कहां गया केजरीवाल का टी 5 प्‍लान ?

    दिनांक 02-जून-2020   
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केजरीवाल ने दो माह पहले कोरोना से निपटने की कार्ययोजना बनाई थी। लेकिन आज भी स्थिति जस की तस है। अपनी नाकामी छिपाने के लिए दिल्‍ली सरकार मीडिया घरानों को भारी भरकम विज्ञापन दे रही है, और कोरोना से होने वाली मौतों पर पर्दा डाल रही है

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दिल्‍ली की अरविंद केजरीवाल सरकार कोरोना से निपटने की बजाए मीडिया प्रबंधन पर ज्‍यादा ध्‍यान दे रही है। कोरोना से जुड़े आंकड़ छिपाए जा रहे हैं और मीडिया घरानों का मुंह बंद रखने के लिए उन्‍हें भारी भरकम विज्ञापन दिए जा रहे हैं। संक्रमण के मामले में दिल्‍ली करीब 19,000 आंकड़ों के साथ देश में तीसरे पायदान पर है। यह स्थिति तब है, जब अप्रैल के पहले सप्‍ताह में मुख्‍यमंत्री अरविंद केजरीवाल 5टी वाली एक ‘दिव्‍य कार्ययोजना’ के साथ मीडिया से मुखातिब हुए थे।

7 अप्रैल को प्रेसवार्ता में उन्‍होंने यह बताया था कि अगर दिल्ली में कोरोना संक्रमण के 30,000 मामले आए तो उनकी सरकार किस तरह काम करेगी। साथ ही, उन्‍होंने कहा था, ‘मोटे तौर पर सभी देशों के अनुभव देखने के बाद एक चीज तो साफ है कि आपको कोरोना से तीन कदम आगे रहना है। अगर आप सोते रहे और कोरोना फैल गया तो उसके बाद आप कोरोना को कंट्रोल नहीं कर पाएंगे।’ बता दें कि मरकज की मेहरबानी से 7 अप्रैल तक दिल्‍ली में संक्रमण के 549 मामले आ चुके थे, जबकि 7 लोगों की मौत हुई थी।

केजरीवाल की  टी 5 कार्ययोजना थी- टेस्टिंग, ट्रेसिंग, ट्रीटमेंट, टीम वर्क, ट्रैकिंग और मॉनिटरिंग। उन्‍होंने दक्षिण कोरिया का उदाहरण देते हुए कहा था कि जिस तरह उसने बड़े पैमाने पर परीक्षण कर कोरोना संक्रमित का पता लगाया और इस पर नियंत्रण पाया, हम भी उसी तरह काम करेंगे। लेकिन दो महीने बाद दिल्‍ली सरकार ने कोरोना परीक्षण के लिए कितनी प्रयोगशालाएं स्‍थापित की और रोजाना कितने परीक्षण हो रहे हैं?

ट्रेसिंग के तहत कोरोना पॉजिटिव की पहचान होने के बाद उससे जुड़े सभी लोगों का पता लगाकर उन्‍हें क्‍वारंटीन करने की बात कही थी, लेकिन अब लोगों से कह रहे हैं कि अगर कोई पॉजिटिव भी है तो उसे अस्‍पताल आने की जरूरत नहीं। घर में रहकर ही वह अपना इलाज करा सकता है। इसका क्‍या मतलब है? ट्रीटमेंट यानी इलाज के लिए केजरीवाल ने अस्‍पतालों में 3,000 बिस्‍तरों की क्षमता होने की बात कही थी, जबकि उनकी तैयारी 30, 000 मरीजों के लिए बिस्‍तर उपलब्‍ध कराने की थी। लेकिन सच्‍चाई यह है कि दिल्‍ली के अस्‍पतालों में अभी केवल 3829 बिस्‍तर ही हैं। केजरीवाल के अनुसार, अस्‍पतालों में करीब 2300 बिस्‍तर खाली हैं।

सवाल यह है कि जब सरकारी अस्‍पतालों में बिस्‍तर खाली हैं तो मरीजों को निजी अस्‍पतालों में क्‍यों भेजा जा रहा है? कोरोना संक्रमितों के लिए 30, 000 बिस्‍तर का दावा कहां गया? आलम यह है कि निजी अस्‍पतालों में कोरोना जांच के लिए भी कोई राशि तय नहीं की गई है। निजी अस्‍पताल मनमाने तरीके से मरीजों से पैसे वसूल रहे हैं और कई मामलों में उनका इलाज भी नहीं कर रहे हैं।  इसी तरह, उन्‍होंने टीम वर्क की बात कही थी, लेकिन उन्‍होंने केंद्र सरकार या किसी अन्‍य राज्‍य के साथ क्‍या तालमेल बैठाकर काम किया? उन्‍हें पड़ोसी राज्‍य उत्‍तर प्रदेश से ही सीख लेनी चाहिए थी, जिसने 31 मई तक कोरोना मरीजों के लिए न केवल एक लाख बिस्‍तर विकसित करने का लक्ष्‍य रखा, बल्कि उसे हासिल भी कर लिया।

यही नहीं, राज्‍य में रोजाना 10,000 से अधिक जांच हो रही है। कुला मिलाकर जब कोई तैयारी ही नहीं है तो दिल्‍ली सरकार कोरोना की तैयारियों की ट्रैकिंग यानी निगरानी और मॉनिटरिंग क्‍या करेगी? अपनी नाकामी छिपाने के लिए केजरीवाल कोरोना के फर्जी आंकड़े दे रहे हैं और करोड़ों के विज्ञापन के लालच में मुख्‍यधारा मीडिया ने अपना मुंह बंद कर रखा है।