ओआईसी में भारत को घेरने के चक्कर में कैसे धाराशाई हुआ पाकिस्तान ?

    दिनांक 02-जून-2020   
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अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत को घेरने की कोशिश में पाकिस्तान को फिर मात खानी पड़ी। ओआईसी यानी इस्लामिक सहयोग संगठन में इस्लामोफोबिया के मसले पर भारत को घेरने के लिए बिछाए जाल में वह खुद ही ऐसे उलझ गया कि इसके विदेश मंत्रालय को अब मामले की लीपा-पोती की खातिर गलत बयानी करनी पड़ रही है
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पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता आइशा फारूख का दावा है कि भारत में इस्लामोफोबिया और कश्मीर के मसले को लेकर आईओसी के अधिकांश सदस्य पाकिस्तान के साथ हैं। इसके अलावा संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार मशीनरी, अंतराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन और अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने भी इस मामले में पाकिस्तान की हिमायत की है। जबकि वास्तविकता इसके बिलकुल उलट है। अंतरराष्ट्रीय मीडिया जम्मू कश्मीर से धारा 370 हटाए जाने के बाद से कई बार इसका दौरा कर चुका है और उसकी ओर से ऐसी कोई बात नहीं कही गई जिससे भारत को शर्मिंदा होना पड़े। इसी तरह पिछले सप्ताह न्यूयॉर्क में इस्लामोफोबिया जब पाकिस्तान ने आईओसी की बैठक में भारत के खिलाफ दुष्‍प्रचार की मुहिम और भारत व अरब बिरादरी के रिश्‍तों में खटास डालने का प्रयास किया तो उसके करीबी देशों ने ही उसे तगड़ा झटका दे दिया।
 

 बताते हैं कि संयुक्त राष्ट्र में इस्लामिक देशों के संगठन ऑर्गेनाजेशन ऑफ इस्लामिक कोऑपरेशन (ओआइसी) की वर्चुअल बैठक में पाकिस्तान ने इस्लामोफोबिया के आरोप पर भारत को घेरने की कोशिश की, लेकिन ओआइसी के कई सदस्यों देशों सऊदी अरब, यूएई और ओमान ने पाकिस्तान की जगह भारत का साथ दिया। यही नहीं पाकिस्‍तान के आरेापों पर ओआइसी के अन्‍य देशों ने कोई प्रतिक्रिया ही नहीं दी। हद तो तब हुई कि मालदीव ने संयुक्त राष्ट्र में ओआईसी की वर्चुअल बैठक में भारत के खिलाफ पाकिस्तान द्वारा किए जा रहे दुष्प्रचार की हवा निकाल दी। इस मामले में मालदीव के अलावा सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात ने भी पाकिस्तान की जगह भारत का साथ खड़ा नजर आया और पाकिस्‍तान के आरोपों को खारिज कर दिया। पहले की तरह केवल तुर्की ने भी इसका समर्थन किया। इस घटना से स्पष्ट हो गया है कि ओआइसी में भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी हैसियत का लोहा मनवा लिया है। इसे भारत के सऊदी अरब और यूएई के साथ बढ़ते व्‍यापारिक संबंधों के मद्देनजर भी देखा जा रहा है।   

बताते हैं कि पाकिस्‍तान की इस चाल के पीछे तुर्की का दिमाग है, जो ओआइसी में सऊदी और यूएई का महत्‍व कम करना चाहता है। मगर इस बार पाकिस्‍तान और तुर्की का साथ देना वाले मलेशिया का स्‍टैंड नरम रहा। पहले की तरह उसने पाकिस्‍तान का साथ नहीं दिया। पहले मलेशिया के पूर्व प्रधानमंत्री महातिर मोहम्‍मद के नेतृत्‍व में भारत का विरोध किया जाता रहा है, लेकिन मलेशिया में नेतृत्‍व परिवर्तन के साथ ही उसके स्‍टैंड में भी बदलाव आया है। 
 
 ओआइसी की वर्चुअल बैठक में संयुक्‍त राष्‍ट्र में पाकिस्‍तान के राजदूत मुनीर अकरम ने दावा किया कि भारत में इस्लामोफोबिया को बढ़ावा दिया जा रहा है। विभिन्न राज्यों में मुसलमानों से ज्यादतियां की जा रही हैं। इसके जवाब में यूएन में मालदीव की स्थायी प्रतिनिधि थिलमीजा हुसैन ने कहा कि भारत के संदर्भ में इस्लामोबिया का आरोप लगाना तथ्यात्मक रूप से गलत है। भारत, दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र और बहु-सांस्कृतिक समाज है। यहां 20 करोड़ से अधिक मुसलमान रहते हैं। ऐसे में इस्लामोफोबिया का आरोप लगाना सही नहीं होगा।

उन्होंने कहा कि यह दक्षिण एशियाई क्षेत्र में धार्मिक सद्भाव के लिए ऐसा करना हानिकारक होगा। इस्लाम भारत में सदियों से मौजूद है। यह देश का 14.2 फीसद आबादी के साथ भारत में दूसरा सबसे बड़ा धर्म है।  थिलमीजा के मुताबिक, दुनिया ने घृणा, पूर्वाग्रह और नस्लवाद की संस्कृति में एक खतरनाक वृद्धि देखी है। राजनीतिक और अन्य विचारधाराओं / एजेंडों को बढ़ावा देने के लिए हिंसा के रूप में हिंसा का इस्तेमाल किया गया है। मालदीव दुनिया में कहीं भी इस तरह के कार्यों के खिलाफ मजबूती से खड़ा है। इससे पहले पाकिस्तान ने 9 फरवरी को ओआईसी की बैठक में कश्मीर के मसले पर भारत को घेरने की कोशिश की थी। मगर सउदी अराब के साथ नहीं देने से वह इसमें विफल रहा था।

उल्लेखनीय है कि चार महादेश के 57 देशों वाले इस्लामिक सहयोग संगठन के लिए अब्दुल मनाफी मुटालो इस्लामोफोबिया के मामले देखते हैं। इनका दफ्तर जद्दा में मदीना रोड पर है। अब तक मुटालो की ओर से भी भारत में इस्लामोफोबिया को लेकर कोई कड़ी टिप्पणी नहीं आई है। यहां तक कि सोशल मीडिया पर इस तरह के विवाद में संयुक्त अरब इमीरात को घसीटने पर वहां की राजकुमारी हिंड अल कासिमी ने विरोध किया है।