तगड़े दुश्मन की चर्बी उतारना हो तो उसकी कमाई बन्द कर दो, वह अपने आप टूट जाएगा

    दिनांक 18-जून-2020
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कमलेश कमल

तगड़े दुश्मन की चर्बी उतारने के लिए सबसे पहले यह करें कि उसका समान नहीं खरीदने की कसम खा लें। गांव में बड़े बुजुर्ग कहते हैं- "जिससे झगड़ा हो, उसकी कमाई बन्द कर दो, वह अपने आप टूट जाएगा।"

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लद्दाख में 1 कर्नल समेत 20 से अधिक बहादुर जवान बलिदान हुए हैं। इस घटना को टेलीविजन पर देखकर पूरा देश उद्वेलित हुआ है। भारत—चीन सीमा के हालात देखकर स्थितियों का अंदाजा लगाया जा सकता है। ऐसे में, सबसे पहले आपको क्या करना चाहिए ?

गांव में बड़े बुजुर्ग कहते हैं- "जिससे झगड़ा हो, उसकी कमाई बन्द कर दो, वह अपने आप टूट जाएगा।" यही सबसे अच्छा कदम है। उसकी कमाई बन्द कर दें! अच्छी बात यह है कि पड़ोसी देश चीन के मामले में आप यह कर भी सकते हैं।

चीन हमारा पड़ोसी ही नहीं है, हमारा सबसे बड़ा व्यापारिक पार्टनर भी है। हमसे उसकी बड़ी कमाई है। हमसे ही कमाकर वह हमें आंख दिखाता है, हमारे क्षेत्र में घुस आता है, सैनिकों के साथ धक्का-मुक्की और हिंसक झड़पें करता है। ऐसे में इस दुश्मन से अगर निपटना है, तो उसे कमजोर करना होगा।

हमसे चीन कितना कमाता है ? 2018 में हमें उससे लगभग 58 अरब डॉलर का व्यापार-घाटा हुआ है। दुःखद है कि हम जितना उसे बेचते हैं, उससे 4 गुणा अधिक सामान उससे ख़रीदते हैं। वर्ष 2019 के आंकड़ों को देखें, तो हमारा निर्यात 2018 के 18.83 अरब डॉलर से घटकर 17.95 अरब डॉलर रह गया है। दूसरी तरफ़,  होली के रंग, गणेश की प्रतिमा, दिवाली का दीया, बिजली की लड़ी तक उसका ले रहे हैं। अगर उसका मुकाबला करना है, तो पहले उसे कमज़ोर करना होगा। हमारा ही खा-खाकर वह तगड़ा हो गया है।

तगड़े दुश्मन की चर्बी उतारने के लिए सबसे पहले यह करें कि उसका समान नहीं खरीदने की कसम खा लें। जो ले लिया है, उसकी कमाई तो वह कर चुका। भावुकतावश उसे तोड़कर या फेंककर अपना नुकसान न करें। चालाकी से दुश्मन को कमज़ोर करें।

सरकार की बाध्यता है कि वह खुल कर सामान लेना बंद नहीं कर सकती। आज लगभग हर देश विश्व व्यापार संगठन के प्रावधानों से बंधा है। कुछ लोग कहते हैं कि सरकार जनता से अपील करने की जगह चीनी वस्तुओं के आयात पर इम्पोर्ट ड्यूटी 200 प्रतिशत या उससे भी अधिक क्यों नहीं कर देती ? इससे आयात अपने आप रुक जाएगा। इसमें समझने की आवश्यकता है कि विश्व व्यापार संगठन के प्रावधान कुछ ऐसे हैं कि हम क्या कोई भी देश बिना किसी ठोस कारण के दूसरे देश के साथ इस तरह आयात या निर्यात पूरी तरह नहीं रोक सकता।

एक और कारण है। स्थिति कुछ ऐसी है कि भारतीय कम्पनियों में चीन का 60 हजार करोड़ का निवेश है, जिसे वे अचानक बाहर ले लें, तो हमारी कम्पनियों की सेहत पर बहुत बुरा असर पड़ेगा। उदाहरण के लिए, पेटीएम, ओला, ओयो, स्नैपडील, स्विगी जैसी कम्पनियों में भी चीन की अलीबाबा, टेनसेंट, दीदी युसिंग जैसी कम्पनियों के बड़े शेयर्स हैं।

इसके अलावा केमिकल और फार्मास्युटिकल दो ऐसे क्षेत्र हैं, जिनमें अभी चीन पर निर्भरता है। इन्हें सरकार अभी बन्द करने की स्थिति में नहीं है। हालाँकि एंटीबायोटिक्स के क्षेत्र में सरकार ने स्विट्जरलैंड और इटली की पहचान विकल्प के रूप में की है। न्यूक्लियर रिएक्टर, बॉयलर, आदि कुछ महत्त्वपूर्ण वस्तुओं के लिए भी यूरोपियन देशों से चर्चा है। ऑटो पार्ट्स और कीटनाशक के क्षेत्र में भी विकल्प तलाशे जा रहे हैं। कीटनाशक के क्षेत्र में जैविक कीटनाशक के उत्पादन को बढ़ाने पर मुख्य प्रतिबल है।

वाणिज्यिक संबंधों के अंतर्गत यही सरकार की मजबूरी है। लेकिन हमारी तो मजबूरी नहीं है। सरकार चाहे खुल कर मना न कर सके, हम बहुत कुछ कर सकते हैं। लैपटॉप, वाशिंग मशीन, टीवी, एयर कंडीशनर, बर्तन, पंखे, सूटकेस आदि कुछ ऐसे क्षेत्र हैं, जहां हम यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि कहीं हम चीन का बना तो नहीं खरीद रहे।

जानना चाहिए कि हमारे स्मार्टफोन बाजार में हमारा यह दुश्मन ही 70 फीसदी है, टेलीकॉम में 45 फीसदी है। इन दोनों क्षेत्रों में अगर हम अपने पर आ गए, तो चीनी उत्पादकों को दिन में तारे दिखने लगेंगे। एक अध्ययन के अनुसार अगर जागरूक होकर हम अगले एक साल तक चीन से होने वाले आयात को पचास प्रतिशत भी कम कर सके, तो घरेलू मैन्युफैक्चरिंग को 30-35 अरब डॉलर मिल सकता है और चीन से व्यापार बहुत हद तक संतुलन में आ सकता है। सोचिए, मात्र हमें जागरुक होना है।

ध्यातव्य है कि चीन आईटी और फार्मा कंपनियों को अपने बाजार में उत्पाद बेचने की इजाज़त नहीं देता है और हम उसे कॉटन, यार्न, मेटल, स्टोन आदि चीजें ही निर्यात कर रहे हैं। तथ्य है कि लघु और कुटीर उद्योगों के संवर्धन में ही भारत का भविष्य छिपा है, पर देशहित की परवाह किए बिना हम स्टेशनरी, बच्चों के बर्थडे तक के गुब्बारे, चार्ट, खिलौने आदि चीन का बना ले आते हैं क्योंकि वे दो पैसे सस्ते मिल जाते हैं।

भारतीय वस्तुओं को वैश्विक बाजार में टिकाऊ और गुणवत्तापूर्ण माना जाता है, पर हम स्वयं इसे प्राथमिकता नहीं देते। उदाहरण के लिए मध्य प्रदेश के खंडवा में चीन की ही तर्ज पर 300 लघु उद्योग घरों से चलाये जा रहे हैं जिसमें बिजली के उपकरण आदि बनाए जा रहे हैं। बहुत ही कम समय में यहाँ के उत्पादों ने अपनी एक पहचान बना ली है। इसी तरह, कॉस्मेटिक्स में तो भारत के हर्बल उत्पादों की तो विश्व में कोई सानी नहीं है पर हम मँहगे विदेशी ब्रांड्स के पीछे भागते हैं।

चीनी माल यहाँ आए ही नहीं, यह करने की स्थिति में सरकार नहीं है। सरकार धीरे से हमें आत्मनिर्भरता, वोकल फ़ॉर लोकल आदि कह ही रही है। हम फर्ज निभाएं! यथासंभव  स्वदेशी अपनाएं! पेस्ट और साबुन से लेकर खिलौने और बिजली के उपकरण तक लेते समय जब हम देश का बना देखने लगेंगे तो आर्थिक विशेषज्ञ मानते हैं कि ज़ल्द ही तस्वीर बदल जाएगी।

देशभक्ति शब्दों में नहीं, आचरण में हो। सोशल मीडिया पर देशभक्ति प्रदर्शित करने से कहीं अच्छा है कि कुछ ठोस कीजिए। अपने पैसे से दुश्मन को मज़बूत मत कीजिए। हाँ, कुछ लोग मज़ाक उड़ाएँगे क्योंकि उन्हें नहीं पता कि वे अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं, अपने ही घर को कमज़ोर कर रहे हैं।