अरशद मदनी को हर बात में है आपत्ति

    दिनांक 22-जून-2020   
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जमीयत उलेमा ए हिंद के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी को दिल्ली दंगों के संदर्भ में दाखिल हो रहे आरोपपत्रों से लेकर सीएए, एनआरसी, एनपीआर और तीन तलाक विरोधी कानून पर भी घोर आपत्ति है। उनका कहना है कि इनके जरिए मुसलमानों की मजहबी पहचान को मिटाने का काम किया जा रहा है और उन्हें दंगों में फंसाया जा रहा है
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देश में कुछ लोग और संगठन ऐसे हैं, जिन्हें लगता है कि भारत में मुसलमानों के साथ सौतेला व्यवहार हो रहा है। इसलिए ये लोग बिना किसी आधार कोई भी बयान दे देते हैं और इसका खामियाजा देश को भुगतना पड़ता है। उनके बयानों से कटृटरवादी इतने उत्तेजित हो जाते हैं कि वे दंगा—फसाद करने लगते हैं और जब उन दंगाइयों के विरुद्ध पुलिस कार्रवाई करती है, तो कहा जाता है,'मुसलमानों के साथ ज्यादती हो रही है।'

20 जून को एक ऐसा ही बयान जमीयत उलेमा हिंद के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने दिया है। उन्होंने सहारनपुर में एक बयान जारी कर कहा है,''दिल्ली दंगे में मुसलमानों को राजनीतिक कारणों से फंसाया जा रहा है। उन पर बेबुनियाद आरोप लगाए जा रहे हैं।'' उन्होंने यह भी कहा,''जिन मुसलमानों को दंगों में फंसाया जा रहा है, उन्हें हर तरह की कानूनी मदद मुहैया कराई जाएगी। इसके लिए वकीलों की फौज तैयार हो चुकी है।'' उल्लेखनीय है कि इन दिनों दिल्ली पुलिस फरवरी में दिल्ली में हुए दंगों के आरोपपत्र अदालत में दाखिल कर रही है। इनमें हिंदू और मुसलमान दोनों आरोपी बनाए जा रहे हैं, लेकिन मदनी को लग रहा है कि केवल मुसलमानों को ही फंसाया जा रहा है।

मदनी ने यह कहकर भी मुसलमानों को भड़काने की कोशिश की कि ''देश में जहां भी दंगे होते हैं, वहां पुलिस की भूमिका ठीक नहीं रहती है। दिल्ली में भी यही हुआ। अब दिल्ली पुलिस एकतरफा आरोपपत्र दाखिल कर रही है।'' 

मदनी ऐसे बयानों को लेकर बराबर सुर्खियों में रहते हैं। इससे पहले उन्होंने 20 फरवरी को  सीएए, राष्ट्रीय नागरिक पंजी (एनआरसी) और राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) को केंद्र सरकार का 'सांप्रदायिक' कार्य बताया था। मदनी ने कहा था, ''इनके जरिए मुसलमानों की मजहबी पहचान को मिटाने और भारत को 'हिंदू राष्ट्र' बनाने का प्रयास हो रहा है।''

जब केंद्र सरकार ने तीन तलाक विरोधी कानून बनाया था तब भी मदनी ने देश के मुसलमानों को उकसाने वाले बयान दिए थे। उन्होंने कहा था,''सरकार ऐसे 50 कानून बना ले, लेकिन जो मुसलमान हैं, वे शरीयत को ही मानेंगे।'' मदनी के ऐसे बयानों से पता चलता है कि उन्हें न तो देश की सरकार पर भरोसा है, न ही अदालत पर और न ही पुलिस पर। यदि ऐसा होता तो वे इस तरह के भड़काने वाले बयान नहीं देते।