अयोध्या फैसले के कुछ अनछुए पहलू

    दिनांक 19-जून-2020
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 डॉ. संतोष कुमार तिवारी

अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि मंदिर बनाने के लिए हुए समतलीकरण के दौरान वहां ऐसे अनेक ऐतिहिक शिल्प मिले हैं, जो सिद्ध करते हैं कि वहां बहुत प्राचीन मंदिर हुआ करता था। पहले भी वहां ऐसी प्राचीन चींजे मिली हैं जिनकी चर्चा सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले में भी की है

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श्रीराम जन्मभूमि परिसर के समतलीकरण के दौरान मिले स्तंभ, जिन पर हिंदू संस्कृति की छाप दिखती है

बहुत से लोगों को यह नहीं मालूम होगा कि अयोध्या में विवादित ढांचे का क्षेत्रफल सिर्फ 1,500 वर्ग गज ही था। सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के पष्ठ 922 पर यह 1,500 वर्ग गज वाली बात कही गई है। परंतु फैसले से मुस्लिम पक्षकारों को मिली है पांच एकड़ जमीन अर्थात् 5 गुणा 4840-24,200 वर्ग गज जमीन। साथ ही इस जमीन पर उनको मालिकाना हक भी मिला है। बाबर या औरंगजेब, जिस किसी ने भी जब श्रीराम जन्मभूमि पर ढांचा बनवाया था, उसने उन्हें मालिकाना हक कभी नहीं दिया था। श्रीराम जन्मभूमि पर अपने मालिकाना हक के बारे में मुस्लिम पक्ष सर्वोच्च न्यायालय को संतुष्ट नहीं कर पाया।

बाद में ईस्ट इंडिया कंपनी और अंग्रेज सरकार ने भी उस जमीन पर मालिकाना हक मुस्लिमों को कभी नहीं दिया था। परंतु हां, उस ढांचे के रखरखाव के लिए कुछ पैसा दिया जाता था। वह जमीन नजूल की भूमि थी, किसी वक्फ की संपत्ति  नहीं थी। वहां मुस्लिमों का शांतिपूर्ण कब्जा कभी भी नहीं रहा। सर्वोच्च न्यायालय के फैसले में पृष्ठ संख्या 637 पर उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल के निर्णय का जिक्र है। न्यायमूर्ति अग्रवाल ने कहा था, ‘‘मुझे इस बारे में कोई संदेह नहीं है कि विवादित ढांचे के अंदर और बाहर जो स्तंभ लगे हैं, उन पर मानव आकृतियां बनी हैं और कुछ जगह तो वे हिंदू देवी-देवता जैसी लगती हैं।’’

सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि विवादित स्थान पर इस्लामिक चिन्ह हैं और वे आकृतियां भी हैं, जिनकी हिंदू पूजा करते हैं। दोनों ही एक साथ मौजूद हैं। सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष मुस्लिम पक्ष ऐसा कोई सबूत नहीं दे सका कि जिससे यह साबित हो सके कि ढांचे के निर्माण के बाद से 1856-57 तक अर्थात् 325 वर्ष के कालखंड में वहां कोई नमाज पढ़ी जाती थी। (देखें, फैसले के पृष्ठ 900-901)

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समतलीकरण के दौरान मिला एक नक्काशीदार पत्थर

सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के उक्त पृष्ठों में कहा गया है कि अयोध्या में 1856-57 और 1934 में इन्हीं विवादों को लेकर सांप्रदायिक दंगे भी हुए थे। 1934 के दंगे में इस विवादास्पद ढांचे के गुंबद का एक हिस्सा क्षतिग्रस्त भी हुआ था। निहंग सिखों ने ढांचे के अंदर घुस कर एक झंडा गाड़ा था और हवन-पूजा की थी।

सर्वोच्च न्यायालय के फैसले में कहा गया है कि 1856-57 से 16 दिसंबर, 1949 तक वहां जुमे की नमाज पढ़ी तो जाती थी, परंतु इसमें बीच-बीच में व्यवधान भी आते रहे। अंतिम बार जुमे की नमाज 16 दिसंबर, 1949 को पढ़ी गई। 

हिंदुओं को क्या मिला?
अगर हिंदू पक्ष को देखें, तो सर्वोच्च न्यायालय के फैसले से उन्हें श्रीराम जन्मभूमि के पूरे क्षेत्र में बगैर किसी रोकटोक के भव्य मंदिर बनवाने का कानूनी अधिकार मिल गया। यह विवाद देश की तीन चौथाई से अधिक आबादी की आस्था के साथ जुड़ा रहा है और यह 125 साल से ज्यादा समय से इस या उस  अदालत में लंबित रहा। अयोध्या में कई मंदिर हैं, परंतु श्रीराम जन्मभूमि अकेला ऐसा मंदिर है जहां गर्भ गृह है। अन्य किसी मंदिर में गर्भ गृह नहीं है। इस विवाद को निपटाने के लिए पांच सदस्यीय खंडपीठ बधाई की पात्र है, जिसने सर्वसम्मत से अपना फैसला दिया। खंडपीठ के सदस्य थे-(तत्कालीन) मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई, न्यायमूर्ति एस. ए. बोबडे, न्यायमूर्ति डी. वाई. चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति अशोक भूषण और न्यायमूर्ति एस. अब्दुल नजीर। न्यायमूर्ति रंजन गोगोई 2019 में सेवानिवृत्त हो गए हैं। अ

भी हाल में उन्हें राज्यसभा की सदस्यता के लिए मनोनीत किया गया है। लेकिन सेकुलर और कट्टरवादियों ने न्यायमूर्ति गोगोई को राज्यसभा का सदस्य बनाने पर कुछ ऐसा दुष्प्रचार किया, जैसे कि उन्हें कोई ‘ईनाम’ दिया गया  हो। ये नकारात्मक सोच वाले वामपंथी उस समय चुप थे जब 1979 में न्यायमूर्ति हिदायतुल्ला को देश का उपराष्ट्रपति बनाया गया था। न्यायमूर्ति हिदायतुल्ला सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश रह चुके थे। हैरानी की बात है कि सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड को यह समझने में देर लगी कि पांच एकड़ भूमि को स्वीकार कर लेना उनके हित में है। अगर इतनी बड़ी जमीन पर एक मस्जिद बनवाई जाए तो उसका अधिकांश हिस्सा खाली ही रहेगा, क्योंकि अयोध्या में इतने मुसलमान नहीं हैं, जोकि उसे भर सकें। सुन्नी वक्फ बोर्ड ने कहा कि उस जमीन पर एक इस्लामिक अध्ययन केंद्र भी खोला जाएगा।
 
समुचित शोध की कमी
9 नवंबर, 2019 को सर्वोच्च न्यायालय ने अपना फैसला दिया था। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले के बिन्दु संख्या 3623 और 3624 में मुस्लिम पक्ष के कुछ गवाहों द्वारा प्रकाशित एक पुस्तिका के बारे में यह टिप्पणी की कि इस प्रकार के संवेदनशील मसलों पर समुचित शोध किए बगैर कोई चीज छपवाने से जनता के आपसी मैत्रीपूर्ण संबंधों पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। न्यायालय ने आश्चर्य व्यक्त किया कि इस प्रकार के प्रकाशन उन लोगों द्वारा किए गए जो कि इतिहासकार या पुरातत्वविद् होने का दावा करते हैं!

के. के. मुहम्मद का समर्पण
संवेदनशील मसलों पर तरह-तरह के खेल मीडिया के जरिए किए या कराए जाते रहे हैं। इससे लोग गुमराह और भ्रमित हो जाते हैं। उदाहरण के लिए सर्वोच्च न्यायालय का फैसला आने से लगभग एक माह पूर्व ‘टाइम्स आॅफ इंडिया’ ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के अध्यक्ष का एक पत्र खूब मोटा शीर्षक लगा कर समाचार के तौर पर छापा। इस पत्र में कहा गया था कि के. के. मुहम्मद कभी भी भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के उस दल के सदस्य नहीं थे जिसने 1976-77 में अयोध्या के विवादित स्थल पर उत्खनन कार्य किया था। यहां यह बता देना जरूरी है कि अयोध्या में यह उत्खनन कार्य प्रो.  बी. बी. लाल के नेतृत्व में एक टीम ने किया था जिसके एकमात्र मुस्लिम सदस्य के. के. मुहम्मद थे। बी. बी. लाल की आयु अब लगभग 100 वर्ष है और वे भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के महानिदेशक भी रहे हैं। ‘टाइम्स आॅफ इंडिया’ की उस खबर के जवाब में बी. बी. लाल ने उस अखबार को एक ईमेल भेज कर स्पष्ट किया कि के. के. मुहम्मद उस समय उनकी टीम के सदस्य थे।

क्या है जी. पी. आर. तकनीक 
2003 में उच्च न्यायालय के आदेश पर श्रीरामजन्म भूमि क्षेत्र का ग्राउंड पेनेट्रेटिंग रडार (जी. पी. आर.) सर्वे हुआ था। जी. पी. आर. तकनीक से जो जानकारी मिली है वह पूर्णत: वैज्ञानिक है। अभी कुछ महीने पहले यह योजना बनी थी कि काशी शहर का जी. पी. आर. सर्वे किया जाए। इसमें बिना सड़कों को खोदे ही यह पता चल जाएगा कि भूमि के कई मीटर नीचे क्या है। एक किलोमीटर के जी.पी. आर. सर्वे पर लगभग 10,000 रुपए का खर्च आता है।

 सेवानिवृत्ति के बाद के. के. मुहम्मद कालीकट (केरल)  में रहते हैं। उन्होंने एक पुस्तक ‘मैं हूं भारतीय’ लिखी है। इसके एक अध्याय ‘अयोध्या : कुछ ऐतिहासिक तथ्य’ में वे लिखते हैं, ‘‘प्रो. बी. बी. लाल के नेतृत्व में अयोध्या उत्खनन टीम में ‘दिल्ली स्कूल आॅफ आर्किओलाजी’ से मैं एक सदस्य था। उस समय के उत्खनन में मंदिर के स्तंभों के नीचे के भाग में र्इंटों से बनाया हुआ आधार देखने को मिला। उत्खनन के लिए जब मैं वहां पहुंचा, तब ढांचे की दीवारों में मंदिर के स्तंभ थे। स्तंभ के नीचे के भाग में 11वीं व 12वीं शताब्दी के मंदिरों में दिखने वाले पूर्ण कलश बनाए गए थे। मंदिर कला में पूर्ण कलश 8 ऐश्वर्य चिन्हों में एक है। 1992 में बाबरी ढांचा ढहाए जाने के पहले एक या दो स्तंभ नहीं, 14 स्तंभों को हमने देखा है।’’

उल्लेखनीय है कि न्यायालय के निर्देश पर 2003 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने वहां ग्राउंड पेनेट्रेटिंग रडार (जी. पी. आर.) तकनीक से सर्वे किया था। यह जी. पी. आर. तकनीक 1976-77 में भारत में उपलब्ध नहीं थी। इस सर्वे में पता चला कि ढांचे के नीचे 17 पंक्तियों में 85 खंभे हैं। प्रत्येक पंक्ति में पांच खंभे हैं। और ये सभी मूलत: हिंदू धर्म से संबंधित लग रहे हैं। ढांचे की अपनी कोई नींव नहीं थी। वह तो पूर्व स्थित संरचना के ऊपर बनाई गई थी। (देखें,सर्वोच्च न्यायालय का फैसला, पृष्ठ 905)

 2003 में  डॉ. हरि मांझी और डॉ. बी. आर. मणि की देखरेख में जी. पी. आर. तकनीक से जो सर्वे हुआ था उसकी पूरी वीडियोग्राफी की गई थी। उस सर्वे टीम में कुछ मुस्लिम पुरातत्वविद् भी शामिल थे, जैसे कि गुलाम सईउद्दीन ख्वाजा, अतिकुर रहमान सिद्दीकी, जुल्फिकार अली, ए. ए. हाशमी आदि। यदि एक पंक्ति में इन लोगों द्वारा किए गए सर्वे का निष्कर्ष बताया जाए, तो वह यह था कि विवादित ढांचे के नीचे एक विशाल विष्णु मंदिर था। के. के. मुहम्मद अपनी पुस्तक में लिखते हैं, ‘‘बाबरी ढांचा हिंदुओं को देकर समस्या का समाधान करने के लिए नरमवादी मुसलमान तैयार थे, परंतु इसको खुलकर कहने की किसी में हिम्मत नहीं थी।’’

 सम्राट विक्रमादित्य युग का था राम मन्दिर
श्रीराम जन्मभूमि पक्ष की ओर से कहा गया था कि उस स्थान पर महाराजा विक्रमादित्य के समय से एक मंदिर था जिसके कुछ हिस्से को बाबर की सेना के कमांडर मीर बाकी ने नष्ट किया था और मस्जिद बनवाने का प्रयास किया था। उसने उसी मंदिर के खंभे आदि इस्तेमाल किए। ये खंभे काले कसौटी पत्थर के थे और उन पर हिंदू देवी-देवताओं की आकृतियां खुदी हुई थीं। इस निर्माण कार्य का बहुत विरोध हुआ और हिंदुओं ने कई बार लड़ाइयां लड़ीं, जिनमें लोगों की जानें भी गई थीं। अंतिम लड़ाई 1855 में लड़ी गई थी। इस कारण वहां मस्जिद की मीनार कभी नहीं बन सकी थी और वजू के लिए पानी का प्रबंध भी कभी नहीं हो सका था।   (सर्वोच्च न्यायालय के फैसले से )

सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी कहा है कि वाल्मीकि रामायण और स्कंद पुराण सहित अन्य धार्मिक ग्रंथों के कारण हिंदुओं का विश्वास है कि वह जगह राम का जन्मस्थान है। न्यायालय ने कहा कि धार्मिक ग्रंथों की बातों को आधारहीन करार नहीं दिया जा सकता। न्यायालय ने यह भी पाया कि ‘रामचरितमानस’ और ‘आइने अकबरी’ में भी अयोध्या को धार्मिक स्थल बताया गया है। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले में विलियम फिंच, जोसफ टेफेनथेलर आदि विदेशी यात्रियों के यात्रा वृत्तांतों, ईस्ट इंडिया गजेटियर आॅफ वाटर हेमिल्टन सहित अन्य ऐतिहासिक साक्ष्यों को भी आधार बनाया। अभी 26 मई को दुनियां भर के करोड़ों लोगों को यह जानकर अत्यंत आनंद हुआ कि श्रीराम जन्मभूमि पर भव्य मंंदिर का निर्माण शुरु हो गया है। सबकी कामना  है कि मंदिर का काम  शीघ्र पूरा हो ताकि वे  अपने आराध्य भगवान रामलाला के दर्शन उनके जन्मस्थान पर कर सकें।
(लेखक झारखंड केंद्रीय विश्वविद्यालय के सेवानिवृत्त प्रोफेसर हैं)