धांधली पर खुला मुंह विज्ञापनों ने सिला

    दिनांक 02-जून-2020
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सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के  बाद भी कोरोना संकट पर झूठी खबरें परोस रहा मीडिया का एक वर्ग
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पूरे विश्व में महामारी फैलाने के बाद चीन अब एक तरह का छद्म युद्ध शुरू कर चुका है। यह युद्ध मीडिया किसी भी देश में वहां की मीडिया के माध्यम से अपनी मर्जी का झूठ फैलाता रहा है।  बीते कई सालों में चीन ने वामपंथी दुष्प्रचार तंत्र को विकसित किया है। अपने देश में भी जब चीन से जुड़ा कोई विवाद होता है तो कुछ मीडिया संस्थानों और पत्रकारों की गतिविधियां देखकर समझ में आ जाता है कि वे किसके लिए काम कर रहे हैं। एनडीटीवी ने खबर दी कि ‘लद्दाख में चीन ने भारतीय सेना की गश्ती टुकड़ी को हिरासत में ले लिया था, लेकिन बाद में छोड़ दिया।’ सेना ने फौरन खंडन किया और तथ्य भी सामने आ गए। कुछ दूसरे मीडिया संस्थानों ने भी लद्दाख में चीन की गतिविधियों को लेकर अपुष्ट जानकारियां प्रसारित कीं। ऐसी ज्यादातर अफवाहों का उद्देश्य भारतीयों में भ्रम की स्थिति पैदा करना था।

देसी वेंटिलेटर के बाद अब देश में बनी पीपीई किट भी मीडिया के एक वर्ग के निशाने पर हैं। इनके ‘खराब गुणवत्ता’ का होने के बारे में आपको टाइम्स आफ इंडिया से लेकर एनडीटीवी तक पर ढेरों खबरें मिल जाएंगी। इनका उद्देश्य चिकित्सकीय सुविधाओं की कमियों को उजागर करने से ज्यादा स्वदेशी उत्पादों को खराब बताना होता है। जबकि ऐसे ज्यादातर मामले अपवाद की तरह हैं। संभवत: मीडिया का एक वर्ग  चीन के सामान की पैरवी करने की कोशिश कर रहा है। यह स्थिति तब है जब कई देशों से चीन के सामान के घटिया होने की शिकायतें लगातार आ रही हैं। जबकि भारत से भेजी गर्इं पीपीई किट हर जगह गुणवत्ता के मामले में खरी साबित हुई हैं।

श्रमिक ट्रेनों से लोगों को उनके घरों तक पहुंचाने का काम जारी है। लाखों की संख्या में उन्हें सुरक्षित पहुंचाया जा चुका है। लेकिन मीडिया का एक वर्ग अब इसे लेकर भी झूठ फैलाने में जुटा है। दैनिक भास्कर ने छापा कि एक ट्रेन सूरत से सीवान 9 दिन में पहुंची। इसी के साथ दावा किया कि ट्रेनों के अंदर कई यात्रियों की भूख-प्यास से मौत हो गई। जबकि जांच में पता चला कि यात्रियों को नियमित रूप से खाना मिल रहा था। जिन लोगों की मौत हुई उनमें से कुछ इलाज कराकर लौट रहे थे या पहले से किसी बीमारी के शिकार थे। इसी तरह लॉकडाउन में स्कूल खोले जाने जैसी अफवाहें भी मीडिया के माध्यम से उड़ाई गर्इं। यह स्थिति तब है जब शुरू में ही सर्वोच्च न्यायालय का आदेश था कि कोरोना संकट से जुड़े समाचार मीडिया आधिकारिक पुष्टि के बाद ही चलाए।

उधर महाराष्ट्र सरकार ने चाइनीज वायरस से निपटने में अपनी विफलता के बारे में सोशल मीडिया पर लिखने वालों पर कार्रवाई शुरू कर दी है। कई लोगों पर सत्ताधारी कार्यकर्ताओं द्वारा हमलों के समाचार भी हैं। ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ का रोना रोने वाला पूरा गिरोह गायब है। वैसे भी मुख्यधारा मीडिया में गैर-भाजपा शासित राज्यों की आलोचना पर अघोषित प्रतिबंध है।

मराठी अखबार लोकसत्ता ने एक आनलाइन मतदान कराया जिसमें पूछा गया कि क्या महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन लगा देना चाहिए? जैसे ही अधिकतर लोगों ने ‘हां’ में उत्तर देना शुरू किया, अखबार ने अपनी वेबसाइट से इस मतदान को हटा लिया। इंडियन एक्सप्रेस समूह का यह अखबार ‘साहसी पत्रकारिता’ का दावा करता है। मुंबई के अस्पतालों के शवगृहों में शव रखने की जगह नहीं है। लेकिन इसके बारे में आपको किसी चैनल या अखबार पर ज्यादा कुछ नहीं मिलेगा। यही स्थिति दिल्ली में है जहां सरकार खुल्लमखुल्ला मृतकों की संख्या में धांधली कर रही है। जैसे ही कुछ अखबारों ने इस बारे में
समाचार छापा, अगले दिन ही दिल्ली सरकार के पूरे पन्ने के विज्ञापन आ गए।

‘टाइम्स नाऊ’ ने ईसाई मिशनरियों के हाथों देशभर में हो रहे कन्वर्जन पर बहस कराई। आंध्र प्रदेश में सत्ताधारी वाईएसआर कांग्रेस पार्टी के सांसद ने कबूला कि ‘राज्य में ईसाई जनसंख्या कागजों में भले ही 2.5 प्रतिशत हो, लेकिन वास्तव में उनकी संख्या 25 प्रतिशत हो गई है।’ यह संतोष की बात है कि मुख्यधारा मीडिया के कुछ चैनलों ने जनसंख्या संतुलन को बिगाड़ने के इस षड्यंत्र पर चर्चा शुरू की है। इस समस्या का संबंध राष्ट्रीय सुरक्षा से है। चाहे जिहादी संगठन हों या ईसाई मिशनरियां, उनके असली उद्देश्य किसी से छिपे नहीं हैं। लंबे समय तक इसे होते रहने की छूट दी गई, जिसका परिणाम है कि आज देश के 8 राज्यों में हिंदू अल्पसंख्यक हो चुके हैं। मीडिया की चुप्पी का भी स्थिति को बिगाड़ने में बड़ा योगदान रहा है।