हमें बीमारी से लड़ना है, बीमार से नहीं!

    दिनांक 18-जून-2020   
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अराजकता की राजनीति, यानी अथक प्रयासों के बाद मतभिन्नताओं के विविधतापूर्ण बिंदुओं को जोड़कर तैयार की गई एक सर्वमान्य और न्यायोचित व्यवस्था को ताकत के बूते बदलने की प्रवृत्ति। लेकिन यह केवल प्रवृत्ति नहीं, एक गंभीर बीमारी है। कोरोना से भी भयंकर! ऐसी आदत और इसे पोसने वाले किसी भी समाज के लिए खतरनाक हैं। अराजकता- यह शब्द आज इसलिए प्रासंगिक है, क्योंकि इसके लक्षण दिल्ली से लेकर अमेरिका और यूरोप तक दिख रहे हैं। अराजकता का उत्सव मनाने वाले यहां भी दिख रहे हैं, वहां भी।
सबसे पहले बात दिल्ली की। देश के भीतर प्रदेश, जिला, पंचायत जैसी इकाइयां प्रशासकीय सुविधा के लिए होती हैं जिनका अंतिम लक्ष्य लोगों के जीवन को आसान बनाना होता है, लेकिन जब ये भेदभाव का औजार बन जाएं और वह भी मानवीय संकट के आज के कोरोना काल में, तो उपचार जरूरी हो जाता है। यही हुआ दिल्ली में। सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली की ‘आम आदमी’ की सरकार को खूब खरी-खोटी सुनाई। देश की सबसे बड़ी अदालत को वह दिख गया जो जमीन पर बैठे कराहते लोगों को महसूस हो रहा था। ‘आम’ की सरकार आम लोगों का दर्द समझने और इसका प्रशासनिक कुशलता से इलाज करने की बजाय आत्मप्रचार और घिनौने प्रपंच-तंत्र में डूबी पाई गई।
दिल्ली में मृतकों का ‘कोविड टेस्ट’ न करने का आदेश पारित कर और साथ ही जीवितों के ‘टेस्ट’ के लिए भी सीमा बांधकर इस राज्य सरकार ने बता दिया कि वह लाशों के साथ-साथ मौत के आंकड़ों और नाकामी की कहानी को दफनाना चाहती है। इस तरह सरकार ने न सिर्फ कोविड संक्रमण से हुई मौतों की संख्या छुपाई, बल्कि अंतिम संस्कार के समय आवश्यक ‘प्रोटोकॉल’ को धता बताते हुए मानो पूरे समाज को महामारी के कफन से ही लपेट दिया!
मुफ्त के फेर में दिल्लीवाले जिनकी पालकी उठा लाए थे, वे जनता की अर्थियां उठवा देंगे, जनता नहीं जानती थी। जिन्हें महानायक समझा, वे महज मुखौटे और असल में अराजकता के सौदागर निकलेंगे, किसने सोचा था!
दो महीने के ‘लॉकडाउन’ के दौरान सियासी करतब और प्रचारबाजी होती रही। अगर दिल्ली सरकार चाहती तो अस्पताल में ‘बेड’ और ‘वेंटिलेटर’ की बात हो सकती थी। उनके दावों में दस गुना तक का झूठ भी दिखाई दिया। अस्पताल में 30 हजार ‘बेड’ की उपलब्धता का दावा जब तीनेक हजार पर जा टिका तो झूठ की पोल खुलने से पहले मीडिया की झोली विज्ञापनों से भरने का खेल चला।
जनता को मौत के मुंह में धकेलने वाली इन कलाबाजियों से यह भ्रम टूट गया कि दिल्ली में सरकार जैसी कोई चीज है। लगता है ‘मुफ्त’ के चक्कर में महंगा सौदा दिल्ली के गले पड़ गया। वैसे, इसका एक आयाम यह भी है कि जब देश ने जेपी आंदोलन के बाद अन्ना हजारे की अगुवाई में एक बड़े जनांदोलन को देखा तो लगा कि एक नई तरह की बात करने के लिए यह आंदोलन खड़ा हुआ है और राजनीति में नैतिकता की बात करने वालों के लिए भी यह श्रेष्ठ प्रतिमान बनकर उभरेगा। किन्तु अन्ना को आहिस्ता से किनारे कर, दिल्ली की सियासी चाबी हाथ में आते ही अरविंद केजरीवाल जब सड़क पर बैठ गए थे, तभी यह संकेत मिल गया था कि आम आदमी की आशाओं का प्रतिनिधित्व करने का दम भरने वाले इस सियासी जमघट में पारदर्शी प्रशासन का संकल्प नहीं, घोर अराजकता का बीज है! कुछ लोगों को पूत के पांव पालने में ही दिख गए थे, लेकिन तब उन्हें विशुद्ध आलोचक ठहराकर खारिज कर दिया गया। आज यह बात जनता के सामने खुल चुकी है कि अरविंद केजरीवाल सरकार अराजकता के गंभीर रोग से ग्रस्त है।
प्रशासन और नीतियों को ठोकर मारने वाली अराजकता की बीमारी का वैश्विक व्याप
केजरीवाल सरकार और उसकी परोक्ष तौर पर हिंसक प्रशासकीय निष्ठुुरता को किनारे रखिए। हमें दिल्ली या देश के दायरे से बाहर आज के संदर्भ में उस अराजकता का विश्लेषण करना चाहिए, जो भारत में इस शासन में (या कहिए वामपंथ की ओर झुके हर शासन में) दिखाई देती है। इसकी व्याख्या आपको शासन के भीतर और इस तरह के शासन को बाहर से बल देने वाले अराजकता, उन्माद और उपद्रव के पारिस्थितिक तंत्र के संदर्भ में करनी होगी। लोगों को उकसाकर राजनीतिक परिवर्तन लाने के पैरोकार कौन हैं, कैसे काम करते हैं और स्थान, मंच, प्रकार अलग होने पर भी इस अराजक उन्माद का वैश्विक फैलाव (यदि कोई है) कैसा हो सकता है? इसकी व्याख्या वर्तमान वैश्विक घटनाक्रम के आईने में करनी होगी।
जॉर्ज फ्लायड की दुर्भाग्यपूर्ण हत्या के बाद ब्लैक लाइव मैटर्स (बीएलएम) के नाम से अमेरिका में चोला बदलकर अपने चरम रूप में सामने आई अराजकता और ऐसी ही हिंसा को भारत में जमीन पर उतरते देखने का आह्वान करने वालों के राजनीतिक जुड़ाव और विचार जगत को जोड़कर देखना जरूरी है। सदियों से साथ-साथ रहने वाले भारतीय समाज में रक्तपात की राजनीति की बात करने वाले और अपने विरोधियों पर फासीवादी होने का बिल्ला लगाने वाले लोग कौन हैं, इनका फैलाव कैसा है, आपसी गठजोड़ कैसा है, यह समझे बिना बात नहीं बनेगी!
अमेरिका, यूरोप में फिलहाल अराजकता का तूफान एंटीफा के नाम से है। आश्चर्यजनक समानता देखिए कि भारत में अराजकतावदियों की चिंता यह है कि अमेरिका जैसी विद्रोह की आग यहां क्यों नहीं लगी? हमारे यहां लोग सड़कों पर उतरकर क्यों उत्पात नहीं मचा रहे, क्यों अन्य लोगों की निजी या सरकारी संपत्तियों को फूंक नहीं रहे? इनका दर्द यह है! देखना चाहिए कि अराजकता का उत्सव मनाने वाले ये कौन लोग हैं। अगर एंटीफा के आईने में इस अराजकता को समझेंगे, तो स्थिति ज्यादा स्पष्ट होगी। एंटीफा अपने आप में कोई राजनीतिक दल नहीं है और न ही कोई सुगठित समूह। इसे विघटनकारी जमातों का आकार-प्रकारहीन जमघट कह सकते हैं। यह कोई एकल संगठन नहीं, इसका कोई शीर्ष नेता भी नहीं है। यह गुप्त आंदोलन है और इसकी अलग-अलग देशों में आपसी समन्वय से चलने वाली अलग-अलग ढीली-ढाली इकाइयां हैं, जिनकी बैठकें नियमित रूप से होती रहती हैं। एंटीफा को जानना है तो उसकी गतिविधियों को देखना होगा। यह यूनाइटेड किंगडम में 1980 के दशक में स्थापित एक उग्रवादी समूह है जिसकी मूल रणनीति यह थी कि ‘फासीवादियों’ को अपने विचार-संदेश फैलाने से रोका जाए। लेकिन सवाल यह है कि आखिर ये लोग फासीवादी कहते किसे हैं? ये जिस पर फासीवाद का बिल्ला लगाते हैं, उस फासीवाद का दुनिया में आज अस्तित्व है भी या नहीं और क्या एंटीफा सामाजिक आंदोलन के छद्म रूप में राजनीतिक मंसूबों को पूरा करने का कोई साधन है?
इस अंदेशे का कारण है। अगर एंटीफा की जड़ों को देखें तो यह 1930 तक पीछे जाती हैं। एंटीफा का प्रतीक चिन्ह और इसका नाम, दोनों अराजकतावाद और साम्यवाद का प्रतिनिधित्व करने वाले दो झंडों से बना हुआ है। जर्मन एंटीफा आंदोलन से ये दोनों चीजें प्राप्त हुर्इं। इसकी शुरुआत 1930 के दशक में जर्मनी में हिटलर विरोधी समूह के तौर पर हुई। ये और बात है कि नाजियों के उफान को चुनौती देने के प्रयास का कोई लाभ न हुआ। हिटलर अपना काम करता रहा और एंटीफा ने पोलैंड का रुख कर लिया। आज अमेरिका में जो उत्पात हुआ है, वही पूरे यूरोप में भी दिख रहा है। लंदन में स्थिति यह है कि महापुरुषों की मूर्तियों को एंटीफा प्रदर्शनकारियों से बचाने के लिए उन्हें कार्डबोर्ड से ढकने की नौबत आ गई। सोचने वाली बात यह है कि जो महात्मा गांधी नस्लभेद के खिलाफ वैश्विक आंदोलन के प्रणेता रहे, आज अमेरिका में उनकी मूर्तियां तोड़ी जाती हैं ‘ब्लैक लाइव मैटर्स’ के नाम पर! चर्चिल की मूर्तियों पर हमले होते हैं। इसका साफ मतलब है, समाज के कोमल संवेदनशील अंगों को औजार बनाकर कुछ और साधने की कुटिल चाल है।
खास बात यह है कि ये लोग नीतिगत बदलाव नहीं चाहते। ये लोग डिजिटल दुनिया में अपनी जगह सुरक्षित करना चाहते हैं। शारीरिक शक्ति के बल पर चीजों को हथियाना, दूसरों को उत्पीड़ित करना इनकी क्रियाओं में शामिल है। अभी लंदन में दो पुलिसकर्मियों पर हमला किया गया। पुलिसवाले के साथ हिंसा का वीडियो बनाया गया। वास्तव में ये अतिवादी लोकतांत्रिक दुनिया को नष्ट करने वाले, वैचारिक विविधता और विभिन्नता का सम्मान नहीं करने वाले, हिंसक हत्यारे लोगों का एक समूह है। ये विभाजक रेखाओं पर अलग अस्मिताओं की दुहाई देते हुए अलगाववादी विचारों को पोसते और बढ़ावा देते हैं। यहां हमें हिंसा, रक्तपात और लोगों की इच्छाओं का दमन दिखता है, क्योंकि इन लोगों के पास पूरी दुनिया में कोई ‘मॉडल’ ऐसा नहीं कि जो बता सके कि उनके सपनों के समाज और व्यवस्था का खाका क्या है। यह समझना होगा कि लोकतंत्र में रहकर लोकतंत्र की हत्या नहीं हो सकती, विविधता में रहते हुए नस्ल-पोषित लड़ाई नहीं लड़ी जा सकती। इसलिए दुनिया को उस खूनी सपने से बाहर आना चाहिए और एंटीफा हो या राजनीति में अराजकतावाद का कोई स्वर, लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं को लगी इस बीमारी की वैक्सीन, बिना कोई दुर्भावना पाले संवैधानिक प्रावधानों के जरिए पूरी दुनिया को बनानी ही होगी।
याद रखिए अराजकता एक बीमारी है और...‘..हमें बीमारी से लड़ना है, बीमार से नहीं!’
@Hiteshshankar