चीन की आंतरिक चुनौती

    दिनांक 23-जून-2020
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संतोष कुमार वर्मा

इन दिनों चीन अपने अंदर की चुनौतियों से ही परेशान है। तमाम बंदिशों के बावजूद बहुत सारे लोग सरकार की नीतियों की आलोचना करने लगे हैं। सवाल यह भी है कि क्या इन सबसे ध्यान हटाने के लिए ही चीन अपने पड़ोसियों से बैर मोल ले रहा है

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रोजगार के लिए प्रदर्शन करते चीन के युवा (फाइल चित्र)

एक छद्म समाजवादी गणराज्य के रूप में 1949 में अस्तित्व में आने वाला पीपुल्स रिपब्लिक आफ चाइना हमेशा से ही अपने सर्वोच्चतावादी और विस्तारवादी स्वप्नों को पूर्ण करने के लिए जिन उपायों का सहारा लेता आया है उन्हें किसी भी दृष्टि से उचित और उपयुक्त नहीं माना जा सकता। साम्यवादी चीन, जो चीन की प्राचीन शासन प्रणाली और सामाजिक व्यवस्था को भयंकर शोषणकारी मानता आया है, आज उसका वास्तविक उत्तराधिकारी बन बैठा है और तथाकथित ह्यमिडिल किंगडम  पर एकछत्र वर्चस्व स्थापित करने के लिए उसी रुढ़िवादी और दमनकारी ह्यडिवाइन मेंडेट का अधिकारी स्वयं को मान रहा है। और अब इसी क्रम में वह विश्व पर अपना प्रभाव जमाने के लिए अनैतिक और कुत्सित उपायों का सहारा ले रहा है।

 
परन्तु चीन के इन षड्यंत्रों की वास्तविकता विश्व के सम्मुख उजागर हो चुकी है और उसे व्यापक विरोध का सामना भी करना पड़ रहा है। संयुक्त राज्य अमेरिका समेत कई देशों ने चीन के साथ अपने संबंधों में गहन कटौती की है, और आने वाले समय में यह एक विश्वव्यापी आन्दोलन बनने जा रहा है।  चाइना इंस्टिट्यूट फॉर कंटेम्पररी इंटरनेशनल रिलेशंस (जो कि चीन के शीर्ष खुफिया निकाय, राज्य सुरक्षा मंत्रालय से संबंद्ध एक थिंक-टैंक है) द्वारा जारी की गई रपट के अनुसार आज वैश्विक चीन विरोधी भावना लगभग उतनी ही प्रबल है जितनी थ्येनआनमन चौक की घटना के बाद थी और यह तनाव चीन के अन्दर भी स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।

जनक्रांति के नाम पर सत्ता में आई साम्यवादी सरकार को अपने निहित स्वार्थों के लिए जनता का खून बहाने में कभी भी हिचकिचाहट महसूस नहीं हुई। ह्यग्रेट लीप फॉरवर्ड और ह्यकल्चरल रेवोलुशन जैसी तथाकथित क्रान्तिकारी योजनाओं के नाम पर बड़े पैमाने पर नरसंहारों को अंजाम दिया गया और आज चीन की जनता के समक्ष वैसी ही परिस्थितियां विद्यमान हैं जैसी कि अनेकानेक रपटें बताती हैं कि चीन में इस महामारी के कारण बड़े पैमाने पर जनहानि हुई है, परन्तु चीन की सरकार बचाव कार्यों के बजाय इस पर लीपापोती करने में अधिक व्यस्त है और उल्टा इन सबसे ध्यान हटाने के लिए वह अपनी आक्रामक प्रसारवादी नीति की ओर अग्रसर हो रहा है और इसका कारण दरार को कागज से ढकने के प्रयास की भांति हो सकता है।

सूचनाओं के अनुसार चीन और अमेरिका के बीच बिगड़ते संबंधों को लेकर कम्युनिस्ट पार्टी आफ चाइना के उच्चतम स्तर पर गहन मतभेद हैं। इनमें एक आक्रामक तबका है जो इस बात का पक्षधर है कि चीन को अंत तक लड़ना चाहिए, जबकि पार्टी के अन्दर एक तुलनात्मक रूप से उदारवादी समूह है जो अमेरिका के साथ दुनियाभर में बढ़ती चीन विरोधी भावना के मद्देनजर संबंधों को सुधारने का हिमायती है।

विश्वभर के समाचार माध्यम चीन की सरकार के इन कारनामों की खबरें प्रकाशित करते आ रहे हैं। एक ओर जहां इनसे चीन में इस महामारी की स्थिति का पता चलता है, वहीं दूसरी ओर इससे निपटने में चीन की सरकार की प्रतिबद्धता और जनता के प्रति उपेक्षा साफ दिखाई देती है। हालांकि चीन का दावा है कि वह सामान्य स्थिति में आ चुका है परन्तु वास्तविकता यह है कि चीन के कुछ प्रान्तों में स्थितियां अत्यधिक तनावपूर्ण बनी हुई हैं। चीन में कोरोना के प्रसार के चलते लगाए गए ह्यलॉकडाउन समेत अनेक प्रतिबंधों के कारण हुबेई समेत आसपास के प्रान्तों के जनजीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा है। इन सबके कारण नागरिकों की आर्थिक स्थिति अत्यधिक खराब हो चुकी है और वुहान इस व्यापक विरोध का भी केंद्र बन चुका है। हुबेई और जियांग्शी प्रान्त में प्रदर्शनकारियों द्वारा सरकार से किराया माफ करने की मांग की जा रही है, क्योंकि इसके भुगतान के लिए उनके पास कोई भी आय का साधन नहीं बचा है। परन्तु शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर भी पुलिस द्वारा बर्बरतापूर्ण हमले किए गए। ये हमले दिखाते हैं कि चीनी कम्युनिस्ट पार्टी अपने नागरिकों के शांतिपूर्ण विरोध के प्रति भी कितनी असहिष्णु है।

दुनिया भर में चीन की नीतियों का विरोध जोर पकड़ता जा रहा है जिसका सीधा असर इन देशों के साथ चीन के व्यापारिक संबंधों पर भी पड़ा है। बहुराष्ट्रीय निगम बड़े पैमाने अपनी इकाइयां चीन से बाहर निकालने जा रहे हैं। आज चीन में बेरोजगारों की संख्या 7 करोड़ तक हो चुकी है। इससे आर्थिक रूप से वंचित वर्ग के साथ-साथ बुद्धिजीवी, शिक्षाविद् और छात्रों में गहन असंतोष व्याप्त हो चुका है।

साम्यवाद दुनियाभर की तरह चीन में भी बुरी तरह से असफल  हो चुका है।  ग्रेट लीप फॉरवर्ड और कल्चरल रेवोलुशन व्यापक जन असंतोष को दबाने के लिए बड़े पैमाने पर किए गए नरसंहार का भाषाई आवरण मात्र थी। 1970 के दशक के उत्तरार्ध में डेंग शियाओ पिंग के द्वारा बड़े पैमाने पर आर्थिक सुधारों ने चीन को एक उत्पीड़क पूंजीवादी राष्ट्र में तब्दील करने का काम किया जो केवल एक पार्टी की सत्ता को बचाने की सीमा तक स्वयं को ह्यसाम्यवादी कहलाना पसंद करता है। आज चीन में स्वतंत्रता का अभाव है और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अभाव कुछ ज्यादा ही गंभीर है। आज चीन में सरकारी मीडिया का प्रभुत्व है और उसके विरोध में जाने वाली किसी भी आवाज को कड़ाई से दबा दिया जाता है।

फेसबुक और ट्विटर जैसे सोशल मीडिया पर चीन में गंभीर प्रतिबंध हैं। इसकी वजह है कि असंतोष को अभिव्यक्ति के साधन न मिल सकें, परन्तु इन्हें आवाज मिल ही जाती है। इसका एक छोटा सा उदाहरण हैं झांग जुए झोंग। ये एक संवैधानिक विद्वान हैं और इन्होंने नेशनल पीपुल्स कांग्रेस के सदस्यों से एक नए संविधान का मसौदा तैयार करने का आग्रह करने वाला एक पत्र वी-चैट पर प्रसारित किया, जिसमें बीजिंग द्वारा कोरोना  वायरस महामारी से निपटने के तौर-तरीकों की आलोचना भी की गई थी। इसके लिए झोंग को जेल की हवा खानी पड़ी। इसी प्रकार 1990 और 2000 के दशक में लाखों चीनी फुटबॉल प्रशंसकों के बीच जाना-पहचाना नाम रहे हाओ हैडॉन्ग ने निर्वासित चीनी नागरिकों के यूट्यूब चैनल पर कुछ वीडियोज  प्रकाशित कर चीनी कम्युनिस्ट शासन की जमकर आलोचना की है। हैडॉन्ग ने कहा है कि चीन ने मानवता के खिलाफ भयानक अत्याचार किए हैं और कम्युनिस्ट पार्टी को आतंकवादी संगठन कहा है।

उन्होंने हांगकांग में चीन के सुरक्षा कानून के खिलाफ भी खुल कर कहा। पर चीनी सरकार के दबाव में इन्हें अपनी टिप्पणियां वापस लेनी पड़ीं और कठोर आलोचनाओं का सामना भी करना पड़ा। चीन की जानी-मानी कार्यकर्ता फैंग फांग ने ह्यवुहान डायरी में स्पष्ट रूप से वर्णन किया है, ह्यह्यवुहान में 60 दिवसीय ह्यलॉकडाउन के दौरान किन गंभीर परिस्थितियों से सामना करना पड़ा। सेंसरशिप और कठोर साइबर निगरानी से बचकर यह लिखने में सफल रही फेंग ने सरकारी की जवाबदेही के विषय में कठोर प्रश्न उठाए हैं। चीन के बड़े रियल एस्टेट कारोबारी रेन, जो स्वयं भी चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के वरिष्ठ सदस्य हैं, शी जिनपिंग की आलोचना करने वाला एक लेख लिखने के बाद से ही लापता हैं। डॉ. ली, जिन्हें चीन के ह्यव्हिसल-ब्लोअर डॉक्टर के रूप में जाना जाता है, ने पहली बार दिसंबर, 2019  के अंत में कोरोना वायरस के बारे में सहयोगियों को चेतावनी दी थी और कहा था, हम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता चाहते हैं। उनका यह विचार चीनी सोशल मीडिया पर एक महत्वपूर्ण नारा बन चुका है।

चीन के बड़े रियल एस्टेट कारोबारी रेन, जो स्वयं भी चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के वरिष्ठ सदस्य हैं, शी जिनपिंग की आलोचना करने वाला एक लेख लिखने के बाद से ही लापता हैं। डॉ. ली, जिन्हें चीन के ह्यव्हिसल-ब्लोअर डॉक्टर के रूप में जाना जाता है, ने कहा था, हम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता चाहते हैं। उनका यह विचार चीनी सोशल मीडिया पर एक महत्वपूर्ण नारा बन चुका है।


उपनिवेशवाद से मुक्ति के नाम पर हथियाए गए हांगकांग के साथ किए जाने वाले व्यवहार में चीन की नीयत की वास्तविकता देखने में आ रही है। 1 जुलाई,1997 को ब्रिटेन से चीन को अंतरण होने के पश्चात् हांगकांग की एक विचित्र स्थिति है, जिसे बहुधा ह्यएक देश, दो व्यवस्थाएं भी कहा जाता है। आज सैद्धांतिक रूप से हांगकांग अर्ध-स्वायत्त है। इसके पास स्वयं की मुद्रा, पासपोर्ट, आव्रजन तंत्र और कानूनी प्रणाली है। परन्तु शासन पर वास्तविक नियंत्रण चीन का ही है और चीन के लगातार बढ़ते नियंत्रण के कारण हांगकांग के निवासी अपनी दैनिक जीवनचर्या में घुटन महसूस कर रहे हैं क्योंकि चीनी सरकार के इशारे पर बने ऐसे ढेरों कानून हांगकांग में आम जनता की स्वतंत्रता को बाधित कर रहे हैं। पिछले वर्ष से ही चीन के विरुद्ध व्यापक विरोध जारी है, जब चीन की शह पर हांगकांग की कठपुतली सरकार ने नए और कठोर प्रत्यर्पण कानून के निर्माण के संबंध में एक विधयेक प्रस्तुत किया। इसका सीधा सा लक्ष्य हांगकांग के असंतुष्टों को चीन लाकर उनकी आवाज को दबाना था और तब से यह प्रदर्शन लगातार गहराता जा रहा है और अब चीन इसका दमन करने के लिए एक राष्ट्रीय सुरक्षा कानून लेकर आया है जिसमें सभ्य समाज के सारे मानदंडों को ताक पर रख दिया है।

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद चर्चिल ने बाल्टिक सागर में स्टेटिन से लेकर एड्रियाटिक सागर में ट्रीस्ट तक फैले जिस लोहे के परदे की बात सोवियत संघ के परिप्रेक्ष्य में की थी, वहां सोवियत संघ की जगह आज चीन ग्रहण कर चुका है। आज  चीन और शेष विश्व के बीच दरार लगातार बढ़ती ही जा रही है। आज शी जिनपिंग अपनी ह्यबेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव और ह्यमेरीटाइम सिल्क रोड जैसी परियोजनाओं के द्वारा विश्व में साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद का एक नया दौर लाने के प्रयास कर रहे हैं। परन्तु अब जबकि उनकी घरेलू स्थिति ही खराब हो रही है और उनके विरुद्ध विरोध के स्वर मुखर होने लगे हैं, ऐसी स्थिति में पड़ोसी देशों के प्रति युद्धोन्माद खड़ा कर अपनी स्थिति को पुन: स्थायित्व देने के प्रयास कर रहे हैं। भारत-चीन सीमा पर मौजूदा तनाव इसका ही विस्तार है। दुनिया भर में चीन की नीतियों का विरोध जोर पकड़ता जा रहा है जिसका सीधा असर इन देशों के साथ चीन के व्यापारिक संबंधों पर भी पड़ा है।

बहुराष्ट्रीय निगम बड़े पैमाने अपनी इकाइयां चीन से बाहर निकालने जा रहे हैं। आज चीन में बेरोजगारी की स्थिति में भारी मात्रा में वृद्धि हुई है और यह संख्या 7 करोड़ तक हो चुकी है। इससे आर्थिक रूप से वंचित वर्ग के साथ-साथ बुद्धिजीवी, शिक्षाविद् और छात्र जैसे वर्गों में गहन असंतोष व्याप्त हो चुका है। इस सबसे चीन की सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टी भी नहीं बच सकी है। चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के कैडर में बहुसंख्यक वर्ग ऐसा है जो एक व्यक्ति के हाथों में सत्ता के केंद्रीकरण से रुष्ट है, और अवसर आने पर विरोध के स्वर मुखर हो सकते हैं। शी जिनपिंग आज 1960 के दशक के पूर्वार्ध के माओ की तुलना में कहीं अधिक शक्तिशाली हो चुके हैं और सत्ता के विभिन्न सोपानों पर स्थित संस्थाएं अत्यधिक कमजोर हो चुकी हैं और ऐसी स्थिति में चीन में आने वाली राजनीतिक अस्थिरता, चीन को सोवियत संघ के विघटन जैसी स्थितियों में भी ले जा सकती है। 
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)