चीन से कई मोर्चों पर लड़ी जाएगी लड़ाई

    दिनांक 23-जून-2020   
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हर चीज की एक कीमत होती है। भारत की सीमा पर चीन ने जो हरकत की है, उसकी भी एक कीमत है और भारत जो कदम उठाएगा, उसकी भी एक कीमत होगी। लेकिन विस्तारवादी महत्वाकांक्षाओं से प्रेरित होकर लद्दाख की गलवान घाटी में चीन की इस हरकत के बाद भारत के पास जवाब देने के अलावा कोई रास्ता नहीं। वस्तुत: चीन के साथ एक लंबी लड़ाई की पृष्ठभूमि तैयार हो चुकी है, जो कई मोर्चों पर एक साथ लड़ी जाएगी
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गलवान घाटी का वह इलाका जहां हाल में चीनी सैनिकों ने धोखे से भारत पर घात किया था (उपग्रह चित्र)
15/16 जून  की रात को गलवान घाटी में हुए संघर्ष के दौरान दोनों ओर से सैनिक हताहत हुए। भारत के 20 सैनिकों के शहीद होने की बात सामने आई, लेकिन चीन के कितने सैनिक मारे गए, इसको लेकर अटकलों का बाजार गर्म रहा। चीन के सरकारी अखबार ग्लोबल टाइम्स की मुख्य संवाददाता वांग वेनवेन 16 जून को दोपहर 1.54 बजे एक ट्वीट करके बताती हैं कि ‘ऐसी खबर है कि भारत के साथ झड़प में पीएलए के 5 जवान मारे गए और 11 घायल हो गए।’ बाद में वह कहती हैं कि उन्होंने भारतीय मीडिया में चल रही खबर के हवाले से ऐसा कहा था और चीन के आधिकारिक स्रोतों की ओर से इस झड़प में चीन के कितने सैनिक मारे गए हैं, इसके बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई है। चीन जैसे बंद कम्युनिस्ट देश से विश्वसनीय सूचना के निकलने की उम्मीद नहीं की जा सकती। ऐसे में थोड़ा नजरों को घुमाकर विभिन्न स्रोतों से मिल रही सूचनाओं को एक सीध में रखकर देखने की जरूरत है।

अमेरिका की प्रतिष्ठित और विश्वसनीय वेबसाइट यूएस न्यूज एंड वर्ल्ड रिपोर्ट ने 16 जून को एक खबर जारी की जिसमें कहा गया कि अमेरिकी खुफिया एजेंसियों के मुताबिक गलवान घाटी में भारत के साथ झड़प में चीन के भी 35 सैनिक मारे गए जिनमें एक अधिकारी भी शामिल था। यह रिपोर्ट थी पॉल शिंकमैन की जो यूएस न्यूज में राष्ट्रीय सुरक्षा संवाददाता हैं। शिंकमैन खुफिया एजेंसियों में अपने अच्छे संपर्क के लिए जाने जाते हैं और यूक्रेन, इराक, अफगानिस्तान युद्ध समेत दुनियाभर के संघर्ष क्षेत्रों से रपट कर चुके हैं। इसके साथ ही रिपोर्ट में कहा गया है कि झेंप के कारण चीन इस झड़प में मारे गए अपने सैनिकों के बारे में कोई जानकारी नहीं दे रहा है। एमआईटी में चीनी मामलों के विशेषज्ञ टेलर फ्रॉयल ने भी कहा है कि भारत के साथ संघर्ष में उसके कितने सैनिक मरे या घायल हुए, इसके बारे में चीन की ओर किसी जानकारी के सार्वजनिक किए जाने की उम्मीद बेमानी है क्योंकि ऐसा कभी नहीं हुआ। वह कहते हैं कि कई बार तो इसके आंकड़े वर्षों और कई बार दशकों बाद आते हैं। उन्होंने ट्विटर पर अपनी राय जाहिर करते हुए उदाहरण भी दिया कि कैसे 1962 के युद्ध से जुड़ी जानकारी 1994 में प्रकाशित आंतरिक इतिहास में दी। 

बहरहाल, विश्वसनीय सूत्रों के मुताबिक 15/16 की रात में हुई झड़प के बाद सुबह जैसे ही हल्की रोशनी हुई, चीन के हेलीकॉप्टरों ने, सूत्रों के मुताबिक, 45-46 उड़ानें भरीं। हेलीकॉप्टरों के आने के थोड़ी देर पहले से ही चीन के सैनिक गलवान नदी में डूबे अपने साथियों के शवों को निकालने में जुट गए थे। हेलीपैड थोड़ी ऊंचाई पर था और चीन के दो-दो सैनिक अपने साथी सैनिकों के शवों को बारी-बारी से उठाकर ले गए। इसके अतिरिक्त पहाड़ी पर से भी चीनी सैनिक अपने साथियों के शव ले गए। ब्रिगेडियर आर.पी. सिंह (से.नि.) कहते हैं, ‘किसी भी हालत में चीन की ओर से मरने वाले सैनिकों की संख्या 40 से कम नहीं थी। झड़प रात में होने के कारण ज्यादातर घायल सैनिकों को इलाज मिलने में देरी हुई। 14 हजार फुट से अधिक की ऊंचाई और शून्य से नीचे का तापमान सैनिकों के लिए जानलेवा साबित हुआ। हमारी ओर से भी घायल सैनिकों को जरूरी चिकित्सा सुविधा दिन निकलने के बाद ही दी जा सकी और हम भी गलवान नदी में गिरे अपने शहीदों के शव अंधेरा छंटने के बाद ही निकाल सके।’

गलवान से अपने सैनिकों के शवों को लाने के लिए चीन ने छोटे हेलीकॉप्टरों का इस्तेमाल किया। इतनी ऊंचाई पर हेलीकॉप्टर का इस्तेमाल वैसे भी शवों, गंभीर रूप से घायलों को निकालने या फिर बहुत जरूरी मदद पहुंचाने के लिए ही किया जाता है। बहरहाल, यह साफ है कि हमारे सैनिकों ने बड़ी बहादुरी के साथ चीनी सैनिकों के हमले का जवाब दिया और उन्हें ज्यादा नुकसान पहुंचाया।

तैयारी हर मोर्चे पर
तिब्बत की सीमा से लगती गलवान घाटी में भारत और चीन में हिंसक सैन्य संघर्ष के बाद बढ़ी कूटनीतिक सरगर्मियों के बीच भारत ने दो बातें एकदम स्पष्ट कर दी हैं। एक, वह चीन की हरकतों को भूलने नहीं जा रहा और दूसरी, अगर चीन की ओर से कोई सैन्य दुस्साहस किया गया तो उसका कड़ा जवाब दिया जाएगा। इस बीच, इस तरह की बात फैली कि चीन ने हमारे 10 सैनिकों को बंधक बना लिया था जिन्हें बाद में रिहा किया गया, लेकिन बात ऐसी नहीं थी। जिस प्रकरण में यह बताया जा रहा है, उस संदर्भ में यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि वहां की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि उधर के सैनिक इधर और इधर के सैनिक उधर जाते रहे हैं। ऐसा ही हमारे 10 सैनिकों के साथ भी हुआ जो उस इलाके में थोड़ी आगे तक चले गए थे जिसे चीन अपना मानता है। और सबसे बड़ी बात यह है कि चीन ने भी इस बात से लगातार इनकार किया कि उसने किन्हीं भारतीय सैनिकों को बंधक बनाया हुआ है। हां, यह जरूर बताया जा रहा है कि इन जवानों की मुलाकात आगे चीनी सैनिकों से हुई और उसके बाद वे वापस लौट आए।

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लद्दाख सीमा इलाकों में पैनी नजर रख रहे हैं भारतीय सैनिक। (फाइल चित्र)

बहरहाल, गलवान के घटनाक्रम के बाद बढ़ते तनाव के बीच भारत ने अपनी तीनों सेनाओं को सावधान करने देने के साथ विभिन्न स्तरों पर बातचीत से विवाद को सुलझाने की कोशिशें भी जारी रखी हैं। भारत विवाद को बातचीत से सुलझाना चाहता है बशर्ते चीन भी ऐसा ही चाहे। इसी क्रम में 17 जून को विदेशमंत्री एस. जयशंकर ने चीन के विदेश मंत्री वांग यी के साथ बात की और इसी दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भी बयान आया कि भारत शांति चाहता है, लेकिन किसी भी उकसावे का जवाब देने को तैयार है। भारत के कड़े संदेश के बाद चीन की ओर से भी बराबर संकेत दिए गए कि वह शांतिपूर्ण तरीके से विवाद को हल करना चाहता है। इसके अलावा, यह भी एक महत्वपूर्ण कारक है कि वायरस को फैलाने को लेकर चीन और अमेरिका में तनातनी बढ़ने के बाद से ही प्रशांत महासागर में अमेरिका के तीन एयरक्राफ्ट कैरियर यूएसएस थ्योडोर रूजवेल्ट, यूएसएस निमिज और यूएसएस रोनाल्ड रीगन मंडराते रहे हैं और लद्दाख में तनाव में जारी गतिरोध के दौरान ही अमेरिका ने अपने इन शक्ति-प्रतीकों को चीन के थोड़ा करीब भेजकर चीन पर सांकेतिक दबाव बना दिया था।

बहरहाल, तमाम कूटनीतिक गहमागहमी के बीच भारत ने अपनी सुरक्षात्मक तैयारियों को ढीला नहीं किया है। भारत ने चीन के साथ किसी भी सैन्य संघर्ष की स्थिति से निपटने के लिए लद्दाख के आसपास के सैन्य अड्डों पर सुखोई-30 एमकेआई, मिग-29 और जगुआर जैसे  युद्धक विमानों से लेकर टैंकभेदी अपाचे हेलीकॉप्टरों तक को तैनात कर दिया है। इसके साथ ही बंगाल की खाड़ी में भी भारतीय नौसेना ने अतिरिक्त युद्धक पोत तैनात कर दिए हैं। संदेश स्पष्ट है, अगर बात बिगड़ी तो भारत हर मोर्चे पर चीन को जवाब देने को तैयार है।

भारत के साथ विवाद क्या
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चीन के साथ बढ़ते तनाव के मुद्दे पर सर्वदलीय बैठक की और यह स्पष्ट किया कि न तो हमारी एक इंच जमीन किसी के कब्जे में है और न ही हमारी किसी भी चौकी पर किसी और ने कब्जा किया हुआ है। अब सवाल उठता है कि फिर चीन के साथ विवाद क्या है? ले. जनरल अता हसनैन (से.नि.) भी साफ शब्दों कहते हैं, ‘अगर किसी को लगता है कि गलवान घाटी में चीन हमारे इलाके में घुस आया है तो यह अज्ञानता है। चीन का कोई भी सैनिक हमारे इलाके में नहीं है। मगर उन्होंने स्थिति में बदलाव किया है। वे अपनी तरफ मोचेर्बंदी कर रहे हैं। अपनी ताकत बढ़ा रहे हैं, और हम उनके कदमों का जवाब देने के लिए बराबर की तैनाती कर रहे हैं। हमने भी दारबुक, दौलत बेग ओल्डी (डीबीओ) रोड के पीछे अपनी तैनाती बढ़ा दी है। और ये सब उपग्रह से मिलने वाली तस्वीरों में दिख भी रहा है।’
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तिब्बत की निर्वासित सरकार के साथ हमें अपने संबंधों को और बेहतर करने चाहिए। आज तिब्बत को कोई मान्यता नहीं देता। अगर हम पहल करें तो और भी लोग आगे आएंगे।
-आलोक बंसल, रक्षा विशेषज्ञ

इसमें दो राय नहीं कि अगर भारत और चीन के बीच विवाद बढ़ा तो उसका परिणाम खतरनाक ही होगा और नुकसान दोनों ओर होगा।
-ले. जन.(सेनि.) शंकर प्रसाद

युद्ध जीतने  और लक्ष्य को पाने के लिए लड़ा जाता है। हमें बहुत अवसर मिलेंगे। जब तक वह मौका नहीं आता, अपनी ताकत बढ़ाते जाइए।
-ले. जन. (सेनि.) अता हसनैन


दरअसल, तिब्बत पर अवैध कब्जा करने वाला चीन अब इतिहास में पीछे क्विंग राजशाही तक जाकर पूरी गलवान घाटी को अपना हिस्सा बता रहा है। ऐसे ही वह तिब्बत के पूरे इलाके में हॉट स्प्रिंग, डेमचोक, पैंगोंग त्सो झील समेत अलग-अलग जगहों पर अपना दावा पेश करता है। पैंगोंग त्सो झील में फिंगर-4 तक का इलाका भारत के कब्जे में रहा है और आज भी है। हालांकि भारत का मानना है कि वास्तविक नियंत्रण रेखा फिंगर-8 से गुजरती है इसलिए उसका दावा वहां तक है। दूसरी ओर चीन का मानना है कि एलएसी फिंगर-2 से गुजरती है। ताजा विवाद यह है कि चीन ने फिंगर-4 से फिंगर-5 के बीच में सैन्य बल की भारी तैनाती कर रखी है।

अब सवाल यह उठता है कि दोनों देशों में यह विवाद आज का है नहीं, फिर ताजा टकराव क्यों? इसके तीन कारण हैं। एक, कोविड-19 के मामले में अलग-थलग पड़ते चीन को दुनिया का ध्यान भटकाने के लिए कोई नया मोर्चा खोलना था। इसके एक विकल्प के तौर पर उसने तिब्बत सीमा से लगते भारतीय इलाकों को चुना। दूसरा, भारत के अमेरिका के साथ मजबूत होते संबंधों और भारत, अमेरिका, जापान व आॅस्ट्रेलिया का क्वाड समूह चीन के खिलाफ एक मजबूत कूटनीतिक मोर्चे के तौर पर उभर रहा था। ऐसे में चीन भारत पर दबाव बनाकर उसे कम से कम उस स्थिति में लाना चाहता था जहां वह चीन के खिलाफ होने वाली खेमेबंदी से प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष तौर पर किनारा कर ले। तीसरा, भारत ने तिब्बत सीमा से लगे अपने इलाकों में हाल के वर्षों में जिस तरह ढांचागत सुविधाओं को युद्ध स्तर पर बेहतर किया है, उससे वह आशंकित था। ये और बात है कि भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि तिब्बत के साथ लगते अपने सीमाई इलाकों में वह आधारभूत ढांचे  को मजबूत करता रहेगा।

कूटनीति की अहम भूमिका
अब सबसे बड़ा सवाल, आगे क्या हो सकता है। दोनों देशों ने तनातनी के बीच यह संकेत तो दिए ही हैं कि वे बातचीत से विवाद को सुलझाना चाहते हैं। भारत ने रूस, चीन और भारत के विदेशमंत्रियों की होने वाली बैठक में शामिल होने की सहमति दे दी है। दूसरी ओर तमाम तरह की धमकियां देने के बाद भी चीन की ओर से बार-बार कहा गया है कि वह भारत के साथ मामले को बिगाड़ना नहीं चाहता। ले. जनरल शंकर प्रसाद (से.नि.) का मानना है कि ‘सैन्य टकराव तो हमेशा टाला जाना चाहिए। खासतौर पर अभी, जब पूरी दुनिया कोविड-19 के कारण आर्थिक मुसीबतों का सामना कर रही है, विवाद को सैन्य टकराव में तब्दील होने से रोकना चाहिए। हां, चूंकि चीन की हरकतों के कारण यह स्थिति पैदा हुई है, तो तनाव दूर करने की ज्यादा जिम्मेदारी भी उसी की है। अच्छा यही होगा कि दोनों देश सम्मान के साथ अपनी-अपनी सेनाओं को पुरानी स्थितियों में ले आएं। हां, इसके लिए भारत को कोशिश करनी चाहिए कि चीन को इस झमेले से बाहर निकलने के लिए सुरक्षित राह देने के बारे में भी सोचे। अगर बिल्ली किसी कमरे में फंस गई है और आपने धीरे से दरवाजे को थोड़ा खोलकर रास्ता दिखा दिया तो वह आपको डराती-आंख दिखाती हुई उससे निकल भागेगी। कूटनीति का काम ऐसी ही खिड़कियों को खोलना होता है।’ इसमें दो राय नहीं कि अगर भारत और चीन के बीच विवाद बढ़ा तो उसका परिणाम खतरनाक ही होगा और नुकसान दोनों ओर होगा।

जवाब दें राहुल
अभी हाल ही में राहुल गांधी ने ट्विटर पर एक सवाल पूछा, ‘‘चीन ने हिंदुस्थान के शस्त्रहीन सैनिकों की हत्या करके एक बहुत बड़ा अपराध किया है। मैं पूछना चाहता हूं, इन वीरों को बिना हथियार खतरे की ओर किसने भेजा और क्यों भेजा? कौन जिम्मेदार है?’’

वैसे, चीन के संदर्भ में ‘कौन जिम्मेदार है’, सवाल आजादी के बाद से ही बार-बार उठते रहे हैं और लोगों को इनका जवाब भी मालूम है। वे जवाब राहुल को भी पता होंगे, खैर उन्हें इतिहास में ज्यादा पीछे नहीं ले जाते। चंद साल पहले के दौर में वे आसानी से चले भी जाएंगे तो बात 2013 की। तारीख 6 सितंबर। संसद में बहस होती है राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बोर्ड के अध्यक्ष श्याम सरन लद्दाख के दौरे से लौटकर तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को सौंपी रिपोर्ट पर। अब देखिए किसने क्या कहा, राहुल गांधी को शायद पता चल जाए कि कौन जिम्मेदार है।

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यशवंत सिन्हा- ‘‘मंत्री महोदय (ए.के.एंटोनी) से जानना चाहता हूं कि क्या डिपसांग बल्ज आज भारत के नियंत्रण में है या हम उसे खो चुके हैं?...750 किलोमीटर का इलाका उन्होंने (चीन) ऐसा कर दिया है कि भारत की सेना वहां नहीं जा सकती...दौलत बेग ओल्डी के पास एक ट्रैक जंक्शन है, उसमें उन्होंने (चीन) एक सड़क बनाई है, जो मोटरेबल है। चाइना की आर्मी मोटराइज्ड ट्रांसपोर्ट में उस रोड का इस्तेमाल करती है...750 वर्ग किलोमीटर, जिसमें हमारी सेना पैट्रोलिंग कर सकती थी, उससे आज के दिन हम वंचित हैं। यह कैसे हुआ, कब हुआ?...पैंगोंग त्सो (लेक) है, जिसमें एक स्वीजाप एरिया है, वहां पर चीन आज ‘डॉमिनेट’ कर रहा है..वह ज्यादा आक्रामक भूमिका में आ गया है...बार-बार हमारी भूमि के अंदर ‘इनकर्शन’ इसलिए हो रहा है कि चीन की फौज ने वहां पर ताकत बनाई है और हमने नहीं बनाई।’’

मुलायम सिंह यादव- ‘‘मैंने सेना के एक बहुत वरिष्ठ अधिकारी से पूछा कि आप क्या कर रहे हो, तो उन्होंने कहा कि हमें हुक्म ही नहीं देते हैं...हर हफ्ते बैठक होती है...उसमें प्रधानमंत्री जी रहते हैं, रक्षा मंत्री रहते हैं..., हमें कोई निर्देश नहीं मिला। ...जब चीन सड़क बनवा रहा था तो हमने भी सड़कें बनवाईं और हमारी सरकार नहीं रही तो वे सड़कें, जो अधूरी बनी हुई थीं, उनका आपने क्या किया? कितनी मरम्मत कराई? नहीं करवाई तो मरम्मत क्यों नहीं करवाई?..कोई परवाह नहीं की तो देश को चला कैसे रहे हैं?’’

बिजोया चक्रवर्ती- ‘‘चीन ने पूर्वी अरुणाचल प्रदेश में पमपम तक घुसपैठ की जो तिनसुकिया से 400 किलोमीटर है।...चांगलांग के बाद कोई मोटरेबल रोड नहीं है और हमारे सैनिकों को सीमा तक जाने के लिए 105 किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है... 10 अगस्त को चीन की घुसपैठ के बाद भाजपा के कार्यकर्ताओं ने पैदल जाकर पहली चौकी, दूसरी चौकी, तीसरी चौकी और फिर चौथी चौकी पर कब्जा जमाया। उन्होंने 55 किलोमीटर की यात्रा की और फिर वापस आ गए।...क्या आप अरुणाचल प्रदेश को चीन को सौंपने जा रहे हैं? आप सेना को काम करने और लड़ने क्यों नहीं देते?’’

शैलेंद्र कुमार-‘‘मुलायम सिंह जब रक्षा मंत्री थे, उस वक्त जब सीमा पर खतरा हुआ, उन्होंने सीमा पर जाकर बहादुरों की हौसला अफजाई की।...रक्षा मंत्री से कहना चाहूंगा कि लद्दाख पर चीनी सेना की बराबर घुसपैठ हो रही है। क्या आप लद्दाख गए? आपने सेना के लोगों का मनोबल बढ़ाया? आप वहां जाने का काम करेंगे या आपकी इच्छाशक्ति मर गई?’’

ए.के.एंटोनी-‘‘विवाद चल रहा है, अभी निपटारा नहीं हुआ है...आप चमत्कार की उम्मीद नहीं कर सकते...भारत की तुलना में चीन की ढांचागत सुविधाएं काफी बेहतर हैं... आजाद भारत की नीति थी कि सीमा को विकसित नहीं करना सबसे बढ़िया सुरक्षा है...’’।

राहुल को सोचना चाहिए कि-‘‘सीमा को विकसित नहीं करना सबसे बढ़िया सुरक्षा है’’- इस लीक पर चलने वाली वाली सरकारों को सीमा संकट का जिÞम्मेदार माना जाए या नहीं? क्योंकि जवाब संसद में हुए सवाल-जवाब में ही छिपा है।


ले.जन. हसनैन का भी मानना है कि भारत और चीन को परस्पर कूटनीतिक तरीके से मौजूदा विवाद को सुलझाना चाहिए। वह कहते हैं,  ‘भारत को फिलहाल चीन को बातचीत में लगाए रखना चाहिए। अगर मामला सुलझता है तो बहुत अच्छा, नहीं सुलझता है और गतिरोध बना रहता है तो बातचीत चलती रहनी चाहिए। ऐसा नहीं कि भारत को मौका नहीं मिलेगा। बस इंतजार करना चाहिए सही समय का। जैसे, डोकलाम में चीन ने अचानक फैसला किया और वे पीछे हट गए। क्यों हटे? इसलिए कि कुछ हफ्तों बाद वुहान में 'ब्रिक्स' का शिखर सम्मेलन होने जा रहा था। भारतीय प्रधानमंत्री भी वहां जा रहे थे और कांग्रेस पार्टी आॅफ चाइना की 19वीं कांग्रेस की भी बैठक होने जा रही थी। जिनपिंग के लिए ये दोनों ही महत्वपूर्ण थे और वह नहीं चाहते थे कि डोकलाम में दोनों देशों की सेनाओं के एक-दूसरे के सामने अड़े रहने की कोई छाया इन पर पड़े और उसका प्रतिकूल असर घरेलू मोर्चे पर उनके खिलाफ जाए।’

गलवान और पैंगोंग त्सो में क्या संभव
ऐसा लग रहा है कि फिलहाल यह मामला खिंचेगा। वैसे 6 जून की बैठक में दोनों पक्षों में इस बात पर सहमति बनी थी कि गलवान, हॉट स्प्रिंग और डेमचोक इलाकों में दोनों ओर की सेनाएं अपनी पुरानी स्थिति पर लौट जाएंगी और वही प्रक्रिया जमीनी स्तर पर चल ही रही थी, जब गलवान में चीनी सैनिकों की आक्रामकता के कारण स्थिति बिगड़ी। यह और बात है कि चीन हमेशा की तरह खुद को ही पीड़ित बता रहा है। फिलहाल एक महत्वपूर्ण सवाल यह है कि गलवान और पैंगोंग त्सो में क्या हो सकता है, क्योंकि दोनों देशों के बीच तनाव का स्तर क्या रहेगा, यह मोटे तौर पर इन्हीं दो इलाकों पर निर्भर करेगा। गलवान जैसे इलाके में तापमान शून्य से 30 डिग्री तक नीचे चले जाने के बाद वहां मोचेर्बंदी आसान नहीं होगी। यह स्थिति दोनों ओर की होगी। ले. जन. हसनैन कहते हैं, ‘मुझे नहीं लगता कि चीन इतनी आसानी से गलवान को छोड़ेगा, अब वह पूरी गलवान घाटी पर अपना दावा करने लगा है। इसके अलावा वह पैंगोंग त्सो में फिंगर 4 तक अपनी स्थिति को मजबूत बनाए रखना चाहता है। पैंगोग त्सो का रणनीतिक महत्व ज्यादा है। झील के उत्तरी कोने से हमें चीन पर पूरी निगरानी का मौका मिलता है। अगर चीन उत्तरी तट से पानी के जरिये दक्षिणी तट की ओर कोई कार्रवाई करेगा तो हमारी पूरी निगरानी उस इलाके पर होगी। वह नहीं चाहता कि हमारी निगरानी वहां रहे। अगर चीन उत्तरी तट से उत्तर के पहाड़ों की तरफ युद्ध करे और ऊपर से हमारी तरफ आए तो यह जगह हमारे लिए कवच का काम करेगी, यही चीन नहीं चाहता।''

कूटनीति से बात न बनी तो
यह एक बड़ा सवाल है और भारत ने इन्हीं आशंकाओंं को देखते हुए अपनी तीनों सेनाओं को होशियार कर रखा है, क्योंकि बेशक चीन की ओर से अभी इस तरह के तमाम संकेत और संदेश दिए जा रहे हैं कि वह भारत के साथ विवाद को बढ़ाना नहीं चाहता और उसकी भी प्राथमिकता शांतिपूर्ण तरीके से विवाद के समाधान की है। लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि तिब्बत से लगते भारतीय सीमाई इलाकों के आसपास चीन क्या करेगा, यह बहुत कुछ इस बात पर भी निर्भर करेगा कि चीन इस मोर्चे का इस्तेमाल दुनिया का ध्यान भटकाने के लिए कितना करना चाहता है। ऐसी स्थिति में भारत को युद्ध के लिए तैयार रहना होगा।
ले. जन. शंकर प्रसाद कहते हैं कि गलवान की स्थिति और हमारे सामने विकल्प को समझने के लिए हमें कारगिल की ओर रुख करना होगा। कारगिल में 1999 में तब सेना को नियंत्रण रेखा पार करने की अनुमति नहीं थी। तब भी वहां पाकिस्तानी सेना चोटियों पर काबिज हो गई थी और हम नीचे थे, जिस कारण अपनी चोटियों को उनके कब्जे से मुक्त कराने में हमें बड़ी संख्या में अपने बहादुर जवानों को खोना पड़ा। इस कारण यहां गलवान घाटी में हमें कुछ और तरीके खोजने होंगे। अभी गलवान घाटी में तो नियंत्रण रेखा है नहीं, वहां वास्तविक नियंत्रण रेखा है जिसको लेकर भी दोनों देशों के बीच विवाद है। वे कहते हैं, ‘ऐसे में वह करना होगा जो हमने 1971 के युद्ध के दौरान कारगिल में किया था। उस समय वहां की सबसे बड़ी पाकिस्तानी चौकी थी हाथी नाका। पाकिस्तानी सेना ऊंचाई पर थी। हमने 10-12 किलोमीटर अंदर जाकर पीछे से उन पर हमला किया था। इसलिए गलवान की पहाड़ियों से अगर किसी कारणवश चीन की सेना नहीं हटती है तो हम ऐसे रणनीतिक कदम उठा सकते हैं। 1999 में वायुसेना को यह हिदायत दी गई थी कि वह नियंत्रण रेखा को पार नहीं करगी। लेकिन अगर इस बार स्थिति बिगड़ ही गई तो वायुसेना का इस्तेमाल होगा और उन इलाकों में चीन सेना की आपूर्ति लाइन को काटने में इसकी बड़ी भूमिका होगी। बांग्लादेश के युद्ध में हमारी रणनीति यह थी कि जहां सामने अवरोध हो, वहां उससे सीधे हल्का-फुल्का खोले रखते हुए आसपास से हमला बोलो। मुझे लगता है, इस तरह की युद्ध कला में हमारे पास अच्छा अनुभव है।’

‘गलवान पर चीन का दावा गलत’

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तिब्बत की निर्वासित सरकार के प्रधानमंत्री लोबसंग सांगेय ने कहा कि गलवान घाटी पर चीन का अधिकार नहीं है। अगर चीनी सरकार ऐसा दावा कर रही है तो यह गलत है। गलवान नाम ही लद्दाख का दिया हुआ है। अहिंसा भारत की परंपरा है और यहां इसका पालन होता है। चीन अहिंसा की बातें तो करता है, लेकिन पालन नहीं करता। इसका सबूत तिब्बत है।


ले. जन. हसनैन कहते हैं कि चीन क्या कर सकता है, यह जानने के लिए चीन को समझना होगा। चीन कभी—कभी नियम के हिसाब से नहीं खेलता। जो नियम दुनिया बनाती है, संयुक्त राष्ट्र बनाता है, अंतरराष्ट्रीय अदालत बनाती है, उनकी चीन परवाह नहीं करता, उनके नियमों को नहीं मानता। दक्षिणी चीन सागर में उसने अंतरराष्ट्रीय अदालत की बात कहां मानी? वे कहते हैं, ‘ अपनी तैयारियों के लिहाज से चीन की अभी की गतिविधियों को संकेत मानना चाहिए कि वह आगे क्या कर सकता है। बेशक हमारी पूरी कोशिश कूटनीतिक चैनल से मामले को निपटाने की हो, लेकिन तैयारी दोतरफा युद्ध की होनी चाहिए। कारण, अगर मामला बढ़ा तो मुझे नहीं लगता कि यह कोई स्थानीय और सीमित संघर्ष होगा। उस स्थिति में पूर्ण युद्ध होगा और फिर उत्तराखंड से लेकर, हिमाचल, अरुणाचल...हर जगह पर मोर्चे खुलेंगे। इसके अलावा पाकिस्तान की ओर से भी परेशानी पैदा की जाएगी। ऐसे में हमें चीन और पाकिस्तान से एक साथ निपटने की संभावनाओं को ध्यान में रखते हुए अपनी रणनीति तैयार करनी होगी।’ दूसरी ओर, चीन के सरकारी मीडिया ने भी यह साफ संकेत दिया है कि अगर भारत के साथ सैन्य संघर्ष की नौबत आई तो उसे दो-तरफा और संभव है तीन-तरफा युद्ध का मुकाबला करना पड़ेगा। संभवत: चीनी मीडिया का इशारा चीन, पाकिस्तान और नेपाल से है।

ले. जन. हसनैन का मानना है कि युद्ध सिर्फ और सिर्फ जीत के लिए तथा अपने लक्ष्यों को हासिल करने के लिए लड़ना चाहिए और जब तक संभव हो मनोवैज्ञानिक हथियार से ही काम चलाना चाहिए। उनका कहना है कि जो परिणाम मनोवैज्ञानिक अस्त्र से हासिल होते हैं, वे सैन्य शक्ति से नहीं होते। ले. जन. शंकर प्रसाद का भी मानना है कि ‘सैन्य विकल्प जब भी आजमाए जाते हैं, परिणाम अस्थायी होता है। स्थायी परिणाम के लिए वापस कूटनीति के दरवाजे खोलने पड़ते हैं इसलिए हर स्थिति से निपटने की पूरी तैयारी करते हुए कूटनीति को सबसे ज्यादा मौका दिया जाना चाहिए।’

एक और बात है, हमें कूटनीतिक तौर पर तिब्बत, ताइवान, हांगकांग, दक्षिण चीन सागर जैसे चीन को बेचैन कर देने वाले दबाव बिंदुओं पर बीच-बीच में हाथ रखना होगा। वैसे भी, इन सारे संबंधों में परेशानी का सबब चीन की विस्तारवादी नीतियां ही हैं। यह वक्त विचार करने का है कि क्या हम ताइवान को पृथक देश के तौर पर मान्यता देने की ओर क्रमश: बढ़ें? क्या तिब्बत की निष्कासित सरकार के सरोकारों के प्रति खुद भी संवेदनशील बनें और दुनिया को भी बनाएं? दक्षिण चीन सागर में मुक्त और भयमुक्त आवागमन की चिंताओं के निराकरण में कुछ और आगे बढ़ें? बात सिर्फ कूटनीति की नहीं है। बात न्यायसंगत विश्व व्यवस्था की भी है।

कुल मिलाकर, हमारी कोशिश यही है कि बातचीत से ही बात बन जाए। लेकिन यह अकेले हम पर निर्भर नहीं करता। जो भी हो, यह तय करना चीन का काम है कि उसे भारत के साथ संबंधों को आगे क्या स्वरूप देना है। हर स्थिति के लिए तैयार रहना हमारी परिस्थितिगत आवश्यकता  है, और हमने उसके लिए कमर कस भी रखी है। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)