नहीं मिला, पर उसके लिए नामित होना भी बहुत बड़ी उपलब्धि है। मेटुकतीरे आज 90 साल के हैं। यह प्रसंग बताता है कि आज अमेरिका के जनजातीय लोग बहुत आगे बढ़ चुके हैं।


उत्तरी अमेरिका और दक्षिणी अमेरिका में 500 के करीब जनजातियां सदियों से रहती हैं। 1492 में कोलंबस ने अमेरिका की भूमि पर कदम रखा तो उसने इन जनजातियों को ‘इंडियन’ कहा। इसके बाद इन जनजातियों ने अपने को ‘इंडियन’ ही कहना शुरू किया।  बता दें कि इन लोगों का वर्तमान के भारतीयों से कोई संबंध नहीं है। इन्हीं लोगों का संगठन है- ‘अ‍ॅब ओरिजिनल इंडियन’।   अमेरिका में यह संगठन बहुत मजबूत हो गया है।

इनके बच्चे हर क्षेत्र में आगे बढ़ रहे हैं। अब ये लोग अपने और अपनों के अधिकारों के लिए संघर्ष करने लगे हैं। इनका साथ अफ्रीका से अमेरिका और यूरोप लाए गए गुलामों के वंशज देने लगे हैं। इन गुलामों के बच्चे भी आज बहुत प्रभावशाली हो गए हैं। यही लोग जॉर्ज फ्लॉइड की निर्मम हत्या पर विरोध प्रदर्शन और तोड़फोड़ कर रहे हैं। इन लोगों ने ब्रिटेन और अमेरिका में गुलामों की खरीद-फरोख्त करने वाले अनेक नेताओं की मूर्तियां ढहा दी हैं। ये घटनाएं उनकी बढ़ी हुई ताकत का भी परिचय देती हैं।

इन विरोध प्रदर्शनों के तेज होने के पीछे एक और कारण है। वह है विश्व के अनेक देशों में ईसाई संगठनों का कमजोर होना।  यूरोप, अमेरिका, रूस, आॅस्ट्रेलिया आदि देशों में ‘अल्ट्रा ग्लोबलिज्म’ नामक संगठन का प्रभाव बढ़ गया है। इसलिए इन देशों में युवा पीढ़ी ईसाइयत के विरुद्ध आवाज उठाने लगी है। ईसाई परिवारों में जन्मे युवा भी अपने को ईसाई कहने से बच रहे हैं। कई देशोें में ईसाई अल्पसंख्यक भी होने लगे हैं। इस कारण भी ये प्रदर्शन हो रहे हैं।

श्वेत और अश्वेत की कथा
अमेरिका में जो तोड़फोड़ उपद्रव हो रहे हैं, उनमें अश्वेतों के सभी वर्ग के लोग शामिल हैं। ये लोग ‘अश्वेत’ कैसे बने, इसकी एक बहुत ही दिलचस्प कथा है। ‘जेनेसिस’, जो बाइबिल का ही हिस्सा है, इसमें श्वेत और अश्वेत की कहानी लिखी है। इसे सही बताते हुए पूरी दुनिया में इसका प्रचार करके लोगों को धोखे में रखा गया। उस कथा के अनुसार कुछ हजार साल पहले एक महाप्रलय में पूरा विश्व डूब गया था। उस समय ईश्वर का वरदान पाने वाले कुछ लोगों को बचाने के लिए एक नाव आई। उस नाव में नोहा नाम का एक गृहस्थ अपनी पत्नी और बच्चों के साथ चढ़ा। उन सबको कुछ दिनों तक जल में ही समय बिताना पड़ा। फिर बाद में धीरे-धीरे प्रलय शांत हुई और उनका जीवन फिर से चालू हुआ।

नोहा के बच्चों के नाम थे-साम, हाम और जेपेथ। एक दिन नोहा शराब पीकर मस्त था। उसे अपने कपड़ों का भी ध्यान नहीं था। हाम ने अपने पिता की ऐसी स्थिति को देखकर कहा, ‘‘आपको अपने कपड़ों का भी होश नहीं है।’’ हाम की इस टिप्पणी से नोहा को गुस्सा तो आया, पर उसने कुछ बोला नहीं। दूसरे लड़के साम को पिता की इस स्थिति की जानकारी मिली तो उसने उसकी ओर देखा भी नहीं और घर से बाहर चला गया। इसके बाद नोहा ने हाम को श्राप दिया। वह श्राप था, ‘‘तुम घर छोड़कर दक्षिण दिशा में जाओगे। वहां तुम तो काले रहोगे ही, तुम्हारी आगे की सभी पीढ़ियां भी काली ही पैदा होंगी। उन सभी पीढ़ियों को साम की आने वाली पीढ़ियों की सेवा करनी पड़ेगी।’’ ऐसा माना जाता है कि बाद में हाम अफ्रीका गया। वहां वह काला हो गया और उसके बच्चे भी काले ही पैदा हुए। मान्यता है कि इजिप्ट से दक्षिण दिशा में जोहानिसबर्ग तक, जहां-जहां अश्वेत समाज है, वह हाम का वंशज है।

 हालांकि इस कहानी को बहुत लोग नहीं सच मानते हैं। लेकिन माना जाता है कि वही लोग अब अपने साथ हो रहे हर अन्याय का विरोध पूरी ताकत से कर रहे हैं। अब समय बदल गया है। अब किसी के साथ न तो त्वचा के रंग के नाम पर भेदभाव किया जा सकता है और न ही किसी को गुलाम बनाया जा सकता है। इसलिए अमेरिका और समस्त यूरोपीय समाज को अपनी सोच बदलने की जरूरत है। इसी में पूरी मानव जाति की भलाई है। (लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं)