दिल्ली में लाशों के ढेर पर बैठी कंगाल और विफल सरकार

    दिनांक 02-जून-2020   
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कोरोना महामारी से लोग मर रहे हैं. दिल्ली से मजदूरों का पलायन सबने देखा.पिछले साल दिसंबर में केजरीवाल ने खुद कहा था कि हमने खूब पैसा खर्च किया फिर भी हमारे खजाने में पैसा बचा हुआ है और अब कर्मचारियों को तनख्वाह देने के लिए पैसे न होने की बात कही जा रही है

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कोरोना काल में दिल्ली एक विफल राज्य है. महामारी बेकाबू, खजाना खाली. लेकिन दिल्ली की सत्ता एक नीरो के हाथ में है. कोरोना से मरने वाले लोगों की लाशें छिपाई जा रही हैं, मरीज भर्ती होने के लिए भटक रहे हैं, कंगाल हो चुकी केजरीवाल सरकार कर्मचारियों की तनख्वाह का पैसा केंद्र से मांग रही है. लेकिन अरविंद केजरीवाल रोज करोड़ों रुपये के विज्ञापन देकर अपना चेहरा चमका रहे हैं. दिल्ली की केजरीवाल सरकार पर दाग बहुत हैं. बहुत से रक्तबीज इसी सरकार की देन हैं. टुकड़े गैंग से लेकर शाहीन बाग तक. नागरिकता संशोधन कानून की मुखालफत से लेकर सेना के शौर्य पर सवाल की नई परंपरा पैदा करना. कोरोना काल में श्रमिकों के पलायन की राह भी तो दिल्ली से ही निकली.

रविवार को दिल्ली सरकार ने अपनी आर्थिक बदहाली का चिट्ठा खोला. मुफ्त बिजली, पानी और परिवहन के सुहाने सपने दिखाकर सत्ता में आई केजरीवाल सरकार आखिरकार आर्थिक बदइंतजामी का बोझ बनकर रह गई है. तीन दिसंबर 2019 को दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने ट्वीट किया था कि पांच साल में हमने सड़क, स्कूल, परिवहन पर खूब पैसा खर्च किया. इसके बावजूद हमारे खजाने में फालतू पैसा है. ऐसा इसलिए संभव हुआ क्योंकि दिल्ली में एक भ्रष्टाचार मुक्त सरकार है, जो लोक कल्याण के लिए समर्पित है. वैसे इस ट्वीट के बगैर भी जनता जानती है कि दिल्ली के मुख्यमंत्री आत्म मुग्धता के चरम पर रहते हैं. दिसंबर से जून आते-आते अरविंद केजरीवाल सरकार की ये हालत हो गई कि कर्मचारियों को तनख्वाह देने के लिए भी पैसे नहीं है. देश का हर सूबा कोरोना महामारी से जूझ रहा है. हर राज्य में लॉक डाउन हुआ. लेकिन दिल्ली की सरकार जैसी हालत किसी की नहीं है. वजह बहुत साफ है. इस पूरे लॉक डाउन और महामारी के दौरान केजरीवाल सरकार ने विज्ञापनों पर पैसा पानी की तरह बहाया है.

दिल्ली के मुख्यमंत्री के पुराने सखा कुमार विश्वास का कहना है "लाखों  करोड़ की चुनावी-रेवड़ियां, टैक्सपेयर्स के हज़ारों करोड़ अख़बारों में 4-4 पेज के विज्ञापन व चैनलों पर हर 10 मिनट में चेहरा दिखाने पर खर्च करके, पूरी दिल्ली को मौत का कुआं बनाकर अब स्वराज-शिरोमणि कह रहे हैं कि कोरोना से लड़ रहे डॉक्टरों को सैलरी देने के लिए उनके पास पैसा नहीं हैं Man’s shoe !". सांसद रमेश बिधूड़ी ने सवाल पूछा- दिल्ली का बजट 39000 करोड़ रुपये था, जो जीएसटी के बाद 65000 करोड़ रुपये हो गया. वाजिब सवाल है, पैसा कहां गया. भाजपा नेता कपिल मिश्रा ने भी पूछा- "तो करोड़ों रूपए विज्ञापनों में क्यों फूंक रहे हो? परसों हर चैनल में 14 मिनट का केजरीवाल का विज्ञापन था - एक दिन में 25 करोड़ रुपए फूंके ! हर रोज सिर्फ अखबारों में 2-3 करोड़ के विज्ञापन, टीवी पर रोजाना 4-5 करोड़ रुपये के विज्ञापन, पैसे नहीं हैं तो ये बर्बादी क्यूं ?". केजरीवाल सरकार की तरफ से इनमें से किसी भी सवाल का जवाब नहीं आया. आता भी कैसे. जो पूछा जा रहा है, वो सर्वविदित है. एक कंगाल सरकार के पास तनख्वाह के लिए पैसे नहीं है, लेकिन अपने विज्ञापन के लिए पैसे हैं. आखिर विज्ञापन क्यूं जरूरी है. ये अरविंद केजरीवाल सरकार की विफलता को ढकने का जरिया है. उदाहरण के तौर पर, एक दैनिक समाचार पत्र के पोर्टल पर खबर चली कि दिल्ली में मृतकों की संख्या तीन सौ नहीं, नौ सौ से ज्यादा है... ये खबर कुछ देर चली. और फिर यूआरएल नॉट फाउंड. यानी खबर गायब हो चुकी थी. दिल्ली सरकार की विफलताओं की खबर न तो आपको अखबारों में मिलेगी और न ही चैनलों पर.

दिल्ली सरकार असल में झूठ का साम्राज्य है. लगातार दो दिन से कोरोना के एक हजार से ज्यादा मामले सामने आ रहे हैं. मौत के आंकड़ों को लेकर केजरीवाल सरकार पिछले एक महीने से बाजीगरी कर रही है. लाशों के ढेर लग रहे हैं. कोरोना से मरने वालों की गिनती छिपाई जा रही हैं, लेकिन आज तक सरकार की ओर से आधिकारिक रूप से किसी भी दिन के मौत के आंकड़े अंतिम रूप से नहीं बताए गए. अभी तक दिल्ली में एक हजार से ज्यादा लोगों का अंतिम संस्कार कोविड प्रोटोकॉल के तहत हुआ है. लेकिन सरकारी आंकड़ा चार सौ है.


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मई के तीसरे हफ्ते में ही एनएमसीडी में स्टैंडिंग कमेटी के चेयरमैन जयप्रकाश ने दावा किया कि सिर्फ इस जोन में 21 मई तक कोरोना वायरस पॉजिटिव 282 लोगों का स्टैंडर्ड प्रोटोकॉल के तहत या तो अंतिम संस्कार किया गया है. यानी उनके इलाके में अब तक 282 लोगों की मौत कोरोना वायरस के चलते हुई है. दक्षिण दिल्ली नगर निगम में सदन के नेता कमलजीत सहरावत ने भी दावा किया, कि असलियत में मौत का आंकड़ा काफी ज्यादा है. सहरावत के अनुसार पंजाबी बाग शमशान घाट में 232 कोरोना मरीजों के शवों को लाया गया था, जबकि 68 डेड बॉडी कोरोना संदिग्धों के थे. इसके अलावा 76 शवों को आईटीओ कब्रिस्तान में दफनाया गया और एक शव को मदनपुर खादर में दफनाने के लिए ले जाया गया. एक समाचार चैनल के वीडियो में स्वास्थ्य अधिकारियों को मृतक के शरीर को कोरोना वायरस प्रोटोकॉल के अनुसार दफन करते देखा गया था. दफनाने के लिए गड्ढा खोदने के लिए एक जेसीबी मशीन भी लगाई गई थी. आईटीओ कब्रिस्तान के रिकॉर्ड के मुताबिक वह 96वां शव था, जिसे वहां दफनाने के लिए ले जाया गया था. एक और खास रणनीति. शवों को ठिकाने लगाने के अंदाज में देर रात अंतिम संस्कार किया जाता है.

दिल्ली में कोरोना इलाज के लिए कितने बेड हैं, ये भी अपने आप में एक पहेली बन चुका है. केजरीवाल सरकार दावा करती है कि तीस हजार से ज्यादा बेड हैं. जबकि अदालत में बताया जाता है कि तीन हजार से कुछ ज्यादा ही बेड उपलब्ध हैं. लोगों को इलाज के लिए भर्ती नहीं किया जा रहा है. हाल ही में नंद नगरी थाने के एसएचओ को कोरोना पॉजिटिव होने के बाद भर्ती होने के लिए कई अस्पतालों में घूमना पड़ा था. दिल्ली की हालत ये है कि लोगों को सरकार निजी अस्पतालों की राह दिखा रही है. जहां इलाज पांच लाख रुपये तक का बैठ रहा है. अब आखिरकार अपनी विफलता को नया मुखौटा पहनाते हुए सरकार ने मरीजों को होम क्वारंटाइन की इजाजत दे दी है. ये एक प्रकार की स्वीकारोक्ति है कि हमारे पास इलाज के लिए संसाधन नहीं हैं.

 

गुनाह कई हैं केजरीवाल सरकार के

दिल्ली झूठे वादों में फंस गई है. कोरोना बेकाबू है. आर्थिक बदहाली सिर पर है. इसके अलावा भी जहर के कई बीज केजरीवाल सरकार ने बो दिए हैं, जिनकी फसल दिल्ली या तो काट चुकी है, या काटेगी.


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  •  दिल्ली के ही जाफराबाद और कुछ मुस्लिम बहुल इलाकों में राहत सामग्री और राशन बांटने में धार्मिक आधार पर भेदभाव हुआ है. हिंदुओं को राशन की दुकानों से लौटा दिया गया. इसके पीछे दिल्ली में सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी के नेता और कार्यकर्ता थे. इस विषय में तमाम तथ्य सामने आने के बावजूद केजरीवाल सरकार ने इन हिंदुओं तक राहत पहुंचाने का कोई इंतजाम नहीं किया.

  • सीएए के विरोध में सबसे पहले मुसलमानों को भड़काने वाली दिल्ली सरकार ही थी. दिल्ली में सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी के नेता कार्यकर्ता दिल्ली इसमें सक्रिय थे। आम आदमी पार्टी के पार्षद मोहम्मद ताहिर हुसैन को दिल्ली पुलिस गिरफ्तार कर चुकी है। उसकी छत पर चढ़कर हथियार लहराते हुए, आगजनी करते हुए लोगों का वीडियो इंटरनेट पर वायरल है।हिंसा, आगजनी, हत्या जैसी घटनाओं पर आज तक दिल्ली सरकार या सत्तारूढ़ पार्टी ने माफी नहीं मांगी है.
  •  इसी कोरोना काल में, जब सब जान बचाने में लगे हैं, दिल्ली की केजरीवाल सरकार के एक विधायक ने मदनपुर खादर में सिंचाई विभाग की जमीन पर रोहिंग्या घुसपैठियों की पूरी बस्ती बसा दी है. इनके पास फर्जी आधार से लेकर राशन कार्ड तक सब हैं.

  •  जब रोहिंग्याओं को बसाया जा रहा था, तभी लॉकडाउन में श्रमिकों को खदेड़ने की शुरुआत दिल्ली से ही हुई. रातों-रात एनाउंस किया गया कि उत्तर प्रदेश और बिहार के लिए यूपी बार्डर पर बसे हैं. तीन हजार से ज्यादा बसों में लादकर दो लाख लोगों को यूपी बार्डर पर पटक दिया गया. इसी से देश में पलायन की शुरुआत हुई.

  •  दिल्ली सरकार ने खुद स्वीकार किया है कि तीन लाख से ज्यादा श्रमिकों ने दिल्ली से पलायन कर दिया. हालांकि ये आंकड़ा आठ से दस लाख के बीच बताया जाता है. इस बाबत कोई सफाई नहीं दी गई कि मुफ्त बिजली, मुफ्त पानी और दस लाख लोगों के लिए रोज खाना बांटने के बावजूद इतनी बड़ी संख्या में श्रमिक पलायन क्यों कर गए.

  •  दिल्ली में जब लॉक डाउन से लोग बेहाल थे. भूखे लोगों को दिए जाने वाले सरकारी खाने की हकीकत सबने देखी है. जबकि शाहीन बाग में चमत्कारिक तरीके से सौ दिन तक बिरयानी की आपूर्ति होती रही.

  • जब लोगों को राहत की जरूरत है, आम आदमी पार्टी के विधायक पानी के टैंकर सप्लाई पर वसूली कर रहे हैं. इसके अलावा राशन वितरण में धांधली, राहत सामग्री में घोटाले के गंभीर आरोप लग रहे हैं.