फिर सुलगाई जा रही है अलगाववाद की आग

    दिनांक 18-जून-2020   
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पंजाब में एक बार फिर से ‘खालिस्तान’ आंदोलन को हवा देने की कोशिश की जा रही है। कुछ विदेशी ताकतें अलगाववादी तत्वों को हवा दे रही हैं। खुफिया एजेंसियों से मिल रही सूचनाएं और हाल के घटनाक्रम चिंताजनक तस्वीर पेश करते हैं

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‘खालिस्तान आंदोलन’ के पक्ष में बयान देने वाले (बाएं से) जत्थेदार ज्ञानी हरप्रीत सिंह और भाई गोबिंद सिंह लोंगोवाल
स्वर्ण मंदिर परिसर में ‘खालिस्तान आंदोलन’ के समर्थन में नारे लगाते कुछ सिख (फाइल चित्र)


अमृतसर के श्रीअकाल तख्त साहिब के जत्थेदार ज्ञानी हरप्रीत सिंह ने गत दिनों कहा है, ‘‘खालिस्तान की मांग जायज है, अगर केंद्र सिखों को खालिस्तान देता है तो सिख इससे इंकार नहीं करेंगे।’’ वहीं शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के अध्यक्ष भाई गोबिंद सिंह लोंगोवाल ने शिकायत की है, ‘‘सिख भारत में बेगानापन महसूस कर रहे हैं।’’

6 जून, 1984 को श्रीहरिमंदिर साहिब को आतंकियों के चंगुल से मुक्त करवाने के लिए सेना द्वारा किए गए आॅपरेशन ब्लू स्टार की 36वीं बरसी पर कट्टरवादी संगठनों ने खालिस्तान के समर्थन में नारे भी लगाए। अकाली दल (अमृतसर) के अध्यक्ष सिमरनजीत सिंह मान के बेटे ईमान सिंह मान और सिख यूथ फेडरेशन भिंडरावाला के नेता बलवंत सिंह गोपाला के नेतृत्व में आए कार्यकर्ताओं की पुलिसकर्मियों के साथ हाथापाई भी हुई। पंजाब भाजपा के अध्यक्ष अश्विनी शर्मा ने जत्थेदार ज्ञानी हरप्रीत सिंह के खालिस्तान के बारे में दिए गए बयान को दुर्भाग्यपूर्ण बताया है। शर्मा ने कहा, ‘‘ऐसे महान तख्त के जत्थेदार होने के नाते उन्हें ऐसा बयान नहीं देना चाहिए, जो देश की एकता, अखंडता और पंजाब के सामाजिक सद्भाव को चोट पहुंचाने वाला हो। केवल पंजाबी ही नहीं, बल्कि करोड़ों भारतीयों की आस्था श्री अकाल तख्त साहिब में है और इस बयान से करोड़ों लोगों की भावनाएं आहत हुई हैं। पंजाब ने पहले ही बहुत संताप झेला है, हजारों निर्दोष पंजाबियों को अपनी जान गंवानी पड़ी है। पंजाबियों ने खालिस्तान के विचार को हमेशा नकारा है और अनगिनत बलिदान देकर पंजाब में शांति व भाईचारा स्थापित किया है।’’ वहीं पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय बेअंत सिंह के पुत्र और सांसद रवनीत सिंह बिट्टू ने भी देश को तोड़ने वाले इन बयानों की निंदा की है।

निष्पक्ष तौर पर देखा जाए तो ज्ञानी हरप्रीत सिंह और भाई गोबिंद सिंह लोंगोवाल ने जो बयान दिए हैं वे दुर्भाग्यपूर्ण और भ्रम फैलाने वाले हैं। दोनों व्यक्ति उन पदों पर बैठे हैं जिन्हें सिख समाज हमेशा आशाभरी निगाहों से देखता है व जिनसे मार्गदर्शन लेता है, लेकिन जिस तरह का बयान देकर सिख समाज में भ्रम फैलाया व राष्ट्रभक्त देशवासियों की भावनाओं को ठेस पहुंचाया गया, वह अति दुर्भाग्यपूर्ण है। जिस प्रकार के भाव ज्ञानी हरप्रीत सिंह व सरदार गोबिन्द सिंह ने प्रकट किए हैं, ऐसी ही बयान आॅपरेशन ब्लू स्टार से करीब एक दशक पहले शुरू हो गए थे। राजनीतिक स्वार्थ के लिए देश की अखण्डता को चुनौती देना और देश की जनता की भावनाओं से खिलवाड़ करने का सिलसिला तो पुराना है, लेकिन 1978 में निरंकारियों और जरनैल सिंह भिंडरावाले के अनुयायियों के कदम से पंजाब की राजनीति ने जो करवट बदली उसका परिणाम आॅपरेशन ब्लू स्टार के रूप में सामने आया। 1978 से लेकर 1984 और फिर उसके बाद आॅपरेशन ब्लैक थण्डर से लेकर तत्कालीन मुख्यमंत्री सरदार बेअंत सिंह के कत्ल तक पंजाब में आतंकवाद व अलगाववाद के कारण राज्य के घर-आंगन व खेत-खलिहान अगर खून से लाल हो गए तो इसका मुख्य कारण ज्ञानी हरप्रीत सिंह और गोबिंद सिंह की तरह महत्वपूर्ण पदों पर बैठे जिम्मेवार लोगों के गैर जिम्मेदराना बयान ही थे। तत्कालीन नेतृत्व ने अगर जिम्मेदारी से अपनी भूमिका निभाई होती तो न आतंकवाद फैलता और न ही आॅपरेशन ब्लू स्टार की नौबत आती।

आज फिर से उसी खून खेल  के लिए मंच सजाने की चेष्टा होती दिखती है। श्रीअकाल तख्त के जत्थेदार और  शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक  कमेटी  के  अध्यक्ष  जो  कह  रहे  हैं उससे सिख समाज  भ्रमित हो सकता है। भ्रमवश अगर कुछ सिख नौजवान एक बार फिर मार्ग भटकते हैं तो इसके लिए कौन  जिम्मेदार  होगा?

देखा जाए तो इस तरह के गैर-जिम्मेदार बयान, पंजाब का आतंकवाद, आॅपरेशन ब्लू स्टार, तत्काकालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या और दिल्ली के सिख विरोधी दंगे,ये ऐसी घटनाएं हैं जो परस्पर गुंथी हुई हैं। 1970 के दशक में नेताओं ने इस तरह गैर-जिम्मेदाराना बयान न दिए होते, सिखों के साथ अन्याय व भेदभाव की झूठी कहानियां न फैलाई होतीं, ‘पंजाब के हितों की अनदेखी’ का झूठ न खड़ा किया होता तो पंजाब को आतंकवाद के रूप में लगभग ढाई दशक तक संताप न झेलना पड़ता। चिंता की बात है कि आज फिर से उसी खूनी खेल के लिए मंच सजाने की चेष्टा होती दिखती है। श्री अकाल तख्त के जत्थेदार और शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमटी के अध्यक्ष जो कह रहे हैं उससे सिख समाज भ्रमित हो सकता है। भ्रमवश अगर कुछ सिख नौजवान एक बार फिर मार्ग भटकते हैं तो इसके लिए कौन जिम्मेदार होगा? खालिस्तान मिलने वाला नहीं, यह बात तो ज्ञानी हरप्रीत सिंह भली-भांति जानते ही हैं। फिर भ्रम फैलाकर सिख नौजवानों को भटकाने की कोशिश क्यों की जा रही है?

1984 में आप्रेशन ब्लू  स्टार होता ही नहीं अगर पांथिक व राजनीतिक पदों पर बैठे वरिष्ठ व्यक्ति जिम्मेदारी से कार्य करते। आतंकियों व देशविरोधी तत्वों ने श्री हरि मंदिर साहिब को देश के खिलाफ एक मजबूत किले में बदल दिया तो उस समय अकाल तख्त व शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी क्यों खामोश रहे? यह तो संभव नहीं कि इनके नियंत्रण वाले गुरुद्वारे में हथियारों का जखीरा एकत्रित होता रहा, आतंकी दनदनाते रहे, निर्दोष लोगों की हत्याओं के फरमान जारी किए जाते रहे और एसजीपीसी व अकाल तख्त के नेतृत्व को इसका भान तक नहीं हुआ?  क्या उस समय का नेतृत्व अपने दायित्वों के प्रति गंभीर रहा? उत्तर है नहीं, क्योंकि यह नेतृत्व गंभीर होता तो स्वर्ण मंदिर रक्त-पिपासुओं का अड्डा न बनता। पंजाब में 30 हजार निर्दोष हिंदू-सिख न मारे जाते और न ही होता आॅपरेशन ब्लू स्टार। पंजाब में 1980 के दशक में जितना खून बहा है उसे कोई नहीं भुला सकता, लेकिन हमें यह बात भी नहीं भूलनी चाहिए कि देश की एकता व अखण्डता को चुनौती देने वाला चाहे कोई बड़े से बड़ा व्यक्ति हो या संगठन, उसको देश हल्के में नहीं ले सकता। देश की एकता-अखण्डता से बड़ा कोई नहीं है।

आग से खेलने का शौक पालने वालों को ये नहीं भूलना चाहिए कि देश के अंदर व विदेशों में सक्रिय खालिस्तानी तत्व इसी तरह के अवसरों की तलाश में रहते हैं और इस तरह के गैर-जिम्मेदाराना बयानों से इन ताकतों को प्रोत्साहन मिलता है। सोशल मीडिया पर खालिस्तानी तत्वों की सक्रियता व समय-समय पर इस आतंकवाद से जुड़े लोगों की होने वाली गिरफ्तारियां बताती हैं कि देश में खालिस्तानी आतंकवाद की आग बुझी तो है, परंतु पूरी तरह शांत नहीं हुई है। ऊपर से गुरुद्वारा एक्ट-1925 के तहत भारतीय संविधान व्यवस्था के अंतर्गत देश की एकता, अखण्डता की सौगंध खाकर चुने जाने वाले शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के अध्यक्ष देश को तोड़ने का समर्थन करते हैं तो यह संवैधानिक रूप से भी गंभीर अपराध है।

देश के निर्माण में सिख समाज का कितना बड़ा योगदान है और सिख समाज को देश में कितनी स्वतंत्रता व समानता है, इस पर कभी कोई संदेह नहीं किया जा सकता, परंतु आग से खेलने का काम बंद होना चाहिए।