चीन से डर क्यों?

    दिनांक 23-जून-2020
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पं. दीनदयाल उपाध्याय
विस्तारवादी चीन ने भारत के प्रति दशकों से आक्रामक रुख अपनाया हुआ है। 1962 के युद्ध से पूर्व 1960 में भी स्थितियां आज जैसी तनावपूर्ण थीं। तब भी युद्ध की बजाय 'शांति' चाहने वाले साम्यवादी स्वर उठे थे और भारत की सैन्य सामर्थ्य पर सवाल उठाए गए थे। पं. दीनदयाल उपाध्याय ने पांचजन्य के 19 अक्तूबर,1960 के  अंक में अपने आलेख में ऐसे सभी प्रश्नों पर टिप्पणी करते हुए देश से परिस्थिति का स्वाभिमानपूर्वक सामना करने का आह्वान किया था। यहां हम उनके उसी आलेख को पुन: प्रकाशित कर रहे हैं
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‘राज्य’ का जन्म समाज की अन्तर्बाह्य सुरक्षा के लिए हुआ और आज विभिन्न विचारधाराओं के प्रभाव में उसके कर्तव्यों का विस्तार और विकास होने के उपरांत भी, उसका अस्तित्व अपने दोनों मूल कर्तव्यों के सफल और प्रभावी पालन पर ही निर्भर करता है। इसीलिए अंदर या बाहर, कहीं से भी उसको चुनौती दी जाए अथवा उसकी अस्मिता पर आघात किया जाए तो राज्य के सूत्रधार अन्य सब कर्तव्यों को गौण समझकर, उनकी अवहेलना करके भी, चुनौती देने वाली शक्ति या व्यक्ति का सफल सामना करने का प्रयास करते हैं। इस कर्तव्य की अनुभूति एवं उससे प्रेरित प्रयासों में ही राज्य की ‘प्रभुता’ निहित है। जैसे जंगल में दो शेर नहीं रह सकते वैसे ही इस राज्य में दो ‘प्रभुशक्तियां’ नहीं चल सकतीं। दूसरी का आविर्भाव प्रथम के पराभव के उपरांत ही
होता है।

आज हमारे पड़ोसी चीन ने हमारी प्रभुसत्ता को चुनौती दी है। यह सत्य है कि उसने यह चुनौती स्पष्ट युद्ध की घोषणा करके नहीं दी है तथा हमारे उसके सभी प्रकार के दौत्य संबंध पूर्ववत बने हुए हैं। किन्तु इससे कोई इंकार नहीं कर सकता कि चीन ने आक्रमण किया है तथा आज यह भारत की भूमि में जहां भी बैठा है तो इसलिए नहीं कि हम उसे वहां बने रहने देना चाहते हैं अथवा हमारे और उसके बीच इस विषय में कोई समझौता हो गया है, अपितु इसलिए कि वह हमारी भूमि पर हमारी प्रभुता स्वीकार करने को तैयार नहीं।

विचित्र स्थिति
वर्तमान स्थिति में परिवर्तन दो आधारों पर लाया जा सकता है। एक तो चीन के साथ समझौता करके स्थायी अथवा अस्थायी रूप से चीन का उस क्षेत्र पर अधिकार स्वीकार कर लें। दूसरा, उसे अधिकार छोड़कर वापस अपनी सीमा में जाने के लिए विवश करें। आज इस दोनों पर्यायों में से किसी का भी प्रयोग न होने के कारण अन्तरराष्टÑीय संबंधों में एक अनोखी स्थिति पैदा हो गई है। चीन न हमारा मित्र है और न शत्रु और न ही वह उदासीन है। लद्दाख के विषय में न हमारी उससे लड़ाई है और न संधि। स्पष्ट है कि इस स्थिति में जब तक वह वहां बना रहेगा, हमारी प्रभुता को चुनौती देता रहेगा तथा हमारे मस्तिष्क में तनाव बढ़ता ही जाएगा-हमारे सिर पर अनिश्चितता की तलवार लटकती रहेगी तथा इस प्रकार केवल लद्दाख का भाग ही नहीं, संपूर्ण उत्तरी सीमा हमारे लिए चिंता का विषय बनी रहेगी।
 
चीन के बारे में प्रारंभ से बहुत बढ़-चढ़कर प्रचार किया गया है। दूसरे की थाली की खीर सदा अधिक दिखती है, इस कहावत के अनुरूप हमारी यह धारणा हो गई है कि   ‘चीन   के पास विपुल सामर्थ्य है तथा हमारे पास कोई ताकत      नहीं’। यह मानते हुए भी कि शत्रु को कभी कमजोर नहीं समझना चाहिए, यह कहना सत्य नहीं होगा कि चीन की सैनिक सामर्थ्य भारत की तुलना में इतनी अधिक है कि   हम अपने देश के भूभाग को भी उससे मुक्त न कर सकें।
 

चीन का जो रुख है उसमें उसकी भूख केवल अभी तक अधिकृत भूभाग से ही नहीं मिटने वाली, बल्कि वह उससे बहुत अधिक पर अपना दावा कर रहा है। पर यदि वह उतने से संतुष्ट हो जाए तो क्या हमें भी समझौता कर लेना चाहिए? स्पष्ट है, इसका अर्थ आक्रमण के सम्मुख आत्मसमर्पण होगा। उसका परिणाम हमारे पड़ोसी देशों पर भी पड़ सकता है। हमारे नेता चाहे ‘शांति’ के उच्च आदर्शोें से प्रेरित होकर यह समझौता करें, किन्तु विश्व तो उसे हमारी कमजोरी ही मानेगा। दुर्बल के साथ किये हुए समझौतों का मूल्य नहीं होता। यदि हम समझौता भी चाहते हैं तो हमें अपने सामर्थ्य का प्रकटीकरण करना पड़ेगा। बिना उसके किया हुआ समझौता हमारी खोई हुई प्रतिष्ठा को और भी धक्का लगायेगा तथा एशिया के छोटे-छोटे राष्ट्र फिर या तो चीन की गोद में चले जाएंगे अथवा भय के कारण अमेरिका का सहारा खोजेंगे।

तो क्या युद्ध करें?
पर शक्ति के प्रकटीकरण का अर्थ है चीन के साथ लद्दाख की भूमि में सक्रिय संघर्ष करना। यहां सिद्धांत और व्यवहार दोनों का प्रश्न आता है। देश में कुछ लोग ऐसे हैं, यद्यपि उनकी संख्या अंगुलियों पर गिनने लायक है, जो सैनिक संघर्ष के सिद्धांतत: विरोधी हैं। विनोबाजी और जयप्रकाश जी की गिनती इन्हीं लोगों में करनी होगी। हमारे प्रधानमंत्री भी न लड़ने की नीति को कभी-कभी सिद्धांत के ऊंचे आसन पर मंडित करने का प्रयास करते हैं, किन्तु जब वे यह कहते हैं कि चीन आगे आया तो हम मुकाबला करेंगे, तो हमें यह निष्कर्ष निकालना पड़ेगा कि युद्ध न करना उनके लिए कोई सिद्धांत नहीं है। यह बात अलग होगी कि वे इससे जहां तक हो सके, भागना चाहते हैं।

दूसरा प्रश्न व्यवहार का है। क्या हमारे पास इतना सामर्थ्य है कि हम चीन के साथ लद्दाख में युद्ध कर सकें?
सत्य तो यह है कि हमारी सबसे बड़ी कोई कमजोरी यदि है तो वह यह दु:खद वास्तविकता है कि देश के बड़े-बड़े लोगों के मन में इस प्रकार का प्रश्न उठता है। व्यावहारिकता के नाम पर इस प्रकार के प्रश्न का औचित्य बताने का प्रयत्न किया जा सकता है, किन्तु व्यावहारिकता तो यह है कि राष्ट्र संघर्ष में बलाबल का विचार करके नहीं कूदते बल्कि न्याय और अपने राष्ट्रीय हित और मूल्यों की रक्षा का विचार कर युद्ध की विभीषिका का सहर्ष वरण करते हैं। शक्ति और सामर्थ्य का प्रश्न तो युद्ध का संकल्प करने के बाद ही होता है। एक बार न्याय के प्रति श्रद्धा तथा उसको प्राप्त करने के लिए सब कुछ करने की तैयारी हो जाय कि फिर उद्योग पर्व प्रारंभ होता है। यह बात अलग है कि अनत तक भी आप संधि के लिए तैयार रहें परंतु जो युद्ध के लिए तैयार नहीं वह संधि भी क्या करेगा?

सफलता कैसे मिले?
यदि महाभारत निश्चित है तो वह आज हो या कल। उसके लिए उचित अवसर चुना जा सकता है। अर्थात चीन से लड़ने का हमारे पास सामर्थ्य नहीं है, यह प्रश्न नहीं पैदा होना चाहिए बल्कि चीन से लड़कर हम सफलता कैसे पायें यह प्रश्न होना चाहिए। हमें लड़ाई  निश्चित मानकर चलना होगा। यहां आने के बाद हमें दोनों के बलाबल तथा अपने और शत्रु मित्रों का भी विचार करना चाहिए। यह विचार करते हुए हमें संघर्ष की भावी संभावनाओं का भी यथोचित विचार करके  चलना होगा।

विश्व युद्ध का भय
सबसे पहला प्रश्न यह है कि क्या लद्दाख का संघर्ष विश्वयुद्ध में परिणत हो जाएगा? दुर्भाग्य से पिछले दशक में भावी विश्वयुद्ध के विषय में हमारे देश में इतनी चर्चा हुई है तथा हमारे प्रधानमंत्री ने दुनिया के बड़े बड़े गुटों को सलाह देने के लिए इतना कहा है कि हमारे सर पर विश्वयुद्ध का भय बुरी तरह सवार है। संभवत: दुनिया का कोई देश विश्वयुद्ध की संभावनाओं के कारण इतना परेशान नहीं होगा जितना भारत है। हैदराबाद, पूर्वी बंगाल, गोवा, तुकेरग्राम, कश्मीर, लद्दाख किसी भी प्रश्न को लें, हमें लगता है कि वे सब तीसरे महायुद्ध के पलीते का काम करेंगे। अच्छा हो कि हम इस भूत को अपने सर पर से उतार दें।

जहां तक लद्दाख का प्रश्न है, वहां विश्वयुद्ध नहीं होगा। यह जागतिक परिस्थिति, लद्दाख की भौगोलिक स्थिति तथा हमारी विदेश नीति, इन तीनों बातों पर निर्भर करता है। हमारी तटस्थता की नीति इस संघर्ष को व्यापक नहीं होने देगी और इसीलिए हमें आज उसमें परिवर्तन करके पाकिस्तान के साथ गठबंधन नहीं करना चाहिए। हां, उसके साथ हम मित्रता के संबंधों को दृढ़ कर सकते हैं।

क्या रूस चीन को सहायता देगा?
दूसरा प्रश्न है कि यदि विश्वयुद्ध नहीं हुआ तो भी रूस चीन की सहायता कर सकता है तथा जिस कम्युनिस्ट गुट का मुकाबला करने में आज पश्चिम के सब राष्ट्र मिलकर कार्य कर रहे हैं उसके साथ हम अकेले भिड़ जाएं तो क्या यह बुद्धिमानी कही जा सकेगी? जिनके सर पर कम्युनिस्ट का भय बुरी तरह सवार है वे तो उपर्युक्त स्थिति के अलावा और किसी स्थिति की कल्पना नहीं कर सकते, किन्तु सत्य यह है कि रूस आज भारत के विरुद्ध चीन की सहायता नहीं करेगा। रूस और चीन के आंतरिक मतभेद के स्थान पर भारत की विदेश नीति, अंतरराष्टÑीय साम्यवाद की भूमिका रूस को इस संघर्ष से अलग रहने के लिए विवश करेगी। यदि हम अपने ही बल पर खड़े रहें तो रूस और अमेरिका, दोनों तटस्थ रहेंगे।

क्या हम चीन से लड़ सकते हैं?
अब तीसरा प्रश्न पैदा होता है कि क्या हम चीन से सफलतापूर्वक लड़ सकेंगे? इस विषय में इतना ही कहना होगा कि अभी तक भारत के शत्रु और मित्र, दोनों ने ही देश के युद्ध विषयक मनोबल को तोड़ने का काम किया है। चीन के बारे में प्रारंभ से बहुत बढ़-चढ़कर प्रचार किया गया है। दूसरे की थाली की खीर सदा अधिक दिखती है, इस कहावत के अनुरूप हमारी यह धारणा हो गई है कि ‘चीन के पास विपुल सामर्थ्य है तथा हमारे पास कोई ताकत नहीं’। यह मानते हुए भी कि शत्रु को कभी कमजोर नहीं समझना चाहिए, यह कहना सत्य नहीं होगा कि चीन की सैनिक सामर्थ्य भारत की तुलना में इतनी अधिक है कि हम अपने देश के भूभाग को भी उससे मुक्त न कर सकें। चीन के पास सेना की संख्या अधिक है, परंतु उसके सैनिक अनुशासन, वीरता तथा समर नीति में हमारी सेना का मुकाबला नहीं कर सकते। हमारे पास संभव है अद्यतन शस्त्र न हों, किन्तु शस्त्र बल में हम कम नहीं हैं। जहां तक भौगोलिक स्थिति का संबंध है, यह प्रश्न सदैव अपरिवर्तनीय रहने वाला है। जो लोग इससे भी दुर्गमतर स्थानों पर जाकर कश्मीर का युद्ध जीत सके, वे लद्दाख में पिछड़ जायेंगे, यह कहना ठीक नहीं। यातायात का विकास करने के बाद भी वहां की समर-नीति सदैव भिन्न रहेगी तथा यह कहा जा सकता है कि हमारे जवान तथा अफसर इस मामले में अनजान नहीं हैं।


आज हमारे पड़ोसी चीन ने हमारी प्रभुसत्ता को चुनौती दी है। यह सत्य है कि उसने यह चुनौती स्पष्ट युद्ध की घोषणा करके नहीं दी है। किन्तु इससे कोई इंकार नहीं कर सकता कि चीन ने आक्रमण किया है तथा आज यह भारत की भूमि में जहां भी बैठा है तो इसलिए नहीं कि हम उसे वहां बने रहने देना चाहते हैं अथवा हमारे और उसके बीच इस विषय में कोई समझौता हो गया है, अपितु इसलिए कि वह हमारी भूमि पर हमारी प्रभुता स्वीकार करने को तैयार नहीं।

 हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि जिस क्षेत्र में चीन से हमें संघर्ष करना पड़ेगा, वहां हमारे मित्र तथा उसके शत्रु रहते हैं। तिब्बत अभी तक विद्रोह कर रहा है, सिंक्यांग तथा चीनी तुर्किस्तान विद्रोह के लिए तैयार बैठे हैं और फिर चीन की आंतरिक स्थिति, वहां प्रजातंत्र न होने के कारण प्रकट न होती हो किन्तु वह ऐसी नहीं कि चीन के शासक निश्ंिचत होकर पेकिंग से हजारों मील दूर आकर लड़ते रहें। किन्तु यह बात सत्य है कि हमें हिमालय के उत्तर के देशों के प्रति अपनी नीति बदलनी पड़ेगी। तिब्बत के प्रश्न की ओर दुर्लक्ष्य करके हमने अपने ही हाथ काट लिये हैं।

आर्थिक दृष्टि से चीन की स्थिति जर्जर
आर्थिक दृष्टि से ही चीन के चाहे कितने गुणगान क्यों न गाए गए हों, अब यह स्पष्ट हो गया है कि उसकी समृद्धि प्रचारात्मक ही अधिक थी। लद्दाख में लड़ाई का भार संभालना उसके लिए भी सरल नहीं होगा।

हमारी निष्क्रियता ही चीन का बल
सत्य तो यह है कि भारत जैसे देश के साथ यदि सक्रिय संघर्ष का अवसर आया तो चीन कोई भी पग उठाने के पहले सौ बार सोचेगा। अब तो उसका बल हमारी निष्क्रियता और तथाकथित शांति की नीति है, जब तक वह धौलधायो में अपना कब्जा बनाये रख सकता है, वह क्यों पीछे हटकर अपनी बदनामी कराये? किन्तु एक बार उसको हमारी सेनाओं के आगे बढ़ने का निश्चय दिखा कि वह भारत के साथ न्यायपूर्ण समझौता करने को तैयार हो जाएगा।  यदि उसकी हठधर्मी बनी रही तो फिर भारत में आज भी इतना सामर्थ्य है कि वह अपने न्याय—अधिकार का संरक्षण कर सके।