भारत के गौरवशाली अतीत से चिढ़ते हैं वामपंथी

    दिनांक 22-जून-2020   
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डॉ अंशु जोशी


लोकतांत्रिक मूल्यों, शैक्षणिक स्वतंत्रता तथा अधिकारों की बात करने वाले जेएनयू के वामपंथी वास्तव में कितने अलोकतांत्रिक हैं, इसका एक और प्रमाण हाल ही में देखने को मिला जब विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के कुछ शिक्षकों द्वारा सरस्वती सभ्यता पर एक वेबिनार कराया गया। विश्वविद्यालय में वैसे तो वामपंथी शिक्षक और नेता अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात करते हैं, किन्तु अपने ही राष्ट्र के गौरवशाली अतीत पर चर्चा इन्हें रास नहीं आती।
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लोकतांत्रिक मूल्यों, शैक्षणिक स्वतंत्रता तथा अधिकारों की बात करने वाले जेएनयू के वामपंथी वास्तव में कितने अलोकतांत्रिक हैं, इसका एक और प्रमाण हाल ही में देखने को मिला जब विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के कुछ शिक्षकों द्वारा सरस्वती सभ्यता पर एक वेबिनार कराया गया। विश्वविद्यालय में वैसे तो वामपंथी शिक्षक और नेता अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात करते हैं, किन्तु अपने ही राष्ट्र के गौरवशाली अतीत पर चर्चा इन्हें रास नहीं आती। ऐसे ही बुद्धिजीवी होने का रंगीन चश्मा पहने कुछ वामपंथी शिक्षकों ने इस वेबिनार का पुरज़ोर विरोध किया। ये बात अलग है कि वेबिनार का आयोजन सफलतापूर्वक हुआ, जिसमें देश—विदेश से कई श्रोता तथा दर्शक जुड़े तथा वेबिनार में हुई गहन तथा गंभीर चर्चा को खूब सराहा गया।
 
जेएनयू में ये पहली बार नहीं हुआ है। सम्पूर्ण विश्व में जिस नदी के अस्तित्व को सिद्ध मान इतिहासकार इससे जुड़ी संस्कृति का विश्लेषण करने में लगे हुए हैं, उसी नदी तथा उसके प्राचीन भारत वर्ष के निर्माण में महती भूमिका को जेएनयू के तथाकथित प्रबुद्ध इतिहास के शिक्षक "मिथ्या" मानते हैं। और तो और, भारतीय इतिहास के इस अत्यंत महत्वपूर्ण अकादमिक विषय पर चर्चा इन्हें "कम्युनल" लगती है।
 
ये वही इतिहासकार हैं, जो 1857 के स्वतंत्रता संग्राम को "विद्रोह" लिखते आये हैं, ये वही प्रबुद्ध हैं जिन्हें भगत सिंह "आतंकवादी" लगते हैं। कॉंग्रेस पार्टी का महिमामंडन करते हुए ये बताना भूल जाते हैं कि इसकी स्थापना किसने और क्यों की थी। इन स्वघोषित प्रबुद्धों को आज भी पश्चिम एशिया "मिडिल ईस्ट" लगता है और शिवाजी जैसे महापराक्रमी—वीर "लुटेरे"। इसी तरह के ब्रिटिश कलम की कॉंग्रेसी स्याही से लिखे गए भारतीय इतिहास को इसी वामपंथी-कॉंग्रेस नेक्सस ने भारतीय पाठ्यक्रम में खूब चलाया और नतीजा निकला ऐसी पीढ़ी जिसे अपने भारतीय इतिहास की गौरवशाली घटनाओं और वीरों के बारे में ज्ञान ही नहीं, या तोड़-मरोड़ कर पढ़ाये गए इतिहास की वजह से जो अपने आप को अपनी ही संस्कृति से कटा पाते हैं। ये वही इतिहासकार हैं जिन्होंने तमाम पाठ्य पुस्तकों में नेहरू-गांधी परिवार को भारतीय स्वतंत्रता का एकमात्र सुपर हीरो घोषित किया हुआ है। स्वतंत्रता के यज्ञ में कितने ही वनवासी और दलित वीरों-वीरांगनाओं की आहुति पड़ी, पर उनका उल्लेख भी करना अपने सुविचारित राजनीतिक षडयंत्र के तहत इन्हें उचित न लगा। पर यही लोग अपने राजनीतिक एजेंडा के तहत दलितों और वनवासियों के हित की बात करते हैं। 

जेब जब सरकारी वेतन से भरी हो, घर में तमाम उपकरण और साधन हों, बच्चे विदेशी स्कूलों और विश्वविद्यालयों में पढ़ रहे हों, घर के बाहर बोगनबेलिया और मोगरे फूल रहे हों, तब ऐसी में बैठ गरीब मज़दूरों पर,आदिवासियों पर, दलितों पर, महिलाओं के अधिकारों पर चर्चा करना वामपंथियों के लिए फैशन या पसंदीदा टाइम पास है। कोरोनाकाल के दौरान पलायन कर चुके और कर रहे श्रमिकों के लिए मध्य प्रदेश, कर्नाटक और उत्तर प्रदेश सरकारों ने कई सारी योजनाओं का कार्यान्वयन प्रारम्भ कर दिया, जिसका कोई ढिंढोरा कहीं नहीं पीटा गया, पर इन बुद्धिजीवियों की सांठ-गाँठ से चलती काँग्रेस ने जिस प्रकार इन श्रमिकों का उपयोग अपने राजनीतिक एजेंडा के लिए किया, उससे ये स्पष्ट हो जाता है कि इस राष्ट्र के दुःख दर्द इनके लिए अवसर हैं, जिसके माध्यम से ये सरकार और जनता के बीच खाई खोदने और गहरी करने में लगे रहते हैं। चीन जैसे देश पर सहानुभूति रखने वाले झोला छापों से यही उम्मीद की जा सकती है कि सरस्वती पर चर्चा उन्हें "कम्युनल" लगे। 

किन्तु, चाहे जेएनयू हो या पूरा राष्ट्र, आज भारतीय दृष्टि से इतिहास, अंतर्राष्ट्रीय राजनीति, अर्थशास्त्र और कई अन्य विषयों पर चर्चाएं की जा रही हैं, शोध हो रहे हैं, अकादमिक काज हो रहे है। भारत को केंद्र में रख अपनी संस्कृति और जड़ों से जुड़े विषयों पर चर्चा करना अत्यंत महत्वपूर्ण भी है और आवश्यक भी। इनसे जो विषय निकल कर आएंगे वे भारत के भविष्य का रोडमैप बनाने में कारगर सिद्ध होंगे।
 
जेएनयू के कैंपस में यदि "भारत तेरे टुकड़े होंगे" जैसे नारे लग सकते हैं, कश्मीरी अलगाववादी नेता आकर सभाएं कर सकते हैं और छात्राएं "मजहबी आस्था" के लिए बुरका या नकाब पहन सकती हैं तो भारत माता की जय का जयघोष करने में, रामायण पर चर्चा करने में और सरस्वती पर वेबिनार करने में कैसी परेशानी है ? सरस्वती पर इतिहास की दृष्टि से चर्चा हो या कालिदास पर साहित्य की दृष्टि से, कौटिल्य के अर्थशास्त्र पर चर्चा हो या श्रीराम पर अकादमिक चर्चा हो या श्री कृष्ण और श्रीमदृ भगवदगीता पर राजनीति शास्त्र और प्रबंधन की दृष्टि से, भारतीय इतिहास और संस्कृति से जुड़े चरित्रों, साहित्य और घटनाओं पर चर्चाएं और विवेचन अवश्य होना चाहिए, क्योंकि अपने ही राष्ट्र में अपने ही किरदारों, घटनाओं और इतिहास पर चर्चा के लिए हमें किसी के सर्टिफिकेट की आवश्यकता नहीं। साथ ही पाठ्यक्रमों और पाठ्यपुस्तकों में भारतीय इतिहास के साथ की गयी भयावह छेड़-छाड़ को भी सुधारने की आवश्यकता है। 
(लेखिका जेएनयू में सहायक प्राध्यापक हैं)