गंभीर रोग, गहन अनुसंधान

    दिनांक 18-जून-2020
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नलिन चौहान
आज देश ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में कोरोना वायरस के संक्रमण का सामना करने के लिए दवा बनाने की पुरजोर कोशिश हो रही है। ऐसे में यह जानना दिलचस्प होगा कि भारत में पश्चिमी चिकित्सा अनुसंधान  कब-कब और कैसे आगे बढ़ा

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1845 में स्थापित इस मुम्बई मेडिकल कॉलेज  ने चिकित्सा अनुसंधान में बहुत बड़ा योगदान दिया है
हम सबको पता है कि 18वीं सदी के भारत में अंग्रेजों के आगमन के साथ पश्चिम का विज्ञान भी पहुंचा। 1784 में विलियम जोन्स ने वैज्ञानिक अनुसंधान में अपनी रुचि के अनुरूप कलकत्ता में ‘एशियाटिक सोसाइटी आॅफ बंगाल’ की स्थापना की। इसने तब के हिन्दुस्थान में वैज्ञानिक गतिविधियों के विकास में प्रमुख भूमिका निभाई। सोसाइटी ने 1788 में पहली बार ‘एशियाटिक रिसर्च’ का प्रकाशन किया। यह भारत में अपनी तरह का पहला प्रकाशन था, जिसका नाम 1832 में बदलकर ‘जर्नल आॅफ द एशियाटिक सोसाइटी आॅफ बंगाल’ कर दिया गया। इसी वर्ष कलकत्ता में ‘द मेडिकल एंड फिजिकल सोसाइटी आॅफ कलकत्ता’ बनी। इस सोसाइटी की कार्यवाही का प्रकाशन ही भारत की पहली ‘पेशेवर चिकित्सा पत्रिका’ के रूप में सामने आया। 1835 में मद्रास और कलकत्ता तथा 1845 में बंबई में मेडिकल कॉलेज शुरू हुए।

1857 की लड़ाई के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी के भंग होने और और भारत में अंग्रेज सरकार की स्थापना का परिणाम यह हुआ कि 1869 में चिकित्सा अनुसंधान को एक संगठित स्वरूप दिया गया। बाद में तीनों प्रेसीडेंसी (बंगाल, मद्रास और बम्बई) को मिलाकर 1896 में एक अखिल भारतीय चिकित्सा सेवा (आॅल इंडिया मेडिकल सर्विस) गठित की गई। इस प्रकार चिकित्सा अनुसंधान क्षेत्र में अनेक कदम उठाए गए और 1911 में भारतीय अनुसंधान कोष संघ सहित अनेक उच्चस्तरीय प्रयोगशालाएं बनाई गर्इं। 1914 में सर आशुतोष मुखर्जी ने पहले अध्यक्ष के रूप में कलकत्ता में हुई भारतीय विज्ञान कांग्रेस का उद्घाटन किया। 1916 में कलकत्ता में भारतीय प्राणी सर्वेक्षण स्थापित किया गया। 1917 में जगदीश चंद्र बोस ने कोलकाता में जैव-शोध क्षेत्र में अग्रणी और प्रसिद्ध बोस संस्थान बनाया। 1932 में कोलकाता में अखिल भारतीय स्वच्छता और सार्वजनिक स्वास्थ्य संस्थान की स्थापना हुई। आज यह शिक्षण, प्रशिक्षण और अनुसंधान के क्षेत्र में एक अग्रणी संस्थान है।


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1897 में मुक्तसर (पंजाब) में स्थापित प्रयोगशाला। चिकित्सा अनुसंधान के क्षेत्र में इसका बहुत नाम था। 


दुनिया में उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में होने वाले रोगों के निदान के लिए 19वीं सदी के अंतिम 20 वर्ष में दवाई पर काम आरंभ हुआ। इसी क्रम में 1880 में चार्ल्स लेवरन ने मलेरिया का परजीवी, 1877-80 में वांडेक कार्टर ने बार-बार होने वाले सर्पिलम बुखार के कारण ओर 1884-85 में कोच ने भारत और मिस्र, दोनों देशों में हैजे के विब्रियो की खोज की। 1897 में इंडियन मेडिकल सर्विस के रोनाल्ड रॉस मलेरिया के फैलाव में एनोफिलीज मच्छरों की भूमिका को दर्शाने और उसकी भूमिका को स्थापित करने में सफल रहे। इससे भारत में चिकित्सा अनुसंधान में नए आयाम खुले।

1859 में बने रॉयल कमीशन द्वारा 1863 में सौंपी गई रिपोर्ट में मद्रास, बम्बई और बंगाल में सार्वजनिक स्वास्थ्य आयोग बनाने की सिफारिश की गई। शीघ्र ही इन आयोगों के स्थान पर बदल करते हुए हर प्रेसीडेन्सी में एक स्वच्छता आयुक्त के साथ एक सहायक नियुक्त कर दिया गया। ब्रिटिश भारत के दूसरे प्रांतों में ‘सैनेटरी इंस्पेक्टर-जनरल’, जिन्हें बाद में ‘सैनिटरी कमिश्नर’ या स्वच्छता आयुक्त कहा जाता था, नियुक्त किए गए और सफाई तथा टीकाकरण के काम से जुड़े कर्मचारियों को धीरे-धीरे उनके साथ समाहित कर दिया गया। 1888 में लॉर्ड डफरिन के समय में अंग्रेज सरकार ने स्वच्छता के मामले को लेकर स्थानीय निकायों और ग्राम पंचायतों को उनके कर्तव्यों का स्मरण करवाते हुए एक प्रस्ताव पारित किया। 1910 में भारत सरकार में गृह विभाग को शिक्षा, सफाई सहित प्रशासन के कुछ दूसरे विभागों के कामकाज से राहत देने के लिहाज से एक नया विभाग बनाया गया। इसके अलावा, स्थानीय निकायों ने सार्वजनिक स्वच्छता को लेकर सम्मेलन आयोजित किए और बम्बई, मद्रास और लखनऊ में तीन अखिल भारतीय सफाई सम्मलेन हुए। इन सम्मेलनों की अध्यक्षता सर हरकोर्ट बटलर ने की।

प्लेग आयोग की रिपोर्ट (1898-99) के परिणामस्वरूप भारत में लॉर्ड कर्जन के समय अंग्रेज सरकार ने स्वच्छता विभाग के पुनर्गठन का कदम उठाया। उस समय अनेक अनुसंधान संस्थान शुरू किए गए और भारत सरकार में स्वच्छता आयुक्त के पद का सृजन और नियुक्ति हुई। इस अधिकारी का कार्य स्वच्छता और जीवाणु संबंधी विषयों पर भारत सरकार को सलाह देना, स्थानीय निकायों के साथ इन विषयों को लेकर भविष्य की योजनाओं की तैयारी और क्रियान्वयन तथा देशभर में स्वच्छता को लेकर अनुसंधान को सुनिश्चित करना था। जबकि जीवाणु विभाग और अनुसंधान के लिए आवश्यक मानव संसाधन से लेकर प्रशासन तक के संबंध में निर्णय लेने का अधिकार ‘इंडियन मेडिकल सर्विसेज’ के महानिदेशक को दिया गया।

भारत सरकार का स्वच्छता आयुक्त पूरे देश का भ्रमण करने वाला एक ऐसा अधिकारी था, जिसे स्थानीय निकायों के साथ अनौपचारिक रूप से परामर्श करने और सलाह देने का अधिकार था। देश के हर प्रांत में ‘स्वच्छता बोर्ड’ बनाए गए। देश में सार्वजनिक स्वास्थ्य की समस्याएं जटिल थीं। यह बात इस तथ्य से साबित होती है कि कीड़ों के काटने से रोग का प्रसार एक महत्वपूर्ण कारक था। इसी कारण से सार्वजनिक स्वास्थ्य विभाग के विकास की दिशा में शुरुआत की गई। स्वच्छता आयुक्त देशभर में स्वच्छता और टीकाकरण से जुड़े कार्यों और इनके महत्वपूर्ण आंकड़ों की निगरानी करता था। जन स्वास्थ्य आयुक्त और सांख्यिकीय अधिकारी सार्वजनिक स्वास्थ्य के मामलों के लिए जिम्मेदार थे। जबकि भारत सरकार के कर्मचारी देश की जनता के स्वास्थ्य मामलों से संबंधित सर्वेक्षण, योजना, समन्वय, आयोजना और नियमन के कार्य के लिए जिम्मेदार थे।

माना जाता है कि योजनाबद्ध ढंग से चिकित्सा अनुसंधान के प्रयास 1894 से ही आरंभ हो गए थे, जब इंडियन मेडिकल कांग्रेस ने अंग्रेज सरकार को शोध संस्थानों की स्थापना और व्यवस्था करने का आग्रह किया था। भारत सरकार के इन प्रस्तावों पर विचार करने और देश में कुछ महामारियों की घटनाओं के कारण केंद्रीय और प्रांतीय स्तर पर प्रयोगशालाओं की स्थापना के कुछ प्रस्ताव तैयार हुए। इनमें से कुछ प्रस्तावों के फलीभूत होने के कारण अनेक प्रयोगशालाएं स्थापित हुर्इं। आज भी इन प्रयोगशालाओं में से कुछ का अस्तित्व बना हुआ है जो कि एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय संस्थान के रूप में चिकित्सा अनुसंधान क्षेत्र में कार्यरत हैं।


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1896 में मुम्बई में फैली प्लेग महामारी के दौरान इलाजरत मरीज


1893 में आंत्र ज्वर (आंतों के बुखार) और हैजा के प्रकोपों की जड़ तक पहुंचने और उनके उपयुक्त इलाज के लिए आगरा में पी. एच. हॅनकिन के नेतृत्व में ‘बैक्टेरियोलॉजिकल लेबोरेटरी’ की स्थापना की गई।

1896 में बम्बई में प्लेग फैला और यह पूरे देश में व्यापक रूप से फैल गया। ऐसा दावा किया जाता है कि इस पर सर पेर्डे लुकिस ने कहा था, ‘‘प्लेग ने भारत में चिकित्सा अनुसंधान की दिशा में वैसी ही भूमिका निभाई, जैसे करीब 60 साल पहले हैजे ने इंग्लैंड में स्वच्छता के मामले में निभाई थी।’’ 1897 के आरंभ में, एक अंग्रेज अधिकारी डब्ल्यू .एम. हाफकीन, जिन्हें प्लेग की समस्या पर काम करने की जिम्मेदारी दी गई थी, ने एक रोगनिरोधी टीका विकसित किया। इस टीके का पहली बार बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया गया और कुछ संशोधनों के साथ आज भी प्लेग की रोकथाम के लिए यह एक प्रभावी उपाय बना हुआ है। इसके बाद ब्रिटेन, भारत, जर्मनी और रूस ने भारत में प्लेग की महामारी की जांच के लिए अनेक प्लेग आयोगों की स्थापना की गई। पहले भारतीय प्लेग आयोग की महत्वपूर्ण सिफारिशों में एक अनुशंसा, प्लेग की जांच करने के लिए उपयुक्त विशेषज्ञों से युक्त प्रयोगशालाओं की स्थापना और स्वास्थ्य संबंधी गंभीर समस्याओं की रोकथाम के साधनों की व्यवस्था करना था।

सिकंदराबाद में कार्यरत सर्जन-मेजर रोनाल्ड रॉस ने 1897 में एक ऐतिहासिक खोज की। इससे यह बात साबित हुई कि मच्छर ही मलेरिया के वाहक हैं। 1900 में कसौली में पहला ‘पाश्चर इंस्टीट्यूट’ (वैज्ञानिक लुई पाश्चर के नाम पर बना संस्थान) स्थापित किया गया। उसके तीन साल बाद मद्रास स्थित गिडी में बछड़े के लिम्फ (लसीका) की दवा बनाने और जीवाणु विज्ञान से जुड़े सामान्य कार्यों के लिए ‘किंग इंस्टीट्यूट’ बनाया गया।

1903 में डोनोवन ने मद्रास में कालाजार के पीड़ितों के मामले में एक परजीवी तिल्ली की उपस्थिति को साबित किया। अब इस परजीवी तिल्ली को डोनोवन के नाम पर लीशमैनिया डोनवानी के रूप में जाना जाता है। 1904 में रोजर्स ने जीवाणुओं की वृद्धि से यह साबित किया कि यह परजीवी एक पीड़ादायक फ्लैजिलेट था। इन खोजों ने देश में चिकित्सा सेवाओं के दूसरे सदस्यों को भी अनुसंधान कार्य से जुड़ने के लिए प्रेरित किया।

1906 में कसौली में केंद्रीय अनुसंधान संस्थान स्थापित किया गया। 1907 में दक्षिण भारत के कन्नूर में एक और पाश्चर संस्थान खोला गया। इन सभी संस्थानों और प्रयोगशालाओं में अनुसंधान कार्य की उचित सुविधाएं प्रदान की गर्इं।

1905 में भारत सरकार ने अपने अधीन एक जीवाणु विज्ञान विभाग स्थापित करने के लिहाज से वैज्ञानिक कार्य में लगे कर्मचारियों का एक अलग ‘कॉडर’ बनाया। आरंभिक चरण में मूल रूप से 13 अधिकारियों, जिनमें अधिकतर इंडियन मेडिकल सर्विस के सदस्य थे, के साथ इस विभाग का गठन किया गया। इन अधिकारियों को केंद्रीय और प्रांतीय प्रयोगशालाओं में तैनात किया गया। 1911 में इंडियन रिसर्च फंड एसोसिएशन (आईआरएफए), जिसे भारतीय अनुसंधान कोष संघ भी कहा जाता है, की स्थापना हुई। इसका प्राथमिक उद्देश्य संचार के रोगों की रोकथाम के लिए चिकित्सा अनुसंधान, उससे संबंधित ज्ञान का प्रसार और प्रायोगिक कार्यों को प्रोत्साहन देने तथा उनके प्रचार का वाहक बनने के साथ दूसरे क्षेत्रों में भी हो रही अनुसंधान गतिविधियों का वित्तपोषण करना और सहायता देना था। आईआरएफए की स्थापना के दो साल बाद इंग्लैंड में ‘मेडिकल रिसर्च काउंसिल’ बनी। आईआरएफए को बनाने का श्रेय हरकोर्ट बटलर और इंडियन मेडिकल सर्विस के महानिदेशक सर पेर्डे लुकिस को है।

आईआरएफए के संचालक मंडल की पहली बैठक 15 नवंबर, 1911 को मुंबई के परेल स्थित प्लेग प्रयोगशाला में हरकोर्ट बटलर की अध्यक्ष्ता में हुई थी। दूसरी बैठक में एसोसिएशन की आम सभा में चिकित्सा अनुसंधान के प्रसार की दृष्टि से इंडियन मेडिकल रिचर्स का एक जर्नल शुरू करने का निर्णय हुआ। इसका नाम ‘इंडियन जर्नल आॅफ मेडिकल रिसर्च’ रखा गया और उसमें पहले से प्रकाशित हो रहे ‘पाल्यूडिज्म’ नामक प्रकाशन तथा वैज्ञानिक संस्मरणों के रूप में छपे अधिकतर मोनोग्राफों को भी समाहित कर लिया गया। यह जर्नल एसोसिएशन का आधिकारिक प्रकाशन है जो कि जुलाई, 1913 से आज तक नियमित प्रकाशित हो रहा है।

1911 में इंडियन मेडिकल सर्विस के मेजर एस. पी. जेम्स को पीले बुखार और उससे प्रभावित क्षेत्र में अध्ययन की जिम्मेदारी दी गई और भारत में इस रोग की रोकथाम के लिए सुरक्षात्मक उपायों को करने का प्रस्ताव बनाने को कहा गया। 1914 में भारत सरकार ने ‘इंडियन मेडिकल सर्विस’ कैडर के आकार को बढ़ाते हुए विभाग का नया नाम ‘मेडिकल रिसर्च डिपार्टमेंट’ रखा। साथ ही विभाग में अधिकारियों की संख्या को बढ़ाकर 30 कर दिया गया, जिसमें आठ अधिकारियों के वेतन और भत्तों के व्यय का वहन आईआरएफए करता था।इस बीच पहला विश्व युद्ध छिड़ने के कारण इस दिशा में प्रगति बाधित हुई, क्योंकि देश के अधिकांश शोधकर्मी भारतीय सेना में तैनात कर दिए गए। 1909 में केंद्रीय समिति के तहत कसौली में एक केंद्रीय मलेरिया ब्यूरो की स्थापना की गई। 1916 में भारत के लिए एक मलेरिया संगठन की संकल्पना की गई और उसी वर्ष शिमला में हुई इंपीरियल मलेरिया कान्फ्रेन्स के बाद उसे साकार रूप दे दिया गया। एक केंद्रीय मलेरिया समिति सहित भारत के आठ सूबों में एक-एक प्रांतीय मलेरिया समिति गठित की गई।

 1925 में कसौली में केंद्रीय मलेरिया संगठन की स्थापना की स्वीकृति प्राप्त की गई और जो कि भारतीय मलेरिया सर्वेक्षण के नाम से जाना गया। इसके प्रशासन और वित्तपोषण का दायित्व आईआरएफए पर था।आईआरएफए को विशेष सरकारी अनुदान प्राप्त था, पर वह इंग्लैंड के ‘मेडिकल रिसर्च काउंसिल’ की तरह काफी हद तक एक स्वतंत्र निकाय था। एक अंग्रेज अधिकारी सिंटन को इस संगठन का पहला निदेशक नियुक्त किया गया और समस्त जांच-पड़तालों और अनुसंधानों को नए संगठन के तहत कर दिया गया। सिंटन 1936 में संगठन के निदेशक पद से सेवानिवृत्त हुए। उनके बाद, लेफ्टिनेंट कर्नल गोर्डन कॉवेल ने संगठन की कमान संभाली।

1937 में भारत सरकार ने सर्वेक्षण के सार्वजनिक स्वास्थ्य और सलाह देने के कार्य को अपने हाथ में लेने का निर्णय किया। इसके साथ ही, संगठन का नाम और मुख्यालय के स्थान में परिवर्तन किया गया। भारत के मलेरिया संस्थान के नए नाम के साथ उसे दिल्ली स्थानांतरित कर दिया गया। सिंटन निदेशक के रूप में आईआरएफए के वैज्ञानिक सलाहकार बोर्ड के पदेन सदस्य थे। वे राष्ट्र संघ के मलेरिया आयोग के सदस्य और इस निकाय के समन्वय अधिकारी भी थे।

वैसे तो अनेक प्रकार के रोगों पर नवाचार किए गए, जिनसे महामारियों की रोकथाम में मदद मिली, लेकिन पैसे की कमी और दूसरी कठिनाइयों के कारण नवाचारों को हतोत्साहित किया गया। 19वीं सदी के अंत और 20 वीं सदी की शुरुआत में भारत में रोग चिकित्सा की स्थिति में सुधार हुआ और इस बात को व्यापक रूप से स्वीकार किया गया कि चिकित्सा अनुसंधान रोग निवारक दवा का एक अभिन्न अंग था     (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)