नवज्ञानोदय की भारतीय वैचारिकी

    दिनांक 18-जून-2020
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प्रो. राघवेन्द्र प्रसाद तिवारी

आज के बदलते संदर्भों में गुरु की भूमिका भी उत्तरोत्तर महत्वपूर्ण होती जा रही है। छात्रों के साथ निकट सहयोग और उनसे भी सीखने की एक ललक गुरु में हो तो जीवनोपयोगी शिक्षा का आधार मजबूती प्राप्त करता है

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छात्रों और शिक्षक के बीच आत्मीयतापूर्ण व्यवहार संवाद में सहायक होता है 

शिक्षा का मुख्य उद्देश्य मनुष्य के ‘स्व’ का विस्तार करते हुए उसके जीवन एवं रोजगार कौशल हेतु आवश्यक संरचनाओं एवं प्रकार्यों के लिए आधारभूत विकल्प उपलब्ध कराना है। परिवर्तनशील सन्दर्भों में आधुनिक शिक्षा इन उद्देश्यों की पूर्ति नहीं कर पा रही है। सामान्यत: यह देखा गया है कि नियोक्ताओं को अपेक्षित कौशल के अभाव में उच्चतम डिग्रीधारकों के लिए भी ‘कौशल-वृद्धि और पुनर्विकास’ की व्यवस्था करनी पड़ती है। अत: यह महत्वपूर्ण है कि हमारे विद्यार्थी ऐसे बुनियादी कौशलों से युक्त हों जिससे वे परिवर्तनशील, जटिल और महत्वाकांक्षी कार्यस्थल से भी सामंजस्य बैठा सकें। अधिगम के इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए ज्ञानगुरुओं को स्वयं को दक्ष एवं कौशलयुक्त बनाना होगा। हिन्दू स्मृति-ग्रन्थों में अधिगम से सम्बन्धित एक महत्वपूर्ण दर्शन प्रस्तुत किया गया है-
‘‘आचार्याथ पादम् आदत्थे, पादम् शिष्या स्वमेधया।
पादम् सा ब्रह्मचारिभ्या, शेषम् काल क्रमेण चा।।’’

अर्थात् व्यक्ति एक चौथाई ज्ञान अपने ज्ञानगुरु से, एक चौथाई आत्मविश्लेषण से, एक चौथाई दूसरों से शास्त्रार्थ करके तथा शेष एक चौथाई ज्ञात आचार या नए आचारों में योग, सुधार एवं संशोधन द्वारा अर्जित करता है। अधिगम का यह दृष्टिकोण वर्तमान और भविष्य के लिए भी प्रासंगिक है। आधुनिक ‘मैसिव ओपन आॅनलाइन कोर्सेज’ के ‘चतुर्थांश’ जैसेकि, ई-ट्यूटोरियल्स, ई-कंटेंट्स, मूल्यांकन एवं विमर्श-मंच संयोगवश हमारी उपरोक्त प्राचीन शिक्षा पद्धति से बहुत समानता रखते हैं। अत: 21वीं सदी के ज्ञानगुरु को गढ़ने के लिए भारतीय ज्ञान-दृष्टिकोण को पुनर्परिभाषित करना होगा।

प्राचीन भारतीय ज्ञान-परंपरा में ज्ञानगुरुओं की छह उपाधियां थीं-अध्यापक (सूचना प्रदायक), उपाध्याय (सूचना-ज्ञान प्रदायक), आचार्य (ज्ञानयक्त कौशल प्रदायक), पंडित (अंतर्दृष्टि प्रदायक), दृष्टा (आलोचनात्मक चिंतन प्रदायक) और गुरु (प्रबोधन प्रदायक)।
स्वामी विवेकानन्द के अनुसार शिक्षा मनुष्य में अंतर्निहित पूर्णता की अभिव्यक्ति है। उनका मानना था कि शिक्षा व्यक्ति-निर्माता, जीवनदायिनी और चरित्र निर्मात्री होनी चाहिए। शिक्षा का मुख्य कार्य मन की शक्ति, बुद्धिमत्ता एवं स्वावलम्बन में वृद्धि करना है। इस सन्दर्भ में डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम द्वारा प्रस्तावित 21वीं सदी का ‘शिक्षा मॉडल’ महत्वपूर्ण है, जिसमें शोध और अनुसंधान, सृजनशीलता और नवोन्मेष, उच्चस्तरीय तकनीकी प्रयोग की क्षमता, उद्यमिता और नैतिक नेतृत्व जैसे प्रमुख पांच मुख्य घटक बताये गये हैं।  गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने के लिए हमें कुछ बुनियादी प्रश्नों पर चिन्तन करना होगा, जैसे-क्यों पढ़ायें, किसे पढ़ायें, कौन पढ़ाये, कहां पढ़ायें, क्या पढ़ायें, कैसे पढ़ायें एवं कैसे मूल्यांकन करें। यहां प्रमुख रूप से ‘कौन पढ़ाये’ विषय पर चर्चा करने से पूर्व प्राचीन भारत की बहुप्रचलित गुरुकुल शिक्षा पद्धति पर एक विहंगम-दृष्टि डालनी आवश्यक है।

गुरुकुल शिक्षा: प्रबोधन का स्वायत्त स्वरूप
भारतीय उपमहाद्वीप में लगभग 5000 ई.पू. में आवासीय गुरुकुल ही ज्ञान के प्रमुख केन्द्र थे। गुरुकुल-व्यवस्था राज्याश्रित न होकर समाज-पोषित थी; इसी कारण वे अपनी पाठ्यचर्या, शिक्षण प्रविधि और मूल्यांकन विधि अपनाने के लिए स्वतंत्र थे। जहां कौशल विकास के लिए शिष्यों को निश्चित दिनचर्या का पालन करना पड़ता था। गुरुकुल में शिक्षण के छह चरण होते थे-श्रवण, अभ्यास, अर्थ-बोध, परिणाम-बोध, अर्हिवाद (व्याख्यात्मक अध्ययन) एवं उपपत्ति (निष्कर्ष पर पहुंचना)। ब्लूम (2001) की ‘रिवाइज्ड टैक्सोनामी’ मूल्यांकन एवं सृजन—भी गुरुकुल के उपरोक्त छह चरणों से बहुत अधिक समानता रखते हैं। गुरुकुलों में कथा, दृष्टांत और सुसंगत उदाहरणों के माध्यम से पाठ और प्रसंग को स्पष्ट किया जाता था। समय-समय पर विमर्श और शास्त्रार्थ के भी आयोजन होते थे। गुरु प्रशिक्षक नहीं, बल्कि मार्गदर्शक होते थे। वे सीखने की प्रक्रिया में सहयोगी बनते थे। गुरुकुल में आयोजित विभिन्न गतिविधियों में शिष्यों के प्रदर्शन के आधार पर ही उनका मूल्यांकन होता था। कुल मिलाकर गुरुकुलों में शिष्य आनंदपूर्वक शिक्षा ग्रहण करते थे। गुरुकुल में शिक्षा का लक्ष्य था आत्मविश्वास, अनुशासन, नियंत्रण-कौशल का संवर्धन, चरित्र निर्माण, सामाजिक जागरूकता, व्यक्तित्व-निर्माण, बौद्धिक, आध्यात्मिक एवं भावनात्मक विकास, तार्किक चिंतन, ज्ञान एवं संस्कृति का संरक्षण तथा संवर्द्धन। अत: प्रबुद्ध भारत में आध्यात्मिक, बौद्धिक एवं सुसंस्कृत पीढ़ी के निर्माण हेतु प्राचीन गुरुकुल शिक्षा प्रणाली को पुनरस्थापित करने की आवश्यकता है। 

श्रेष्ठ शिक्षा-प्रणाली विद्यार्थी एवं रचना केंद्रित होती है। इस हेतु भावनात्मक, संज्ञानात्मक, आध्यात्मिक और सृजनात्मक आयामों का सन्दर्भजनित पुनर्प्रतिष्ठापन पाठ्यचर्या, सह-पाठ्यचर्या और अतिरिक्त पाठ्यचर्या में किया जाना आवश्यक है। इस उपक्रम में ज्ञानगुरु की भूमिका स्वत: ही महत्वपूर्ण हो जाती है। वह युवा मन को जिज्ञासु बनाने, सुरक्षित और उत्साहवर्द्धक वातावरण-निर्माण करने तथा समस्याओं के समाधान के लिए सही मार्ग चुनने में उनकी सहायता करता है।

आत्मप्रतिमा एवं पुन:स्थापना
विद्यार्थियों की वर्तमान पीढ़ी की तकनीकी पर अत्यधिक निर्भरता एवं ध्यानाकर्षण की कमी ने शिक्षा-विमर्श के समक्ष नयी चुनौतियां प्रस्तुत की हैं। शिक्षक एवं विद्यार्थियों के बीच लगातार बढ़ती संवादहीनता एक प्रमुख शिक्षणशास्त्रीय संकट है। ऐसे में सहज संवाद के लिए परिस्थितियां तैयार करना एक नवाचार होगा। सहभागितापूर्ण एवं परस्पर संवादी शिक्षण को नवीन शैक्षणिक-विमर्श के रूप में देखा जा सकता है। इस शिक्षा-विमर्श के अनुसार ज्ञानगुरु बनने के लिए प्राथमिक तौर पर निम्नलिखित सात प्रविधियों को व्यवहृत किये जाने की आवश्यकता है।

अनुकूलन का मूर्तिमान स्वरूप
‘एक मानक सभी के लिए सार्थक’ वाली मान्यता का समय अब नहीं रहा। स्वामी विवेकानन्द के अनुसार प्रत्येक मनुष्य एकाधिक बुद्धिमत्ता से परिपूर्ण है, जिसकी पुष्टि ‘हावर्ड गार्डनर’ ने अपनी पुस्तक ‘फ्रेम्स आॅफ माइण्ड:द थियरी आॅफ मल्टीपल इंटेलीजेंसिज’ में ‘एकाधिक बुद्धिमत्ता सिद्धान्त’ के माध्यम से की है। उनके अनुसार बुद्धिमत्ता के आठ प्रकार हैं। यह आवश्यक नहीं है कि प्रत्येक विद्यार्थी सभी प्रकारों में समान रूप से दक्ष हो। आज के शिक्षक में अनुकूलन की पर्याप्त क्षमता होनी चाहिए, जिससे वह विद्यार्थियों को उनकी विशेष योग्यता के अनुकूल उनके विकास में सहयोग कर सके। साथ ही वह शिक्षा के बदलते परिवेश के सापेक्ष स्वयं को भी परिवर्तित कर सके, पाठ्यपुस्तक पर अपनी निर्भरता से आगे बढकर नवाचारों का समावेश कर सके। गुरुओं से अपेक्षा है कि वे विद्यार्थियों से विचार-विमर्श करते रहें एवं उनके प्रश्नों का समाधान पाने में सहभागी बनें। इस परिस्थिति में ‘फ्लिप्ड शिक्षण विधि’ उपयोगी हो सकती है, जिसमें कक्षा एवं उसके बाहर विद्यार्थी एवं शिक्षक सहभागी होकर ज्ञान-सृजन में प्रवृत्त हो सकें। ज्ञानगुरुओं को सीखने-सिखाने की मिश्रित प्रणाली को भी अपनाने की आवश्यकता है। इस तरह ‘सुधार, प्रदर्शन एवं परिवर्तन’ के प्रारूप को आत्मसात करके ही ज्ञानगुरु अनुकूलन की क्षमता से युक्त हो सकता है।

 तकनीकी दक्षता का अभिप्रेरक
तकनीकी-दक्ष ज्ञान गुरुओं को अपने विद्यार्थी से आत्मीय रिश्ता बनाने में सहयोग मिलता है, जिससे सीखने-सिखाने की प्रक्रिया अत्यंत सहज हो जाती है। ऐसे समय में जब सारे शैक्षणिक परिसर डिजिटल हो रहे हैं, अधिगम में तकनीकी का उपयोग न करने वाले शिक्षक विद्यार्थियों को अकेला छोड़ रहे हैं। आज के शिक्षकों को विद्यार्थियों में अच्छी आदतों के संस्कार रोपित करने की कला आनी चाहिए। आज के विद्यार्थी स्क्रीन से सीखने में अधिक सहज हैं। कक्षा में ‘स्क्रीन इन्वायरमेंट’ निर्मित करके विद्यार्थियों की इस सहजता को सीखने की लगन में कैसे परिवर्तित करें, इस पर विचार करना आवश्यक है। तकनीकी-जगत की उपलब्धियों का लाभ उठाते हुए विद्यार्थियों की जिज्ञासा को जगाना एवं कक्षायी अधिगम से आगे बढ़कर विद्यार्थियों को सीखने के लिए प्रेरित करना ही आज के ज्ञानगुरुओं का मंतव्य होना चाहिए। शिक्षा का यह वैश्विक धरातल उन्हें विभिन्न संस्कृतियों, कार्य-पद्धतियों एवं वातावरण को समझने का विरल अवसर प्रदान करता है।

अनुभवों का सर्जक
आजकल ‘प्रायोगिक एवं अनुभवयुक्त ज्ञान’ चिंतन का केन्द्र्रीय विषय है। युवा-मन को किसी संकल्पना को समझने एवं उसे लम्बे समय तक स्मरण में रखने के लिए उद्दीप्तिकारक अनुभवों की आवश्यकता है। विभिन्न संदर्भों पर देशीय, क्षेत्रीय एवं स्थानीय उदाहरणों के द्वारा विषय-वस्तु को समझाने की प्रक्रिया अपनाने से विद्यार्थियों में आत्मबोध की भावना जाग्रत होगी। देश के महापुरुषों, समाज सुधारकों एवं वैज्ञानिकों के योगदानों से विद्यार्थियों को अवगत कराने से उनमें आत्मविश्वास एवं देश के प्रति सम्मान एवं गौरव उत्पन्न होगा। ज्ञानगुरु को ऐसे पाठ्यक्रम, पाठ्य-सामग्री एवं पाठ्य-योजना तैयार करनी होगी जिससे वे प्रायोगिक प्रदर्शनों के आयोजन से विद्यार्थियों की चेतना को प्रखर करने में सहयोगी हो सके।


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वर्चुअल कक्षा आज के दौर की एक वास्तविकता बन चुकी है

शिक्षा का वास्तविक अर्थ ‘गतिविधि आधारित शिक्षा’ है। उदाहरण के तौर पर तैरते-तैरते तैरना सीखना। इस सदी के गुरु को यह सुनिश्चित करना होगा कि विद्यार्थीगण न केवल सीखें बल्कि उस ज्ञान का अनुप्रयोग, विश्लेषण करते हुए उसे आत्मसात कर नए ज्ञान का सृजन कर सकें। इस सन्दर्भ में एक महत्वपूर्ण बात और ध्यान में आती है कि हम अपने विद्यार्थियों को रोजगार विकल्पों के चयन में आवश्यकतानुसार सहायता नहीं कर पाते। हमें उन्हें प्रोत्साहित करना चाहिए कि वे विभिन्न रोजगारों से सम्बद्ध लोगों से बातचीत कर उनकी बारीकियों को जानें-समझें।

विद्यार्थी बोध आवश्यक
आजकल विद्यार्थी ज्ञानार्जन हेतु आॅनलाइन तकनीक पर ज्यादा निर्भर हैं। अत: एक शिक्षक को स्वयं एवं अपने विद्यार्थियों को इस बात के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए कि वे पाठ्यक्रम से चयनित विषयों का शोध-विश्लेषण आॅनलाइन शिक्षण तकनीक एवं संसाधनों के माध्यम से करते हुए विद्यमान ज्ञान को समृद्ध कर, नूतन ज्ञान का सृजन कर सकें। इन परिस्थितियों में आज के गुरुओं को विद्यार्थियों के निष्कपट प्रश्नों से हारने के लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए। संस्कृत में एक श्लोक है कि ‘सर्वतो जयमिच्छेत। पुत्राच्छिष्यात्पराजयम्।।’ अर्थात सबको जीतना चाहता हूं, लेकिन पुत्र और शिष्य से पराजय की इच्छा रखता हूं। इनके हाथों पराजय में भी परम विजय निहित होती है।' यहां विद्यार्थियों के निष्कपट प्रश्नों से हारने का अभिप्राय यही है। विद्यार्थियों की जिज्ञासा की पूर्ति के लिए यह आवश्यक है कि गुरु जीवनपर्यंत एक विद्यार्थी भी बना रहे, जो न केवल विद्यार्थियों के साथ सीखे बल्कि उनसे भी सीखे। हो सकता है, हमने आज जो सीखा, वह कल प्रासंगिक न हो। इसीलिए ज्ञानगुरु को विद्यार्थियों को ‘सीखने, भूलने और पुन: सीखने’ की कला भी सिखानी होगी ताकि वे भविष्य के कार्यों को कुशलतापूर्वक निष्पादित कर सकें। 

गौरव का उन्नायक
शिक्षाविदों के चिंतन का मूल निष्कर्ष यही है कि ‘शिक्षा अर्थार्जन की प्रक्रिया में विद्यार्थियों की सक्रियता महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। ज्ञानार्जन की इसी प्रक्रिया में वे अपने सीखने की दशा एवं दिशा के लिए स्वयं उत्तरदायी हो सकते हैं। सहभागी शिक्षा और साझा मंचों की सहज एवं लोकतांत्रिक उपलब्धता ने विद्यार्थियों के लिए एक अलग ज्ञान-समाज की रचना की है। जहां विद्यार्थी का ‘अभ्यास-कार्य’ उसे नये सन्दर्भों एवं आयामों में मूर्तरूप देने का अवसर प्रदान करता है, ज्ञान-सृजन का यह अनुभव ही उसमें उपलब्ध ज्ञान-संरचनाओं से परे जाकर अपनी कल्पनाओं के अनुरूप कुछ नवीन रचने का आत्मविश्वास भरता है। ज्ञान-विमर्श की इस आधुनिक संरचना के लिए भारतीय ज्ञान-विमर्श एक श्रेष्ठ विकल्प उपलब्ध कराता है, जहां विद्यमान समाजोश्रित आत्मनिर्भरता का प्रारूप विद्यार्थी के भीतर ‘ज्ञानार्जन सह अर्थार्जन’ के साथ ही ‘ज्ञानार्जन, अर्थार्जन एवं प्रतिदान’ की अभिवृत्ति का उत्तरोत्तर विकास करेगा। इसी रचनात्मक भूमिका हेतु ज्ञानगुरु को स्वयं को तैयार करना होगा।

निसर्ग का प्रणेता

विद्यार्थियों के श्रेष्ठ, स्वाभाविक एवं सहज ज्ञानार्जन हेतु उन्हें प्रकृति के साहचर्य का महत्व बताना आवश्यक है। वर्तमान शिक्षा-प्रणाली में प्रकृति एवं उसके उपादान सिर्फ एक उद्दीपन के रूप में प्रयुक्त होते हैं। यह प्रविधि विद्यार्थियों को उपभोक्ता एवं प्रकृति को उपभोग्य सामग्री के रूप में प्रस्तुत करती है। इस प्रवृति के कारण मनुष्य प्राकृतिक संसाधनों के अबाध दोहन को ही अपना पुरुषार्थ मान लेता है। ज्ञानगुरु के लिए अपरिहार्य है कि वह अपने विद्यार्थियों के भीतर प्रकृति के प्रति रागात्मक सम्बन्ध विकसित करे। उन्हें इस तथ्य से परिचित कराये कि सृष्टि का मूल प्रकृति है। इसमें मनुष्य का सकरात्मक हस्तक्षेप उसे संस्कृति में और नकारात्मक हस्तक्षेप विकृति में बदल देती है। सीखने की प्रक्रिया को प्रकृति-सम्मत होनी चाहिए जिससे विद्यार्थियों में प्रकृति के प्रति लगाव के साथ संवेदनशीलता एवं सहअस्तित्व का बोध उत्पन्न हो सकेगा।

 संस्कृति का संवाहक
शिक्षा एक सोद्देश्य प्रक्रिया है जिसमें एक जैविक प्राणी को सामाजिक प्राणी में रूपान्तरित किया जाता है। रूपान्तरण की यह प्रक्रिया संस्कृति द्वारा उपलब्ध कराये गये उपादानों के माध्यम से घटित होती है। शिक्षा द्वारा सामाजिक प्राणी में रूपान्तरित विद्यार्थी के भीतर उचित-अनुचित के विवेक का बोध कराया जाता है। शिक्षा की यह प्रक्रिया प्राय: संस्कृति द्वारा संचालित एवं निर्देशित होती है। ज्ञानगुरु को अपनी अन्य भूमिकाओं के साथ ही संस्कृति का पोषक एवं संवाहक भी होना चाहिए, जिससे कि वह नये युग के विद्यार्थियों में सांस्कृतिक संचेतना एवं संवेदना का संचार कर सके। इन गुणों से पूर्ण विद्यार्थी ही मानवीय-मूल्यों से युक्त एक नये संवेदी समाज के निर्माण में सक्रिय सहभागी बन सकता है।

शिक्षक की भूमिका महत्वपूर्ण
शिक्षा का वास्तविक अर्थ शरीर और मन का प्रबोधन है। इस सन्दर्भ में यह एक सतत अभ्यास है। इन अभ्यासगत शैक्षणिक संरचनाओं एवं प्रक्रियाओं के माध्यम से मनुष्य विचार और चेतना के स्तर को गुणात्मक रूप से अनवरत समृद्ध करता है। वास्तविक अधिगम जीवन के विभिन्न पक्षों, व्यावहारिक और प्रायोगिक ज्ञान पर केन्द्रित होता है। श्रेष्ठ शिक्षा-प्रणाली विद्यार्थी एवं रचना केंद्रित होती है। इस हेतु भावनात्मक, संज्ञानात्मक, आध्यात्मिक और सृजनात्मक आयामों का सन्दर्भजनित पुनर्प्रतिष्ठापन पाठ्यचर्या, सह-पाठ्यचर्या और अतिरिक्त पाठ्यचर्या में किया जाना आवश्यक है।

   इस उपक्रम में ज्ञानगुरु की भूमिका स्वत: ही महत्वपूर्ण हो जाती है। वह युवा मन को जिज्ञासु बनाने, सुरक्षित और उत्साहवर्द्धक वातावरण-निर्माण करने तथा समस्याओं के समाधान के लिए सही मार्ग चुनने में उनकी सहायता करता है। आधुनिक समय में गुरु को अपनी परपंरागत भूमिका को पुनर्मूल्यांकित करना होगा। सतत् विकासीय वैश्विक ज्ञान-संदर्भों  में सूचना एवं तकनीक की भूमिका अपरिहार्य है, जहां उपलब्ध सूचनाओं को सन्दर्भगत करते हुए ‘आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस’ की अवधारणा ज्ञानगुरु के अस्तित्व को नया अर्थ प्रदान करती है। ऐसा शिक्षक अपने विद्यार्थियों में आलोचनात्मक चिंतन-विश्लेषण की क्षमता को विकसित करते हुए उन्हें वैश्विक नागर-समाज का सचेत हिस्सा बनने के अवसर देता है। और ऐसा होने पर ही ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ का आदर्श पुन: फलीभूत हो सकेगा। 
(लेखक डॉक्टर हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर (म.प्र.) के कुलपति हैं)