डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की पुण्यतिथि पर विशेष— सपना हुआ साकार

    दिनांक 22-जून-2020
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प्रो. रसाल सिंह
डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने हमेशा संसद से लेकर सड़क तक और दिल्ली से लेकर श्रीनगर तक भारतीय संविधान के इन विभाजनकारी प्रावधानों- अनुच्छेद 370 और 35 ए का पुरज़ोर विरोध किया और उनके जीवन के आखिरी और निर्णायक लड़ाई भी इस चक्रव्यूह को तोड़ने की ही थी। "एक निशान, एक विधान और एक प्रधान" का नारा उन्होंने अनुच्छेद 370 और 35 ए के विरोध में ही दिया था। 

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5 अगस्त, 2019 को भारत सरकार द्वारा अनुच्छेद 370 और 35—ए को भारतीय संविधान से पूर्ण रूप से हटाने का ऐतिहासिक और साहसिक निर्णय लिया गया। दरअसल, इससे पहले जम्मू-कश्मीर हमें भारत के नक्शे में तो दिखाई देता था किंतु रक्षा, विदेश और संचार जैसे तीन विषयों के अलावा भारतीय संघ और संविधान से स्वायत्तता की स्थिति थी। जम्मू-कश्मीर में अलग संविधान, अलग झंडा, अलग नागरिकता, अलग प्रधान (जिसे वजीरे आज़म या प्रधानमंत्री कहा जाता था) और अलग न्याय विधान ( रणवीर पैनल कोड) का प्रावधान था। ये पृथकतावादी प्रावधान जम्मू-कश्मीर रियासत के भारत में विलय के समय किये गये। ये प्रावधान साम्प्रदायिक तुष्टिकरण और राजनीतिक अदूरदर्शिता का परिणाम थे। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने हमेशा संसद से लेकर सड़क तक और दिल्ली से लेकर श्रीनगर तक भारतीय संविधान के इन विभाजनकारी प्रावधानों- अनुच्छेद 370 और 35 ए का पुरज़ोर विरोध किया और उनके जीवन के आखिरी और निर्णायक लड़ाई भी इस चक्रव्यूह को तोड़ने की ही थी। "एक निशान, एक विधान और एक प्रधान" का नारा उन्होंने अनुच्छेद 370 और 35ए के विरोध में ही दिया था। उनका देश की एकता और अखंडता में पूरा विश्वास था। इसके लिये वे लड़ते हुए बलिदान हो गये। "जहां हुए बलिदान मुखर्जी, वह कश्मीर हमारा है" और " कश्मीर हो या गुवाहाटी; अपना देश, अपनी माटी" जैसे नारों से राष्ट्रभावी विचारों के असंख्य नौजवान प्रेरणा पाते रहे हैं। उनमें से अनेक आज भारत सरकार और सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के नीति-निर्माता हैं। ये डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के बलिदान की रक्त-सिंचित भूमि के फल-फूल हैं।

अनुच्छेद 370 और 35 ए की शुरुआत उस वक्त हुई जब अन्ततः ब्रिटिश सरकार द्वारा भारत को स्वतंत्र करने की घोषणा कर दी गई थी। द्विराष्ट्र सिद्धान्त के साथ देसी रियासतों को भारत या पाकिस्तान-किसी भी राष्ट्र में विलय होने का प्रस्ताव रखते हुये आखिरी फैसला रियासतों के राजाओं पर छोड़ दिया गया था। लगभग सभी रियासतों के विलय के बाद जब महाराजा हरि सिंह से भारत या पाकिस्तान में शामिल होने को कहा गया तो उन्होंने जम्मू-कश्मीर को दोनों ही देशों में से किसी में भी विलय करने से इन्कार करते हुये खुद को स्वतंत्र राज्य बनाये रखने का फैसला किया। भारत को इसमें कोई आपति नहीं थी। लेकिन पाकिस्तान ने प्रारम्भ से ही जम्मू-कश्मीर राज्य को जबरन हथियाने का प्रयास किया। 22 अक्टूबर, 1947 की रात को पाकिस्तान की तरफ से कबाइलियों ने जम्मू-कश्मीर पर सशस्त्र हमला बोल दिया। इस हमले में पाकिस्तान द्वारा किये गये बर्बर व्यवहार और नरसंहार को देख कर महाराजा हरि सिंह ने जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय की गुहार लगाई। इस प्रकार भारतीय संघ में विलय-पत्र (जिसे "इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन" कहा जाता है) पर महाराजा हरि सिंह ने हस्ताक्षर कर जम्मू-कश्मीर को भारत में पूर्ण रूप से विलय करना स्वीकार कर लिया। यहां ध्यान देने योग्य बात यह है कि इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन वही सहमति-पत्र था, जिस पर हस्ताक्षर कर अन्य देसी रियासतों ने स्वयम् को पूर्ण रूप से भारत में विलय किया था। बस फर्क था तो तारीख का जो जम्मू-कश्मीर के विलय के दौरान 15 अगस्त, 1947 न हो कर 22 अक्टूबर, 1947 को किया गया था। बाकी तमाम शर्तें वही थीं, जो अन्य किसी भी देसी रियासत के विलय के लिये तय की गई थीं।

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लेकिन शेख अब्दुल्ला, जो उस दौरान हिन्दू महाराजा हरि सिंह के विरुद्ध संघर्षरत था और मुस्लिम बहुल कश्मीर का लोकप्रिय नेता और प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू का करीबी था। वह अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के कारण जम्मू-कश्मीर के इस विलय के खिलाफ था। इसलिये उसने जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग की। नेहरू और शेख अब्दुल्ला में घनिष्ठ मित्रता होने के कारण नेहरू ने सरदार पटेल और डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के द्वारा संविधान में अनुच्छेद 370 और धारा 35 ए का विरोध करने पर भी शेख अब्दुल्ला की बात मानकर ये प्रावधान किये। इस प्रकार संविधान में अनुच्छेद 370 और 35 ए को जोड़कर जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा दे दिया गया और उसे संविधान के अलग खांचे में रख दिया गया। यह भारत की एकता, अखंडता और संप्रभुता पर बड़ी चोट थी। जिस संविधान सभा में अनुच्छेद 370 और 35 ए को पारित किया गया था, उसके सदस्य डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने इसका जोरदार विरोध किया था। उनका मानना था कि संविधान में शामिल किये गये ये प्रावधान जम्मू-कश्मीर को भारत से कभी भी नहीं जुड़ने देंगे। इन प्रावधानों को डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने शेख अब्दुल्ला के त्रि-राष्ट्र सिद्धान्त का स्वीकार कहा और इसी के विरोध में नेहरू मंत्रिमंडल से उन्होंने अपना त्यागपत्र दे दिया। इस प्रकार वह अब खुले रूप में अनुच्छेद 370 और 35 ए के विरोध में सामने आए और अखंड भारत के निर्माण के उद्देश्य से और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रेरणा से उन्होंने 1951 में भारतीय जनसंघ नामक राष्ट्रभावी राजनीतिक दल का गठन किया। 21 अक्टूबर, 1951 को भारतीय जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की अध्यक्षता में इसकी पहली राष्ट्रीय समिति की बैठक हुई। इस बैठक में सर्व-सम्मति से स्वीकृत प्रस्ताव में जम्मू-कश्मीर के भारत में पूर्ण विलयन अर्थात भारत के पूर्ण एकीकरण का संकल्प लिया गया।

इसप्रकार डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी उन कुछ लोगों में से थे जिन्होंने न सिर्फ स्वतंत्र भारत का सपना अपनी आँखों में सँजोया बल्कि एक अखंड और संप्रभु भारत के सपने को साकार करने के लिये अपना जीवन-सर्वस्व समर्पित कर दिया। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी उन राष्ट्रभावियों में से थे जिन्होंने भारत माता को प्यार करते हुए "जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी" की सार्थकता और महत्ता सिद्ध की। राष्ट्र के लिए त्याग, बलिदान, समर्पण, संघर्षशीलता, संगठन-कार्य और बौद्धिक-वैचारिक तेजस्विता, प्रखर वक्तृता जैसे विशिष्ट गुण उन्हें स्वाधीन भारत का महानायक बनाते हैं।

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का जन्म 6 जुलाई, 1901 को कलकत्ता के एक प्रतिष्ठित बंगाली परिवार में हुआ। उनके पिता सर आशुतोष मुखर्जी बंगाल के एक सुविख्यात शिक्षाविद थे। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का बचपन का नाम बेनी था। भवानीपुर के मित्र इंस्टीट्यूशन से अपनी प्राथमिक शिक्षा पूरी करने के बाद 1917 में उन्होंने अपनी मैट्रिक की शिक्षा पूरी की। इसके बाद उन्होंने कलकत्ता के प्रेसिडेन्सी कॉलेज से 1919 में इंटरमीडिएट परीक्षा उत्तीर्ण की। 1923 में उनका विवाह सुधा चक्रवर्ती के साथ कर दिया गया। 1923 में ही वह विश्वविद्यालय सीनेट के फेलो बने। इसी वर्ष 1923 में ही उन्होंने बांग्ला में एम.ए की परीक्षा प्रथम श्रेणी से पास की। 1924 में कलकत्ता विश्वविद्यालय से बैचलर ऑफ़ लॉ की परीक्षा पास करने के बाद डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने कलकत्ता उच्च न्यायालय में अधिवक्ता के रूप में अपना नाम दर्ज कराया। इसके बाद वे 1926 में बैरिस्टर बनने के लिए इंग्लैंड चले गए और 1927 में  वे बैरिस्टर एट लॉ की डिग्री लेकर भारत लौटे।

विद्या, वित्त और विकास के तीन स्तंभों पर आधारित राष्ट्रीय विचारों से ओतप्रोत उनका जीवन अत्यंत सकारात्मक और ऊर्जावान था। जब वे कलकत्ता विश्वविद्यालय के कुलपति बने तब 1937 में उन्होंने पहली बार रवीन्द्रनाथ टैगोर जैसे राष्ट्रीय सांस्कृतिक महानायक को दीक्षान्त समारोह में आमंत्रित किया और अपना दीक्षान्त भाषण भी अपनी मातृभाषा बांग्ला में दिया। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के जीवन में शिक्षा के महत्व को इस रूप में भी समझा जा सकता है कि भारत लौटने के बाद मात्र 33 वर्ष की उम्र में ही वह कलकत्ता विश्वविद्यालय के कुलपति नियुक्त हुए। इस तरह उन्होंने विश्व के सबसे युवा कुलपति होने का गौरव भी प्राप्त किया। वह 1938 तक कुलपति के पद पर रहे तथा अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में अनेक रचनात्मक कार्य किये। कलकत्ता विश्वविद्यालय का प्रतिनिधित्व करते हुये वे 1929 में कांग्रेसी उम्मीदवार के रूप में बंगाल विधान परिषद के सदस्य चुने गये। लेकिन जब 1930 में कांग्रेस ने विधान मंडल के बहिष्कार का आह्वान किया तो डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने विधान परिषद से इस्तीफा दे दिया। बाद में वह निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में दोबारा निर्वाचित हुए।

1937 में जब कृषक प्रजा पार्टी और मुस्लिम लीग गठबंधन सत्ता में आया तो डॉ.  मुखर्जी विपक्ष के नेता बन गये। वह फज़लुक हक के नेतृत्व में प्रगतिशील मंत्रिमंडल में वित्त मंत्री के रूप में शामिल हुये। लेकिन एक साल से कम समय में उन्होंने इस पद से त्यागपत्र दे दिया। इसके कुछ दिन बाद ही वह अखिल भारतीय हिन्दू महासभा में शामिल हो गये। 1940 में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी को अखिल भारतीय हिन्दू महासभा का कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त किया गया और 1944 में वह अखिल भारतीय हिन्दू महासभा के अध्यक्ष चुने गये। गाँधी जी की हत्या के बाद डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी चाहते थे कि हिन्दू महासभा को केवल हिन्दुओं तक ही सीमित न रखा जाये और यह जनता की सेवा के लिये केवल एक गैर राजनीतिक संगठन के रूप में कार्य करने तक ही सीमित न रहे। डॉ.  श्यामा प्रसाद मुखर्जी की इन मांगों को स्वीकार नहीं किया गया तो वे 1948 में इससे अलग हो गये। आजादी के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने अपने सर्वदलीय मंत्रिमंडल में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी को उद्योग एवं आपूर्ति मंत्री के रूप में नियुक्त किया। दरअसल, डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का केन्द्रीय मंत्रिमंडल में शामिल किया जाना कोई आश्चर्य की बात नहीं थी। इससे पहले संविधान सभा में उनके प्रदर्शन, राजनीतिक दूरदर्शिता, शानदार भाषण कला और संसदीय प्रक्रिया के ज्ञान और अनुभव ने उन्हें अभूतपूर्व ऊँचाई प्रदान कर दी थी। उनका राजनीतिक प्रभाव भी अद्वितीय था। उनकी राष्ट्रवादी वैचारिक प्रतिबद्धता समझौतावादी और स्वार्थपरता वाली राजनीति से मेल नहीं खाती थी। इसलिए वैचारिक मतभेदों के कारण डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ज्यादा दिनों तक मंत्रिमंडल का हिस्सा नहीं रह सके। पाकिस्तान में हिन्दू, सिख आदि अल्पसंख्यकों पर हो रहे मजहबी अत्याचारों और प्रताड़ना के विरोध में तथा तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लियाकत अली के बीच हुये समझौते में ढिलाई से दुखी होकर 6 अप्रैल, 1950 को डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने मंत्रिमंडल से त्यागपत्र दे दिया। इसके बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन सरसंघचालक श्री माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर (गुरूजी) से प्रेरणा और मार्गदर्शन प्राप्त करने के बाद 21 अक्टूबर, 1951 को दिल्ली में भारतीय जन संघ की स्थापना की और इसके पहले अध्यक्ष बने।

1951-52 के आम चुनावों में भारतीय जन संघ के तीन सांसद चुने गये जिनमें से एक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी स्वयं थे। उन्होंने संसद के भीतर राष्ट्रीय जनतांत्रिक पार्टी बनाई जिसमें 32 सदस्य लोक सभा और 10 सदस्य राज्य सभा से थे। हालांकि, लोक सभा अध्यक्ष ने उसे विपक्षी पार्टी के रूप में मान्यता नहीं दी। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी भारत की अखंडता और भारत में कश्मीर के पूर्ण विलय के दृढ़-समर्थक थे। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 370 को भारतीय संघ और संविधान की विफलता बताया। अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को निरस्त करने के लिये भारतीय जन संघ ने हिन्दू महासभा और रामराज्य परिषद के साथ सत्याग्रह शुरू किया। 1953 में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी जनसुनवाई के लिए कश्मीर गये और इसी दौरान 11 मई को वहां लागू परमिट सिस्टम का उल्लंघन कर कश्मीर में प्रवेश करते हुये उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और श्रीनगर में नजरबंदी के दौरान ही 23 जून, 1953 को डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने अपनी अन्तिम सांस ली।


डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी भारतीय राष्ट्र की एकता और अखंडता के प्रबल समर्थक थे। इसीलिए अनुच्छेद 370 के तहत कश्मीर को दिये गये विशेषाधिकारों के वे सख्त खिलाफ थे। यही नहीं उन्होंने संविधान में शामिल किये गये अनुच्छेद 370 को राष्ट्र के लिए घातक बताया था। डॉ.  श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने प्रारम्भ से ही कश्मीर नीति पर जवाहरलाल नेहरू की तुष्टिकरण की नीति का विरोध किया। 1944 में  दिल्ली में हुए पंचम आर्य महासभा सम्मेलन में अध्यक्षीय भाषण देते हुये डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने साफ कर दिया था कि आजादी के बाद भारत की एकता और अखंडता को कायम रखना बहुत ही महत्वपूर्ण चुनौती होगी।

दरअसल, आजादी के बाद 1948 में भारत में विलय के बाद जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा और अधिकार दिये गये थे। डॉ.  श्यामा प्रसाद मुखर्जी आजादी के बाद अखंड भारत में जम्मू कश्मीर की इस स्थिति को मानने के लिये बिल्कुल तैयार नहीं थे। जम्मू-कश्मीर की इस विशेष स्थिति का विरोध करते हुये डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने “एक देश में दो निशान, एक देश में दो संविधान और एक देश में दो प्रधान नही चलेगा”  जैसा विख्यात नारा दिया। अनुच्छेद 370 के तहत संविधान में जम्मू कश्मीर को विशेषाधिकार प्राप्त था। डॉ.  श्यामा प्रसाद मुखर्जी इस विशेषाधिकार का विरोध जीवन भर करते रहे और उन्होंने अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को "भारत के बाल्कनीकरण" की संज्ञा दी। भारत के पूर्ण एकीकरण के अपने महत्तम उद्देश्य को स्पष्ट करते हुये अगस्त 1952 में जम्मू में हुई विशाल रैली में उन्होंने कहा कि या तो आपको भारतीय संविधान प्राप्त करवाऊंगा या फिर इस उद्देश्य के लिये अपना पूरा जीवन बलिदान कर दूंगा।

जम्मू-कश्मीर एकीकरण के अलावा एक और विषय था, जिसकी ओर डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने पूरे भारत का ध्यान खींचा। दरअसल, जम्मू-कश्मीर के प्रधानमंत्री शेख अब्दुल्ला की सरकार से वहां का दूसरा सबसे बड़ा भाषाई समुदाय डोगरा अत्यंत त्रस्त था। डोगरा समुदाय सम्मान और अधिकारों के लिये प्रेमनाथ डोगरा की अगुआई में प्रजा परिषद पार्टी पहले से ही संघर्ष कर रही थी। कई दस्तावेजों से यह साबित होता है कि शेख अब्दुल्ला चाहता था कि सारे डोगरा कश्मीर छोड़ कर चले जाएं और अपनी जमीन और घर-बार उन लोगों (मुसलमानों) के लिये छोड़ जाएं, जिन्हें शेख अब्दुल्ला अपना समझते थे। यह साम्प्रदायिक भेदभाव और उत्पीड़न की पराकाष्ठा थी। तत्कालीन इंटेलीजेन्स ब्यूरो के प्रमुख बी एन मलिक ने भी अपनी पुस्तक “माई इयर्स विद नेहरू” (My years with Nehru) में इस तथ्य का विस्तार से उल्लेख किया है। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने डोगरा आन्दोलन को पूरा समर्थन दिया। यह तथ्य भी ध्यान देने योग्य है कि जम्मू-कश्मीर में डोगरा समुदाय के साथ अब्दुल्ला सरकार द्वारा किये जा रहे दुर्व्यवहार और भेदभाव के विषय में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने जवाहर लाल नेहरू और शेख अब्दुल्ला के साथ लगभग छह माह तक लंबा पत्राचार किया। इस पत्राचार में उन्होंने उनसे डोगरा समुदाय के उत्पीड़न और दोयम दर्ज़े के विषय में संज्ञान लेने का आग्रह किया। यह स्पष्ट रूप से लोकतांत्रिक व्यवस्था में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की आस्था को दर्शाता है। लेकिन नेहरू सरकार द्वारा कोई भी कार्रवाई न करने पर उन्होंने जम्मू-कश्मीर में स्वयं जाकर स्थिति को समझने और उसे सुलझाने का भी प्रस्ताव रखा। इस पर भी कोई भी कोई प्रतिक्रिया न होने पर डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने जम्मू-कश्मीर में लागू परमिट व्यवस्था का विरोध किया। इस व्यवस्था के तहत जम्मू-कश्मीर से बाहर का कोई भी व्यक्ति बिना परमिट लिये जम्मू-कश्मीर की सीमा में प्रवेश नहीं कर सकता था। इस व्यवस्था के विरोध में उन्होंने मई 1953 को बिना परमिट लिये जम्मू-कश्मीर जाने की योजना बनाई। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी 8 मई, 1953 को सुबह 6:30 बजे अपने समर्थकों के साथ पंजाब के रास्ते जम्मू के लिय रवाना हुए। जालंधर से अमृतसर के लिए उन्होंने ट्रेन पकड़ी। 10 मई 1953 को जालंधर में दिये गए अपने वक्तव्य में उन्होंने साफ किया कि जम्मू-कश्मीर सरकार ने भारत के किसी भी नागरिक को वहां आने के अधिकार से वंचित किया हुआ है। इसके अगले ही दिन 11 मई 1953 की शाम को डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी को जम्मू—कश्मीर की सीमा के 2 मील भीतर लखनपुर से गिरफ्तार कर लिया गया। माधवपुर की निगरानी चौकी पार करने के बाद पुल के बीच से ही उन्हें गिरफ्तार कर उधमपुर होते हुए श्रीनगर से दूर निशात बाग के करीब बंदी बनाकर एक घर में रखा गया। बाहरी दुनिया से उनका सम्पर्क काट दिया गया। उन्हें लिखी जाने वाली कई चिठ्ठियों को दबा दिया गया। दोस्तों या रिश्तेदारों से भी नहीं मिलने दिया गया। 22 जून की सुबह से उनकी तबियत बहुत खराब हो गई। इसके बाद उन्हें राजकीय अस्पताल में भर्ती करवाया गया। 23 जून की सुबह नज़रबंदी के दौरान ही विषम परिस्थितियों में उन्होंने अपनी आखिरी सांस ली।


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डॉ.  श्यामा प्रसाद मुखर्जी की आकस्मिक और असामयिक मृत्यु पर विपक्ष द्वारा लगातार सवाल उठाये गये, और इसकी जांच की मांग पूरे देश से उठने लगी। लेकिन तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने इस पर कोई कार्रवाई/ सुनवाई नहीं की। जम्मू-कश्मीर को लेकर डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की नीति स्पष्ट थी। वह किसी भी हालत में जम्मू-कश्मीर को विशेषाधिकार देने के पक्ष में नहीं थे और इसके लिये उन्होंने “संसद से लेकर सडक” तक कई आन्दोलन किये। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का मानना था कि भारत के भौगोलिक चित्र को पाकिस्तान में स्वतंत्र कश्मीर के नारे लगाकर नहीं बदला जा सकता।


आम तौर पर डॉ  श्यामा प्रसाद मुखर्जी को जन संघ के संस्थापक और कश्मीर के लिये आंदोलन करने वाले नेता के तौर पर याद किया जाता है। लेकिन उनका व्यक्तित्व इतने तक ही सीमित नहीं था। एक प्रखर राष्ट्रवादी होने के साथ-साथ उन्होंने आजादी से पहले और आजादी के बाद राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दिया। स्वतंत्रता के बाद भारत के राजनीतिक आकाश में नेहरू और कांग्रेस का एकछत्र वर्चस्व था। इस अधिनायकवादी केन्द्र को चुनौती देने वाले विपक्षी नेताओं में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी एक प्रमुख नाम हैं। स्वतंत्रता आंदोलन की विरासत को कब्जाने के कारण सर्वसत्तावादी कांग्रेस पार्टी और नेहरू जी की सरकार के सामने विपक्ष की मजबूत और भरोसेमंद आवाज़ डॉक्टरों की तिकड़ी बनी। इस तिकड़ी में डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी, डॉ. भीमराव आंबेडकर और डॉ. राम मनोहर लोहिया शामिल थे। दुर्भाग्य की बात है कि इन तीनों की ही मृत्यु रहस्यमय ढंग से हुई। लेकिन यह ऐतिहासिक तथ्य है कि इन तीनों ने ही अपने-अपने तरीके से कांग्रेस की हेकड़ी को चुनौती दी।
 
एक राष्ट्र के रूप में भारत के निर्माण में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का एक बड़ा योगदान यह भी रहा है कि उन्होंने पूरे बंगाल को पाकिस्तान में जाने से भी बचाया। जब ब्रिटिश सरकार ने भारत के विभाजन का प्रस्ताव रखा और कांग्रेस के नेताओं ने उसे स्वीकार कर लिया तब डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने बंगाल और पंजाब के विभाजन की मांग उठाकर प्रस्तावित पाकिस्तान का विभाजन करवाया और आधा पंजाब और आधा बंगाल भारत के लिये बचा लिया। आजादी के बाद पंडित जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में बनी अन्तरिम सरकार में उद्योग एवं आपूर्ति मंत्री के रूप में उन्होंने शानदार काम किया। अपने छोटे से कार्यकाल में उन्होंने भारत के औद्योगिक विकास की नींव रखी। उनके कार्यकाल में ऑल इंडिया हैंडीक्राफ्ट बोर्ड, ऑल  इंडिया हेंडलूम बोर्ड और खादी ग्राम उद्योग आदि की स्थापना हुई। जुलाई, 1948 में औद्योगिक वित्त काॅरपोरेशन की स्थापना भी हुई। उनके कार्यकाल में ही चितरंजन लोकोमोटिव फैक्ट्री की शुरुआत की गई। इसके अलावा भिलाई स्टील प्लांट, सिंदरी फर्टिलाइज़र समेत कई और औद्योगिक कारखानों की परिकल्पना और स्थापना उन्होंने मंत्री रहते हुए की थी। जिस स्वावलंबन और आत्मनिर्भरता की बात आज एकबार फिर कोरोना संकट के दौर में की जा रही है, उसकी परिकल्पना और नींव डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने आज से 70 साल पहले रखी थी।
(लेखक जम्मू केंद्रीय विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हैं।)