विस्तारवाद को जवाब

    दिनांक 22-जून-2020   
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तिब्बत की आजादी का कत्ल हो गया, भारत की जमीन गई और इसके बाद भी देश को यही समझाया गया कि उस जमीन का क्या जहां ‘एक तिनका भी नहीं उगता!’ सरकार जगी न जगी, धोखे की आहट से मेजर शैतान सिंह भाटी जैसे सपूतों का शौर्य जाग गया

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मेजर शैतान सिंह भाटी। 1962 के युद्ध में इनके नेतृत्व में भारतीय सेना की एक टुकड़ी ने लगभग 1,000 चीनी सैनिकों को मारा था। मरणोपरांत इन्हें परम वीर चक्र से सम्मानित किया गया।
भारत में औपनिवेशिक दौर के ब्रिटिश प्रशासक और उपन्यासकार कर्नल फिलिप मीडोज टेलर का उपन्यास Confessions of a Thug एक विश्वविख्यात रचना है। इसमें वे लोगों को झांसे में लेने वाले ठगों के किस्से बताते हुए उनकी कार्यप्रणालियों और व्यूहरचनाओं को लेकर दिलचस्प खुलासे करते हैं। ऊपर से शांत, अहिंसक, मृदुभाषी देखने वाले मुखौटे के पीछे क्रूर, नृशंस चेहरों की यह वास्तविकता रोंगटे खड़े कर देने वाली है। लोगों का लालच, मजबूरी या सीधापन देखकर ठग मीठी बातों का जाल बिछाते हैं। सहयोग के नाम पर निकटता बढ़ाते हैं, और फिर एक दिन मौका देख कर काम तमाम!
‘हिंदी-चीनी, भाई-भाई...’ माओ ने नेहरू से मीठी बातें ही तो की थीं! तिब्बत की आजादी का कत्ल हो गया, भारत की जमीन गई और इसके बाद भी देश को यही समझाया गया कि उस जमीन का क्या जहां ‘एक तिनका भी नहीं उगता!’ सरकार जगी न जगी, धोखे की आहट से मेजर शैतान सिंह भाटी जैसे सपूतों का शौर्य जाग गया। इसके बाद तो जैसे पूरा भारत ही जाग गया। जब मुलम्मा उतर जाता है तो हकीकत चमकने लगती है! चीनी इरादों की हकीकत भारत जानता है और इसीलिए भारत के लिए चीनी धींगामुश्ती की बजाय चीन के लिए भारत का ताजा जवाब ज्यादा चौंकाने वाला है।
लद्दाख में भारत-चीन भिड़ंत अपने आपमें इकलौती घटना नहीं है, किंतु मौजूदा वास्तविक नियंत्रण रेखा से लगे भारतीय सीमा क्षेत्र में भारतीय सैन्य बलों के सामने अड़ने की घटनाओं की आवृत्ति और इस बार हिंसा का स्तर बताता है कि पेंगोंग झील के शांत पानी में बेचैनी और लालसा की लहरें उठने लगी हैं। यह बेचैनी और लालसा किस ओर है? इसका कारण क्या है? और इसका व्याप क्या सिर्फ पेंगोंग-सो तक है?
तिब्बत को हथियाने के बाद तिब्बत सीमा से लगते भारतीय क्षेत्रों में चीन की बढ़ती दिलचस्पी और हेकड़ी के आईने में इस प्रश्न के उत्तर तलाशने जरूरी हैं।
भारत-चीन के बीच की शांत पट्टी (तिब्बत) तत्कालीन भारतीय राजनीति की आंखों पर बंधी पट्टी के कारण गंवा दी गई, यह ऐतिहासिक तथ्य है। किंतु इससे भी बड़ी बात यह है कि इस एक घटना ने भारत को सबक के साथ-साथ ड्रैगन के हिंसक विस्तारवादी मंसूबे को नख-दन्त दे दिए।
तिब्बत को रौंदता, स्वतंत्र देश ताइवान पर दावा ठोकता, ‘हिंदी-चीनी, भाई-भाई’ का नारा लगाने के बाद दोस्ती की पीठ में छुरा घोंपता ड्रैगन तब से और उन्मत्त ही होता गया है।
उन्माद की विशेषता है कि शुरुआत में यह रोग पकड़ में नहीं आता, उन्माद बढ़ता है तो सीमित दायरे में उत्पात बढ़ता है। उपेक्षा या प्रहसन भाव से लोग तब भी टाल जाते हैं, किंतु एक क्षण आता है जब दायरा लांघते ही उत्पाती को झन्नाटेदार जवाब मिलता है।
चीन के साथ लद्दाख में ठीक यही हुआ है।
ताइवान में यही हो रहा है।
हॉन्गकॉन्ग में यही होना है।
लद्दाख: मुठभेड़ के बाद भारत के 20 बलिदानी सैनिकों की संख्या आई मगर चीन अपना नुकसान बता नहीं सका। लोगों ने देखे तो लाशें ढोकर ले जाते
चीनी हेलीकॉप्टर। सूत्रों के मुताबिक इन्हें 46 चक्कर लगाने पड़े!
ताइवान: चीन ने चाहा कि विश्व मंच तक ताइवान की बात न पहुंचे, किंतु 18-19 मई को विश्व स्वास्थ्य संगठन के मंच पर और 19 जून को ‘कॉपनहेगेन डेमोक्रेसी समिट’ में ताइवान ने ताल ठोक दी।
ताइवान के लिए एकीकरण को बाध्यकारी बताने वाले ड्रैगन को जवाब मिला कि इस स्वतंत्र देश को चीन का ढोंग ‘एक देश, दो व्यवस्था’ मंजूर नहीं है।
हॉन्गकॉन्ग: चीनी सुरक्षा कानूनों की आड़ में हॉन्गकॉन्ग की लोकतांत्रिक आवाजों को दबाने की कोशिश हुई तो युवाओं के साथ 80-90 वर्ष के बुजुर्ग भी चीन के विरोध में पूरी दमदारी से आ
खड़े हुए।
लद्दाख की घटना के संदर्भ बिंदु जोड़ते हुए ये सिर्फ कुछ उदाहरण हैं मगर ड्रैगन के उत्पात, उत्पात के जवाब और इस जवाब से उपजी छटपटाहट को बताने वाले दर्जनों ऐसे उदाहरण विश्व पटल पर फैले पड़े हैं।
संयोग है कि एक मानवता-द्रोही वर्ग की अंतर्कथा के इतिहास दर्पण में हम आज एक देश को देख सकते हैं। चीन चालबाजियों का वैश्विक उदाहरण बनकर दुनिया के सामने खड़ा है। ऊपर से सौम्य, मिठबोला, सहयोगी किंतु मौका मिलते ही फंदे में लेने वाला पूरा उत्पाती।
कर्नल फिलिप अपने उपन्यास में बताते हैं कि कैसे ठग का रेशमी रुमाल, जिसके एक सिरे पर चांदी का सिक्का बंधा रहता है, शिकार के गले में फंदा लगाने का उपकरण या कहिए उसका काल बन जाता है।
रेशम महापथ (सीपीईसी) ड्रैगन का रुमाल है और व्यापार या आधारभूत ढांचे में निवेश इस रुमाल में बंधा सिक्का!
चीनी रेशम के फंदे की घुटन दुनिया को महसूस होने लगी है।
वैसे, तथ्य यह भी है कि लालसाओं के अलावा ठग अपनी बेचैनियों से भी बंधे होते हैं। आपस में फूट का डर, भेद खुलने का भय या बेसुध होने की बजाय शिकार के मुस्तैद हो जाने, प्रतिकार करने का खतरा..
हाल में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी में नेतृत्व के प्रश्न पर फूट के संकेत उभरते
दिखे हैं।
समाज पर वामपंथी शासन का असर छीज रहा है।
दुनिया चीनी चालबाजियों पर मुस्तैद होने लगी है।
बहरहाल, लद्दाख जैसी झूमाझटकियों का जवाब देना हम जानते हैं लेकिन चीन के लिए अब दुनिया में खतरा चौतरफा है-
- निर्वासित सरकार के माध्यम से तिब्बत घोषणा कर चुका है कि लद्दाख उसका नहीं, भारत का ही ऐतिहासिक हिस्सा है।
-ताइवान, चीन से अलग, विश्व व्यवस्था में अपनी हिस्सेदारी मांग रहा है।
-वियतनाम और ताइवान के साथ अमेरिका, आस्ट्रेलिया, जापान एकजुट हो रहे हैं। और भारत... यह तो है ही, क्योंकि ठगी का दंश झेलने वाली जमीन ने इसका अंत भी देखा है।
@Hiteshshankar